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नियमित ब्लॉग सलीम सरमद की कलम से....

बाज़ार और सांप्रदायिकता

मुक्त रहना यह कठिन काम है- आंद्रे ज़ीद

धर्म और मनोरंजन की दो झीनी परतें देह पर चिपकी हैं। जब लोग नैतिक होंगे मनोरंजन की परत अधिक चमकेगी। जैसे आस्था की हल्की करवट प्रदर्शन में तब्दील हो जाती है। प्रदर्शन फिर राजनीतिक हो सकता है, सामाजिक हो सकता है, व्यक्तिगत भी हो सकता है लेकिन प्रदर्शन धार्मिक नहीं रहता…

प्रदर्शन कैसा भी हो असमानता का प्रतीक है।

असमानता के कारण ही लोगों में स्वार्थ का भाव आता है। जंगल की गहराई में भटकते हुए पूर्वजों की स्मृति ने हमें साहस दिया था। स्मृति को बचाये रखने के लिए हमने देवताओं की कहानियां गढ़ीं। आज भले कोई नहीं जानता कि इबादतगाह का पहला पत्थर किसने रखा, मगर दुख, भय और स्वार्थ के कारणवश सब उसकी शरण में हैं। दुख, भय और स्वार्थ से कोई मुक्त नहीं है।

अनकॉन्शियस माइंड कुछ नहीं है। स्वप्न भी कुछ नहीं हैं… जैसे स्वतंत्र विचार कुछ नहीं है।

हम सब बंधुआ हैं। हम सिर्फ़ धारणाओं का घेरा बढ़ा सकते हैं। बंधन तोड़ना अब कठिन है… बंधन सभी ने सहर्ष स्वीकार किये हैं।

हमारा ऐसा होना तयशुदा नहीं था। जिसने बंधन तोड़ने का प्रयत्न किया उसने भाषा, इतिहास, संस्कृति और सत्ता के मद्दे मुक़ाबिल संघर्ष की राह चुनी।

हम सब अपनी पहचान से मुक्त नहीं हो सकते। हम अपनी भौगोलिक सीमाओं से भी मुकर नहीं सकते।

जो भाषा से वंचित है।

जिसका इतिहास खोखला है।

जिसे संस्कृति के पोषक तत्व नहीं मिले।

सत्ता के दोगलेपन से जो अनभिज्ञ है। उनका ग़ुलाम होना तयशुदा है।

जब तक अन्याय है, कोई भी अपनी पहचान छोड़ना नहीं चाहेगा। हालांकि इतिहास और संस्कृति पूरी तरह से ढकोसला है। जबकि सत्ता ने अपने समर्थकों का भी भला नहीं किया… भाषा उम्मीद जगाती है मगर हर बार निराशा हाथ लगी है। हम सब विचारों के ग़ुलाम हैं।

बाजार शह देता है। सांप्रदायिकता बंधन को और कसती है। कबीर कहते हैं ना- कबीरा खड़ा बज़ार में मांगे सबकी ख़ैर… ये ख़ैर बस्ती, मोहल्ला या चौराहे पर नहीं मांगी जा रही है। हमें बाज़ार में सँभलना है। बाज़ार और सांप्रदायिकता पर नज़र रखिए… दोनों साथ हैं।

फिर भी बाज़ार से कोई भी मुक्त नहीं है। संभव हो तो सांप्रदायिकता से कन्नी काटिए। बंधन अगर हटते भी हैं फिर भी हम देह रह जाते हैं… धर्म और मनोरंजन की झीनी परतों से बनी देह। धारणाओं के ढांचे से बनी देह… विचारों से संचालित देह।

धारणाएं असुरक्षा की गोद में पनपती हैं। धारणाओं से कोई भी मुक्त नहीं है। विज्ञान धारणाओं को मिटाने का सबसे कमज़ोर टूल है… लेकिन दर्शन आज भी धारणाओं से गोरिल्ला युद्ध लड़ रहा है।

सलीम सरमद

सलीम सरमद

1982 में इटावा (उ.प्र.) में जन्मे सलीम सरमद की शिक्षा भोपाल में हुई और भोपाल ही उनकी कर्म-भूमि है। वह साहित्य सृजन के साथ सरकारी शिक्षक के तौर पर विद्यार्थियों को भौतिक विज्ञान पढ़ाते हैं। सलीम अपने लेखन में अक्सर प्रयोगधर्मी हैं, उनके मिज़ाज में एकरंगी नहीं है। 'मिट्टी नम' उनकी चौथी किताब है, जो ग़ज़लों और नज़्मों का संकलन है। इससे पहले सरमद की तीन किताबें 'शहज़ादों का ख़ून' (कथेतर) 'दूसरा कबीर' (गद्य/काव्य) और 'तीसरा किरदार' (उपन्यास) प्रकाशित हो चुकी हैं।

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