rare earth minerals, world map of minerals
नियमित ब्लॉग विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....

सदी के 'नये तेल': पर्यावरण की बड़ी चुनौती

            स्मार्टफ़ोन की चमचमाती स्क्रीन से लेकर इलेक्ट्रिक वाहनों की साइलेंट रफ़्तार और पवन चक्कियों के विशाल ब्लेड्स तक, आधुनिक दुनिया जिस हरित और डिजिटल क्रांति की ओर बढ़ रही है, उसकी अदृश्य रीढ़, रेयर अर्थ मिनरल्स यानी दुर्लभ भू-तत्व हैं। नाम के विपरीत ये खनिज पृथ्वी में बहुत दुर्लभ नहीं हैं, बल्कि इनका शुद्ध रूप में मिलना और इनका सुरक्षित निष्कर्षण करना अत्यधिक जटिल है, जो इन्हें रेयर बनाता है। वर्तमान में ये रणनीतिक संसाधन, वैश्विक राजनीति, आधुनिक अर्थव्यवस्था और गंभीर पर्यावरणीय संकट के केंद्र में आ चुके हैं।

आवर्त सारणी के सत्रह रासायनिक तत्वों के समूह को रेयर अर्थ एलिमेंट्स कहा जाता है, जिनमें पंद्रह लैंथेनाइड्स समूह के तत्व हैं और समान गुणों के कारण स्कैंडियम तथा यिट्रियम भी इसी श्रेणी का हिस्सा हैं। इन तत्वों में लैंथेनम हाइब्रिड कारों में, सैरियम ऑटोमोबाइल के कैटलिटिक कन्वर्टर्स में और प्रैसियोडायमियम तथा नियोडायमियम आज के सबसे शक्तिशाली स्थायी चुंबक बनाने के लिए दुनिया भर में सबसे ज़्यादा मांग में हैं।

वहीं, यूरोपियम स्क्रीन को लाल रंग देता है और अन्य तत्व जैसे गैडोलीनियम, टर्बियम तथा डिस्प्रोसियम विशिष्ट तकनीकी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। ये सभी तत्व अक्सर एक साथ ही अयस्कों में घुले-मिले पाये जाते हैं, जिन्हें अलग करना रसायन विज्ञान की कठिन प्रक्रियाओं में है।

रेयर अर्थ मिनरल्स का वैश्विक नक़्शा

वर्तमान में यह नक़्शा एकतरफ़ा झुका हुआ है, जहाँ चीन लगभग साठ से सत्तर प्रतिशत खनन और नब्बे प्रतिशत प्रसंस्करण क्षमता के साथ इस बाज़ार का निर्विवाद सम्राट है। आइए इस स्थिति पर नज़र डालें:

  • चीन की बायान ओबो दुनिया की सबसे बड़ी खदान है और रिफ़ाइनिंग तकनीक पर उसका एकाधिकार है।
  • इसके विपरीत संयुक्त राज्य अमेरिका कैलिफ़ोर्निया की माउंटेनपास खदान से खनन तो करता है, लेकिन प्रोसेसिंग के लिए बाहरी निर्भरता पर काम कर रहा है।
  • म्यांमार भारी रेयर अर्थ तत्वों का बड़ा स्रोत बनकर चीन को कच्चे माल की आपूर्ति करता है।
  • ऑस्ट्रेलिया अपनी माउंट वेल्ड खदान के दम पर एक प्रमुख उत्पादक है।
  • भारत के पास भी अपनी तटीय रेत में इन तत्वों का प्रचुर भंडार है, जिसका प्रबंधन इंडियन रेयर अर्थ्स लिमिटेड द्वारा किया जाता है, लेकिन भारत में इसका वाणिज्यिक दोहन अभी शुरूआती चरणों में है।
  • हाल ही वियतनाम, अफ्रीका और स्वीडन में नये भंडारों की खोज ने वैश्विक उम्मीदें जगायी हैं।

आज दुनिया इस बात को लेकर आशंकित है कि चीन इन खनिजों को एक भू-राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकता है, जिसके कारण अमेरिका, यूरोपीय संघ, जापान और भारत मिलकर ‘खनिज सुरक्षा साझेदारी’ जैसे गठबंधन बना रहे हैं ताकि उद्योगों के लिए इनकी आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित किया जा सके।

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इन खनिजों को आधुनिक उद्योग का विटामिन कहा जाता है क्योंकि इनकी थोड़ी-सी मात्रा भी उत्पाद की दक्षता को कई गुना बढ़ा देती है। पवन चक्कियों के जनरेटर और इलेक्ट्रिक वाहनों की मोटरों के लिए नियोडायमियम-आयरन-बोरॉन चुंबक अनिवार्य हैं, तो दूसरी तरफ़ लड़ाकू विमानों, मिसाइल गाइडेंस सिस्टम और रडार प्रणालियों जैसे रक्षा उपकरणों में भी इनका भारी उपयोग होता है।

हमारे दैनिक जीवन के इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे स्मार्टफ़ोन के स्पीकर, हार्ड ड्राइव, वाइब्रेशन मोटर्स और फ़ाइबर ऑप्टिक केबल्स भी इन तत्वों के उपयोग बिना काम नहीं कर सकते।

पर्यावरणीय क़ीमत

“हरित तकनीक” को सक्षम बनाने वाले ये खनिज ख़ुद को निकालने की प्रक्रिया में ही पर्यावरण पर बेहद गहरा और काला दाग़ छोड़ते हैं। कुछ बिंदुओं में समझिए:

रेयर अर्थ तत्व अक्सर थोरियम और यूरेनियम जैसे भारी और रेडियोधर्मी तत्वों के साथ मिश्रित रूप में पाये जाते हैं। जब एक टन रेयर अर्थ ऑक्साइड को रिफ़ाइन किया जाता है, तो उसके साथ भारी मात्रा में रेडियोधर्मी अपशिष्ट और ज़हरीला एसिड युक्त कीचड़ निकलता है, जो ठीक से प्रबंधित न होने पर भूजल और मिट्टी को सदियों के लिए विषैला बना देता है।

इसके अलावा, इन खनिजों को अयस्क से अलग करने के लिए सल्फ्यूरिक और हाइड्रोक्लोरिक एसिड जैसे रसायनों के विशाल लीचिंग पाउंड्स बनाये जाते हैं, जिससे निकलने वाला अम्लीय अपशिष्ट जल, आस-पास के क्षेत्रों को कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की चपेट में ले आता है।

खुली खदानों के कारण बड़े पैमाने पर जंगलों का कटना और अयस्क को पीसने-भूनने के दौरान निकलने वाली फ़्लोरीन तथा सल्फ़र डाइऑक्साइड जैसी गैसें वायुमंडल को गंभीर रूप से प्रदूषित करती हैं।

भविष्य की राह

भविष्य में पर्यावरण और आपूर्ति दोनों संकटों से निपटने के लिए अब तीन स्तरों पर काम चल रहा है…

पहला प्रयास पुराने स्मार्टफ़ोन, कंप्यूटर और ईवी मोटर्स से रेयर अर्थ चुंबकों को निकालकर उनका पुनर्चक्रण यानी अर्बन माइनिंग करना, क्योंकि वर्तमान में केवल एक प्रतिशत से कम रेयर अर्थ तत्व ही रीसायकल हो पाते हैं।

दूसरा प्रयास वैकल्पिक रसायन शास्त्र पर आधारित है, जिसके तहत वैज्ञानिक ऐसी तकनीक और मोटरें विकसित करने पर काम कर रहे हैं जिनमें इन दुर्लभ तत्वों की आवश्यकता ही न हो।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण प्रयास बायो-लीचिंग का है, जिसमें रसायनों के बजाय विशेष बैक्टीरिया का उपयोग करके खनिजों को अलग किया जाता है ताकि एसिड प्रदूषण को न्यूनतम किया जा सके।

रेयर अर्थ मिनरल्स इस सदी के “नये तेल” के रूप में उभरे हैं। जीवाश्म ईंधन से मुक्ति पाने की होड़ में पृथ्वी को एक नये रासायनिक संकट से बचाने का एकमात्र तरीक़ा यही है कि इनके खनन और प्रसंस्करण की ऐसी तकनीकें अपनायी जाएं जो पर्यावरण के अनुकूल और पारिस्थितिक रूप से सुरक्षित हों।

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

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