
संयुक्तांक 23-24
आब-ओ-हवा – संयुक्तांक 23-24
भाषाओं के साथ ही साहित्य, कला और परिवेश के बीच पुल बनाने की इस कड़ी में विशेष नज़र है अभिव्यक्ति की आज़ादी से जुड़ी कुछ प्रमुख घटनाओं पर। नियमित स्तंभों की अपनी रौनक़ है, जो नये कोण और नयी दृष्टियां देते हैं। इसके साथ ही मक़बूल शायर राजेश रेड्डी से एक ख़ास बातचीत, शाहनाज़ इमरानी की याद और बीते कल की कुछ महत्वपूर्ण आवाज़ों का स्मरण इस अंक को समृद्ध करता है…
गद्य
फ़्रंट स्टोरी
स्टैंड लीजिए, आप अपने ही देश में हैं : राजेश जोशी, विष्णु नागर, कविता कृष्णपल्लवी, राकेश कायस्थ, भवेश दिलशाद की टिप्पणियां
मुआयना
ब्लॉग : हम बोलेंगे (संपादकीय)
उर्दू, ईदी, शब्दकोष : भवेश दिलशाद
ब्लॉग : तख़्ती
बच्चे कोरे कागज़ नहीं : आलोक कुमार मिश्रा
सरोकार
‘बोलने’ के पक्ष में शीर्ष न्यायालय, बड़े काम के बोल : आब-ओ-हवा प्रस्तुति
ग़ज़ल रंग
ब्लॉग : शेरगोई
“थोड़ा है, थोड़े की ज़रूरत है” : विजय स्वर्णकार
ब्लॉग : गूंजती आवाज़ें
आभासी दुनिया और इलियास राहत : सलीम सरमद
गुनगुनाहट
ब्लॉग : समकाल का गीत विमर्श
नयी सदी की चुनौतियांँ और नवगीत कविता-4 : राजा अवस्थी
ब्लॉग : जिया सो गाया
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है? : मनस्वी अपर्णा
फ़न की बात
‘अच्छी शायरी ही चलती है, टिकती है’ : प्रख्यात शायर राजेश रेड्डी से ग़ज़ाला तबस्सुम की बातचीत
किताब कौतुक
ब्लॉग : क़िस्सागोई
कठोर सच की कहानियां : नमिता सिंह
ब्लॉग : उर्दू के शाहकार
फ़साना-ए-आज़ाद : डॉ. आज़म
ब्लॉग : तह-दर-तह
शिकारी व गौरैया : निशांत कौशिक
सदरंग
ब्लॉग : वरधन की कला चर्चा
कला में एब्स्ट्रैक्शन-2 : धृतिवर्धन गुप्त
ब्लॉग : उड़ जाएगा हंस अकेला
रॉबिन की धुन पर मन्ना दा का रूमान : विवेक सावरीकर ‘मृदुल’
ब्लॉग : तरक़्क़ीपसंद तहरीक़ कहकशां
..पहुंचे हैं कहां तक इल्म-ओ-फ़न साक़ी : जाहिद ख़ान
याद बाक़ी
शाहनाज़ इमरानी, एक यादगार कहानी : प्रतिभा गोटीवाले
पूर्व पाठ…
‘कैकेयी अब बोलती’… एक कृति धारावाहिक-6
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