जगन्नाथ प्रसाद श्रीवास्तव, jagannath prasad shrivastav, braj shrivastav
संस्मरण ब्रज श्रीवास्तव की कलम से....

अब कहाँ मिलते हैं दादाजी जैसे लोग!

             दादाजी परिवार का एक अत्यंत प्रिय और गरिमामय रिश्ता होते हैं। उन्हें पितामह भी कहा जाता है। हर किसी को दादाजी का स्नेह नहीं मिल पाता, पर मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूँ कि मुझे उनका प्रेम मिला। हम सभी अपने दादाजी को स्नेह से “बब्बा” कहते थे। वे मेरे पिताजी सहित तीन पुत्रों और दो बेटियों के पिता थे। उनका शरीर लंबा, ऊँचा और इकहरा था। लगभग पंद्रह वर्ष की आयु तक मुझे उनका सान्निध्य मिला और वही समय मेरे बचपन की सबसे उजली स्मृतियों का आधार बन गया।

मेरे दादाजी का नाम जगन्नाथ प्रसाद श्रीवास्तव था। वे सचमुच कुछ विशेष थे। उनके व्यक्तित्व में एक ऐसी सहज गरिमा थी, जो किसी भी व्यक्ति को पहली ही मुलाक़ात में प्रभावित कर देती थी। वे प्रायः धोती-कुर्ता पहनते थे और उनके चेहरे पर एक शांत आत्मविश्वास झलकता रहता था। वे स्वयं पटवारी थे, इसलिए गाँव के लोगों के बीच उनका विशेष सम्मान था। वे मेरे पिताजी के भी पिताजी थे, इसलिए उनके भीतर एक स्वाभाविक ठसक और ज़िम्मेदारी का भाव दिखायी देता था। उनकी लंबी भुजाएँ देखकर मन में अक्सर “आजानुबाहु” की उपमा कौंध जाती थी।

हमारा गाँव काँकर, मध्यप्रदेश के विदिशा ज़िले की कुरवाई तहसील के अंतर्गत आने वाला एक छोटा-सा गाँव था। पृथ्वी के विशाल मानचित्र पर वह एक छोटा-सा बिंदु भर रहा होगा, पर हमारे लिए वही पूरा संसार था। गाँव के किनारे बंडई नाम की एक छोटी नदी बहती थी। उसके दोनों ओर दूर-दूर तक फैले खेत थे। खजूर के लंबे वृक्ष, पीपल, इमली और कबीट के पेड़ गाँव के वातावरण को विशिष्ट बनाते थे। एक हनुमान मंदिर था, कुछ चबूतरे और गलियारे थे, और गिने-चुने पक्के मकान। अधिकांश घर कच्चे ही थे; हमारा घर भी कच्चा था, लेकिन दो मंज़िला था। दीपावली के दिनों में जब उसे छुई से पोत दिया जाता, तो वह सचमुच किसी फूल की तरह खिल उठता था।

उन दिनों गाँव का जीवन बहुत सरल था। शौचालय जैसी सुविधा तो गाँव के सबसे संपन्न घरों में भी नहीं थी। लोग चौपालों में बैठकर चौपड़ और ताश खेलते, खेतों की बातें करते और जीवन को उसी सहजता के साथ जीते रहते। विवाह-समारोहों में पंगतों का विशेष महत्व होता था। गाँव की चौपाल में जब भी कोई बैठक होती, दादाजी को आदरपूर्वक बुलाया जाता। लोग उन्हें “लालाजी”, “काकाजी” या “बब्बा” कहकर संबोधित करते थे। किसी छोटे-मोटे विवाद में उनकी राय को महत्व दिया जाता था।

दादाजी का स्वभाव मिलनसार था। लोग उनके पास आते-जाते रहते। माँ बताती थीं कि उनके कहने पर हमारे घर में लगभग रोज़ दो-चार ऐसे मेहमानों का भोजन बनता रहता था जो या तो उनके कास्तकार होते या कोई साधु-संत अथवा राहगीर। वे सबको अपनत्व से मिलते थे और यही कारण था कि गाँव में लगभग हर व्यक्ति उनसे स्नेह रखता था। उनका मन केवल व्यवहारिक जीवन तक सीमित नहीं था। वे भीतर से एक आध्यात्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। जीवन के गहरे अर्थों पर वे अक्सर विचार करते रहते थे। अनेक दोहे और चौपाइयाँ उन्हें कंठस्थ थीं। मुझे याद है, वे अपने एकांत में अक्सर यह चौपाई गुनगुनाते रहते—
उमा कहुँ मैं अनुभव अपना
सत हरि भजन जगत सब सपना

फिर कुछ देर आँखें बंद कर शांत बैठ जाते, मानो जीवन के किसी गहरे रहस्य पर मनन कर रहे हों। एक बार उन्होंने मुझसे यह चौपाई घर की दीवार पर लिखवायी थी। इसके साथ ही उन्हें यह पंक्ति भी बहुत प्रिय थी—

रामायुध अंकित गृह शोभा वरन न जाई

इन पंक्तियों में उनके जीवन-दर्शन की झलक मिलती थी। संसार उन्हें एक क्षणभंगुर स्वप्न की तरह दिखायी देता था और ईश्वर-स्मरण उनके लिए जीवन का स्थायी आधार था।

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दादाजी को भाषा और साहित्य से भी प्रेम था। वे नियमित रूप से पुस्तकें पढ़ते रहते थे। ‘कल्याण’, ‘रामचरितमानस’ और ‘गीता’ जैसी पुस्तकें घर में रहती थीं और मैंने उन्हें कई बार इन ग्रंथों में तल्लीन होकर पढ़ते देखा था। पिताजी तो बाद में कवि के रूप में प्रसिद्ध हुए, पर एक बार दादाजी ने भी मुझे अपनी लिखी एक कविता दिखायी थी। वह छंद में थी और उसकी अंतिम पंक्ति में “जगन्नाथ” शब्द आया था। उनकी हस्तलिपि बहुत सुंदर थी—छोटे-छोटे अक्षरों वाली। उनके पास स्याही से चलने वाले मोटे लाल और नीले पेन होते थे और स्याही की दवातें भी रहती थीं। पटवारी होने के कारण वे लंबे-लंबे कागज़ों पर कुछ न कुछ लिखते रहते। कभी-कभी वे हमें भी रफ़ काम के लिए वही काग़ज़ दे देते।

दादा-पोते का संबंध अपने आप में बड़ा आत्मीय होता है। मैं उनका ज्येष्ठ और लाड़ला पोता था। वे मुझे अक्सर अपने साथ रखते। हमने साथ में कई बस यात्राएँ कीं और कई बार पैदल भी दूर-दूर तक गये। वे चाहते थे कि मैं मेहनती बनूँ, इसलिए कभी-कभी छोटे-छोटे काम भी दे देते— जैसे बैलों को नदी तक पानी पिलाने ले जाना, भूसा से भरा बोझ कुछ दूरी तक सिर पर ले जाना, खेत पर खाना पहुँचाना या खलिहान में काम में हाथ बँटाना। उन्होंने मुझे बैलगाड़ी चलाना भी सिखाया। इसके अलावा वे मुझे कुरवाई, दुनातर और टोरिया के मेलों में भी ले जाते थे।

मेरे बचपन की स्मृतियों में एक दृश्य बार-बार उभरता है—गर्मी की छुट्टियाँ, गाँव की शांत दोपहर और हमारे घर में रखी लकड़ी की मोहरों वाली शतरंज की बिसात। दादाजी ने ही मुझे शतरंज खेलना सिखाया था। वे धैर्य से हर चाल समझाते और कहते— “बेटा, शतरंज केवल खेल नहीं है, यह सोचने की कला सिखाती है।”

हम दोनों देर तक खेलते रहते। कभी मैं जीत जाता, कभी वे; पर हर बार मुझे लगता कि असली जीत तो उनके साथ बिताये उस समय की होती थी। संगीत से भी उन्हें विशेष लगाव था। उन्होंने एक हारमोनियम ख़रीदा था। जब वे उस पर उँगलियाँ चलाते और रामचरितमानस की चौपाइयाँ गाते, तो पूरी तरह उसमें डूब जाते। हमारे यहाँ ऐसे संगीत-सत्र को “गम्मत” कहा जाता था। लोग ऊँचे आलाप लेकर गाते, बीच-बीच में चाय और बीड़ी की महफ़िल भी चलती। उनके गाने की प्रतीक्षा रहती थी। उनकी यह संगीत-रुचि पिताजी में भी आयी और अब हम लोग भी कभी-कभी उस परंपरा का आनंद लेते हैं।

गणित में भी उनकी पकड़ अद्भुत थी। जब मैं कक्षा दस में पढ़ता था, कभी-कभी वे मेरे पूछने पर क्षेत्रमिति के प्रश्न मौखिक ही हल कर देते थे। बिना काग़ज़-कलम के जटिल गणनाएँ कर लेना उनकी असाधारण स्मरण-शक्ति और तार्किक क्षमता का प्रमाण था।

वे धार्मिक अवश्य थे, पर आडंबर से दूर रहते थे। पाखंड उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं था। श्रद्धा उनके लिए बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि भीतर की सच्चाई थी। सन् 1975 के आसपास वे दादीजी, पिताजी और चाचाजी के साथ इलाहाबाद कुंभ भी गये थे। उस यात्रा का ज़िक्र वे बड़े आनंद से किया करते थे।

मेरे जीवन से जुड़ी एक छोटी-सी घटना भी उनके स्नेह की याद दिलाती है। मेरा पहला नाम कुलदीप रखा गया था। एक बार बच्चों ने मुझे चिढ़ाते हुए “कुल्फी” कहना शुरू कर दिया। मैंने दादाजी से शिकायत की। वे सीधे स्कूल गये और हेडमास्टर को आवेदन देकर मेरा नाम बदलकर “ब्रज बिहारी” रखवा दिया। शायद उसमें उनकी कृष्ण-भक्ति की छाया भी थी।

खाने-पीने में भी उन्हें विशेष रुचि थी। वे स्वयं सिलबट्टे पर मसाले पीसते और दादीजी से सब्ज़ी बनवाते। गाँव में लोग उन्हें वैद्य भी मानते थे। उनके पास एक छोटी-सी किट रहती थी जिसमें कुछ दवाइयाँ रहतीं। किसी को हल्का बुख़ार या सर्दी हो जाये तो वे तुलसी की चाय का नुस्ख़ा बताते।

खेती से भी उन्हें गहरा लगाव था। वे नियमित रूप से खेतों पर जाते, मज़दूरों के साथ काम करते और फसल के समय खलिहान में रात-रात भर जागते। अपने पुरुषार्थ से उन्होंने काँकर में लगभग पंद्रह खेत ख़रीदे थे।

अपने स्वभाव में वे दार्शनिक और कुछ हद तक वीतरागी भी थे। संसार को वे एक व्यापक और गहरी दृष्टि से देखते थे। जीवन के अंतिम वर्षों में उन्हें शराब का व्यसन भी हो गया था। यह बात परिवार के लिए चिंता का कारण थी और हमें उनका यह रूप अच्छा नहीं लगता था, पर उनके प्रति हमारा सम्मान और स्नेह कभी कम नहीं हुआ। उनके भीतर का स्नेही, उदार और विचारशील व्यक्ति फिर भी सबको प्रिय बना रहा।

सन् 1980 की एक गर्मी का दिन था। उस समय हम लोग पिताजी के साथ शाहनगर, ज़िला पन्ना में रहते थे। अचानक दादाजी के निधन का समाचार मिला। यह ख़बर सुनकर हम सब स्तब्ध रह गये, मानो किसी विशाल वृक्ष की छाया अचानक हट गयी हो। वे लगभग सत्तर वर्ष तक जीवित रहे।

आज उनके जाने के चार दशक बाद भी उनका व्यक्तित्व स्मृतियों में उज्ज्वल बना हुआ है। उनकी सीख और उनका स्नेह हमारे जीवन में एक स्थायी उपस्थिति की तरह है। जब उन दिनों को याद करता हूँ तो लगता है— दादाजी जैसे लोग अब कहाँ मिलते हैं। वे एक ऐसे समय के प्रतिनिधि थे जिसमें सादगी थी, श्रम था, आस्था थी और जीवन को समझने की एक शांत, गहरी दृष्टि थी।

उनकी स्मृतियाँ आज भी मन के एक कोने में सुरक्षित हैं। जब कभी वह कौंधते हैं तो उस समय में पहुंच जाता हूँ।

ब्रज श्रीवास्तव

ब्रज श्रीवास्तव

कोई संपादक समकालीन काव्य परिदृश्य में एक युवा स्वर कहता है तो कोई स्थापित कवि। ब्रज कवि होने के साथ ख़ुद एक संपादक भी हैं, 'साहित्य की बात' नामक समूह के संचालक भी और राष्ट्रीय स्तर के साहित्यिक आयोजनों के सूत्रधार भी। उनके आधा दर्जन कविता संग्रह आ चुके हैं और इतने ही संकलनों का संपादन भी वह कर चुके हैं। गायन, चित्र, पोस्टर आदि सृजन भी उनके कला व्यक्तित्व के आयाम हैं।

2 comments on “अब कहाँ मिलते हैं दादाजी जैसे लोग!

  1. बुजुर्ग परिवार के वट वृक्ष होते हैं, इनकी छाया में परिवार के सदस्यों में स्नेह, सद् गुणों और संस्कार का विकास होता है।

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