
- March 23, 2026
- आब-ओ-हवा
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पुस्तक चर्चा प्रद्युम्न शर्मा की कलम से....
दीवान-ए-आरज़ू: परंपरागत भी आधुनिकता भी
‘दीवान-ए-आरज़ू’, मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा से तआल्लुक़ रखने वाली शाइरा अंजुमन मंसूरी का दीवान है। इस दीवान से पहले अंजुमन मंसूरी के तीन शे’री मज्मुए मंज़र-ए-आम पर आ चुके हैं। वर्ष 2025 में अब अंजुमन मंसूरी ‘आरज़ू’ की शाइरी दीवान की शक्ल में आयी है।
इस दीवान की शाइरी पर बातचीत करने से पहले ज़रूरी समझता हूं कि शाइरा के बारे में कुछ परिचय आपको दूं। शाइरा संस्कृत साहित्य में स्नातक हैं और उन्होंने हिन्दी व उर्दू साहित्य में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की है। इस किताब की शुरूआत में ही बताया गया है कि दीवान किसे कहते हैं। दीवान उसे कहते हैं जिसमें हरूफ़-ए-तहज्जी (उर्दू की वर्णमाला) के हिसाब से रदीफ़ हों, यानि जिस शे’री मजमूए में, ‘अलिफ़’ से लेकर ‘ये’ तक, हर हर्फ़ पर ख़त्म होने वाले लफ़्ज़ की रदीफ़ वाली ग़ज़लें होती हैं, वही मुकम्मल तौर से दीवान समझा जाता है। पहले वे ग़ज़ल या ग़ज़लें आतीं हैं जिनके रदीफ़ का अंतिम हर्फ़ ‘अलिफ़’ पर ख़त्म होता है, उसके बाद ऐसी जिनका रदीफ़ ‘बे’ पर और फिर इसी तरह उर्दू वर्णमाला के हिसाब से आने वाले हुरूफ़ पर ख़त्म होने वाली रदीफ़ों वाली ग़ज़लें…
अब यहां सवाल उठता है कि दीवान क्या सिर्फ़ उर्दू वर्णमाला के ही लिहाज़ से लिखा जा सकता है? दो साल की हो रही आब-ओ-हवा के दूसरे अंक में ही ग़ज़ाला तबस्सुम ने ‘दीवान किसे कहते हैं’ लेख में इस सवाल को तवज्जो देते हुए लिखा था कि आने वाले वक़्तों में मुमकिन है कि अरबी, फ़ारसी और उर्दू वर्णमाला की तरह हिंदी वर्णमाला के अनुसार भी दीवान सामने आएं। दीवान की परिभाषाएं समझने के लिए यह लेख पढ़ना चाहिए।
अब हम बात करें आरज़ू जी के दीवान पर तो इसकी अधिकांश ग़ज़लें ‘अलिफ़’ पर ख़त्म होने वाली रदीफ़ संबंधी हैं। हर एक हर्फ़ से संबंधित ग़ज़लों के समूहों पर पृथक अनुक्रमांक अंकित किया गया है। शाइरी का दीवान की शक्ल में प्रकाशित होना एक उपलब्धि माना जाता रहा है और यह किसी भी शाइर के लिए गर्व की बात होती है।
कहने में कोई संकोच नहीं कि अंजुमन मंसूरी ‘आरज़ू’ के इस संग्रह से गुज़रते हुए शाइरी के म’यार के परिप्रेक्ष्य में इस दीवान ने कहीं भी निराश नहीं किया। इस दीवान की शाइरी विषय-वस्तुओं, उपमाओं और रूपकों से समृद्ध है। कर्म को प्रधानता देते हुए दीवान के पहले शे’र में ही शाइरा कितनी सरलता से कहतीं हैं-

“दो क़दम जो बढ़ा नहीं सकता
अपनी मंज़िल वो पा नहीं सकता”
ऐसा ही एक बेहतरीन उदाहरण मिलता है, जब शाइरा कहती हैं-
“पड़ा होता कहीं दुनिया की पस्ती में ये गुम होकर
जो दरिया ‘आरजू’ कुहसार से आगे नहीं बढ़ता”
और यह भी कि हमारी ज़िन्दगी पर लोगों के कहने-सुनने का कोई असर नहीं होना चाहिए-
“कई मख़्लूक की है ज़िंदगी, गौहर का घर फिर भी
फ़क़त खारा कहा सबने मगर सागर नहीं टूटा”
इन्सानी मनोविज्ञान का अन्दाज़ा भी शायरा को बख़ूबी है, वे कहती हैं-
“अगर दिल में कोई उम्मीद का जज़्बा नहीं रहता
तो इंसाँ गर्दिश-ए-अय्याम में ज़िंदा नहीं रहता”
मुहावरों का प्रयोग भी क़ाबिले-ग़ौर है-
“ओखली में सर दिया है ख़ुद ही जब
मूसलों की मार से घबराएं क्या”
उल्लेखनीय है ऊपर कहे गये शे’रों की रदीफ़ का अंतिम हर्फ़ अलिफ़ पर ख़त्म होता है, जैसी कि शर्त दीवान के लिए होती है, उसके मुताबिक़ ये दीवान की शुरूआती ग़ज़लों के ही अशआर हैं। आगे देखिए शाइरा की फ़िक्र जाइज़ है जब वे कहती हैं-
“खेत खलिहान और कगर ग़ाइब
गाँव से भी हुए शजर ग़ाइब”
बेटे और बेटी में फ़र्क किये जाने की चिंता भी शाइरा को है-
“लाख क़ाबिल हो जहाँ भर में ये बेटी लेकिन
है रवायत कि रहे बेटा ही घर का वारिस”
और
“अब भी बेटे बेटियों की परवरिश में फ़र्क़ है
रो रही इंसानियत इंसाँ की फ़ितरत देख कर”
ग़ज़ल का यह मतल’आ पर्यावरण के प्रति शाइरा की फ़िक्र को उज़ागर करता है, जब वे कहती हैं-
“इन दरख़्तों की शहादत का है जाया काग़ज़
अपनी हस्ती में कहाँ यूँ ही ये आया काग़ज़’
अपने दीवान में शाइरा वर्तमान व्यवस्था से रू-ब-रू होते हुए फ़रमाती हैं-
“अब ये सिस्टम में है कि हर मुंसिफ़
वक़्त पर फ़ैसला नहीं देता”
यहाँ देखने की बात है कि अंग्रेज़ी के उस शब्द से गुरेज़ नहीं किया गया जो हमारी बोली में रच-बस गया है। मानवीय संबंधों में परिलक्षित गिरावट पर भी उनकी नज़र है-
“मतलब-परस्त इतना हुआ है जहाँ कि अब
रिश्ते निभाये जाते हैं मे’यार देखकर”
इस दीवान की शाइरी में प्रयोग किये गये इस्ति’आरे सुबोध हैं। अपेक्षाकृत सरल शब्दों का प्रयोग है। फ़ारसी और अरबी भाषा के जो शब्द प्रयुक्त हुए हैं, कह सकते हैं अमूमन आमफ़ह्म उर्दू अल्फ़ाज़ का प्रयोग इस दीवान में पाया जाता है। जहाँ तक तरक़ीब का या सामासिक पदों या इज़ाफ़त या अत्फ़ के इस्ते’माल का प्रश्न है, कम ही स्थानों पर भाषा इतनी क्लिष्ट होती है कि आम हिन्दी पाठक की समझ के परे हो। शे’रों में कसावट, उनका फ्लो और मिसरों में पुख़्तगी की कमी कहीं महसूस नहीं होती।
कहा जा सकता है ‘दीवान-ए-आरज़ू’ की शाइरी का केन्द्रीय-विचार इंसानियत का है। इसमें मुहब्बत है, भाईचारा है और सूफ़ी दर्शन भी। यद्यपि अंक और शब्दार्थ दिये जाने में कहीं-कहीं तकनीकी त्रुटियाँ परिलक्षित होती हैं। इस दीवान का साहित्यिक मोल क्या है, ये तो नाक़िद और वक़्त ही तय करेगा पर आम पाठकों के लिए इसमें बहुत कुछ सरस और सहज उपलब्ध है। कुल मिलाकर इस दीवान में परंपरा के साथ ही और कुछ आधुनिकता भी है। व्यक्ति, समाज, संस्कृति, सियासत और मज़हब की झलक इसमें मिलती है। शाइरा अपने शे’रों के माध्यम से सहज ही अपने विचारों का संप्रेषण करती हैं। दीवान पठनीय है।

प्रद्युम्न शर्मा
अतिरिक्त संचालक, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के पद से हाल ही सेवानिवृत्त। साहित्य में रुचि, विशेषकर ग़ज़ल कहने, पढ़ने और सुनने का शौक़ रखते हैं। चित्रकारी का भी शौक़ और तेलुगु भाषा के भी जानकार। संपर्क: 9407130066।
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