
- April 13, 2026
- आब-ओ-हवा
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डॉ. दिनेश पाठक की कलम से....
आशा भोसले: हमेशा जवां आवाज़ का ख़ामोश होना!
आशा भोसले ने एक सुदीर्घ और यशस्वी जीवन जिया। उन्होंने 20 भाषाओं में लगभग 12 हज़ार रचनाओं को अपनी आवाज़ दी, जिनमें गीत, गज़ल, भजन, क़व्वाली, पॉप, फ़िल्मी, ग़ैर-फ़िल्मी से लेकर विदेशी बैंड्स और गायकों तक सभी कुछ शामिल रहा किंतु लगभग आठ दशक लंबे अपने गायन जीवन के दौरान वे अपने शुरूआती संघर्ष को कतई नहीं भूलीं। हालांकि उनका संघर्ष लता दीदी के संघर्ष से कुछ हटकर था, जहां लता ताई के ऊपर स्वयं को एक गायिका के रूप में स्थापित करने के संघर्ष के साथ ही एक बड़े परिवार को पालने की ज़िम्मेदारी भी थी, वहीं आशा का संघर्ष अपनी एक अलग पहचान बनाकर स्थापित होने को लेकर था। अपने पहले विवाह के कटु अनुभव और बच्चों के एकल अभिभावक के रूप में पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी के साथ ही अपनी निजी और पेशेवर ज़िंदगी में उन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे। लेकिन इन उतार-चढ़ावों से विचलित हुए बिना वे अपने कर्म पथ पर निरंतर अग्रसर रहीं।
कहते हैं बरगद के साये में किसी पौधे का पनपना बहुत कठिन होता है। पण्डित दीनानाथ मंगेशकर के असामयिक निधन के बाद मंगेशकर परिवार की ज़िम्मेदारियों ने लता मंगेशकर को जाने-अनजाने एक ऐसे वटवृक्ष में परिणत कर दिया था, जिसके साये में पूरा परिवार जीवन के संघर्षों से दो-चार हो रहा था। लता जी ने एक इंटरव्यू में मुझे बताया था, “मैं गाने में अच्छी थी और मेरा मन भी उसी में रमता था लेकिन युवा और भोली थी और दुनिया के बेरहम दस्तूर से अपरिचित थी। मेरी तो विधिवत् शिक्षा भी नहीं हुई थी, कोई पीछे देखने वाला भी नहीं था। ऐसे में यदि मेरा काम छूट गया तो क्या होगा… यह सोचकर मैं कांप उठती थी, इसीलिए इच्छा न होने पर भी मुझे बहुत कुछ करना पड़ता था। क्योंकि मेरा परिवार उस समय बड़े अभाव के दौर से गुज़र रहा था। मेरी चचेरी बहन, आका इंदौर से अपने दो छोटे बच्चों के साथ हमारे यहां रहने आ गयी थी। परिवार में हम सब नौ सदस्य हो गये थे और कंपनी उन दिनों मुझे केवल 80 रुपये महीना देती थी, उससे तो घर का चूल्हा जलाना भी मुश्किल था।”
वाक़ई लता ताई ने, मीना, आशा, उषा और हृदयनाथ को अपने स्नेह की ठंडी छांव में उन सब दुश्वारियों से दूर रखा, जिससे वो ख़ुद गुज़री थीं। संगीत क्योंकि परिवार के संस्कार में था, इसलिए सभी धीरे-धीरे संगीत में पारंगत होते गये। कुछ घराने का असर और कुछ वंशानुगत ख़ूबियां आशा को अपने शुरूआती गीतों के लिए जो वाहवाही मिलती, उसमें मापदंड लता ही होतीं। लेकिन आशा को वो तारीफ़ें ख़ुश नहीं करतीं थीं।

ख़ुद आशा भोंसले ने एक इंटरव्यू में कहा था, “दीदी की तरह गाना गाने के लिए मुझे संघर्ष की ज़रूरत नहीं पड़ती। आवाज़ एक विरासत होती है। परिवार की तरफ़ से भी मिल सकती है.. भगवान की तरफ़ से भी। लेकिन क्या था कि, जब मैं गाती थी तो लोग आगे आकर तारीफ़ करते और कहते आशाजी आपका गाना बहुत अच्छा लगा। ऐसा लगा कि बस जैसे लता दीदी ही गा रही हों। तो मैं सुनकर उदास हो जाती… मुझे बड़ा दुःख होता। मैं सोचती थी कि जब तक असल चीज़ दुनिया में है, नक़ल को कोई क्यों अपनाएगा? इसलिए मेरे लिए अपनी एक ‘सेपरेट आइडेंटिटी’ (पृथक पहचान) बनाने के लिए संघर्ष ज़रूरी हो गया था। संयोग था कि कुछ ऐसा हुआ कि मेरी आवाज़ में थोड़ा फ़र्क आ गया। मैंने उसको पहचानकर, धीरे-धीरे उसे ‘डेवलप’ करना शुरू किया। यहीं से मेरी आवाज़ ‘आशा भोसले’ की आवाज़ बनी।”
वाक़ई आशा भोसले की आवाज़ को सुनते हुए हमें बार-बार यह लगता है उनकी आवाज़ के दो सिरे हैं एक सिरा वह, जिसे सुनते हुए महसूस होता है, जैसे यह आशा भोसले नहीं भारत की किसी भी एक आम स्त्री, कोई मां, कोई बेटी, कोई बहन या फिर किसी प्रेमिका का स्वर है, जबकि दूसरा सिरा वो है जिसे सुनकर लगता है कि यह एक ऐसी आधुनिक स्त्री की आवाज़ है जो ज़िंदगी को अपने ही बेबाक अंदाज़ से जीना जानती है।
हम यह कह सकते हैं कि लोगों ने विशेष तौर पर संगीतकारों ने आशा भोसले के स्वर के इस दूसरे सिरे को ही अधिक पहचाना और श्रोताओं से परिचित भी कराया।
हम यह भी कह सकते हैं कि उन्होंने इसे ही आशा भोसले के स्वर की स्थायी पहचान बना डाला और शायद इसमें आशा ताई की भी मौन स्वीकृति सम्मिलित थी क्योंकि वे अपनी आवाज़ को लता मंगेशकर से अलग सिद्ध करना चाहती थीं।
हालांकि इस संसार में हर एक चीज़ की तुलना नहीं की जा सकती है और फिर आवाज़ के आयाम तो इतने विस्तृत होते हैं कि उन्हें किसी तयशुदा माप पर तुलनात्मक रूप से परखकर अंतिम निर्णय करना लगभग असंभव ही है, लेकिन फिर भी यदि हम इन दो बहनों की आवाज़ों को कोई नाम देना चाहें तो कह सकते हैं कि, लता की आवाज़ यदि आत्मा है, तो आशा की आवाज़ शरीर।
आशा भोसले की आवाज़ में रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आंखों के सामने उभरने वाली भारतीय स्त्री की बहुआयामी छवियां झलकती रही हैं। यह आशा भोसले की आवाज़ का ही कमाल है कि उसे सुनने वाले अल्पवयस्क अपनी उम्र से आगे बढ़कर उसे महसूस करते हैं और बुज़ुर्ग अपनी उम्र से नीचे आकर उसका आस्वादन करते हैं।
आशा ताई के सुरों का जादू एक ओर, जाइए आप कहां जाएंगे, अभी न जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं, मैं जब भी अकेली होती हूं तुम चुपके से आ जाते हो, अबके बरस भेजो भैय्या को बाबुल, मांग के साथ तुम्हारा… जैसे गीतों में उभर-उभर पड़ता है तो दूसरी ओर पिया तू अब तो आजा, आ जाने-जां ढूंढती फिर रही मैं तुझे मैं यहां तू कहां, ये लड़का हाय अल्ला कैसा है दीवाना, ये मेरा दिल प्यार का दीवाना… जैसे गीतों को मादकता का लिबास पहना देता है, वहीं तीसरी ओर दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए… जैसी ग़ज़लें और जानम समझा करो.. जैसे पॉप गीत उन्हें एक मुक्कमल पहचान देते हैं।
आख़िर यह कैसे संभव हो पाता है? यह पूछने पर एक बातचीत में उन्होंने कहा था, “मन्द्रसप्तक में गाना, बिना ख़राश के खरज लगाना और सुगमता के साथ तारसप्तक में चले जाना- यह सब इसलिए संभव हो पाया कि मैं एक ज़िद्दी प्रवृत्ति की महिला हूं। ज़िंदगी में मुझे उन तमाम कामों को करने की इच्छा होती है, जो चुनौती देते हैं। यदि मुझे अपनी ही कोई इमेज चुनौती दे, तो मैं उससे भी भिड़ जाती हूं। तो ऐसे गानों के पीछे ज़्यादातर एक ज़िद थी। म्यूज़िक डायरेक्टर जब मुझसे कहते थे कि ये गाना एक यंग एक्ट्रेस के लिए है तुम इसे नहीं गा पाओगी..! बस वहीं मेरे मन में ज़िद पैदा हो जाती थी कि मैं ही गाऊँगी और गाकर रहूँगी।”
शायद आशा ताई की इस ज़िद्दी प्रवृत्ति ने ही उन्हें उम्र के नौवें दशक तक विभिन्न टेलीविज़न और स्टेज शो के मंचों पर सक्रिय रखा। हम इसे उनकी जिजीविषा कह सकते हैं लेकिन वे कहती थीं, “मैं यह मानती हूं कि यह सब मेरे क्लासिकल बेस, माता-पिता और लता दीदी के आशीर्वाद के कारण ही संभव हो पाया।”
(लता मंगेशकर और आशा भोसले का दुर्लभ चित्र लेखक के निजी संग्रह से)

डॉ. दिनेश पाठक
राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं हेतु दीर्घ काल से कला, संस्कृति, संगीत एवं सामायिक लेखन एवं संपादन। आकाशवाणी, दूरदर्शन एवं विभिन्न टी.वी. चैनलों हेतु कार्यक्रम/वृतचित्र लेखन, निर्माण, प्रस्तुतकर्ता के रूप में संबद्ध। विविध क्षेत्रों की विशिष्ट विभूतियों के शताधिक विस्तृत साक्षात्कार जिनमें लता मंगेशकर का अंतिम इंटरव्यू सम्मिलित है। तानसेन समारोह शताब्दी वर्ष हेतु निर्मित विशेष वृतचित्र, 'सुरों और संस्कृतियों का वैश्विक समागम तानसेन समारोह' सहित ऐसे अन्य प्रोजेक्टों में लेखन। 'स्वरित' का संपादन । साहित्य अकादमी म.प्र. सहित अन्य संस्थानों से सम्मानित। राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय, ग्वालियर के पूर्व कुलसचिव एवं वित्त नियंत्रक। संपर्क: dpathak2005@gmail.com
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