
- January 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आज़म की कलम से....
आज़ाद का स्टाइल उन्हीं से शुरू, उन्हीं पर ख़त्म
“आज़ाद नस्र (गद्य) में शायरी करते हैं और शायरी करते हुए नस्र लिखते हैं।” -राम बाबू सक्सेना
“आज़ाद को प्रतीक और रूपक का एक ढंग पसंद आया है और उन्होंने इससे हर जगह काम लिया है। यानी उन्होंने बेजान चीज़ों और इंसानी नैतिकता को मूर्त रूप देकर अपनी कहानियों के किरदार बनाये हैं। हर जगह दिल, बुद्धि, विश्वास, आत्मा, न्याय और अन्याय चलते-फिरते दिखते हैं। बार-बार उनकी गति और स्थिरता को देखकर उकताहट महसूस होती है, लेकिन आज़ाद ने अपनी शैली, बुद्धि और कल्पना की शक्ति से उनमें नयी-नयी सूरतें पैदा की हैं।” -हामिद हसन क़ादरी
“आज़ाद उर्दू-ए-मुअल्ला के हीरो हैं।” -मेहदी अफ़ादी
“नैरंग-ए-ख़याल हज़ार नज़्मों पर श्रेष्ठता रखती है।” -याह्या तन्हा
“आज़ाद उर्दू साहित्य और भाषा के एक जाने-माने हस्ताक्षर हैं, जिन्हें कुदरत ने कल्पनाशीलता की ख़ूबसूरती और वाक्पटुता के प्रस्तुतिकरण का ऐसा वरदान दिया है कि उनकी क़लम का चमत्कार उनकी रचनाओं में रंग भर देता है और सुनने वालों को बांध लेता है और उन्हें आनंद महसूस कराता है।” -सैयद अब्दुल्ला
नैरंग-ए-ख़्याल के सभी लेख जॉनसन, एडिसन और स्टील जैसे मशहूर अंग्रेज़ी निबंधकारों के लेखों से लिये गये हैं। आज़ाद खुद कहते हैं: “मैंने अक्सर अंग्रेज़ी निबंधकारों के विचारों से दीया जलाया है।” ऐसा लगता है जैसे उनके लेख स्वरचित नहीं हैं। या तो अनुवाद हैं या उधार लिये गये हैं, लेकिन शैली ऐसी है कि लगता है जैसे आज़ाद की अपनी रचनाएं हैं। आज़ाद खुद कहते हैं:
“यह किताब नैरंग-ए-ख़्याल है जिसे मैं अपने दिल के ज़ौक़ से लिखता हूं और इसे शौक़ से छपवाता हूं।”
यह उर्दू गद्य की एक शाहकार किताब है। इसमें 13 निबंध हैं। सभी रूपक शैली में लिखे गये हैं। इसे दो भागों में लिखा गया था। पहला हिस्सा, जिसमें सात निबंध थे, 1880 में पब्लिश हुआ था। जिसके आख़िर में एक अनाउंसमेंट है:
“हालांकि विचारों की सभा जमी हुई है और लोग काल्पनिक भाषाओं से जादू कर रहे हैं, लेकिन क़रीब सौ पेज काले हो गये हैं, अब सभा स्थगित हो गयी है और कलाम का दरवाज़ा कुछ समय के लिए बंद हो गया है। ऐ सभा में पधारे लोगो, आपका आना मुबारक हो। धीरे-धीरे, लेकिन अगली सभा के लिए निवेदन अब मान लेना चाहिए क्योंकि भाग-2 का मटीरियल हमारे पास है।” (पेज 112)
दूसरा हिस्सा, जिसमें छह आर्टिकल थे, आज़ाद की मौत के बाद 1923 में प्रकाशित हुआ था। इसमें जिन निबंधों के अनुवाद शामिल हैं, वे इस तरह हैं:
- इंसान किसी भी हाल में ख़ुश नहीं
(THE ENDEAVOUR OF MANKIND TO GET RID OF BURDONS) - शोहरत-ए-आम बक़ा-ए-दवाम का दरबार
(THE VISION OF THE TABLE OF FAME) - ख़ुश तब्ई
(OUR TRUE AND FALSE HUMOUR) - आग़ाज़-ए-आफ़रीनश में बाग़-ए-आलम का क्या रंग था और रफ़्ता-रफ़्ता क्या हो गया
(दुनिया की शुरूआत में दुनिया का बाग़ीचा किस रंग का था और उसका क्या हुआ?/ AN ALLEGORICAL HISTORY OF REST AND LABOUR) - झूठ और सच का रज़्म नामा
(झूठ और सच की लड़ाई / TRUTH AND FALSEHOOD AND FICTION AND ALLEGERY) - गुलशन-ए-उम्मीद की बहार
(उम्मीद का बाग़ीचा/THE GARDEN OF HOPE) - सैर-ए-ज़िंदगी
(ज़िंदगी की यात्रा/THE VOYAGE OF LIFE) - उलूम की बदनसीबी
(देखभाल का तरीक़ा/THE CONDUCT OF PATRONAGE) - इल्मियत और ज़कावत का मुक़ाबिला
(समझदारी और सीखने का रूपक/THE ALLEGORY OF WIT AND LEARNING) - नुक़्ताचीनी
(आलोचना का रूपक/THE ALLEGORY OF CRITICISM) - मुरक़क़ा-ए-ख़ुशबयानी
(वाक्पटुता का रूपक) - जन्नत-उल-हम्क़ा
(मूर्ख का स्वर्ग) - सैर-ए-अदम
(परलोक की यात्रा)
लेखन में एलेगोरिकल स्टाइल अपनाया गया है। यह स्टाइल, यह एलेगरी क्या है? जॉनसन के शब्दों में:
“एलेगरी (रूपक) का मतलब है कहानी कहने का एक ऐसा स्टाइल जिसमें बेजान और बुद्धिरहित चीज़ों को अक्सर ज़िंदा चीज़ों के तौर पर दिखाया जाता है। और इन चीज़ों या कहानियों की मदद से इंसान के नैतिक मूल्यों और भावनाओं को शुद्ध और बेहतर बनाया जाता है।”
आज़ाद ने एलेगरी के ज़रिये धर्म और नैतिकता, साइन्स और आर्ट, कविता और साहित्य के मुद्दों को बड़ी बारीकी और बड़ी कलाकारी के साथ पेश किया है और उन्हें मेहनत, आराम, लालच, संतोष, सच, झूठ, उम्मीद, निराशा, बुढ़ापा, बचपन, अज्ञानता, ज्ञान वग़ैरह जैसी इंसानी विशेषताओं से जोड़ा है। उन्होंने पूरी तरह से कल्पना का सहारा लिया है और शब्दों के रूपक बनाये हैं, लेकिन कुछ इस तरह से जो असलियत के बहुत क़रीब आ गये हैं।
इसमें एक पोएटिक स्टाइल/शायराना अंदाज़ अपनाया गया है, यानी आम कविता की तरह गद्य में भी मज़ा है। वह भाषा की मिठास को मनोरंजन का ज़रिया मानते हैं। इसमें मेटाफ़र का रंग अच्छे से उभरता है, जो गद्य को उसकी परफेक्शन तक ले जाता है। जहां तक भाषा की बात है, दिल्ली की भाषा का इस्तेमाल किया गया है, जो साफ़ और बरजस्ता है। आज़ाद ने जिस स्टाइल को अपनाया है वो उन्हीं से शुरू और उन्हीं पर ख़त्म है। लिखने के पुराने और नये स्टाइल को इस तरह अपनाया गया है कि फ़ारसी की कठिन शैली और आम बोलचाल की भाषा में तालमेल बैठ गया है।
उपमाओं और रूपकों का बोझ तो है, लेकिन आसान वाक्य विन्यास का जलवा भी ऐसा है कि निबंध दिलचस्प बना रहता है। हां, लेकिन उनके मन मस्तिष्क पर माज़ी (अतीत) के शानदार दौर का असर या दबदबा बना रहता है और वह वर्तमान को कमतर समझते हैं। वह कुछ अंग्रेज़ी शब्दों के लिए सटीक पर्यायवाची शब्द न होने की मजबूरी भी बताते हैं। जैसे WIT (विट) के लिए वे लिखते हैं कि “मैंने बहुत कोशिश की कोई एकदम उपयुक्त शब्द नहीं मिला। मुझे ज़कावत/इंटेलिजेंस लिखना पड़ा। उसमें शब्दगत बदसूरती और मतलब की कमियां साफ़ हैं, लेकिन शब्द उतने भी नहीं थे। सारे द्वंद्व सहने को मजबूर होना पड़ा क्योंकि मेरा अभिप्राय, मतलब समझाने से है।” (पेज 78)
आज़ाद के वाक्य विन्यास का एक उदाहरण देखें: “मुल्क-मुल्क फ़राग़ था और खुसरो आराम रहम दिल फ़रिश्ता मक़ाम गोया उनका बादशाह था। वह रईयत से ख़िदमत चाहता था न किसी से ख़िराज बाज़ मांगता था, उसकी इताअत व फ़रमानबरदारी उसमें अदा हो जाती थी।”

यह भी माना जाता है कि अगर आज़ाद ने इस पुस्तक के अलावा कुछ और नहीं भी लिखा होता, तो भी उनकी गिनती उर्दू के अमर लेखकों में होती।
एक नज़र मुहम्मद हुसैन आज़ाद
मशहूर उर्दू लेखक और कवि आज़ाद (जन्म: 10 जून 1830 – मृत्यु: 22 जनवरी 1910) ने अपनी शिक्षा अपने पिता से और फिर अपने जुनून-ए-शौक़ से पायी। पिता मौलवी मुहम्मद बाकर थे, जिन्होंने 1837 में दिल्ली का पहला अख़बार (उर्दू अख़बार) निकाला था। 1854 में मुहम्मद हुसैन आज़ाद भी इसमें एडिटर के तौर पर शामिल हो गये। 1857 में आज़ादी की लड़ाई के दौरान, इस उर्दू अख़बार ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ तीखे लेख छापे, लेकिन अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जारी बगावत पूरी तरह नाकाम रही। इसके बाद, पकड़-धकड़ शुरू हो गयी। मौलाना बाक़र को गिरफ़्तार करके गोली मार दी गयी। कुछ के अनुसार तोप से उड़ा दिया गया। आज़ाद अपनी जान बचाने के लिए भूमिगत हो गये।
1873 में कर्नल हॉलरॉयड ने पंजाब सोसाइटी की स्थापना की और एक ख़ास तरह के मुशायरों की नींव रखी, जिसमें ग़ज़ल की जगह नज़्म लिखने के शीर्षक दिये गये। आज़ाद और अल्ताफ़ हुसैन हाली ने इन कविताओं में बड़े जोश के साथ हिस्सा लिया और कई नैतिक और नैचुरल नज़्में लिखीं।
आज़ाद गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर में अरबी और फ़ारसी के प्रोफ़ेसर भी थे और 1887 में क्वीन विक्टोरिया की जुबली पर उन्हें “शम्सुल उलेमा” की उपाधि मिली। उनकी रचनाएँ हैं:
आब हयात, आज़ाद (1880/शोअरा उर्दू, नैरंग ख़याल (1880), सु-ए-फ़ारस (1887), क़सस-उल-हिंद (1869), सैर ए ईरान (1886), दरबार अकबरी (1898), नज़्म ए आज़ाद, तज़किर-ए-आज़ाद, जानवरिस्तान, ख़ुमकदा-ए-आज़ाद, दीवान-ए-ज़ौक (कंपाइल्ड), लुग़त-ए-आज़ाद, जामे-उल-क़वायद, निगरिस्तान फ़ारस, फ़िलोसोफ़िकल थियोलॉजी आदि।
मानसिक थकान और कम उम्र बेटी की असमय मौत की वजह से, 1889 में उनका दिमाग़ी संतुलन बिगड़ गया और उनमें पागलपन के लक्षण दिखने लगे। यह हालत उनके अंतिम दिनों तक बनी रही और 22 जनवरी 1910 को 80 साल की उम्र में लाहौर में उनकी मौत हो गयी। उनका मक़बरा लाहौर, कर्बला, गाम-ए-शाह में है। (जीवन परिचय विकिपीडिया के सौजन्य से)

डॉक्टर मो. आज़म
बीयूएमएस में गोल्ड मेडलिस्ट, एम.ए. (उर्दू) के बाद से ही शासकीय सेवा में। चिकित्सकीय विभाग में सेवा के साथ ही अदबी सफ़र भी लगातार जारी रहा। ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास व चिकित्सकी पद्धतियों पर किताबों के साथ ही ग़ज़ल के छन्द शास्त्र पर महत्पपूर्ण किताबें और रेख्ता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ज़ल विधा का शिक्षण। दो किताबों का संपादन भी। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित, पुरस्कृत। आकाशवाणी, दूरदर्शन से अनेक बार प्रसारित और अनेक मुशायरों व साहित्य मंचों पर शिरकत।
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