बरसात, raining
बारिश का मौसम यूं कभी जाता नहीं। कहीं न कहीं हमेशा बना ही रहता है। यूं भी आषाढ़ और सावन के बाद भादो है। कहीं बरसात कहर तो कहीं राहत। कहीं बादलों से पानी बरस रहा है तो कहीं आंखों से! उर्दू-हिंदी-हिंदोस्तानी शायरी में यह कैफ़ियत दर्ज होती रही है। ऐसे ही कुछ बेहतरीन मिसरे आब-ओ-हवा के पाठकों के लिए...
संकलन : देवदत्त संगेप (अतिरिक्त योगदान: प्रदीप निफाड़कर)...

शायरी में बारिश-बादल-बरसात

वो तिरे नसीब की बारिशें किसी और छत पे बरस गयीं
दिल-ए-बे-ख़बर मिरी बात सुन उसे भूल जा उसे भूल जा
अमजद इस्लाम अमजद

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अबके सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई
मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई
गोपालदास नीरज

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कब नज़र में आएगी बे-दाग़ सब्ज़े की बहार
ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बा’द
फ़ैज़

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गुनगुनाती हुई आती है फ़लक से बूँदें
कोई बदली तेरे पाज़ेब से टकराई है
क़तील शिफ़ाई

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हम तो समझे थे बरसात में बरसेगी शराब
आयी बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया
सुदर्शन फ़ाक़िर

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पहले तो दो जिस्म मिले फिर रूह मिली फिर रात हुई
फिर मत पूछो याद नहीं है कितने दिन बरसात हुई
नासिर शकेब

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दिल की खेती सूख रही है कैसी ये बरसात हुई
ख़्वाबों के बादल आते हैं लेकिन आग बरसती है
राही मासूम रज़ा

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ख़ूब बादल का बरसना प्यार है बरसात में
रहमतों का इस तरह इज़हार है बरसात में
सुहैल काकोरवी

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अब के बारिश में तो ये कार-ए-ज़ियाँ होना ही था
अपनी कच्ची बस्तियों को बे-निशाँ होना ही था
मोहसिन नक़वी

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ज़िंदगी के सारे मौसम आ के रुख़्सत हो गये
मेरी आँखों में कहीं बरसात बाक़ी रह गयी
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

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बारिश हुई तो फूलों के तन चाक हो गये
मौसम के हाथ भीग के सफ़्फ़ाक हो गये
परवीन शाकिर
(सफ़्फ़ाक = निर्मम)

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बरसात आ गयी तो दरकने लगी ज़मीन
सूखा मचा रही है ये बारिश तो देखिए
दुष्यंत कुमार

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तुम आँखों की बरसात बचाये हुये रखना
कुछ लोग अभी आग लगाना नहीं भूले
सागर आज़मी

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हाँ दुआ मांगी थी लेकिन ये तो सोचा भी न था
मौसम-ए-बरसात सब दीवार-ओ-दर ले जाएगा
अज़ीम अमरोहवी

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आज मैं बारिश में जब भीगा तो तुम ज़ाहिर हुईं
जाने कबसे रह रही थीं मुझमें अंगड़ाई सी तुम
कुंवर बेचैन

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घर टपकता है और उस पर घर में वो मेहमान है
पानी-पानी हो रही है आबरू बरसात में
फ़ना कानपुरी

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आँखों में तूफ़ान बहुत है
बारिश का इम्कान बहुत है
अंजुम लुधियानवी

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बा’द बारिश के फ़लक साफ़ हुआ है लेकिन
डूबती नाव से अब क्या मैं सितारा देखूँ
चित्रा भरद्वाज

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उनको आदी बनाओ बारिश का
जिन सुतूनों पे छत बनानी है
फ़हमी बदायूंनी

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छत, बारिश, तनहाई, रात
पूछ न कैसे बिताई रात
फ़हमी बदायूंनी

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मशवरा आपका जाइज़ है मगर मेरे अज़ीज़
तेज़ बारिश हो तो छतरी भी भिगो देती है
हसीब सोज़

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सूखे के हम थे मारे, बारिश में आ गये उफ़
इन बारिशों ने हमको पानी पिला के मारा
कलीम ख़ान

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अब्रे-बाराँ की तो बरसात सभी ने देखी
मैंने आँखों से बरसता हुआ सावन देखा
कुँवर कुसुमेश
(अब्रे-बाराँ = बरसात के बादल)

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अब के बरसात की रुत और भी भड़कीली है
जिस्म से आग निकलती है क़बा गीली है
मुज़फ़्फ़र वारसी

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तेरी यादों में बरसे हैं कितने सावन आँखों से
मन के इस मरुथल ने पी ली है बरसातें कितनी ही
महावीर सिंह ‘दिवाकर’

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दिन भी पी सकता हूँ और रात भी पी सकता हूँ
प्यास ऐसी है कि बरसात भी पी सकता हूँ
मोहसिन आफ़ताब केलापूरी

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कभी बरसात मे भीगे बदन वापस जो घर आऊं
तो सूखा तौलिया मुझको थमाती हैं तेरी यादें
मंजू सक्सेना

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बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है
निदा फ़ाज़ली

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जाने किस महिवाल से आती है मिलने के लिए
सोहनी गाती हुई सौंधी हवा बरसात की
नज़ीर बनारसी

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सूरज की शराफ़त पे न इल्ज़ाम लगाओ
दरअस्ल ये बंजर तो है बरसात का मारा
परवेज़ मौरान्वी

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कहीं आँसुओं की है दास्ताँ कहीं मुस्कुराहटों का बयाँ
कहीं बरकतों की हैं बारिशें कहीं तिश्नगी बे-हिसाब है
राजेश रेड्डी

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है आधे शहर में बारिश तो आधे शहर में धूप
हवा भी इलाक़ा बदलने के फ़न से वाक़िफ़ है
रेहाना रूही

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पिछली बरसात का पानी अभी निकला भी नहीं
फिर से इन आंखों में बरसात चली आई है
रामनाथ शोधार्थी

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बरसीं वहीं वहीं पे समंदर थे जिस जगह
ऊपर से हुक्म था तो घटाएँ भी क्या करें
सबा अफ़ग़ानी

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दूर तक दिल के सहरा में बारिश हुई
तुमको देखा तो जीने की ख़्वाहिश हुई
शकील आज़मी

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झुलस रही है धूप की शिद्दत में जो एक ज़माने से
कैसे लिक्खे क़सीदे आख़िर वो बैरन बरसात के नाम
सिया सचदेव

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जब हो बारिश तो शजर और निखर जाता है
फिर वो बारिश का जो पानी था किधर जाता है?
सैयद वसीम नक़वी

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गोशे बदल-बदल के हर इक रात काट दी
कच्चे मकान में अबके भी बरसात काट दी
ताहिर फ़राज़

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‘तेज़ बारिश की दुआ मैंने ‘ज़फ़र’ मांगी थी
ये भी लाज़िम है कि अब गिरती हुई छत देखूं’
ज़फ़र गोरखपुरी

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अब्र ने अपना ही मोहताज बना रक्खा था
धूप ने जिस्म के अंदर से उगाई बारिश
ज़ुबैर अली ताबिश

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बारिश ने जाते जाते पलटकर कहा निज़ाम
तेरी ये उम्र है कि सुलगती कपास है
शीन काफ़ निज़ाम

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आ गया बारिशों का फिर मौसम
कोई जंगल बुला रहा है मुझे
सलीम सरमद

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बादल घने हैं काली घटाएं हैं आजकल
मेरे शहर में तेज़ हवाएँ हैं आजकल
किशन तिवारी

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दो घड़ी की ये बारिश उसको तर करेगी क्या
जिसकी ख़ुश्क आँखों से उम्र भर हुई बारिश
अंजुमन मंसूरी ‘आरज़ू’

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हद से ज़्यादा रोना भी तो ठीक नहीं
बारिश में कच्चे घर रिसने लगते हैं
महेश कुमार कुलदीप

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पत्तों की गोद में छुपी बूंदों के नाम है
बारिश है और सुनहरी सितंबर की शाम है
ग़ज़ाला तबस्सुम

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उस रात बरसते थे बादल भी ये नैना भी
वो रात बरसती है बरसात में अब दिन भर
भवेश दिलशाद

देवदत्त संगेप, devdutta sangep

देवदत्त संगेप

बैंक अधिकारी के रूप में भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त। शायरी के प्रति ख़ास लगाव। उर्दू, हिन्दी और मराठी ग़ज़लों में गहरी दिलचस्पी। मिज़ाह शायरी करने के भी शौक़ीन और चुनिंदा शेरों और ग़ज़लों के संकलनकर्ता के रूप में पहचान।

8 comments on “शायरी में बारिश-बादल-बरसात

  1. शानदार

    मेरे शेर को शामिल करने पर शुक्रिया❤️❤️

  2. बेहतरीन संकलन
    बहुत मुबारक
    मेरे शे’र को जगह देने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया

  3. बढ़िया संकलन!
    एक अपना भी शेर अर्ज़ करता हूँ…

    बरसात का मौसम भी कितना ग़ज़ब ढाता है
    सराबोर हो तन-मन पर सुलगता तो है ज़रूर

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