
- January 15, 2026
- आब-ओ-हवा
- 0
पाक्षिक ब्लॉग अरुण अर्णव खरे की कलम से....
भाषाओं के पार: व्यंग्य का भारतीय संसार-2
दक्षिण भारतीय भाषाओं में तमिल-व्यंग्य की परंपरा अत्यंत प्राचीन और सामाजिक चेतना से जुड़ी रही है। संगम साहित्य से लेकर आधुनिक काल तक तमिल व्यंग्य ने सामाजिक विषमताओं, जाति-व्यवस्था, धार्मिक पाखंड, सत्ता के दमन और मध्यवर्गीय दोहरेपन पर तीखे और विवेकपूर्ण प्रहार किए हैं। तमिल व्यंग्य की विशेषता है कि वह गंभीर सामाजिक प्रश्नों को को उग्रता के बजाय सूक्ष्म कटाक्ष और तार्किक विवेक के माध्यम से प्रस्तुत करता है।
आधुनिक तमिल व्यंग्य के प्रमुख स्तंभों में चो रामास्वामी (श्रीनिवास अयैर रामस्वामी) का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वे पत्रकार, नाटककार और राजनीतिक व्यंग्यकार के रूप में प्रसिद्ध रहे। उनके व्यंग्य में राजनीति, नौकरशाही और सत्ता की विडंबनाओं पर निर्भीक टिप्पणी मिलती है। पत्रिका ‘तुगलक’ के माध्यम से उन्होंने तमिल व्यंग्य को जन-चेतना से जोड़ा और उसे व्यापक सामाजिक प्रभाव प्रदान किया। देवन (के. कृष्णमूर्ति) और एन.सी. मोहनदास ने मध्यवर्गीय जीवन और सामाजिक विसंगतियों पर संयत, सुसंस्कृत और बौद्धिक व्यंग्य लिखा। मदन (मदनगोपाल) ने अपने कार्टून और व्यंग्यात्मक रेखाचित्रों के माध्यम से तमिल व्यंग्य को दृश्यात्मक प्रभाव और व्यापक लोकप्रियता प्रदान की।
कन्नड़ साहित्य में व्यंग्य की परंपरा समाज-सुधार और वैचारिक चेतना से गहराई से जुड़ी रही है। कन्नड़ व्यंग्य ने जातिगत असमानताओं, धार्मिक रूढ़ियों, राजनीतिक अवसरवाद और प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर सशक्त और साहसी टिप्पणी की है। इसमें लोकभाषा और लोकसंस्कृति का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। कन्नड़ व्यंग्य के प्रमुख हस्ताक्षरों में टी.पी. कैलासम का नाम अग्रणी है। वे अपने लेखन में सामाजिक पाखंड और नैतिक दोहरेपन पर तीखा व्यंग्य करते हैं। गोरूर रामस्वामी अयंगार ने ग्रामीण समाज, प्रशासनिक व्यवस्था और मध्यवर्गीय जीवन पर यथार्थवादी व्यंग्य प्रस्तुत किया। आधुनिक कन्नड़ साहित्य में टी सुनंदम्मा, वाई.एन. गुंडूराव, भुवनेश्वरी हेगड़े, पु. लंकेश, कलमंगी कृष्णमूर्ति और के.पी. पूर्णचंद्र तेजस्वी ने पत्रकारिता और कथा-साहित्य के माध्यम से व्यंग्य को वैचारिक धार प्रदान की। कन्नड़ व्यंग्य में हास्य अक्सर करुणा और प्रतिरोध के साथ जुड़ा हुआ दिखाई देता है।
गुजराती साहित्य में व्यंग्य की परंपरा हास्य, लोकबोध और सामाजिक चेतना के संतुलित समन्वय के रूप में विकसित हुई है। गुजराती व्यंग्य विशेष रूप से व्यापारी वर्ग, मध्यवर्गीय मानसिकता, धार्मिक आडंबर और सामाजिक पाखंड को अपना लक्ष्य बनाता रहा है। इसकी भाषा सहज, चुटीली और लोक-संवेदनाओं से जुड़ी हुई है। आधुनिक गुजराती व्यंग्य के सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली रचनाकार तारक मेहता माने जाते हैं। उनकी रचनाओं में शहरी मध्यवर्ग, सामाजिक दिखावा और मानवीय कमजोरियाँ हास्यपूर्ण किंतु विचारोत्तेजक ढंग से प्रस्तुत होती हैं। ‘दुनियाने उंधा चश्मा’ गुजराती व्यंग्य की सर्वाधिक चर्चित कृति है। इसी कृति पर एक अत्यंत लोकप्रिय धारावाहिक तारक मेहता का उल्टा चश्मा बना है।
गुजराती के एक अत्यंत लोकप्रिय और बहुपठ व्यंग्यकार विनोद भट्ट हैं। उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विषयों पर व्यंग्यात्मक निबंधों और स्तंभ लेखन के माध्यम से विशेष पहचान बनाई। उनके व्यंग्य-निबंधों की भाषा बोलचाल के निकट है और हास्य का स्वभाव आत्म-व्यंग्यात्मक होने के कारण वे सामान्य पाठक से गहरे स्तर पर संवाद स्थापित करते हैं। अहो केम छो, घरनो घा उंसा तथा मिडल क्लास मनोरंजन उनके प्रसिद्द व्यंग्य संग्रह हैं। समकालीन गुजराती व्यंग्यकारों में रजनीकुमार पंड्या, सिनेमा, संस्कृति और समकालीन मुद्दों पर तीखे कटाक्षपूर्ण लेखन के लिए जाने जाते हैं। नवलराम पांड्या, रमणभाई नीलकंठ, दामू सांगाणी, चिनु मोदी और हरसूरदान गढ़वी गुजराती व्यंग्य परंपरा के अन्य प्रतिनिधि रचनाकार हैं।
तेलुगू साहित्य में प्राचीन काल में ही, काव्य में परोक्ष व्यंग्य और वक्रोक्ति के संकेत मिलते हैं। भद्र भूपाल के नीतिसार मुक्तावली और सुमित शतकम इसके उल्लेखनीय प्रमाण हैं। आधुनिक काल में तेलुगू व्यंग्य, मुख्यत: सामाजिक कुरीतियों, जातिगत भेदभाव, धार्मिक आडंबर और राजनीतिक अवसरवाद पर केंद्रित रहा है। तेलुगू व्यंग्य की विशेषता उसका संयत किंतु तीक्ष्ण स्वर है, जिसमें हास्य के साथ नैतिक प्रश्न भी अंतर्निहित रहते हैं। तेलुगू व्यंग्य के प्रमुख रचनाकारों में गुरजाड़ा अप्पाराव, चिलकमर्ति लक्ष्मीनरसिंहम, एम. कामेश्वर राव, तादागिरि पोदराजू, पोत्तूरी विजयलक्ष्मी, भामिदिपाही रामगोपालम, अवधानुष सुधाकर राव, अंबल्ला जनार्दन और त्रिपुरनेनि रामस्वामी चौधरी के नाम उल्लेखनीय हैं। चिलकमर्ति लक्ष्मीनरसिंहम की कृति गणपति को तेलुगू व्यंग्य में विशिष्ट स्थान प्राप्त है। एम. कामेश्वर राव ने अपनी कृतियों कालक्षेपमु, अप्पुडु तथा इप्पुडु में समाज की कमजोरियों और विकृतियों पर मार्मिक तथा विचारोत्तेजक प्रहार किया है। गुरजाड़ा अप्पाराव के नाटक कन्याशुल्कम् में सामाजिक रूढ़ियों और दहेज-प्रथा पर तीखा व्यंग्य मिलता है। तादागिरि पोदराजू ने अपनी कृति प्रमाण पत्र में निर्धन वर्ग की समस्याओं को व्यंग्य के माध्यम से रेखांकित किया है।
केरल देश का सबसे साक्षर प्रदेश माना जाता है। वहाँ बोली जाने वाली मलयालम भाषा में व्यंग्य की परंपरा बौद्धिक तीक्ष्णता, सामाजिक चेतना और सुधारवादी दृष्टि के लिए जानी जाती है। केरल का उच्च साक्षरता-बोध और प्रगतिशील सामाजिक वातावरण मलयालम व्यंग्य को विशेष धार प्रदान करता है। यहाँ व्यंग्य जाति-व्यवस्था, धार्मिक रूढ़ियों, नौकरशाही, राजनीतिक दोगलेपन और मध्यवर्गीय नैतिकता को लक्षित करता है। मलयालम व्यंग्य के आरंभिक संकेत सी.वी. रामन पिल्लै और ई.वी. कृष्ण पिल्लै के लेखन में मिलते हैं। आधुनिक काल में ओ.वी. विजयन और कुंजन नांबियार के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। विजयन के कार्टून और व्यंग्यात्मक लेख सत्ता, राजनीति और वैचारिक पाखंड पर तीखा प्रहार करते हैं। उनकी रचनाओं में व्यंग्य प्रायः गहरी दार्शनिक विडंबना के रूप में उपस्थित होता है। वेलूर कृष्णनकुट्टी भी मलयालम व्यंग्य लेखन का एक और जाना पहचाना नाम है। मलयालम व्यंग्य में हास्य अक्सर करुणा और आत्मालोचन के भाव से जुड़ा दिखाई देता है।
पूर्वी भारत के राज्यों के व्यंग्य-साहित्य में भी सामाजिक सुधार, नैतिक चेतना और मानवीय विवेक पर बल दिया गया है। इन राज्यों में व्यंग्य की परंपरा मुख्यतः लोक-संस्कृति, मौखिक साहित्य, नाट्य-रूपों और आधुनिक पत्रकारिता के माध्यम से विकसित हुई है। यहाँ व्यंग्य प्रायः कटु उपहास के बजाय सौम्य, प्रतीकात्मक और सामुदायिक आत्मालोचना का रूप ग्रहण करता है।
उड़िया साहित्य में व्यंग्य सामाजिक आलोचना, नैतिक अनुशासन और सत्ता-समीक्षा का एक प्रभावी माध्यम रहा है। यहाँ व्यंग्य का विकास लोकजीवन, भक्ति-चेतना और सामाजिक अनुभवों के सहारे हुआ है। सरला दास के महाभारत (उड़िया रूपांतरण) में व्यंग्यात्मक दृष्टि के अनेक प्रसंग मिलते हैं, जहाँ सामाजिक विसंगतियों और मानवीय दुर्बलताओं पर सूक्ष्म कटाक्ष किया गया है। लोकनाट्य परंपराओं – जात्रा और दंडनाट, में सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक व्यंग्य एक प्रमुख तत्व के रूप में उपस्थित रहा है। आधुनिक उड़िया व्यंग्य के केंद्रीय स्तंभ फकीर मोहन सेनापति माने जाते हैं। उनके उपन्यास छ माण आठ गुण्ठ में जमींदारी व्यवस्था, औपनिवेशिक प्रशासन और सामाजिक शोषण पर तीखा और यथार्थपरक व्यंग्य किया गया है। कमला सत्पथी का नाम भी उड़िया व्यंग्य में सम्मान के साथ लिया जाता है।
असमिया व्यंग्य, में हास्य प्रायः संयत और सूक्ष्म होता है, किंतु उसका सामाजिक प्रहार गहरा और सार्थक होता है। असमिया व्यंग्य में यही संकेत लक्ष्मीनाथ बेजबरुआ की रचनाओं में मिलते हैं, जिन्हें असमिया आधुनिक साहित्य का पितामह माना जाता है। उनके निबंधों और व्यंग्यात्मक लेखों में सामाजिक आडंबर और खोखली नैतिकता पर सटीक कटाक्ष मिलता है। इसके बाद हेमेंद्र कुमार बरुआ, बिरेंद्र कुमार भट्टाचार्य, सौरभ कुमार चालिहा और हरिप्रसाद नेओग जैसे रचनाकारों ने असमिया व्यंग्य को वैचारिक विस्तार प्रदान किया। आधुनिक असमिया साहित्य में स्तंभ-लेखन और पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से व्यंग्य निरंतर विकसित हुआ है और वह असमिया समाज की आत्मालोचना का सशक्त माध्यम बना हुआ है।
मणिपुरी-मैतेयी साहित्य में व्यंग्य की जड़ें लोककथाओं, लोकनाट्य और सामाजिक अनुष्ठानों में मिलती हैं। शुमांग लीला (खुले मंच का लोकनाट्य) मणिपुर की व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम है, जिसमें समकालीन राजनीति, भ्रष्टाचार और सामाजिक विसंगतियों पर प्रत्यक्ष किंतु मर्यादित कटाक्ष किया जाता है। मेघालय की खासी, गारो और जयंतिया भाषाओं में व्यंग्य की परंपरा मौखिक साहित्य से विकसित हुई है। खासी लोककथाओं में चतुर नायक और मूर्ख शक्तिशाली पात्रों के माध्यम से सामाजिक अनुशासन और नैतिकता पर व्यंग्य किया जाता है। लोकगीतों और कथा-गायन में यह व्यंग्य हास्यपूर्ण होते हुए भी शिक्षाप्रद होता है। अरुणाचल प्रदेश की बहुजातीय और बहुभाषिक संरचना के कारण व्यंग्य की परंपरा मुख्यतः जनजातीय मौखिक परंपराओं में निहित रही है। लोककथाओं में पशु-पात्रों और मिथकीय चरित्रों के माध्यम से मानवीय मूर्खता, लालच और सत्ता-लोभ पर व्यंग्य किया जाता है। उत्सवों और अनुष्ठानों में प्रस्तुत कथात्मक नाट्य-रूपों के माध्यम से सामाजिक नियमों के उल्लंघन पर हास्यात्मक चेतावनी दी जाती है। आधुनिक साहित्य में व्यंग्य भले ही अभी अपेक्षाकृत नवोदित है, किंतु सामाजिक परिवर्तन, विकास और पहचान के प्रश्नों के साथ इसका विस्तार निरंतर हो रहा है।
पंजाबी साहित्य में व्यंग्य की परंपरा अत्यंत जीवंत, लोकधर्मी और सामाजिक यथार्थ से गहराई से जुड़ी रही है। पंजाबी व्यंग्य की जड़ें लोकगीतों, सूफी काव्य और किस्सागोई की परंपरा में मिलती हैं, जहाँ सामाजिक पाखंड, धार्मिक दिखावा, सत्ता का दमन और मानवीय मूर्खताएँ व्यंग्य का विषय रही हैं। पंजाबी व्यंग्य की विशेषता उसका खुला, बेबाक और तीखा स्वर है, जिसमें हास्य और प्रतिरोध साथ-साथ चलते हैं। आधुनिक पंजाबी व्यंग्य के प्रमुख रचनाकारों में कुलवंत सिंह विर्क, गुरशरण सिंह, स्वर्ण सिंह तुंदील, कंवरपाल सिंह, सुरजीत पातर, शेरजंग जांगली, प्यारा सिंह दाता, मंगत कुलीचंद और पाश के नाम उल्लेखनीय हैं। पाश मुख्यतः क्रांतिकारी कवि के रूप में जाने जाते हैं, उनके लेखन में सत्ता, पाखंड और सामाजिक अन्याय पर तीखा व्यंग्य मिलता है। पंजाबी रंगमंच और नुक्कड़ नाटकों में भी व्यंग्य का प्रभावी प्रयोग हुआ है, जहाँ सामाजिक–राजनीतिक विसंगतियों पर सीधा और जनोन्मुख प्रहार किया गया है।
कश्मीरी साहित्य में व्यंग्य की परंपरा लोकसंस्कृति, और सामाजिक अनुभवों से निकटता से जुड़ी रही है। कश्मीरी व्यंग्य प्रायः संकेतात्मक, प्रतीकात्मक और करुणा से युक्त होता है। यहाँ व्यंग्य केवल हास्य का साधन नहीं, बल्कि पीड़ा, विडंबना और प्रतिरोध की संयुक्त अभिव्यक्ति है। कश्मीरी साहित्य में दीनानाथ नादिम और अख़्तर मोहिउद्दीन जैसे रचनाकारों के लेखन में सामाजिक अन्याय, राजनीतिक अस्थिरता और मानवीय संघर्ष पर व्यंग्यात्मक दृष्टि मिलती है। आधुनिक काल में कश्मीरी लेखन में व्यंग्य अक्सर दबी हुई पीड़ा और गहन विडंबना के रूप में सामने आता है, जो पाठक को भीतर तक प्रभावित करता है।
सिंधी साहित्य में व्यंग्य को तुंज कहा गया है। कुछ विद्वानों ने उपहास और हुजती शब्दों का प्रयोग भी व्यंग्य के लिए किया है। सिंधी में व्यंग्य का स्वर प्रायः मृदु, आत्मालोचनात्मक और नैतिक रहा है, जिसमें कटु उपहास के स्थान पर मानवीय करुणा और सामाजिक विवेक अधिक मुखर दिखाई देता है। प्रारंभिक काल में सूफी संतों – विशेषतः शाह अब्दुल लतीफ भिटाई की काव्य-परंपरा में बाह्य आडंबर, पाखंड और संकीर्ण धार्मिक दृष्टि पर प्रतीकात्मक व्यंग्य मिलता है। यह व्यंग्य उपदेशात्मक होते हुए भी मानवीय संवेदना से संपृक्त है। औपनिवेशिक काल में सिंधी गद्य के विकास के साथ व्यंग्य ने अधिक स्पष्ट सामाजिक रूप ग्रहण किया। इस काल में निबंधों, पत्रिकाओं और नाटकों के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों, सामंती मानसिकता और औपनिवेशिक प्रभावों पर व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ की गईं। शिक्षा, भाषा और पहचान से जुड़े प्रश्न सिंधी व्यंग्य के प्रमुख विषय बने। आधुनिक सिंधी साहित्य में व्यंग्य मध्यवर्गीय जीवन, विस्थापन-बोध और सांस्कृतिक स्मृति से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। विशेष रूप से विभाजन के बाद सिंधी समाज के अनुभव, जड़ों से कटाव, पहचान-संकट और सामाजिक अनुकूलन ने व्यंग्य को एक नई संवेदनशीलता प्रदान की है। सिंधी भाषा के व्यंग्यकारों में हरी दिलगीर, राम पंजवानी, हरीश वासवानी, आनंद गोलानी, सतीश हांडा, डॉ दयाल पाशा और गोविन्द भाटिया प्रमुख नाम हैं।
भारत में अंग्रेज़ी भाषा में विपुल साहित्य रचा गया है, अतः यह स्वाभाविक है कि अंगरेजी व्यंग्य ने भी अपनी एक विशिष्ट पहचान और मुकाम बनाया है। भारत में अंग्रेज़ी में व्यंग्य की परंपरा औपनिवेशिक शिक्षा-प्रणाली, प्रशासनिक संरचना और आधुनिक बौद्धिक चेतना के साथ विकसित हुई। प्रारंभ में अंग्रेज़ी व्यंग्य औपनिवेशिक सत्ता और भारतीय समाज, दोनों के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि का माध्यम बना। इसने पश्चिमी व्यंग्य-परंपरा, विशेषतः जोनाथन स्विफ्ट और ऑस्कर वाइल्ड आदि से शिल्प ग्रहण किया, किंतु विषयवस्तु में भारतीय यथार्थ को केंद्र में रखा। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में अंग्रेज़ी में लिखे भारतीय लेखों, निबंधों और पत्रिकाओं में सामाजिक रूढ़ियों, अंग्रेज़ी-भक्ति, शिक्षा-व्यवस्था और औपनिवेशिक मानसिकता पर व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ मिलने लगती हैं। यह व्यंग्य प्रायः बौद्धिक, विनोदी और सुधारोन्मुख रहा। इसमें हास्य प्रायः सौम्य रहा है, किंतु निहित आलोचना गहरी और प्रभावी। स्वतंत्रता के बाद भारतीय अंग्रेज़ी व्यंग्य ने अधिक स्पष्ट सामाजिक और राजनीतिक स्वर ग्रहण किया। इस परंपरा के प्रमुख लेखकों में आर.के. नारायण, निरद चंद्र चौधुरी, मुजफ्फर अली, खुशवंत सिंह, अशोक मित्रा, पी.के. अय्यर, अंबुज सान्याल, श्रीराम आयंगर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। समकालीन लेखन में राजनेता शशि थरूर की रचनाओं में इतिहास, राष्ट्रवाद और राजनीति पर लिखी गई रचनाओं में बौद्धिक व भाषिक व्यंग्य स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। पत्रकारिता, स्तंभ-लेखन और समकालीन मीडिया में अंग्रेज़ी व्यंग्य ने नई अभिव्यक्ति पाई है। राजनीतिक स्तंभों, कार्टूनों और डिजिटल लेखन में सत्ता, लोकतंत्र और सामाजिक आडंबर पर व्यंग्य एक सशक्त विधा के रूप में उपस्थित है।
भारत की भाषिक विविधता का यह सुविदित तथ्य है कि यहाँ लगभग हर पचास किलोमीटर पर बोली बदल जाती है। इन विविध बोलियों के साहित्य में भी हास्य और व्यंग्य की एक समृद्ध, सजीव और लोकधर्मी परंपरा विद्यमान रही है। लोकजीवन से उपजी ये अभिव्यक्तियाँ जनमानस की विसंगतियों, सामाजिक विडंबनाओं और मानवीय दुर्बलताओं को सहज, सरस और प्रभावी ढंग से रेखांकित करती हैं।

बुंदेली, अवधी, भोजपुरी, मैथिली और ब्रज जैसी प्रमुख बोलियों में भाषा की स्वाभाविक मिठास के साथ हास्य और व्यंग्य का सहज संयोग दिखाई देता है। अवधी में गोस्वामी तुलसीदास के काव्य में विनय और करुणा के साथ-साथ सूक्ष्म व्यंग्य उपस्थित है। भोजपुरी लोकगीतों, बिरहा परंपरा और भिखारी ठाकुर की रचनाओं में सामाजिक रूढ़ियों, सत्ता-संरचनाओं और नैतिक पाखंड पर तीखे किंतु लोकधर्मी व्यंग्य के उदाहरण मिलते हैं। कृष्ण चंद्र भोजपुरी व्यंग्य का एक जाना-पहचाना नाम है। मैथिली के सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिमोहन झा का हास्य और व्यंग्य-बोध अद्भुत था। मैथिली में प्रकाशित उनके अनेक व्यंग्य-संग्रहों का हिंदी में भी अनुवाद हुआ, जो व्यापक रूप से लोकप्रिय रहे। उनका प्रसिद्ध मैथिली व्यंग्य-संग्रह ‘खट्टर काका क तरंग’ विशेष रूप से चर्चित रहा है और मैथिली व्यंग्य-साहित्य की प्रतिनिधि कृतियों में गिना जाता है। ब्रजभाषा में सूरदास और नंददास के भक्तिकाव्य में जीवन की विसंगतियों पर प्रभावी व्यंग्य दृष्टिगोचर होता है। हिंदी के सुपरिचित व्यंग्यकार राजेंद्र मिलान एवं अर्चना चतुर्वेदी के ब्रज भाषा में लिखे व्यंग्य भी खासे चर्चित हैं। बुंदेली लोककाव्य और कथाओं में ग्रामीण जीवन की विसंगतियाँ हास्यात्मक व्यंग्य के रूप में अभिव्यक्त होती रही हैं। बुंदेली में केवल मौखिक परंपरा ही नहीं, बल्कि पर्याप्त मात्रा में लिखित ग्रंथ और काव्य-संग्रह भी उपलब्ध हैं, जो इनके साहित्यिक वैभव को प्रमाणित करते हैं। बुंदेली के प्रमुख व्यंग्य लेखकों में जगन्नाथ सुमन, डॉ. पूर्णचंद श्रीवास्तव और डॉ. गंगाप्रसाद गुप्त ‘बरसैंया’ के नाम आदर और सम्मान के साथ लिए जाते हैं। देवीप्रसाद वर्मा ‘दिनेश’ ने भी बुंदेली में अनेक प्रभावशाली व्यंग्य कथाएँ लिखीं, किंतु असमय निधन के कारण उनका अधिकांश रचनात्मक कार्य प्रकाशित नहीं हो सका।
राजस्थान की बोलियों, विशेषतः मारवाड़ी में व्यंग्य की उपस्थिति और भी अधिक विशिष्ट एवं सुदृढ़ रूप में दिखाई देती है। राजस्थानी व्यंग्य की जड़ें लोककथाओं, फड़, ख्याल, तेरहताली, मांड और जनपदीय हास्य से होते हुए व्यवस्थित और सजग व्यंग्य-लेखन की परंपरा के रूप में विकसित हुआ। समकालीन समय में राजस्थानी में निरंतर व्यंग्य-साहित्य लिखा जा रहा है और नियमित रूप से व्यंग्य-संग्रह प्रकाशित हो रहे हैं। राजस्थानी व्यंग्य के क्षेत्र में बुलाकी शर्मा, मधु आचार्य आशावादी और नीरज दइया ऐसे रचनाकार हैं, जिन्होंने हिंदी के साथ-साथ राजस्थानी भाषा में भी उल्लेखनीय व्यंग्य-लेखन किया है और व्यापक पाठक-वर्ग में पहचान बनाई है। राजस्थानी के अन्य लोकप्रिय व्यंग्यकारों में मंगत बादल, कृष्ण कुमार आशू, मदन केवलिया, अतुल कनक, प्रह्लाद श्रीमाली, राजेंद्र शर्मा मुसाफिर, किशनलाल पारस, माणिक लाल परमार, हरेराम दाधिची तथा मदन गोपाल लाड के नाम लिए जाते हैं। छत्तीसगढ़ी में भी उल्लेखनीय व्यंग्य लेखन हुआ है। इस बोली के प्रमुख व्यंग्यकारों में मेदनी प्रसाद पांडेय, शुकलाल पांडेय, महेन्द्र बघेल, राजकुमार चौधरी, हरिशंकर देवांगन, नारायण लाल परमार, द्वारिका वैष्णव, चोवाराम वर्मा ‘बादल’, वीरेंद्र सरल, विजय मिश्रा, रामेश्वर वैष्णव तथा राजशेखर चौबे के नाम प्रमुखता से लिए जाते हैं। छत्तीसगढ़ी व्यंग्य-साहित्य में कछेरी (मेदनी प्रसाद पांडेय), उबुक चुबूक (रामेश्वर वैष्णव), सुरुज नहीं मरे (नारायण लाल परमार), का के बधाई (राजकुमार चौधरी), झन्नाता तुंहर दुवार (महेन्द्र बघेल) तथा बनगे तोर बिगड़गे (द्वारिका वैष्णव) जैसे संग्रह प्रतिनिधि माने जाते हैं। छत्तीसगढ़ी साहित्य में शुकलाल पांडेय का योगदान इस दृष्टि से उल्लेखनीय है कि उन्होंने विलियम शेक्सपियर की प्रसिद्ध कृति ‘कॉमेडी ऑफ इरर्स’ का छत्तीसगढ़ी में ‘पुरु झुरु’ नाम से अनुवाद किया, जिससे छत्तीसगढ़ी भाषा के व्यंग्यात्मक सामर्थ्य का विस्तार हुआ।
उपरोक्त परिदृश्य से एक समेकित निष्कर्ष स्पष्ट रूप से उभरता है कि भारत में व्यंग्य की परंपराएँ अपने-अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भों में विकसित हुई हैं, किंतु उनका केंद्रीय सरोकार समान रहा है – पाखंड, असमानता, सत्ता की निरंकुशता और मानवीय दुर्बलताओं पर विवेकपूर्ण प्रहार। यह संपूर्ण विवेचन इस तथ्य की पुष्टि करता है कि भारतीय व्यंग्य एक बहुभाषी, बहुस्तरीय और साझा चेतना से निर्मित परंपरा है, जो भिन्न-भिन्न भाषाओं में भिन्न स्वर ग्रहण करते हुए भी अपने मूल उद्देश्य में एकरूप बनी रहती है।
सन्दर्भ –
- विभिन्न वेबसाइट्स व ब्लॉग्स
- ऑनलाइन उपलब्ध शोध पत्रिकाएँ
- व्यंग्यकार मित्रों – यशवंत कोठारी, बुलाकी शर्मा, सुधीर सुधीर ओखदे, समीक्षा तैलंग, राजशेखर चौबे, विवेक रंजन श्रीवास्तव आदि से प्राप्त जानकारी
- धर्मयुग,साप्ताहिक हिंदुस्तान, लफ्ज, व्यंग्य यात्रा पत्रिकाओं के पुराने अंक
- श्यामसुंदर घोष, डॉ मलय, शेरजंग गर्ग तथा बालेन्दुशेखर तिवारी की व्यंग्य आलोचना संबंधी पुस्तकें

अरुण अर्णव खरे
अभियांत्रिकीय क्षेत्र में वरिष्ठ पद से सेवानिवृत्त। कथा एवं व्यंग्य साहित्य में चर्चित हस्ताक्षर। बीस से अधिक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त। अपने माता-पिता की स्मृति में 'शांति-गया' साहित्यिक सम्मान समारोह आयोजित करते हैं। दो उपन्यास, पांच कथा संग्रह, चार व्यंग्य संग्रह और दो काव्य संग्रह के साथ ही अनेक समवेत संकलनों में शामिल तथा देश भर में पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन। खेलों से संबंधित लेखन में विशेष रुचि, इसकी भी नौ पुस्तकें आपके नाम। दो विश्व हिंदी सम्मेलनों में शिरकत के साथ ही मॉरिशस में 'हिंदी की सांस्कृतिक विरासत' विषय पर व्याख्यान भी।
Share this:
- Click to share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Click to share on X (Opens in new window) X
- Click to share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Click to share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Click to share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Click to share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Click to share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky
