
- December 17, 2025
- आब-ओ-हवा
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पुस्तक चर्चा शारदा दयाल श्रीवास्तव की कलम से....
व्यंग्य लेखन की समझ का दायरा बढ़ाती किताब
नामचीन व्यंग्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी की पुस्तक ‘व्यंग्य: कल आज और कल’ इस मायने में विशिष्ठ है कि यह व्यंग्य विधा के सृजनात्मक पहलुओं की गहराई में जाकर पड़ताल करते हुए उस पर विस्तृत प्रकाश डालती है। जैसा कि पुस्तक का शीर्षक है तथा स्वयं उन्होंने अपनी भूमिका में स्पष्ट किया है “व्यंग्य समालोचना शास्त्र अभी भी विकासक्रम में है। यह पुस्तक इसी जटिल, सूक्ष्म और अत्यंत प्रभावशाली साहित्यिक विषय के बहुआयामी विश्लेषण पर केन्द्रित लेखों का एक महत्वपूर्ण संकलन है। यह पुस्तक व्यंग्य को केवल रचना के स्तर पर ही नहीं बल्कि उसके सैद्धांतिक आधारों, ऐतिहासिक विकास यात्रा, विविध साहित्यिक विधाओं में उसकी अभिव्यक्ति और सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों में उसकी भूमिका को गहराई से समझने का एक सुविचारित प्रयास है।”
इस पुस्तक में उन्होंने व्यंग्य की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, सिद्धांतों, विभिन्न साहित्यिक विधाओं में व्यंग्य की उपस्थिति और सामाजिक-सांस्कृतिक प्रश्नों पर तर्कपरक भूमिका पर 21 विभिन्न अध्यायों में विस्तृत विवेचना की है। यह पुस्तक ऐसे समय पर आई है, जब सोशल मीडिया की सुलभ सुविधा के कारण नये लेखकों को अपनी रचनाएं प्रदर्शित करने के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हो गये हैं। विभिन्न विधाओं में लिखा भी बहुत जा रहा है जिसके अच्छे व बुरे प्रभाव सामने आ रहे हैं। एक ओर जहाँ प्रतिभाशालियों को लेखन प्रदर्शन का अवसर मिला है वहीं अनेक शौक़िया लेखकों की न सिर्फ़ बाढ़ आ गयी है बल्कि कुछ पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाओं को स्थान भी मिल जाता है। इसका सबसे बड़ा नुक़सान यह है कि ऐसे लेखक अपनी ग़ैर-स्तरीय रचनाओं को श्रेष्ठ मानकर लेखन कौशल से संतुष्ट हो जाते हैं और गम्भीर पाठकों के लिए स्तरीय रचनाओं की उपलब्धता सीमित हो जाती है। इन परिस्थितियों में चर्चाधीन यह पुस्तक न सिर्फ़ नये व्यंग्य लेखकों के लिए वरन् निष्पक्ष समीक्षकों के लिए एक मार्गदर्शक की भूमिका का निर्वाह करती है।
वर्तमान में अनेक लेखक लोकप्रियता के लिए हास्यपूर्ण मनोरंजक लेख लिख रहे हैं और उन्हें पत्र-पत्रिकाओं में स्थान व प्रशंसा भी मिल रही है, शायद इसलिए भी पुस्तक लेखक श्री विवेक जी को अपनी पुस्तक का आरम्भ ही इस वाक्य के साथ करना पड़ गया होगा, “व्यंग्य साहित्य की वह सशक्त विधा है, जो समाज के ताने-बाने में गुंथी विसंगतियों, विडम्बनाओं और कुरीतियों को उधेड़ने का साहस रखती है। यह मात्र हास्य नहीं, वरन हँसी के पीछे छुपे एक तीखे प्रहार की लेखकीय कला है, जो पाठक को झकझोरती है, सोचने को मजबूर करती है और परिवर्तन की ओर उन्मुख करती है।” स्पष्ट है व्यंग्य की प्रहारक शक्ति ही उसे सशक्त बनाती है। हास्यरहित व्यंग्य एक कटु व्यंग्य बन जाता है और व्यंग्यरहित हास्य एक उद्देश्यहीन रचना ही कहलाएगी। यह व्यंग्यकार के रचना कौशल पर निर्भर है कि वह अपनी रचना को कितना सार्थक, सुस्पष्ट और रोचक बना पाता है। श्री विवेक जी ने अपने आरम्भिक चरण में ही व्यंग्य लेखन के सैद्धांतिक ढांचे व मूल्यांकन हेतु एक सुष्पष्ट मानदण्डों की ज़मीन तैयार कर दी है।
’व्यंग्य आलोचना के लिए वर्गीकरण बिंदु’ में समस्त आवश्यक बिन्दुओं को इंगित करते हुए विवेक जी महत्वपूर्ण बात करते हुए अपनी चिंता व्यक्त करते हैं- “व्यंग्य का स्वतंत्र आलोचना शास्त्र अब तक निर्धारित नहीं है। एक दूसरे की जो व्यंग्य समीक्षा इन दिनों हो रही है, उसमें मापदण्डों पर आधारित वास्तविक आलोचना की जगह इतनी प्रशंसा भर दी जाती है कि लेखक परिष्कार की जगह स्वयं को व्यंग्य का महारथी मानने की भूल कर बैठता है। इसलिए निबंधात्मक सपाटबयानी को भी आज व्यंग्य समझा जा रहा है।”

उपरोक्त उल्लेख पहले किया जा चुका है और देखने में भी आ रहा है कि नये व्यंग्य लेखक भले ही व्यंग्य के शीर्ष पुरुष परसाई, शरद जोशी, रवीन्द्रनाथ त्यागी, श्रीलाल शुक्ल आदि के लेखन की पूँछ पकड़कर उनका अनुसरण कर रहे हों पर उनके लेखन में निरन्तर परिष्करण का अभाव स्पष्ट प्रतीत होता है। पुस्तक में रचनाओं के व्यंग्य लेखन में अपेक्षित सुधार व इस विकास हेतु परसाई, जोशी की रचनाओं का अवलम्बन लेकर कुछ संरचनात्मक मानदण्ड तय किये गये हैं, जिसकी कसौटी पर व्यंग्य रचना की गुणवत्ता निर्धारित की जा सकती है। यह कसौटी किसी यांत्रिक उपकरण की तरह नहीं है कि नाप-तौल से निर्धारित हो जावे बल्कि यह रचना कौशल की कलात्मक अभिव्यक्ति भी है, जो सिर्फ़ महसूस की जा सके। पुस्तक यह प्रश्न भी उठाती है- “क्या व्यंग्य समस्या की जड़ तक पहुँचता है या सतही है? क्या भाषा और शैली संदेश के अनुरूप है? क्या यह पाठक को सोचने के लिए प्रेरित करता है या सिर्फ़ हँसाता है? क्या यह सामाजिक परिवर्तन की सम्भावना जगाता है?
वैज्ञानिक दष्टिकोण में मानव विकास में हँसी का मूल सामाजिक बंधन में है वहीं कथा साहित्य में पौराणिक दृष्टिकोण से ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की रचना उपरान्त उनके हँसने से हास्य उत्पन्न होना बताया गया है। तात्पर्य यह कि हास्य एक मानवीय प्रवृत्ति है, जिसे साहित्य के नौ विभिन्न रसों के अंतर्गत माना गया है। इस पुस्तक के एक पृथक अध्याय में हास्य-व्यंग्य को एक सहज मानवीय प्रवृत्ति बताया गया है और सहित्य क्षेत्र में हास्य का महत्व बताते हुए हास्य के भिन्न प्रकारों पर भी प्रकाश डाला गया है। साथ ही हास्य रचना के पाँच प्रकारों ह्यूमर, विट, सेटायर, आयरनी, और फ़ार्स पर भी बात की गयी है। पुस्तक में हास्य रस/ मानवीय प्रवृत्ति पर पृथक अध्याय सार्थकता इसलिए भी है कि हास्य व्यंग्य का समावेश लगभग हर साहित्यिक विधा में किया गया है। व्यंग्य विधा में तो हास्य का अभाव बेस्वाद भोजन ही माना जाएगा, जिसमें पौष्टिकता भले हो पर तृप्ति न मिल सकेगी।
समाज व्यंग्य रचना की ज़मीन भी है और उसका केन्द्रीय स्तम्भ भी। ’व्यंग्य और समाज के अंतर्सम्बंध’ नामक अध्याय में लेखक ने लिखा है, “समाज व्यंग्य को जन्म देता है, पोषित करता है और कभी-कभी दबाने का प्रयास भी करता है।” यह लेख व्यंग्यकार को उसकी ज़िम्मेवारी के प्रति भी आगाह करता है जिसका अभाव समाज की आहत प्रतिक्रिया के तौर पर सामने आ सकता है।
’व्यंग्य में महिला हस्तक्षेप’ पर व्यापक चर्चा की है और इस क्षेत्र में सक्रिय महिला रचनाकारों का उल्लेख है, जिस कारण समाज के प्रति उनका दृष्टिकोण व अवलोकन की एक नवीन दृष्टि व अनछुए पहलुओं से परिचय होना सम्भव है। ’व्यंग्य के विविध आयाम’ पर रचना की प्रहारक क्षमता व सफलता पर, प्रस्तुतिकरण के कला पक्ष पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला गया है।
हिंदी व्यंग्य जगत के मूर्धन्य रचनाकार कबीर, परसाई, शरद जोशी, रवीन्द्रनाथ त्यागी, श्रीलाल शुक्ल, नरेन्द्र कोहली, नागार्जुन की रचनाओं, उनके लेखकीय शिल्प पर व्यापक चर्चा है, जो एक व्यंग्यकार को अपनी कलम तराशने और समीक्षक को अपनी समझ का दायरा बढ़ाने के पर्याप्त अवसर प्रदान करती है।
’विसंगतियों के युग में व्यंग्य का भविष्य’ पर यह पुस्तक तर्कसम्मत व्याख्या करते हुए रचनाकार को उसकी ज़िम्मेवारी का आभास भी कराती है और बदलते हुए समय अनुरूप मार्गदर्शन भी देती है। पुस्तक के अंतिम पृष्ठों में विभिन्न प्रश्नकर्ताओं द्वारा पूछे गये प्रश्नों के उत्तर भी दिये गये हैं, जो पाठकों की रही-सही जिज्ञासाओं/शंकाओं का समाधान करते हैं।
सरल एवं ग्राह्य भाषा में लिखी गयी इस पुस्तक में व्यंग्य लेखन के समस्त मानदण्डों की विस्तृत व्याख्या है, शीर्ष व्यंग्यकारों की विशिष्ट शैलियों की चर्चा है, व्यंग्य के विभिन्न उदाहरण हैं और सबसे बड़ी बात यह कि यह साहित्य के हर फ़ॉर्म में व्यंग्य के समावेश पर लागू है। विवेक जी की यह पुस्तक व्यंग्य लेखकों, समीक्षकों व नये व्यंग्य रचनाकारों के लिए काफ़ी उपयोगी है।
उम्मीद है पुस्तक के माध्यम से लेखक का यह प्रयास निश्चित ही व्यंग्य विधा को सशक्त बनाने के लक्ष्य में लेखकों के लिए सहायक सिद्ध होगा।

शारदा दयाल श्रीवास्तव
एक व्यंग्य संग्रह प्रकाशित है और ऐसे अनेक पत्र पत्रिकाओं में व्यंग्य व समसामयिक विषयों पर लेख प्रकाशित होते हैं। कुछ साहित्यिक संस्थाओं से संबद्धता और मध्यांचल ग्रामीण बैंक से सेवानिवृत्ति। अधिकारी संघ के महासचिव के रूप में भी सेवा और नाट्य मंचनों में भी भागीदारी।
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दयाल जी ने “व्यंग्य कल आज और कल ” का बारीकी से व्यवस्थित , विस्तृत एवं विश्लेषित परिचय दिया है कि पुस्तक पढ़ने के लिए बहुत जिज्ञासा होती है।
सराहनीय परिचयात्मक आलोचना है।
लेखक एवं समीक्षक दोनों को बधाई