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(लेखा-जोखा) विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....

2025: किताबें इस साल और साहित्य की दिशा

             2025 का वर्ष हिंदी साहित्य के लिए केवल नयी किताबों का साल नहीं, बल्कि एक नये विश्वास और साहस का दौर साबित हुआ है। हिंदी संसार इतना विशाल बात वृक्ष बन चुका है कि इस वर्ष चर्चा में रही कृतियों पर समग्रता में लिखना सूरज को दीया दिखाने जैसा होगा। (इसलिए स्मरण, पठन और मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर एक दिशासूचक आंशिक आंकलन) निजी रूप से, ढेरों छोटे प्रकाशक, जगह-जगह कम संख्या में मुद्रण प्रतियों के साथ भी बड़े काम कर रहे हैं। ऐसे समय में स्मरण, पठन और मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर भोपाल से दूर बैठकर एक दिशासूचक आंशिक आंकलन ही हो सकता है। बहरहाल प्रकाशकों की ताज़ा सूचियाँ और पाठकों में उठती बहसें गवाह हैं कि हिंदी का गद्य सिर्फ़ मनोरंजन या अतीत का दस्तावेज़ नहीं रह गया है। यह एक सक्रिय, जागरूक और बहुआयामी संवाद का मंच बन गया है, जो समाज के नये और पुराने घावों को छूने, जाति, वर्ग और पहचान के सवालों से टकराने और इतिहास में मिथक को नये सिरे से पढ़ने का साहस दिखा रहा है। यह साहित्यिक गति पाठक को केवल पढ़ने के लिए ही नहीं, बल्कि चिंतन और सामाजिक सरोकार से जुड़ने के लिए भी आमंत्रित करती है।

विविध आख्यानों का सह-अस्तित्व

यथार्थ के नये रंग देखने को मिल रहे हैं। इस वर्ष की एक प्रमुख प्रवृत्ति जीवन के सघन यथार्थ को बिना किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत करने की रही है। सेतु प्रकाशन समूह से प्रकाशित उपन्यास इसका प्रमुख उदाहरण हैं। देवेश वर्मा का ‘राममोहन’ स्वतंत्रता के बाद के भारत में जातिगत सीमाओं से टकराते एक युवक के संघर्ष की कथा है। वहीं, रत्नकुमार सांभरिया का ‘नटनी’ सदियों से हाशिये पर धकेले गये एक समाज को साहित्य के केंद्रीय पृष्ठ पर लाने का साहसिक प्रयास है। संतोष दीक्षित का ‘ख़लल’ और तेज प्रताप नारायण का ‘बदलते अक्षांश’ भी अपने-अपने ढंग से समकालीन यथार्थ से सीधी मुठभेड़ करते हैं, जहाँ पूर्वांचल के गाँव से लेकर अमेरिका-यूरोप तक जीवन की जटिलताएँ फैली हैं। राजकमल प्रकाशन की ओर से भी ‘लड़कियाँ’ जैसे शीर्षक समाज के जटिल सच का हिस्सा बने हैं।

स्त्री-दृष्टि का प्रखर स्वर और पहचान का सवाल रचनाकारों ने ज़िम्मेदारी से उठाया है।
स्त्री अनुभवों और पहचान के संकट को लेकर इस वर्ष सशक्त रचनाएँ सामने आयीं। शोभा नारायण का उपन्यास ‘पतझर के रंग’ वयस्क प्रेम की उन अनिश्चितताओं और दुविधाओं की पड़ताल करता है, जो अक्सर कथानक से बाहर रह जाती हैं। यह दर्शाता है कि स्त्री-विमर्श अब केवल शोषण के विरोध तक सीमित नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक भावनात्मक दुनिया और स्वायत्तता की खोज तक विस्तृत हो गया है।

पुनर्पाठ से आगे

इतिहास और विचार का पुनर्पाठ भी सामने आया है, 2025 की हिंदी कृतियाँ केवल वर्तमान तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने इतिहास और विचारधारा को नये सवालों की कसौटी पर कसा। अनन्द कुमार की ‘इमरजेंसी राज की अंतर्कथा’ और रविभूषण का ‘फासीवाद की दस्तक’ जैसी कृतियाँ शामिल हैं, जो राजनीतिक इतिहास के उन पहलुओं पर गंभीर चर्चा को आमंत्रित करती हैं, जो अक्सर सरल व्याख्याओं में दब जाते हैं। इसी कड़ी में इश्तियाक अहमद की ‘जिन्ना: उनकी सफलताएँ, विफलताएँ और इतिहास में उनकी भूमिका’ जैसी पुस्तक ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के जटिल मूल्यांकन की ओर रुजहान दर्शाती है।

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आधुनिक समस्याओं का प्रतिबिंब, भारतीय मनीषा के आलोक में कई साहित्यिक सामग्री प्रकाशित हुई हैं। वाणी प्रकाशन, राजकमल प्रकाशन, प्रभात प्रकाशन ने विविध विषयों पर केंद्रित पुस्तकें प्रस्तुत की हैं। भोपाल से आइसेक्ट ने नये शीर्षकों, नये लेखक-लेखिकाओं को न केवल प्रकाशित किया वरन किताबों पर चर्चा गोष्ठियां भी आयोजित कर विमर्श को बनाये रखा। ज्ञानमुद्रा पब्लिकेशन ने किशोर, स्कूली और कॉलेज के युवाओं हेतु बड़े आयाम पर काम कर उपयोगी किताबें प्रकाशित की हैं।

व्यंग्य के आलोचना शास्त्र पर कम ही काम हुए हैं। इस सिलसिले में इस साल न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन से मेरी अपनी किताब ‘व्यंग्य कल आज और कल’ प्रकाशित हुई है। मेरे द्वारा लिखित मध्यप्रदेश की पुरातात्विक धरोहर, भगतसिंह के जीवन पर उपन्यासिका, इंडिया नेटबुक्स नोएडा ने कई क़ीमती महत्वपूर्ण किताबें पाठकों को सुलभ की हैं। पानी के महत्व को रेखांकित करता लंबा नाटक ‘जलनाद’ प्रकाशित किया, जो चर्चित है। कई किताबों के शीर्षक यह संकेत देते हैं कि ऐतिहासिक या पौराणिक कथाओं के माध्यम से वर्तमान के सामाजिक-राजनीतिक प्रश्नों को उठाने का चलन भी जारी है। ये रचनाएँ दिखाती हैं प्राचीन कथानकों की पुनर्व्याख्या कर उनमें समकालीन यथार्थ की गूँज सुनाना आज के हिंदी लेखन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।

कुल मिलाकर, 2025 में हिंदी साहित्य ने जो रास्ता चुना है, वह पाठक को एक सक्रिय भागीदार बनाने का है। यह साहित्य सुझाव नहीं देता, बल्कि प्रश्न खड़े करता है; आराम नहीं देता, बल्कि विचलित करता है। प्रमुख प्रकाशनों की विविध सूचियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि हिंदी का पठन-पाठन क्षेत्र लगातार विस्तारित हो रहा है। सामाजिक यथार्थ की पड़ताल से लेकर ऐतिहासिक पुनर्व्याख्या तक, ये कृतियाँ हिंदी साहित्य को एक जीवंत, सार्थक और प्रासंगिक बौद्धिक अभ्यास के रूप में स्थापित कर रही हैं। इस प्रकार, 2025 हिंदी साहित्य के इतिहास में एक ऐसे परिवर्तन के वर्ष के रूप में दर्ज होगा, जब उसने अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी और कलात्मक साहस दोनों को नये सिरे से परिभाषित किया। इंक पब्लिकेशन ने सोशल मीडिया पर पांडुलिपियां आमंत्रित कर चयनित किताबों की शृंखला छापी। व्यंग्य, कविताएं, कहानियां, वैचारिक चिंतन, विविध साहित्य आदि पर लिखी पुस्तकें हिंदी को व्यापक स्वरूप में साहित्य, रचनाकार और पाठक समूह से समृद्धि दे रही हैं।

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

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