cpi, rss, swayamsevak, sangh, communist party
भारत की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में वर्ष 2025 में दो धुर-विरोधी विचारधाराओं से सम्बद्ध संगठन तथा राजनीतिक दल की लगातार तुलना की जाती रही है। ये हैं ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ यानी आरएसएस और ‘भारत की कम्युनिस्ट पार्टी’ अर्थात सीपीआई। इस वजह से कि इसी बरस दोनों अपनी स्थापना के एक सौ वर्ष मना रहे हैं। लगभग साथ-साथ शुरू हुई इनकी यात्राओं में इन्होंने क्या खोया, क्या पाया और आज ये कहां आ पहुंचे अथवा खड़े हैं?
वैचारिकी मनोज कुलकर्णी की कलम से....

दो विचार, एक सदी और बेमेल तुलना

            सामान्य बहस-मुबाहिसों में आरएसएस और सीपीआई की स्थापना के कारणों, पृष्ठभूमियों और वैचारिकता पर गंभीर व्याख्याएं अनुपस्थित रहती हैं। अक्सर चर्चा इस बात के इर्द-गिर्द सिमट जाती है कि फ़िलहाल दोनों का प्रसार कितना है अथवा राजनीतिक उपलब्धियां क्या हैं? पिछले लगभग तीन दशकों में अपनी राजनीतिक शाखा ‘भारतीय जनता पार्टी’ के बढ़ते प्रभाव और अनेक प्रदेशों में उसकी सरकारें बन जाने, ख़ासकर वर्ष 2014 में उसके अपने बूते केंद्रीय सत्ता में आ जाने के बाद देश में आरएसएस की सार्वजनिक उपस्थिति बढ़ती चली गयी है। कुछ प्रांतों में गठबंधनों और कहीं-कहीं धन-प्रलोभन अथवा आईटी-ईडी-सीबीआई की धमकियों अथवा छल-बल से सरकारें हथियाने के आरोपों से घिरी भाजपायी सत्ता के संरक्षण, प्रशासकीय-तंत्र के अनुकूलन, बेहिसाब प्रचार और शासकीय साधनों-संसाधनों से बढ़ी आरएसएस की हैसियत से जाने-अनजाने ही आम जनता का बड़ा हिस्सा उसकी चपेट में आया है।

इसके बरअक्स वाम-मोर्चा चुनावी राजनीति में लगातार पिछड़ता गया है। कुछ बरस पहले तक पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और केरल, इन तीन प्रदेशों में वाम-दलों का व्यापक असर था। बरसो-बरस से चली आ रही मज़बूत सरकारें थीं। आज सिवाय केरल के बाकी प्रदेशों में वे सत्ता से बाहर हैं। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में ज़िला और पंचायत स्तरों की राजनीति में भी उनकी उपस्थिति सिकुड़ती गयी है। राज्याश्रित हिंसा के चलते बड़ी तादाद में भयभीत कार्यकर्ता उनसे छिटके हैं। यूं देश भर में सार्वजनिक-क्षेत्रों के कर्मचारियों और संगठित-असंगठित क्षेत्र के कामगारों, किसान आंदोलनों, स्त्री, अल्पसंख्यक, दलित और आदिवासी आदि हाशिये के समुदायों के मौलिक अधिकारों की अनेक लड़ाइयों और व्यापक बौद्धिक जगत के नेतृत्व में उल्लेखनीय उपस्थिति और सार्थक हस्तक्षेप के बावजूद देश के ज़्यादातर हिस्सों की संसदीय राजनीति में वाम-दलों की उपस्थिति हमेशा ही सिमटी-सी रही है। उनके हिस्से किसी प्रदेश में एकाध सांसद, दो-चार विधायक या कि एकाध नगरपालिका आदि की जीत भर दर्ज आती रही है। अपने अजेय गढ़ खो देने के बाद, ज़ाहिर है, राष्ट्रीय राजनीति में वाम-दलों की स्थिति और कमज़ोर हुई है। जिसे, अनेक समीक्षक, मार्क्सवादी विचारधारा, प्रतिरोध के उनके तौर-तरीक़ों और संघर्ष के औज़ार पुराने पड़ जाने और रणनीतियां विफल रह जाने से अप्रासंगिक होते जाना क़रार देते हैं।

ऐतिहासिक परिस्थियों, आरएसएस बनाम वाम-दलों के वास्तविक विचारों की व्याख्या, ज़मीनी कार्यकताओं से लगाकर आला नेताओं का इतिहास-बोध, चेतना का स्तर, नैतिक-बल, बौद्धिक-क्षमता और वैचारिक निष्ठा के साथ-साथ विगत तीन दशकों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आये बदलावों के मद्देनज़र विचार किया जाये तो समझा जा सकता है कि मसला इस क़दर सीधा, सपाट और इकहरा नहीं है। दोनों के प्रचार-प्रसार और प्रभाव में मालूम देने वाले फ़र्क को विश्लेषित करने के लिए विविध पहलुओं और ठोस वजहों को परखा जाना ज़रूरी है।

एक महत्वपूर्ण प्रश्न तो यह भी है कि कट्टर सांप्रदायिक आधारों पर निर्मित सांगठनिक ढांचा, ग़ैर-लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली और नफ़रती गतिविधियों वाले किसी ‘कथित’ सांस्कृतिक-संगठन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मार्क्सवाद जैसे आर्थिक दर्शन, जनवादी-केंद्रीयता पर आधारित संगठन, इतिहास की द्वंद्वात्मक समझ अनुसार समाज की व्याख्या के आधार पर अपनी रणनीतियां बनाने वाले किसी राजनीतिक-दल में महज़ इस आधार पर कि दोनों कैडर आधारित हैं, तुलना की भी जा सकती है?

cpi, rss, swayamsevak, sangh, communist party

चैप्टर-1 : दुनिया तब

आख़िर भारत में दक्षिणपंथ-वामपंथ के अस्तित्व में कैसे आये? बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में अंग्रेज़ी राज से आज़ाद होने के लिए चल रही लड़ाई का नेतृत्व कांग्रेस के पास था। वर्ष 1915 में स्वदेश लौट आये गांधी जी के साथ दक्षिण-अफ्रीका में किये गये उनके नायाब प्रयोगों की ख्याति भी चली आयी थी। 1920 में गरमदली और व्यवहार में ब्राह्मणवादी लोकमान्य तिलक के निधन पश्चात सर्वसमावेशी गांधी स्वतंत्रता-आंदोलन का केंद्र बनते गये। प्रतिरोध के कांग्रेस के प्रयोगों में ‘अहिंसा’ का आग्रह बढ़ता गया। सत्याग्रह, असहयोग, सविनय-अवज्ञा, आमरण अनशन, विदेशी कपड़ों की होली, स्वदेशी का प्रचार, चरखा, खादी, सर्वधर्म प्रार्थना सभाएं और प्रभात-फेरियों जैसे नूतन प्रयोगों से गांधी आम जनता को भी स्वतंत्रता-संघर्ष में साझीदार बना सकने में कामयाब हो रहे थे। मगर, कांग्रेस के भीतर समाजवादी-साम्यवादी सोच वाले समूह और लोग सुधारवादी नेताओं के विरुद्ध थे। उनके अनेक निर्णयों से नाइत्तेफ़ाकी रखते थे और उन्हें ग़ुलामी से मुक्ति के लिए असरहीन तथा नाकाफ़ी मानते थे। जबकि दक्षिणपंथी रुजहानों वाले लोग और समूह गांधी को मुस्लिम-परस्त मानते थे। वे हिंदू हिंतों के लिए एकजुट होने को बेचैन थे।

दुनिया के स्तर पर वह दौर बेहद हलचल भरा था। पहले विश्वयुद्ध की छाया में सोवियत-संघ में समाजवादी क्रांति हो चुकी थी। जिसने दुनिया भर की शोषित-पीड़ित जनता में समतापूर्ण जीवन पाने की उम्मीद जगा दी थी। भारत भी अपवाद न था। उच्च शिक्षित भारतीय युवा, जिनमें अनेक विदेश-पलट छात्र शामिल थे, उक्त बोल्शेविक-क्रांति से उत्साहित थे। साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष में हिस्सेदारी कर वे समाज को हज़ारों बरसों की बेरहम रूढ़ियों से मुक्त कराने के सपने देखने लगे थे। आज़ादी के लिए सशस्त्र क्रांति के इरादे रखने, समता, न्याय और धर्मनिरपेक्ष आधुनिक राष्ट्र बनाने के विचारों से लैस ऐसे नौजवानों में सरदार भगतसिंह का नाम सर्वाधिक लोकप्रिय रहा।

चैप्टर-2 : आरएसएस

हालांकि सदी की लगभग शुरूआत में ‘सर्वदेशक हिंदू सभा’ बन चुकी थी। बाद में जो ‘हिंदू महासभा’ में रूपांतरित हुई। लगभग तभी ‘आल इंडिया मुस्लिम लीग’ भी अस्तित्व में आ चुकी थी। धार्मिक आधारों पर हिंदू अथवा मुसलमानों को संगठित करने, उनके हितों की रक्षा करने के बहाने उन्हें लामबंद करने की संकीर्ण सोच वाले ये संगठन और उनके नेता अतीत-प्रेमी थे। देश को हिंदू धर्म के कथित आदर्शों अनुसार ढालने के प्रबल प्रवक्ताओं में, कालांतर में, विनायक दामोदर सावरकर का नाम प्रमुख तौर पर उभरा। उन्होंने ही ‘हिंदुत्व’ का राजनीतिक विचार पेश किया। जो उन धर्मावलम्बियों, जिनकी पूण्यभूमि भारत से बाहर है, को भावी भारत में दोयम दर्जे का नागरिक मानने की पैरवी करता था। स्पष्टतः वह भारत के मुसलमानों और ईसाइयों के ख़िलाफ़ था। धार्मिक आधारों पर राष्ट्रीयता की ऐसी वकालत ने दो-राष्ट्रों के विवादास्पद सोच को जन्म दिया। उग्र हिंदू विचारों और कट्टर इस्लामी तत्वों की प्रतिक्रियाओं ने ‘फूट डालो-राज करो’ की नीति वाली बर्तानिया हुकूमत के लिए अनुकूल स्थितियां बना दीं। दूसरे विश्व-युद्ध पश्चात साम्राज्यवाद के कमज़ोर पड़ने पर हिंदुस्तान को दो-फाड़ कर अंग्रेज़ी हुक्मरान चलते बने। मोहम्मद अली जिन्ना मुसलमानों के ख़ैरख़्वाह और बंटवारे के बाद इस्लामी मुल्क पाकिस्तान के जनक माने गये। भारत के स्वाधीनता-संग्रामी लेकिन मुल्क को धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के मामले में दृढ़ रहे। जो स्वाभाविक ही कट्टर हिंदुत्ववादी ताक़तों को नापसंद रहा। परिणामस्वरूप हिंदुस्तान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की निर्मम हत्या का गवाह भी बना।

27 सितम्बर 1925, विजयादशमी के दिन नागपुर में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना हुई थी। जिसके सस्थापक डाॅ. केशव बलिराम हेडगेवार के सार्वजनिक जीवन की शुरूआत कांग्रेस के कार्यकर्ता बतौर ही हुई थी। मगर, वे अपने अनन्य साथी और सलाहकार बालकृष्ण शिवराम मुंजे की हिंदू-राष्ट्रवाद और सैन्य-संगठन की पैरोकारी से सहमत और ‘हिंदू-राष्ट’ की अवधारणा के पक्षधर थे। आरएसएस को हेडगेवार ने ‘सांस्कृतिक संगठन’ बताया और इसके दर्शन को ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ कहा। इटली में मुंजे की मुसोलिनी से मुलाक़ात और फ़ासिस्ट सैन्य-संस्थानों के दौरे के ज्ञात तथ्यों के चलते आरएसएस अपनी शुरूआत से ही मुसोलिनी के फ़ासीवाद और हिटलर के नाज़ी शासन से प्रभावित रहने के आरोपों से घिरा रहा है। जिन्हें खारिज करने की सारी कोशिशों के बावजूद ऐतिहासिक साक्ष्यों के चलते वह आज तक उस ‘सच’ से पीछा नहीं छुड़ा सका है। स्वतंत्रता-संग्राम से कन्नी काट जाने वाले आएसएस ने अपने स्वयंसेवकों के लिए सैन्य-दलों जैसी वर्दी, कड़ा अनुशासन, एकचालकानुवर्तित्व यानी एक व्यक्ति की सर्वोच्चता और उसके प्रति पूर्ण समर्पण और लगभग हिटलरी अंदाज़ का अभिवादन अपनाया।

hedgewar, savarkar, godse

1940 में हेडगेवार के निधन पश्चात इसके प्रमुख बने माधव सदाशिव गोलवलकर को संगठन की वैचारिकता को दृड़ बनाने का श्रेय दिया जाता है। जर्मनी में हिटलर द्वारा नस्ल की शुद्धता बचाने और संस्कृति की रक्षा के लिए यहूदियों के सफ़ाये के समर्थन के उनके विवादास्पद लेखन बाबत आरएसएसए अब चाहे चुप लगा जाये, उसके मूल में यही विचार ही है, इसे छिपा पाना उसके लिए मुश्किल रहा है। उसका मत है कि भारत बहुसांस्कृतिक, बहुभाषी, बहुजातीय चाहे हो, इसका मूल चरित्र ‘हिंदू’ ही है। वह हिंदू को सिर्फ़ एक धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान नहीं बत्कि बहुसंख्यकों की राजनीतिक अस्मिता भी बताता है। आरएसएस मानता रहा है कि भारत में हिंदुओं के मज़बूत रहने तक ही उसकी सांस्कृतिक पहचान अक्षुण्ण है। हिंदुओं के कमज़ोर होने पर भारत विभाजित हुआ है। संघ के वर्तमान सरसंघचालक डाॅ.मोहन भागवत भारतीयों के रंग-रूप, भाषा, पूजा पद्धतियों के अलग-अलग होने पर भी सबका डीएनए एक ही बताते रहे हैं। उनके अनुसार इसी माटी से जन्मे, फले-फूले हिंदू धर्म में दार्शनिक विरोधों के कारण अनेक शाखाएं चाहे फूटीं, लेकिन वैदिक काल से आज तक वह क़ायम है, इसीलिए ‘सनातन’ है। सावरकरीय-सिद्धांतों से संघ के ये विचार मेल खाते हैं। अकारण नहीं है कि सावरकर वर्तमान केंद्र सरकार के ‘हीरो’ हैं।

चैप्टर-3 : सीपीआई

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चंद महीनों बाद 26 दिसंबर 1925 को कानपुर में आयोजित एक सम्मेलन में ‘भारत की कम्युनिस्ट पार्टी’ (सीपीआई) अस्तित्व में आयी। हालांकि 17 अक्टूबर 1920 में सोवियत-संघ के ताशकंद में ही एक प्रखर भारतीय युवा एम.एन.राॅय अपने कुछ मित्रों के साथ मिलकर भारत के साम्यवादी आंदोलन की नींव रख चुके थे। देश में फ़िलवक़्त सबसे बड़े वामपंथी दल ‘भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)’ ने इसी तर्क से 2020 में ही भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन की एक सदी पूरी होने को समारोहपूर्वक मना लिया था। बहरहाल, महान अक्टूबर क्रांति के बाद से ही बंगाल, मुंबई, मद्रास और संयुक्त प्रांत आदि जगहों पर कम्युनिस्ट-इंटरनेशनल के सिद्धांतों से प्रभावित अनेक युवा अलग-अलग समूहों में सक्रिय होने लगे थे। उपरोक्त सम्मेलन में ऐसे अनेक समूहों को मिलाकर औपचारिक तौर पर ‘भारत की कम्युनिस्ट पार्टी’ स्थापित की गयी।

वैज्ञानिक-सत्य सार्वजनीन होते हैं, भौगालिक अथवा सांस्कृतिक हालात अनुसार नहीं बदलते। यही वजह रही कि ‘द्वंद्वात्मक भौतिकवाद’ जैसा वैज्ञानिक सिद्धांत मानने वाले ‘अतंर्राष्ट्रीयता’ के पक्षधर वाम-दल दुनिया के मेहनतकशों से एक होने का आह्वान करते हैं। प्रांतीय एसेम्बलियों में चुनाव लड़कर कुछ सीटें जीतने वाली सीपीआई ने देश विभाजन का खुला विरोध किया था। उसी दौर में कम्युनिस्टों द्वारा तेलंगाना में ज़मींदारों के ख़िलाफ़ किये गये सशस्त्र विद्रोह को विफल कर दिया गया था। आज़ादी उपरांत हालांकि कम्युनिस्ट पार्टी ने रणनीति बदली और पहले आम-चुनावों में हिस्सेदारी कर इतनी सींटें पा ली थीं कि वह मुख्य विरोधी दल थी।

दुनिया के तात्कालिक हालात में ‘मुख्य अंतर्विरोध’ और शोषक-वर्ग के चरित्र पर चिंतन कर वामपंथी दल अपनी समझ और रणनीतियां तय करते हैं। इसी समझदारी में मतभेद के कारण 1964 में सीपीआई में मुख्य विभाजन होकर ‘भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)’ का उदय हुआ था। 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी इलाक़े में जिसके कुछ नेताओं ने सशस्त्र-विद्रोह किया और उसी धारा को ‘नक्सलवादी’ कहा गया। क़रीब दो दशकों तक भूमिगत रहकर गोरिल्ला-युद्ध करते रहे उन समूहों के एक हिस्से ने भी आख़िर संसदीय-जनवाद में भरोसा जताया और भारतीय राजनीति में ‘भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) अस्तित्व में आयी। देश में फ़ॉरवर्ड-ब्लाॅक, रिवोल्यूषनरी सोषलिस्ट पार्टी और कुछ अन्य वामपंथी दल भी व्यापक वाम-मोर्चे का हिस्सा रहे हैं। बेशक, आज भी राजनीतिक-कार्यक्रम और रणनीतिक मसलों पर इन दलों में सैद्धांतिक मतभेद हैं। मगर, पूंजीवाद और सांप्रदायिकता के गठजोड़ विरुद्ध लड़ने के लिए ये सब एक साथ सक्रिय हैं।

nehru, marx, communist party, left party

इस मोर्चे से बाहर आज भी कुछ भूमिगत उग्रपंथी वामपंथी संगठन भी हैं। सशस्त्र, छापामार कार्रवाइयां करने वाले ऐसे ‘माओवादी’ समूहों को संसदीय जनतंत्र में हिस्सेदारी करने वाले वामदल दुस्साहसवादी मानते हैं और उनकी रणनीतियों से असहमत हैं। सशस्त्र-समूह, मुख्य-धारा के वामदलों को संशोधनवादी और मार्क्सवाद से भटका हुआ क़रार देते हैं। बहरहाल, अपनी स्थापना की एक सदी मना रही सीपीआई तमाम पड़ोसी मुल्कों के साथ दोस्ताना रिश्ते रखने और यूएपीए जैसे क़ानूनों को समाप्त करने की समर्थक और मोदी-सरकार तथा आरएसएस की हिंदुत्ववादी नीतियों की विरोधी है। भारत में संघीय (फ़ेडरल) ढांचे और संविधान को बचाने की पक्षधर तथा ‘उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण’ की अमेरिका-परस्त नीति की आलोचक भी। देश के क़ुदरती और बौद्धिक साधनों-संसाधनों को चंद कारपोरेट घरानों के हवाले कर देने की मुख़ालफ़त करने वाला यह दल फासीवाद विरुद्ध जनता को एकजुट करने के अलावा सबको रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, आवास उपलब्ध करा सकने वाले धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी जनतंत्र पर आधारित भारत के निर्माण का संकल्प दोहराता रहा है। सम्पत्ति के समान बंटवारे, भूमि-सुधारों, किसान-मज़दूरों के अधिकारों की रक्षा, आम-जनता के लिए सामाजिक सुरक्षा, निजी और विदेशी पूंजी का विरोध, प्रमुख उद्योगों के राष्ट्रीयकरण की पक्षधर यह राजनीतिक दल धर्म के राजनीतिक उपयोग का विरोध करता रहा है।

चैप्टर-4 : बीजेपी

आज सार्वजनिक जीवन के विविध क्षेत्रों में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ के अनेक अनुषांगिक संगठन सक्रिय हैं। जिनकी संख्या और आर्थिक हैसियत दिन-ब-दिन बढ़ती गयी है। वर्ष 1975 के बदनाम आपातकाल से पहले राजनीतिक-क्षेत्र में ‘भारतीय जनसंघ’ आरएसएस का प्रतिनिधित्व करता था। 1951 में स्थापित इस दल का 1977 में बनी ‘जनता पार्टी’ में विलय हो गया था। विभिन्न रुजहानों वाले सियासी-पार्टियों को जोड़कर बना वह भानुमति का कुनबा जल्द ही बिखर गया था। जिसके पीछे ‘भारतीय जनसंघ’ से आये नेताओं की दोहरी सदस्यता का मसला एक मुख्य कारण रहा था। जनता पार्टी के अनेक नेताओं ने आपत्ति उठायी थी कि जनसंघ से आये नेता आरएसएस की सदस्यता कैसे बनाये रख सकते हैं? नतीजतन जनता पार्टी विघटित हो गयी। उसके बाद बने अलग-अलग दलों में एक था-भारतीय जनता पार्टी। 1980 में स्थापित ‘भाजपा’ ने तब ‘गांधीवादी समाजवाद’ को अंगीकार करने की घोषणा की थी। यह बात लेकिन सर्वज्ञात थी कि वह ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ का ही नया राजनीतिक मुखौटा है। इंदिरा गांधी की हत्या पश्चात 1985 के आम चुनावों में महज़ दो सीटों तक सिमट गयी भाजपा ने जल्द ही अयोध्या में भगवान राम की कथित ‘जन्म-भूमि’ पर मंदिर निर्माण की मुहिम छेड़ दी थी। इस मांग के साथ कि अयोध्या में जिस जगह बाबरी-मस्जिद है, वही भगवान श्रीराम की जन्मभूमि है, अत: उस मस्जिद को हटाकर वहां एक भव्य मंदिर स्थापित किये जाने से ही हिंदू आस्थाओं के साथ न्याय किया जा सकेगा। इसी मांग के साथ भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक रथ-यात्रा निकाली थी। बिहार में तब के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव द्वारा रुकवा दी गयी उस यात्रा से भाजपा का सांप्रदायिक चेहरा फिर एक बार बेपर्दा हो गया था।

सावरकर का ‘हिंदुत्व’ और ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ के इरादे फ़ासीवादी और विभाजनकारी होने की चिंता अनेक राजनीतिक-विश्लेषक और सांस्कृतिक चिंतक जताते आये थे। मगर, अपने अजेय होने के अति-आत्मविश्वास के कारण तत्कालीन कांग्रेसी सरकारें सांप्रदायिकता की संघी-परियोजना की अनदेखी करती रहीं। आरएसएस किंतु अपने एजेंडे पर लगातार काम करता रहा। 1992 में बाबरी-मस्जिद ध्वंस और देशव्यापी सांप्रदायिक दंगों ने उसके इरादों को और मज़बूती दी। 2002 में गुजरात के जन-संहार ने जिसमें और इज़ाफ़ा किया। 2014 आते-आते तक भाजपा अपने बूते पर केंद्र सरकार बनाने में सफल रही। वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक नक्शे में आरएसएस के व्यापक प्रभाव और निर्णायक भूमिका से इनकार करना वास्तविकता से आंखें मूंदे रखने के सिवाय कुछ और न होगा।

केंद्र की कुछ गठबंधन सरकारों का नेतृत्व करते हुए भाजपा अपने चुनावी घोषणा-पत्र के विवादास्पद सांप्रदायिक मुद्दों को ठंडे बस्ते में रखती आयी थी। पिछले ग्यारह बरसों में जिनमें से कुछ पूरे किये जा चुके हैं। कुछ लोगों का यह सोच कि आरएसएस ने वक़्त अनुसार ख़ुद को बदला है, महज़ ख़ामख़्याली है। अत्याधुनिक-टैक्नालाॅजी के भरपूर उपयोग के हवाले से जिन्हें ऐसा महसूस होता हैं, वे नज़र-अंदाज़ कर देते हैं कि मात्र तकनीक का प्रयोग किसी के नज़रिये को ‘वैज्ञानिक’ नहीं बना देता। आख़िर विज्ञान-जनित प्रौद्योगिकी का उपयोग भी आरएसएस अवैज्ञानिक बातें फैलाने में ही कर रहा है। उसके मनुवादी आग्रहों में रत्ती भर भी बदलाव नहीं आया है, बल्कि वह बेहद बेशर्मी से मिथकों को इतिहास और कर्मकांडों को विज्ञान बताने तथा इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने का अभियान ज़ोर-शोर से चला रहा है। जिसमें उसे सरकारी-मशीनरी और गोदी-मीडिया का बेहिसाब सहयोग मिलता है। अल्पसंख्यकों के प्रति संघ का नफ़रती-रवैया तो जगज़ाहिर है किंतु दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों के बारे में भी उसके दुराग्रह रेखांकित किये जाते रहने चाहिए। सोशल-इंजीनियरिंग का शिगुफ़ा बीच-बीच में वह चाहे छोड़ता रहे, सच यही है कि उसका मूल दृष्टिकोण वर्णवादी है। क्या अनायास है कि अब तक सिवाय एक को छोड़ आरएसएस के सारे सर संघचालक ब्राह्मण रहे हैं?

तर्क दिया जाता रहा है कि शुरूआत में पिछड़ने के बावजूद एक सदी बाद आरएसएस, वामपंथी दलों से बहुत, बहुत ज़्यादा आगे निकल गया है। आज केंद्र सरकार के अलावा अधिकतर संवैधानिक पदों पर उसके स्वयंसेवक अथवा समर्थक विराजमान है। प्रमुख प्रशासनिक पदों पर भी संघ-समर्थक नौकरशाह होने में कोई संदेह नहीं है! यहां तक कि सुप्रीम-अदालत तक में कुछ न्यायमूर्तियों के बर्ताव और फ़ैसले उनके संघी-सोच की शंकाओं को आधार देते रहे हैं। संघ-प्रमुख के सार्वजनिक संबोधन अब राष्ट्रीय मीडिया पर यूं प्रस्तुत किये जाते हैं, मानो राष्ट्राध्यक्ष देश के नाम संदेश दे रहे हो। बारम्बार गंभीर आरोपों की जद में आते रहे और एकाधिक बार प्रतिबंधित रहे एक विवादास्पद संगठन-प्रमुख आजकल अनेक महत्वपूर्ण सरकारी समारोहों में आदर सहित न्योते जाने लगे हैं। 2024 के आम-चुनावों से पूर्व भाजपाई घोष ‘अबकी बार, चार सौ पार’ से अनेक राजनीतिक समीक्षक सशंकित थे कि 2025 में अपनी मातृ-संस्था को उसके शताब्दी वर्ष में भाजपा सौगात स्वरूप भारत के ‘हिंदू-राष्ट्र’ हो जाने की घोषणा कर सकती है। चुनावों में किंतु भाजपा स्पष्ट बहुमत से पर्याप्त पीछे रही। नितीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू यदि अपनी रीढ़ सीधी रख पाते, तो नरेंद्र मोदी के लिए तीसरी बार प्रधानमंत्री बनना तक मुश्किल था।

rss, bjp, voting, sangh

चैप्टर-4 : देश अब

याद रखा जाना चाहिए कि आरएसएस और वाम-दलों की तुलना इस कारण भी बेमानी है कि जहां वामपंथी दल हज़ारों बरसों के धर्म, जाति, लिंग और भाषा आधारित भेदभाव, अवैध संपत्ति संचयन, संसाधनों की बेजा लूट, स्थापित रूढ़ियों, अवैज्ञानिक मान्यताओं आदि को चुनौती दे रहे होते हैं, तो प्रकारांतर में अपने जातीय अतीत को सर्वश्रेष्ठ, सांस्कृतिक तौर पर अपने धर्म को सर्वाेच्च मानने और बावजूद अशिक्षा, बेरोज़गारी, महंगाई, ग़रीबी, भुखमरी और बीमारी के अपने देश को सर्वाेत्तम मानने वाले बहुसंख्यक अतीत-प्रेमियों को रुष्ट कर रहे होते हैं। ज़ाहिर है, धारा विरुद्ध तैरना हमेशा से मुश्किल रहा है।

इसके विपरीत आरएसएस का सारा कार्य-व्यापार अतीत के मिथ्या गुणगान, वर्णाश्रमी व्यवस्था, हिंदू धर्म के पास प्रत्येक वैज्ञानिक गुत्थी का सटीक जवाब होने के कुप्रचार पर टिका है। जिज्ञासाओं और प्रश्नाकुलता को हतोत्साहित करना और यथास्थिति को बनाये रखना अर्थात धारा-प्रवाह में ख़ुद को छोड़ देना है। जिससे अपेक्षाकृत जल्दी किसी तट पर जा लगने का सुभीता होता है। ख़ुद को बहाव भरोसे छोड़ देने से लेकिन डूबने के ख़तरे भी हुआ करते हैं।

इतिहास प्रमाण है कि रूढ़ियों के खंडन-मंडन और तार्किक स्थापनाओं को समाज आसानी से नहीं स्वीकारता। उसके लिए लम्बा वक़्त और सतत कड़ी मेहनत की दरकार हुआ करती है। ब्रूनो, गैलीलियो, डार्विन अथवा मार्क्स की रूढ़ि-भंजक स्थापनाओं को अपने देश-काल में विरोध और हिंसा तक का सामना करना पड़ा था। अकारण नहीं है कि सुकरात हो, गांधी या कि मार्टिन लूथर किंग, सत्य पर अडिग रहने के कारण मार डाले गये थे। इन्हीं हवालों के मद्देनज़र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी अर्थात प्रकारांतर में दक्षिणपंथी यथास्थितिवाद और वामपंथी परिवर्तनवाद के बीच तुलना बेमेल है। संघ सदैव वामपंथी विचारधारा को पश्चिम से आयातित और भारतीय परम्पराओं और सामाजिक-व्यवस्था के प्रतिकूल बताता रहा है। पूछा जाना चाहिए कि क्या फ़ासीवाद-नाज़ीवाद भारतीय हैं? जबकि वामपंथी विचारकों के इस तर्क कि आएसएस प्रतिगामी, पुरातनपंथी और देश के बहुसांस्कृतिक, बहुभाषीय स्वभाव के विरुद्ध है, के समर्थन में बेहिसाब तथ्य और प्रामाणिक आंकड़े मौजूद हैं। ऐसी पृष्ठभूमि में निर्णय तो आख़िर देश की जनता को करना होगा कि अपने सुखद भविष्य के लिए उसका हाथ आस्था के आधार पर कुछ टोटके कर दिये जाने के पक्ष में उठेगा कि वास्तविक ज़मीनी बदलावों की तरफ़दारी में?

मनोज कुलकर्णी, manoj kulkarni

मनोज कुलकर्णी

चित्रकार, कहानीकार, छायाकार, घुमक्कड़ व वामपंथी संस्कृतिकर्मी। 25 से अधिक चित्र प्रदर्शनियों में हिस्सेदारी। सामयिक विषयों पर अनेक शहरों में नुक्कड़ नुमाइशें। कहानियां, चित्रकला संबंधी लेख, चित्र, रेखांकन, यात्रावृत्तांत, संस्मरण, समीक्षाएं आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। कहानी संग्रह 'औघड़ समय' सहित भारत के जनविज्ञान आंदोलन पर एक पुस्तक के अलावा कुछ अनुवाद पुस्तिकाएं प्रकाशित। बाल-साहित्य की एक पुस्तक-माला, कलापत्र 'तूलिका-संवाद' और जनवादी लेखक संघ की केंद्रीय पत्रिका 'नयापथ' के चित्रकला विशेषांक, जनविज्ञान की त्रैमासिकी 'ज्ञान-विज्ञान वार्ता' और आनलाइन सांस्कृतिक पत्रिका 'हम देखेंगे' का संपादन।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *