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मासिक ब्लॉग निशांत कौशिक की कलम से....

टिस्का की 'चटनी' और साकी की 'दि ओपन विंडो'

इतालवी उपन्यासकार और गद्यकार उम्बर्तो एको ने कहा था, ज़िंदा रहने के लिए हमें कहानियाँ सुनानी ही होंगी। कहानी की अर्थवत्ता और उसकी उपयोगिता जितना आलोचना का विषय है, उतना ही रोज़मर्रा के जीवन का भी। इस क्रम में मुझे एक तरफ़ साकी की कहानी दि ओपन विण्डो (The Open Window) याद आती है और दूसरी ओर हिंदी की शॉर्ट फ़िल्म चटनी (Chutney)।

दि ओपन विण्डो में फ़्रैम्टन नटेल नाम का एक आदमी, जो नस संबंधी परेशानी से जूझ रहा है, देहात में अपनी सेहत सुधारने के उद्देश्य से आता है। वह मिसेज़ सैपलटन के घर पहुँचता है। वहाँ उनकी पंद्रह साल की भांजी वेरा उससे बात करती है। उसे पता चलता है नटेल को परिवार के बारे में कुछ भी मालूम नहीं है।

वेरा कमरे की खुली खिड़की की ओर इशारा करके एक कहानी गढ़ती है। वह कहती है तीन साल पहले उसकी मौसी के पति और दो भाई शिकार पर गये थे और दलदल में डूब गये। उनके साथ उनका कुत्ता भी था। वह बात में सफ़ेद रेनकोट और एक गाने की पंक्ति जैसे छोटे-छोटे विवरण जोड़ती है ताकि बात पुख़्ता लगे। वह यह भी कहती है कि मौसी आज तक खिड़की खुली रखती हैं, इस उम्मीद में कि वे लौट आएँगे।

तभी असली मौसी आती हैं और बहुत मामूली ढंग से बताती हैं कि उनके पति और भाई शिकार से लौटते हुए हमेशा उसी खिड़की से अंदर आते हैं। नटेल को यह बात अजीब लगती है। थोड़ी देर बाद सचमुच तीन आदमी और एक कुत्ता उसे आते दिखायी देते हैं, ठीक वैसे ही जैसे वेरा ने बताया था। रेनकोट और गाने की बात भी सच प्रतीत होती है।

नटेल उन्हें भूत समझकर घबरा जाता है और भाग निकलता है। बाद में जब वेरा से पूछा जाता है कि वह क्यों भागा, वह तुरंत दूसरी कहानी बना देती है कि उसके साथ इंडिया में एक दुर्घटना हुई थी और तबसे वह कुत्तों से बहुत डरता था, इसलिए कुत्ते को देखते ही भाग गया। कहानी का अंत इस वाक्य से होता है, “Romance at short notice was her specialty”। यहाँ रोमांस का आशय प्रेम नहीं, बल्कि तुरंत कथा गढ़ लेने की क्षमता से है।

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‘चटनी’ में टिस्का चोपड़ा वनिता नाम की गृहिणी का किरदार निभाती हैं। फ़िल्म की शुरूआत एक पार्टी में सरग़ोशी से होती है कि “गाज़ियाबाद से है, बातें बनाने में माहिर है।” सादा और अलग-थलग दिखने वाली वनिता, रसिका को अपने पति के साथ फ़्लर्ट करते देखती है और बिना कुछ कहे या तमाशा किये उसे चटनी-पकौड़े खाने के लिए घर आमंत्रित करती है। यह आमंत्रण इसलिए भी है कि रसिका अपनी इच्छा ज़ाहिर करती है कि वह वनिता से चटनी बनाना सीखना चाहती है।

अगला दृश्य वनिता के घर का है, जहाँ चटनी के स्वाद और हरेपन के पीछे एक जघन्य घटनाक्रम सामने आता है। वनिता रसिका को बताती है कि उनके यहाँ काम करने वाला भोला, जो बाद में ऑफ़िस में काम करने लगा था, एक रात झगड़े में मारा गया। वह यह भी कहती है भोला की लाश उसके घर के बरामदे में दबायी गयी और उसी जगह उगने वाली मिर्च से वह चटनी बनाती है। यह सुनकर रसिका सन्न रह जाती है। फ़िल्म यहीं समाप्त होती है।

फ़िल्म की शुरूआत में “बातें बनाने” की जो बात कही गयी थी, उसका संबंध इसी पूरे प्रसंग से जुड़ता है। जहाँ वेरा “शॉट नोटिस” में कथा गढ़ लेती है, वहीं वनिता “बातें बनाने” में माहिर साबित होती है। दोनों ही स्थितियों में कहानी एक साधन है।

ये दोनों रचनाएँ किसी विशिष्ट साहित्यिक परिवेश में नहीं घटतीं। उनके किरदार हमारे आसपास के ही लोग हैं। कहानी में छल एक युक्ति है। उसकी कोई बाहरी नैतिकता नहीं है। कथा का तर्क सामान्य जनजीवन के तर्क से अलग होता है, भले ही जनजीवन कथा का हिस्सा हो। इसीलिए कथा पर तर्क का बोझ नहीं है। दोनों ही कथाओं में छल और भ्रम का प्रभावी इस्तेमाल है, जो कथा के भीतर के किरदारों के संबंधों को बदल देता है और पाठक या दर्शक के लिए विस्मय की तरह प्रकट होता है।

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निशांत कौशिक

1991 में जन्मे निशांत ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली से तुर्की भाषा एवं साहित्य में स्नातक किया है। मुंबई विश्वविद्यालय से फ़ारसी में एडवांस डिप्लोमा किया है और फ़ारसी में ही एम.ए. में अध्ययनरत हैं। तुर्की, उर्दू, अज़रबैजानी, पंजाबी और अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित। पुणे में 2023 से नौकरी एवं रिहाइश।

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