
- September 30, 2025
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नियमित ब्लॉग डॉ. आज़म की कलम से....
हिंदी और उर्दू दोनों का शाहकार उपन्यास
‘गोदान’, मुंशी प्रेमचंद के इस नॉवेल का प्रकाशन 1936 में ग्रंथ रत्नाकर कार्यालय, मुंबई से हुआ था। गोदान को मुंशी प्रेमचंद का ही नहीं उर्दू और हिन्दी दोनों अदब का शाहकार नॉवेल तस्लीम किया जाता है। प्रेमचंद का अख़िरी प्रकाशित नॉवेल भी यही है। गोदान पहले देवनागरी रस्म-उल-ख़त (लिपि) में लिखा गया था फिर इक़बाल बहादुर वर्मा ‘साहिर’ ने इसे उर्दू ज़बान के सांचे में ढाला। ये नॉवेल भारत के पिसे हुए और प्रताड़ित किसानों की दुख-भरी ज़िंदगी को बयान करता है, जिसमें मुंशी प्रेमचंद ने निहायत बेबाकी से किसानों पर होने वाले अत्याचारों की अक्कासी की है। नॉवेल का मुख्य किरदार “होरी” प्रेमचंद का गढ़ा हुआ ऐसा किरदार है, जो पूरे हिन्दोस्तान के किसानों की नुमाइंदगी करता है। नॉवेल के अन्य पात्र भी स्पष्ट तौर पर विभिन्न वर्गों की सामाजिक स्थिति को उजागर करते हैं। इसका समापन दिल को झिंझोड़ देने वाला है। उर्दू और हिन्दी के अधिकांश आलोचकों ने गोदान को उर्दू और हिन्दी भाषाओं का संयुक्त रूप से बेहतरीन नॉवेल क़रार दिया है।
इस उपन्यास के आधारों में निर्धनता, जात-पात, पसमांदा, दबे-कुचले लोग हैं। समाजी नाइंसाफ़ी, आर्थिक बदहाली और मानवता की दुर्दशा पर रोशनी डाली गयी है। धर्म, ऊंच-नीच, अन्य सामाजिक समस्याएं और सरोकार भी लेखन की परिधि में लिये गये हैं। देहाती ज़िंदगी की अक्कासी में यथार्थवाद का कमाल है। दृश्यों को बारीक़ी से ऐसे बयान किया गया है कि पूरा नक़्शा आँखों के आगे खिंच जाता है। ये किसानों की बदहाली का शोकगीत है। जागीरदारी व्यवस्था का हृदय विदारक आलेख है। इसका केंद्रीय पात्र “होरी महतो” एक ग़रीब किसान है, जो जागीरदाराना अत्याचारी व्यवस्था के विरुद्ध और किसानों के शोषण को ख़त्म करने के लिए संघर्ष करता है। शोषण में केवल जागीरदार ही नहीं बल्कि मिल मालिक, अख़बार के संपादक, पेशेवर वकील, डॉक्टर, मास्टर, नेता और सरकारी कर्मचारी भी किसी ना किसी तरह संलिप्त हैं। ये बीसवीं सदी की तीसरी और चौथी दहाइयों (दशकों) का दस्तावेज़ है।
ये केवल एक दास्तान नहीं बल्कि समाज का आईना है। होरी के साथ ये कहानी उसकी बीवी धनिया की भी है, जो अपनी हिम्मत भर अपने परिवार की मदद करती है। दीगर किरदार भी बड़ी अहमियत के साथ अपना-अपना रोल निभाते हैं जैसे रूपा और सोना, गोबर्धन, झूंया महराज, राय साहिब, प्रोफ़ैसर महित, डाक्टर मालती, भोला, मिल मालिक खन्ना, गोविंदी, सेलिया, मातादीन और दातादीन, संपादक ओंकारनाथ आदि और मुस्लिम किरदार मिर्ज़ा ख़ू सय्यद। भारत की मिट्टी की सुगंध हर पृष्ठ पर महसूस होती है।

इस नॉवेल को काश्तकारी का एपिक कहा जाता है। उर्दू और हिन्दी साहित्य में सबसे अहम स्थान हासिल है। मगर कहीं-कहीं असंगत दृश्य भी सामने आते हैं। ऐसा लगता है मुंशी प्रेमचंद ने इस नॉवेल में अपनी सोच के तमाम पहलुओं को पेश कर देने की कोशिश की है। कहीं-कहीं अत्यधिक भावुक दृश्य हैं जो अप्राकृति लगते हैं। बाक़ौल उनके “नॉवेल में आपके क़लम में जितनी ताक़त हो उतना ज़ोर दिखाइए, सियासत पर जिरह कीजिए, किसी महफ़िल का नक़्शा खींचने में दस-बीस पृष्ठ लिख डालिए। लताफ़त (लालित्य) भरी ज़बान हो, यानी कसाफ़त (स्थूलता) से ख़ाली।”
बहरहाल नॉवेल में देहाती के साथ शहरी ज़िंदगी भी एक संतुलन के साथ मौजूद है। होरी एक निहायत मेहनती किसान है। दुख झेलता है, दूसरों को ख़ुश करने में लगा रहता है मगर उसका कोई फ़ायदा नहीं होता।
मुंशी प्रेमचंद: एक नज़र
धनपत राय श्रीवास्तव 31 जुलाई 1880 को लमही, बनारस में पैदा हुए और 08 अक्तूबर 1936 को 56 साल की उम्र में बनारस में उनका देहांत हुआ। उनके पिता का नाम मुंशी अजाइब लाल था।
प्रेमचंद ने नवाब राय के फ़र्ज़ी नाम से 1907 में अफ़सानानिगारी शुरू की। पहला संकलन 1908 में “सोज़-ए-वतन” के नाम से प्रकाशित हुआ। अंग्रेज़ी सरकार ने 1910 में उसे ज़ब्त कर लिया क्योंकि उनमें कुछ कहानियां देशप्रेम पर आधारित थीं। हिन्दी और उर्दू के सबसे बड़े कहानीकार और उपन्यासकार माने गये। सेवासदन, रंग-भूमि, निर्मला, ग़बन, कर्मभूमि, गोदान समेत कोई 18 नॉवेल लिखे और तीन सौ से ज़्यादा कहानियां लिखीं जिनमें कफ़न, पंच परमेश्वर, बड़े घर की बेटी, वग़ैरा बहुत मशहूर कहानियां हैं। ज़्यादातर दोनों ज़बानों में प्रकाशित हुईं। असरार-ए-मुआहिद उनका पहला नॉवेल है, जो उर्दू में है। हम ख़ुरमा-ओ-हम सवाब (1905), जलवा-ए-ईसार (1912), बाज़ार-ए-हुस्न (1921-۔192), गोश-ए-आफ़ियत (1928), चौगान-ए-हस्ती (1927), पर्दा मजाज़ (1928), निर्मला (1929), बेवा (1932), ग़बन (1932), मैदान-ए-अमल (1936) आदि नॉवेल उर्दू में आज भी पसंद किये जाते हैं।
“कफ़न” कहानी और उपन्यास “गोदान” उनकी आख़िरी कृतियां हैं। प्रेमचंद ने उर्दू अफ़साने की बुनियाद डाली। बतौर साहित्यकार वो सुधारपसंद थे और समाज की बुराइयों को दूर करना चाहते थे। यथार्थवादी शैली अपनाते थे। “अंजुमन तरक़्क़ी-पसंद मुसन्निफ़ीन” की पहली कान्फ़्रेंस की अध्यक्षता लखनऊ में 1936 में उन्होंने की थी। सामाजिक भेदभाव, जाति, वर्ण वर्गीकरण के विरोध में लिखने के लिए मुंशी जी ने सरकारी नौकरी को भी त्याग दिया था।

डॉक्टर मो. आज़म
बीयूएमएस में गोल्ड मेडलिस्ट, एम.ए. (उर्दू) के बाद से ही शासकीय सेवा में। चिकित्सकीय विभाग में सेवा के साथ ही अदबी सफ़र भी लगातार जारी रहा। ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास व चिकित्सकी पद्धतियों पर किताबों के साथ ही ग़ज़ल के छन्द शास्त्र पर महत्पपूर्ण किताबें और रेख्ता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ज़ल विधा का शिक्षण। दो किताबों का संपादन भी। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित, पुरस्कृत। आकाशवाणी, दूरदर्शन से अनेक बार प्रसारित और अनेक मुशायरों व साहित्य मंचों पर शिरकत।
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