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हास्य-व्यंग्य आदित्य की कलम से....

देश में अभूतपूर्व पत्रकारिता का दौर

             बहुत-से लोगों के लिए यह निराशाजनक तथ्य है कि आधुनिक भारत में पत्रकारिता का श्रीगणेश विदेशी प्रभावों से हुआ। हालांकि इससे हमें निराश नहीं होना चाहिए। गणेश जी की प्लास्टिक सर्जरी और पुष्पक विमान जैसी उपलब्धियाँ पहले ही भारत के खाते में आ चुकी हैं। हाल ही एक विशिष्ट प्रबुद्ध वर्ग ने घोषित कर दिया है हनुमान प्रथम अंतरिक्ष यात्री थे। इन ऐतिहासिक तथ्यों की खोज ने संपूर्ण विश्व में भारत को मेडिकल साइन्स और अंतरिक्ष कार्यक्रम का अगुआ बना दिया है। इस प्रेरणा से हम कम से इस बात का दावा कर ही सकते हैं कि नारद मुनि उपमहाद्वीप की पावन भूमि के प्रथम स्वतंत्र पत्रकार थे, जिन्होंने पत्रकारिता की शुरूआत की; और इस बात पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। नारद मुनि को तटस्थ पत्रकारिता का अग्रदूत भी माना जा सकता है। वे देवताओं और असुरों दोनों के ही प्रिय थे। वे निस्पृह भाव से किसी भी पक्ष में शामिल न होकर इधर की बात उधर और उधर की बात इधर करने में सिद्धहस्त थे। नारद जी के देवताओं और असुरों दोनों के साथ स्वस्थ संबंध थे उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत अभयदान भी प्राप्त था। इसके व्यापक प्रमाण धर्मग्रंथों में उपलब्ध हैं।

वर्तमान संदर्भों में नारद के स्थान पर पत्रकारों की कुलीन जमात है जिनके संबंधों का दायरा सत्ता पक्ष, सत्ता समर्थक कुलीन वर्ग तथा विपक्ष और जनता तक फैला हुआ है। सम्पूर्ण ब्रह्मांड में नारद ही एकमात्र सार्वजनिक संपर्क सूत्र थे। आजकल सरकार के सभी विभागों और मंत्रालयों में “सूत्र” कुकुरमुत्तों की तरह पाये जाते हैं, जिनके हवाले से गोपनीय ख़बरें सार्वजनिक की जाती हैं।

देश में पत्रकारिता के स्तर को समझने के लिए हमें संख्या रेखा का ज्ञान होना चाहिए। गणित ज्ञान प्रत्येक भारतीय से अपेक्षित है, क्योंकि शून्य के आविष्कार का सेहरा हमारे सिर पर बंधा है। हमारे लोकप्रिय नेता भी गणित के फ़ॉर्मूलों के माध्यम से ही देश के विकास को समझाते हैं, हमें इसका अनुकरण करना चाहिए। इस हिसाब से नारद संख्या रेखा के मध्य बिंदु शून्य की तरह हैं। एकदम बीच में तटस्थ जहां से धनात्मक और ऋणात्मक पत्रकारिता की शुरूआत होती है। भारतीय पत्रकारिता का सुनहरा अध्याय, जिसका अभी हम ज़िक्र करेंगे, वह संख्या रेखा पर धनात्मक पूर्णांक का उदाहरण है। आइए इस बात का परीक्षण करते हैं।

ऐसा माना जाता है अठारहवीं शताब्दी के अंत में जब भारत ग़ुलामी की बेड़ियों में जकड़ा जा रहा था, तब जेम्स ऑगस्ट हिक्की ने सन 1780 में कोलकाता से “बंगाल गजट” नामक पहला समाचार पत्र प्रकाशित किया। यह समाचार पत्र अंग्रेज़ी भाषा में था। ऐसा मान सकते हैं हिक्की एक सरफिरा विदेशी इंसान था, जिसने अपने समाचार पत्र में अपनी ही ब्रिटिश सरकार की नीतियों की आलोचना कर शुरूआत से ही एक ग़लत परंपरा की नींव डाली। वह भी ऐसे समय जब भारतीयों का एक प्रभावशाली वर्ग अंग्रेज़ों की चरण-वंदना करने और पाश्चात्य संस्कृति को अपनाने में गौरव महसूस करने लगा था। हिक्की ने अपनी ही सरकार की अन्यायपूर्ण नीतियों पर प्रश्न उठाकर भारतीयों को भी दुस्साहस के लिए प्रेरित किया। उसके इस कार्य को देशद्रोह की श्रेणी में रखा जा सकता है। आज ही की तरह तत्कालीन समय में सीमित पहुँच के कारण अंग्रेज़ी में की गयी आलोचना को ज़्यादा गम्भीरता से नहीं लिया जाता होगा, अतः भारतीयों को भी अंग्रेज़ी भाषा में समाचार पत्रों का प्रकाशन शुरू करने के अवसर प्राप्त हुए।

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आधुनिक भारत के इतिहासकारों द्वारा भारतीय भाषा में पत्रकारिता की शुरूआत करने का श्रेय राजा राममोहन राय को दिया जाता है। उन्होंने “संवाद कौमुदी” नामक पत्र बंगाली भाषा में प्रकाशित किया था। “सती प्रथा” तथा अन्य सामाजिक और धार्मिक बुराइयों का इस पत्र के माध्यम से मुखर विरोध किया गया, तो साथ ही स्त्री शिक्षा तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ाने की पैरवी की।

“उदन्त मार्तंड” हिंदी में प्रकाशित पहला समाचार पत्र था। समाचार पत्र स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए संघर्ष करते भारत में अवाम की आवाज़ उठाने और विदेशी शासन का विरोध करने का सबसे सशक्त माध्यम बना। इसने भारत में राजनीतिक चेतना जगाने तथा सामाजिक सुधार हेतु जनमत तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

दादाभाई नौरोजी (रास्त गोफ़्तार), शिशिर कुमार घोष (अमृत बाज़ार पत्रिका), बाल गंगाधर तिलक (केसरी, मराठा), लाला लाजपत राय (वंदे मातरम, द पंजाबी), दयाल सिंह मजीठिया (ट्रिब्यून), महात्मा गांधी (यंग इंडिया, हरिजन), मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (अल हिलाल), गणेश शंकर विद्यार्थी (प्रताप) आदि प्रबुद्ध भारतीय इन पत्रों के संपादन अथवा प्रकाशन से जुड़े थे, जिन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद की नींव रखी। इन समाचार पत्रों ने जनता को राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक सुधार के लिए प्रेरित किया। भारत के बहुत से कुलीन और संपन्न लोगों ने ब्रिटिश शासन के विरोध के बावजूद प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इन समाचार पत्रों का वित्त पोषण किया। कालांतर में इस प्रवृत्ति को नियंत्रित करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने प्रेस के नियंत्रण के लिए बहुत से क़ानून बनाये।

ब्रिटिश प्रतिरोध के बावजूद इन हस्तियों और इनसे सम्बद्ध अख़बारों की आधुनिक भारत के निर्माण में भूमिका को देखकर श्रद्धा हो आती है। मीडिया इस समय तक प्रिंट और कुछ मायनों में रेडियो तक ही सीमित था। भारत की स्वतंत्रता के बाद संविधान ने विचार और अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार के साथ इसको संरक्षण प्रदान किया। इस उपाय ने मीडिया को लोकतंत्र का प्रहरी बनने में मदद की। मीडिया की इसी भूमिका के कारण उसे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में देखा जाने लगा। ऐसा नहीं कि इस काल में बिके हुए अख़बार या पत्रकार नहीं थे, उनकी भी पर्याप्त संख्या थी लेकिन जनमानस में न तो उनकी पैठ थी, न ही सम्मान। ये सभी सरकारी अनुदान और सरकार की शाबाशी तक ही सीमित थे।

आजकल मीडिया में दरबारी प्रवृत्ति का ज़ोर चल रहा है। वर्तमान सत्ता ने मध्यकालीन भारत में प्रचलित भाट और चारणों की दरबारी परंपरा को पुनर्जीवित कर दिया है। मीडिया के बहुतेरे चैनलों पर नियमित प्रशस्ति गान करने के लिए इनकी नियुक्ति की गयी है। इस तरह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ में भांड और मीरासियों की एक पूरी जमात पैदा हो गयी है, जिसने पत्रकारिता को नाटकीय प्रस्तुति और स्तुति गान तक सीमित कर दिया है। इस तरह मीडिया का एक बड़ा वर्ग संख्या रेखा के बाईं ओर ऋणात्मक पूर्णांक को प्रदर्शित करने में जी-जान से जुटा हुआ है। इस क्षेत्र में अपने पूर्वजों के द्वारा कमाये गये सम्मान को कौड़ियों के मोल बेच रहा है। इसके एवज़ में उसे राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान और धन प्राप्त हो रहा है। आज देश के छंटे हुए गधे एक-दूसरे का ढेंचू-ढेंचू करते हुए सम्मान कर रहे हैं और हाशिये पर धकेल दिये गये घोड़े दूर खड़े हिनहिनाकर विरोध प्रदर्शन। भारत हमेशा से संतुलन बनाकर चलने की नीति में विश्वास करता आया है। अगर हमारे पूर्वजों ने पत्रकारिता के उच्चतम मानदंड स्थापित किये हैं, तो वर्तमान पीढ़ी निकृष्टतम पत्रकारिता का उदाहरण प्रस्तुत करने में जी-जान से जुटी हुई है ताकि संतुलन बना रहे। जनता “सर्वधर्म समभाव” के समभाव को पकड़कर चल रही है, उसे न तो इसकी उत्कृष्टता से विशेष सरोकार था न ही इसकी निकृष्टता से कोई आपत्ति। इस तरह संख्या रेखा पर निकृष्ट आचरण के ज़रिये मीडिया ने संतुलन बनाने में सफलता अर्जित की है। कभी पेशेवर शुचिता, राष्ट्रप्रेम, संवैधानिक आचरण, देशभक्ति आदि के बोझ से दबकर पत्रकारिता धनात्मक पूर्णांक को प्रदर्शित करती थी।

भारत के मीडिया की यह दशा बाज़ारवाद तथा राजनीतिक शुचिता के ह्रास का परिणाम मानी जा सकती है। शुरूआत में मीडिया ने दबे-छुपे अपना ज़मीर विज्ञापनों और गोपनीय ख़बरों को दबाने के एवज़ में लाभ कमाकर बेचा। आज मीडिया का बड़ा वर्ग खुलेआम निहायती बेशर्मी से ख़ुद को नीलाम कर रहा है। आइए कुछ उदाहरण देखते हैं:

सैकड़ों खुली प्रेस वार्ताएं करने वाले पूर्व प्रधान को मौनी बाबा और कठपुतली कहने वाला मीडिया वाचाल प्रधान की मन की बातों और पूर्व नियोजित साक्षात्कारों से संतुष्ट है। पूर्व प्रधान पर बरसों भ्रष्टाचार की जांच से कुछ हाथ न लगने पर भी मीडिया ने न तो किसी सत्ता से सवाल पूछा, न खेद जताया और न इस दौर के किसी भ्रष्टाचार का पर्दाफ़ाश किया। आज देश पर कर्ज़ का बोझ पूर्ववर्ती सरकारों के मुक़ाबले तीन गुना बढ़ चुका है, आय की असमानता और बेरोज़गारी अभूतपूर्व रूप से बढ़ गयी है लेकिन मीडिया बदहाल अर्थव्यवस्था में विकास खोज रहा है और विकास सेठों की चौखटों एवं सत्ताधारी दल के कार्यालयों में लोट रहा है।

इस देश का एक चलन है, जब भी कभी देश सामान्य अवस्था में आने लगता है शरारती तत्व अपना अगुआ बनाकर दिल्ली में गधे लाकर छोड़ देते हैं। ये गधे दिल्ली में उत्पात मचाते हैं और जनता का जीवन कष्टकारी बनाते हैं, जिससे जीवित होने का स्मरण बना रहता है। कुछ वर्षों पहले ऐसा ही छोटे क़द का एक अगुआ दिल्ली में दाख़िल हुआ और उथल-पुथल मचा दी। गधा भ्रष्टाचार पर रेंक रहा था। गधे ने सत्ता में बैठे एक सज्जन व्यक्ति को टारगेट किया, जो उस समय प्रधान थे, उन पर और उनके सहयोगियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाये। प्रधान जनता का हितैषी था, अतः अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की तर्ज़ पर दो विधेयक वह ले आया, “सूचना का अधिकार” और “लोकपाल”। आज यही विधेयक भ्रष्टाचार का विरोध करने के नाम पर सत्ता में आये लोगों के लिए गले की फांस बने हुए हैं। इन विधेयकों से जनता को मिले अधिकारों को कमज़ोर करने के लिए सरकार के अधिकारियों को मोटी खाल का बनने की ट्रेनिंग दी जा रही है। वे सूचना देने से साफ़ मना कर देते हैं। इसके अलावा जांच में फंसाने, गोपनीयता का हवाला देने और राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरा बताकर सूचना दबायी जा रही है।

एक दल के मुखिया का वैगन आर से थोड़ी बड़ी गाड़ी लेने का मुद्दा बनाने वाला मी​डिया प्रधानसेवक की महंगी गाड़ियों/उड़नखटोलों के बेड़े पर कितनी मासूमियत से चुप होता है। सेना के लिए लड़ाकू विमानों की ख़रीदी में बेतहाशा क़ीमतें चुकाने का हिसाब विपक्ष मांगे तो ऐसे आँखें दिखायी जाती हैं, मानो विपक्षी चुने हुए प्रतिनिधि न होकर घुसपैठिये हों। यहाँ न्यायालय में जाकर दबाव बनाया जाये तो देश की सुरक्षा के नाम पर बंद लिफ़ाफ़े में सूचना। ऐसे सूचना लेने वाला न्यायधीश भी संतुष्ट। महान पत्रकारों ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का अति संवेदनशील मुद्दा घोषित कर रक्षा सौदे पर प्रश्न उठाने वाले विपक्ष पर ही आरोप मढ़ दिया कि देश की सुरक्षा को ख़तरे में डालने का षड्यंत्र है। यह वही बिरादरी है जो कभी बोफ़ोर्स के मुद्दे पर बाल की खाल निकालती थी।

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इस देश में ग़लत नीतियां लागू करने वाली आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी सरकार के विकास हेतु किये गये प्रयास आज भी सम्पूर्ण भारत में गरिमा के साथ यत्र-तत्र मुंह चिढ़ाते खड़े दिखायी देते हैं। देश की आधारभूत संरचना के साक्ष्य आज तक संस्थानों और निर्माणों के रूप में मौजूद है। मीडिया इन उपलब्धियों को वर्षों से मिटाने का अथक प्रयास कर रहा है, लोग अड़ियल हैं, इसे भूल ही नहीं रहे हैं। इस अंधकारमय कालखंड के साक्षी अब स्पेस टेक्नोलॉजी के माध्यम से तीव्रगति से किये जा रहे विकास को देखने का सौभाग्य प्राप्त कर रहे हैं। यों जिन सड़कों पर फ़ाइटर जेट उतारे गये थे, उन पर बारिश के मौसम में नौका-विहार का भी आनंद उठाया जा सकता है।

हज़ारों करोड़ की लागत से निर्मित सड़कों के बीच जलस्तर बढ़ाने के लिए विभाग ने अत्याधुनिक तकनीक से निर्मित वॉटर रिचार्ज पॉइंट सड़कों पर जगह-जगह गड्ढों के रूप में बनाये हैं। ये गड्ढे और धंसती हुई सड़कें भारत की जनसंख्या नियंत्रण में भी परोक्ष रूप से अपनी भूमिका निभा रही हैं। विभाग के प्रमुख स्वयं दावा करते हैं उनके इस अभूतपूर्व कार्य को देखकर उन्हें दुबई के राजा ने छह महीने के लिए भारत के प्रधान से मांग लिया।

देश में अमृतकाल चल रहा है, और “राम राज्य” की आमद हो चुकी है। नोटबंदी और लॉकडाउन की सफल घोषणा के बाद मीडिया ने “कल्कि” अवतार की घोषणा की पूरी तैयारी कर रखी थी.. ख़ैर। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत के बड़े-बड़े बाँधों, कारख़ानों और वैज्ञानिक संस्थानों को “आधुनिक भारत के मंदिर” कहकर लोगों को भ्रमित कर दिया था। अब नये “राम राज्य” में मंदिरों का पुराना गौरव वापस लाने की मुहिम ज़ोर-शोर से जारी है…

रोज़गार के अवसरों को सरकार ने एक रणनीति के तहत सीमित कर रखा है ताकि बेरोज़गार युवाओं को घर में बैठे-बैठे अपने माता-पिता की सेवा करने का अवसर प्राप्त हो सके। इस तरह सरकार भौतिकतावादी संस्कृति को नियंत्रित करने और रामराज्य के श्रवण कुमार तैयार करने में जी-जान से जुटी है और मीडिया के प्रबुद्ध लोगों द्वारा नेहरू के कार्यों की कड़ी आलोचना कर जनजागरण का महती कार्य किया जा रहा है।

वर्षों बाद दिल्ली ने दीपावली का जश्न मनाया, अमृतकाल का अहसास दिलाने के लिए आतिशबाज़ी पर जो अनावश्यक नियंत्रण था, उसमें छूट दी गयी। मीडिया ने इसे एक वर्ग विशेष की भावनाओं पर लगाये गये नियंत्रण से मुक्ति की संज्ञा दी। दिल्ली के प्रदूषण की वैश्विक स्तर पर चर्चा शुरू होते ही नींद से हड़बड़ाकर जागी सरकार ने प्रदूषण कम करने के बेमिसाल तरीक़ों की खोज कर नये कीर्तिमान स्थापित किये। और दिल्ली में ही अत्यंत सीमित अवधि में यमुना जल को प्रदूषण मुक्त बना दिया गया। आलोचना करने वालों को सरकार की उपलब्धियों से जलने वाले विरोधी कहकर प्रबुद्ध मीडिया ने इन आवाज़ों को किनारे कर रखा है। और ताज़ा-ताज़ा ‘बचत उत्सव’ में मीडिया ने चार चांद लगाये। जीएसटी को टैक्स टै​ररिज़्म कभी न मानने वाले प्रबुद्ध पत्रकार कहते नहीं थक रहे ‘अब और आसान’ जीएसटी ‘बहुत बड़ी राहत’ हो गया है!

ख़ैर छोड़ो…! लोग निरर्थक बातें करते रहते हैं, कुछ लोगों का मानना है भारत के एक बड़े वर्ग के बीच मीडिया ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है। मेरा मत थोड़ा भिन्न है। इस देश में राजनीतिक तख़्तापलट का एक लम्बा इतिहास रहा है। इसमें नमकहरामी का ज़िक्र आपको प्राचीन काल से आधुनिक भारत तक बहुतायत से मिल जाएगा। नमक हलाली के क़िस्से दुर्लभ हैं। वर्तमान भारतीय मीडिया के एक बड़े तबक़े ने इस मिथक को तोड़ दिया है। उसने नमक हलाली के अभूतपूर्व प्रतिमान स्थापित किये हैं। और अपनी विश्वसनीयता दरबारों में साबित की है। यह संख्या रेखा के किस ओर दिखायी देते हैं? आप इस बात पर माथापच्ची कीजिए, मुझे छुट्टी दीजिए।

(पहला कार्टून आकाश बनर्जी के इंस्टाग्राम और दूसरा सतीश आचार्य के इंस्टाग्राम हैंडल से साभार)

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आदित्य

प्राचीन भारतीय इतिहास में एम. फिल. की डिग्री रखने वाले आदित्य शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न एनजीओ के साथ विगत 15 वर्षों से जुड़े रहे हैं। स्वभाव से कलाप्रेमी हैं।

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