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21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो एक टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से ​चयन और इन फ़िल्मों का दस्तावेज़ीकरण...
पाक्षिक ब्लॉग (भाग-2) मानस की कलम से....

दिल चाहता है... अनेक परिभा​षाएं गढ़ने वाली फिल्म

          ‘दिल चाहता है’ विशुद्ध दोस्तों पर बनी फ़िल्म है। अगर आप गूगल पर टाइप करते हैं “दोस्ती पर बनी बॉलीवुड फ़िल्म” तो शायद सबसे पहले आपको जो फ़िल्म दिखेगी वो- दिल चाहता है”। ये ऐसे दोस्तों की कहानी है, जैसे वास्तविक जीवन में होते हैं।

‘दिल चाहता है’ के दोस्त एक-दूसरे का सहारा नहीं हैं। जैसे दोस्ती या याराना फ़िल्म में थे, जो दोस्ती की मिसाल क़ायम करते नज़र आ रहे हों। ये दोस्त, काई पो चे, छिछोरे या रॉक ऑन के दोस्तों जैसे किसी ध्येय को पाने के लिए भी साथ नहीं आये हैं। ये दोस्त, 3 idiots के दोस्तों की तरह भी नहीं हैं, जहाँ एक दोस्त लार्जर दैन लाइफ़ है। और न ही पूरी फ़िल्म में ये साथ यात्रा करते नज़र आ रहे हैं, जहाँ फ़िल्म ख़त्म होते-होते अपने अंदर बदलाव महसूस करते हैं- जैसे ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा या मडगांव एक्स्प्रेस में। (अधिकतर दोस्ती तीन लोगों के बीच ही क्यूँ दिखायी जाती है? इस पर कभी बाद में बात करेंगे) और न ही इनके बीच कोई दोस्ताना (2008) है। तो फिर ये कैसे दोस्त हैं?

इसका जवाब ही फ़िल्म की आत्मा है। फ़रहान अख़्तर ने अपनी पहली फ़िल्म बनाने से पहले यह समझ लिया था कि वास्तविक किरदार कितने प्रभावशाली होते हैं और उन्हें कैसे गढ़ा जाता है। फ़िल्मों में वास्तविकता को अक्सर सिर्फ़ कला फ़िल्मों से जोड़कर देखा जाता रहा है। लेकिन ‘दिल चाहता है’ के कुछ दृश्य और गाने हटा दिये जाएं तो यह भी एक कलात्मक फ़िल्म कही जा सकती है। जो महानगरीय या शहरी युवाओं की कहानी कहती है।

इस फ़िल्म में दोस्त वैसे हैं, जैसे आम जीवन में हमारे होते हैं। जो बस हैं। उनका कोई उद्देश्य नहीं है। एक-दूसरे की मदद के लिए नहीं हैं। बस हैं। एक-दूसरे को समझते हैं और कभी कभी नहीं समझते हैं। एक-दूसरे की मदद करते हैं और कभी-कभी नहीं भी करते हैं। प्यार करते हैं, लड़ते हैं, मज़े लेते हैं, लेकिन अपनी-अपनी ज़िंदगी जी रहे हैं। एक-दूसरे के लिए नहीं जी रहे। ये सारे दोस्त इंसानी ज़ेह्न के हैं, जो ग़लतियाँ भी करते हैं। लेकिन ये दोस्त कहीं एक धुरी पर ऐसे जुड़े हैं, जहाँ से इन्हें अलग करना नामुमकिन है। शारीरिक तौर पर भले हो जाएं। वो धुरी एक कम्फ़र्ट लेवल है, जहाँ कोई एक-दूसरे को जज नहीं कर रहा। और इस धुरी को फ़रहान ने उन दृश्यों से दिखाया है, जहाँ तीनों दोस्त अक्सर एक-दूसरे को देखते हैं और दिल खोलकर हँस पड़ते हैं। जैसे अब उनके बीच कोई नहीं आ सकता। वो बेमतलब की हँसी, सिर्फ़ दोस्तों के बीच ही होती है। जो ‘दिल चाहता है’ में हमें दिखती है।

संवाद और साउंड

इस फ़िल्म में किरदारों की वास्तविकता के साथ-साथ संवादों को भी वास्तविकता के लिए जाना जाता है। ऐसे संवाद जो हम आम जीवन की बातचीत में बोलते हैं, वैसे ही फ़िल्म के किरदार भी बात करते हैं। जो इस फ़िल्म के पहले नहीं था। इसके पहले फ़िल्मों की संवाद अदायगी में एक नाटकीयता रहती थी। क्यूँकि फ़िल्में नाटक से होकर आयी हैं। इस तरह ‘दिल चाहता है’ ने यह भ्रम भी तोड़ा कि फ़िल्मों के संवाद सिर्फ़ फ़िल्मी संवाद होते हैं।

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इसके अलावा इस फ़िल्म ने पहली बार सिंक साउंड का प्रयोग किया। सिंक साउंड (सिंक्रोनाइज़्ड साउंड रिकॉर्डिंग) का मतलब है, फ़िल्मों की शूटिंग के समय रिकॉर्ड की गयी आवाज़। अधिकतर फ़िल्मों में आवाज़ डब की जाती है। ऑस्कर में भेजे जाने की एक शर्त यह भी होती है कि आपकी फ़िल्म में सिंक साउंड प्रयोग हुआ हो। शायद फ़रहान को अपनी फ़िल्म को लेकर एक उम्मीद रही हो। जो उसी साल प्रदर्शित हुई लगान ने तोड़ दी। लगान में भी सिंक साउंड का प्रयोग हुआ था।

पुरस्कार और सराहना

हालांकि यह फ़िल्म ग्रामीण इलाक़ों में ज़्यादा सफल नहीं रही, लेकिन शहरी सेंटर्स में यह कमर्शियल रूप से सफल रही और दुनिया भर में ₹397.2 मिलियन (US$4.7 मिलियन) की कमाई की, जिससे यह उस साल की पांचवी सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली हिंदी फ़िल्म बन गयी। तबसे इसे कल्ट स्टेटस मिल गया है और इसे हिंदी सिनेमा में युवाओं की कहानियों और मॉडर्न कहानी कहने के तरीक़े को फिर से परिभाषित करने के लिए एक लैंडमार्क माना जाता है।

49वें नेशनल फ़िल्म अवॉर्ड्स में, ‘दिल चाहता है’ ने दो अवॉर्ड जीते, जिसमें हिंदी में बेस्ट फ़ीचर फ़िल्म का अवॉर्ड भी शामिल था। इसे 47वें फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड्स में तेरह नॉमिनेशन मिले, और इसने सात अवॉर्ड जीते, जिनमें बेस्ट फ़िल्म (क्रिटिक्स), बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर (अक्षय खन्ना) और बेस्ट कॉमेडियन (सैफ़ अली खान) के पुरस्कार शामिल हैं।

भारत में रिलीज़ होने के बाद, ‘दिल चाहता है’ को कई इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल्स में दिखाया गया, जिनमें 33वां इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल ऑफ़ इंडिया, 14वां पाम स्प्रिंग्स इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल, और 11वां ऑस्टिन फ़िल्म फ़ेस्टिवल शामिल हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, न्यू स्ट्रेट्स टाइम्स के के.एन. विजयन ने कहा, यह फ़िल्म आम बॉलीवुड फ़िल्मों से अलग थी और शायद सभी दर्शकों को पसंद न आये, लेकिन उन्होंने चंद्रन की सिनेमैटोग्राफ़ी की तारीफ़ की। द वॉल स्ट्रीट जर्नल के लिए एक रेट्रोस्पेक्टिव रिव्यू में बेथ वॉटकिन्स ने फ़िल्म में ह्यूमर, इमोशन और ईमानदारी के मेल की तारीफ़ की।

फ़िल्म की देन

समय के साथ, इस फ़िल्म को शहरी भारतीय सिनेमा की एक नयी लहर शुरू करने और अख़्तर को अपनी पीढ़ी के लीडिंग फ़िल्ममेकर्स में से एक के तौर पर स्थापित करने का श्रेय दिया गया है।

फ़रहान ने हमें ‘दिल चाहता है’ दी, और ‘दिल चाहता है’ ने हमें फ़रहान जैसा निर्देशक, लेखक, गायक, एक्टर दिया, सैफ़ को वापस फ़िल्में दिलायीं, अक्षय खन्ना को नैशनल अवॉर्ड दिलाया, आमिर को भुवन और आकाश एक साथ निभा सकने वाले प्रतिभावान अभिनेता की छवि दी, फ़िल्म इंडस्ट्री को हिट दी, फ़िल्म मेकर्स को फ़िल्म मेकिंग के अनेक नये रास्ते दिये। ऐसे ही तमाम कारणों से फ़िल्म माइल्स्टोन का दर्जा पाती है और कल्ट फ़िल्म की तरह जानी जाती है।

और यह ट्रिविया भी…

मज़ेदार बात यह है कि फ़रहान ने शुरूआत में इसे आकाश और शालिनी पर फ़ोकस करते हुए एक रोमांटिक कहानी के तौर पर सोचा था, लेकिन उनको कहानी में एक्साइटमेंट और गहराई की कमी लगी। अपने माता-पिता, जावेद अख़्तर और हनी ईरानी से बढ़ावा मिलने पर, जिन्होंने कॉन्सेप्ट की तारीफ़ की लेकिन कुछ सुधार सुझाये, फ़रहान ने कहानी को तीन दोस्तों के बीच के रिश्तों को शामिल करने के लिए बढ़ाया, जिससे फ़ोकस दोस्ती और पर्सनल ग्रोथ की थीम्स पर चला गया।

(स्केच: साइलेंस आफ़ आर्ट के फ़ेसबुक पेज से साभार)

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मानस

विवेक त्रिपाठी उर्फ़ मानस पूर्व बैंककर्मी हैं लेकिन फ़िल्मों के जुनून ने नौकरी छुड़वायी और फ़िल्में बनाने की दिशा में प्रेरित किया। आधा दर्जन शॉर्ट फ़िल्में बना चुके मानस की कुछ फ़िल्मों को फ़ेस्टिवलों में सराहना व पुरस्कार मिले हैं। फ़िल्म लेखन व निर्देशन के अलावा मानस का एक कहानी संग्रह 'बालकनी' प्रकाशित है। इन दिनों वह पूरी लंबाई की फ़िल्म के निर्माण के लिए संघर्षरत हैं।

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