
- December 23, 2025
- आब-ओ-हवा
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विवेक रंजन श्रीवास्तव नवंबर से अमेरिका प्रवास पर हैं और अन्य देशों की यात्राओं पर भी जाने वाले हैं। इस दौरान वह रोज़ाना शब्दों को समय दे रहे हैं। आब-ओ-हवा पर विशेष रूप से वैचारिकी, नोट्स, अनुभव आदि इंदराज के लिए यह कोना।
दूर देस में लेखक-1...
स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी: सबकी स्वतंत्रता का प्रतीक
स्वतंत्रता का कोई आकार नहीं होता, पर जब वह न्यूयॉर्क हार्बर के मध्य लिबर्टी द्वीप पर अथाह जलधारा के बीच खड़ी होकर हवाओं से बातें करती है तो एक वैश्विक जीवंत प्रतीक बन जाती है। स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी अर्थात “लिबर्टी इनलाईटिंग द वर्ल्ड” की कहानी फ्रांस द्वारा वर्ष 1886 में अमेरिका को दी गयी विचारों, संघर्षों और दोस्ती की उस स्वतंत्र यात्रा की प्रतीकात्मक भेंट है जो मनुष्य को मनुष्यता के पथ पर चलने की राह दिखाती है।
फ्रांस में बैठे बुद्धिजीवियों ने जब उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में यह सोचा कि अमेरिका को एक ऐसी भेंट दी जाये, जो आज़ादी और मानव गरिमा की आकांक्षा को व्यक्त कर सके, तब शायद उन्होंने भी कल्पना न की होगी कि यह प्रतिमा एक दिन पूरी दुनिया में अमेरिका का भावनात्मक प्रतीक बन जाएगी। यह प्रतिमा रोमन देवी लिबर्टस से प्रेरित है। मूर्ति के हाथों में अमेरिका की स्वतंत्रता, 4 जुलाई 1776 की तारीख की तख़्ती है।
फ्रांस ने अमेरिकन क्रांति में दोस्ती के प्रतीक स्वरूप इसे अमेरिका को भेंट किया था। 28 अक्टूबर 1886 को इस स्मारक का उद्घाटन हुआ था। स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी की मूर्ति 151 फ़ीट ऊंची है। पैडस्टल सहित स्मारक की कुल ऊंचाई 305 फीट है। तांबे की आवरण परत के कारण ऑक्सीडेशन से इसका रंग हरा पड़ गया है। 1984 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर घोषित किया था।
जैसे छन्द में गणित की रचना
फ्रांसीसी विचारक और सहयोगियों ने आज़ादी और मानवाधिकारों का संदेश देती विराट प्रतिमा का विचार रखा और मूर्तिकार बार्थोल्डी ने उसे रूप देना शुरू किया। यह मूर्ति कठोर सम्मिश्रित धातु की चादरों से गढ़ी गयी, पर इसमें मानवीय भावनाओं का भावनात्मक ताप भी भरा हुआ था। इसके भीतर का ढांचा इंजीनियरों की बुद्धिमत्ता का प्रमाण है, जिसने इसे समुद्री हवाओं की मार से भी सुरक्षित रखा हुआ है। यह प्रतिमा अपने आप में कला और विज्ञान का संगम था, जैसे किसी छंद में पिरोयी सुंदर कविता के पीछे पंक्तियों में छिपा गणित।

जब प्रतिमा आकार ले रही थी, तब उसे अमेरिका में खड़े करने के लिए मज़बूत पेडेस्टल बनाने की ज़िम्मेदारी अमेरिकी जनता ने उठायी। फंड जुटाने के अनगिनत प्रयास हुए, नाटकों से लेकर प्रदर्शनियों तक, व्यापक जनभागीदारी हुई और अंततः यह सहयोग दोनों देशों की आम जनता की मित्रता की एक अनूठी मिसाल बन गया। तैयार प्रतिमा सैकड़ों टुकड़ों में समुद्र पार भेजी गयी और जब वह न्यूयॉर्क पहुंची, तब लोगों ने उसे सिर्फ़ धातु का ढांचा नहीं, एक उम्मीद का पैग़ाम समझ दिल से उसका स्वागत किया। पेडेस्टल पूरा होते ही, स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी खड़ी की गयी और उसकी ऊंचाई आसमान को छूते हुए मनुष्य की वैश्विक स्वतंत्रता की मुखर नैसर्गिक आकांक्षा का स्थायी स्मारक बन गयी। जिस दिन इसका लोकार्पण हुआ, उस दिन यह तय हो गया कि यह प्रतिमा सिर्फ़ अमेरिका की नहीं, उन सबकी अभिव्यक्ति का भाव है जो प्रगति और स्वतंत्रता में विश्वास रखते हैं।
कला की भाषा की ऊंचाई
स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी के हर हिस्से की अपनी प्रतीकात्मक भाषा है। हाथों में मशाल एक राह दिखाती है, जो तमाम अंधेरों को पीछे छोड़कर प्रकाश की ओर चलने की प्रेरणा है। दूसरी भुजा में टेढ़े मेढ़े रास्तों का संक्षेप है, जिस पर तख़्ती में अमेरिकन क्रांति की वह तिथि अंकित है जब मनुष्यों ने यह घोषित किया था कि किसी भी शासन से ऊपर मानव की स्वतंत्र इच्छा है। उसके चरणों के समीप टूटी ज़ंजीरें इस बात की गवाही देती हैं कि गुलामी चाहे कितनी भी पुरानी क्यों न हो, उसे तोड़ने का साहस एक दिन ज़रूर जागता है। यही साहस इस प्रतिमा को वैचारिक रूप से उसकी ऊंचाई से भी ऊंचा स्थान देता है।
बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों में जब लाखों प्रवासी समुद्र पार कर अमेरिका की ओर चले, तब यह प्रतिमा उनके लिये खुले सपनों की पहली झलक थी जिसने दिल को आश्वस्त किया कि वे एक नये वैश्विक स्वतंत्र अध्याय की रचना करने बढ़ रहे हैं। अनगिनत आंखों ने इसे देखा और अपनी उम्मीदों को इसके साथ जोड़ लिया। यही वह क्षण है जब यह प्रतिमा मनुष्य के सामूहिक सपने की प्रहरी बन गयी। आगे चलकर इसे राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा मिला और समय समय पर इसके संवर्द्धन होते रहे, पर इसके अर्थ की भावनात्मक ऊंचाई कभी नहीं घटी।
आज जब आधुनिक दुनिया की जटिलताएं बढ़ रही हैं, तब भी स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी अपनी जगह पर अडिग खड़ी है (भले ही इसकी प्रतिकृतियां न टिक पा रही हों) और मानवता को याद दिलाती है कि स्वतंत्रता किसी राष्ट्र की नहीं, पूरी मानव जाति की प्राकृतिक आवश्यकता है। वह सिखाती है कि अधिकार सिर्फ़ मिलते नहीं, उनकी रक्षा भी करनी पड़ती है। वह यह भी याद दिलाती है कि आज़ादी का कोई अंत नहीं, उसका सफ़र हमेशा चलता रहता है।
समुद्र की लहरें उसके पांवों से टकराती हैं, हवाएं उसकी मशाल को छूकर आगे निकल जाती हैं, पर वह डगमगाती नहीं। उसे पता है कि वह केवल तांबे और लोहे का ढांचा नहीं, बल्कि मनुष्य की आंतरिक शक्ति का जीवंत रूप है। इसी कारण हर आने वाला युग हर नयी पीढ़ी उसे अपने संदर्भ में पढ़ती है और हर देखने वाली आंख उसके अर्थ को अपने अंतस में खोजती है। यही स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी की असली महानता है कि वह स्मारक होकर भी जीवित है और प्रतीक होकर भी मनुष्य के दिल की धड़कनों से बात करती है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी के निहित संदेश और भी प्रासंगिक हो चले हैं।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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