पारंपरिक कलाएं बनाम नयी अभिव्यक्ति
पाक्षिक ब्लॉग शम्पा शाह की कलम से....

पारंपरिक कलाएं बनाम नयी अभिव्यक्ति

         सन् 1985 के आस-पास, एक दिन, हुआ यूँ कि कुछ संथाली युवक बीस मील पैदल चलकर अपने इष्ट देव ‘बोंगा’ को चढ़ाने के लिए मिट्टी का हाथी लेने कालीपद जी के पास आये। बांकी सुंदरा, बंगाल के वयोवृद्ध कुम्हार कालीपद कुम्भकार जी ने उनके पास तैयार रखे कोई चार-पाँच तरह के हाथी दिखा दिये। लेकिन संथाली युवकों के मन में बोंगा देव को चढ़ा सकें, ऐसे हाथी से अपेक्षा कुछ और ही थी। कालीपद जी ने उनसे पूछा कि भाई कैसा हाथी चाहिए? युवक चुप रहे। कालीपद जी ने फिर बोंगा देव के स्वरूप के बारे में, उनके ठौर-ठिकाने, उनके काम-काज के बारे में जानना चाहा। संथाली युवकों की असमंजस और बढ़ गयी, बोले- ‘बोंगा देव का चेहरा तो आज तक किसी ने नहीं देखा। देव हैं, सब कुछ कर सकते हैं। हाँ, जब जंगल में आग लगती है तो बुज़ुर्गों को कहते सुना है कि बोंगा देव की सवारी जा रही है।’

कालीपद जी ने उनसे कुछ समय माँगा। संथाली युवक एक महीने बाद फिर आने को कहकर अपने घर को लौट गये। उनके जाने के बाद कालीपद जी की तो जैसे नींद ही उड़ गयी। उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी का अच्छी तरह से अहसास था- ऐसा हाथी बनाना, जिसे पाकर बोंगा देव प्रसन्न हों और उनके प्रसन्न होने से ही विगत तीन सालों से चौपट हो रही फसल अब के बरस अच्छी हो सकती थी।

रात-दिन उधेड़-बुन चलती रही- जिस देवता का आज तक किसी ने चेहरा नहीं देखा उसे चढ़ने वाले हाथी का चेहरा भला कैसे बना दें? चेहरा न सही, किन्तु क्या बिना सूँड़ और बड़े-बड़े कानों के हाथी हो सकता है? इस महीने भर लम्बी चली उधेड़-बुन के बाद कालीपद जी के हाथों मिट्टी में जो हाथी प्रकट हुआ, उसे देख एकबारगी बोंगा देव भी चमत्कृत हो उठे होंगे! हाथी का भीमकाय शरीर आगे को झुकते-झुकते सीधे सूँड़ जो बना और उसी पर दो तिरछी आँखें और पंखनुमा कान निकल आये। हवा में लहराती छोटी-सी पूँछ और पंखनुमा कान ऐसे बनाये गये कि उन्हें अलग से जोड़ा या निकाला जा सके ताकि रास्ते में ले जाने के दौरान टूटने का ख़तरा न रहे। पूँछ और पंख लगते ही यह हाथी उड़ता-सा मालूम देता है और इसमें कहीं बोंगा देव की जंगल में आग-सी रवानी दिख जाती है। एक माह बाद जब संथाली युवकों ने यह हाथी देखा तो कालीपद जी बताते हैं कि वे इतने ख़ुश हुए कि तय हुए अन्दाज़ से दुगुना देकर वापस गये।

इससे मिलते-जुलते दो और क़िस्से मुझे सुदूर मणिपुर की श्रीमती नीलमणी देवी और बस्तर के श्री सहदेव राणा से सुनने को मिले, जिसमें अपने इलाक़े में कई कुम्हारों की उपस्थिति के बावजूद लोगों ने खास मौक़े के लिए किसी विशेष कुम्हार की तलाश की और उससे काम करवाने के लिए सामान्य से अधिक कष्ट भी उठाये और दाम भी चुकाये। कुम्हार की इस ज़िम्मेदारी और लोगों के उन पर भरोसे और उम्मीद का बड़ा मार्मिक चित्र श्री हकु शाह की कुम्हारों पर लिखी गयी पुस्तक ‘वोटिव टेराकोटा ऑफ़ गुजरात’ में पढ़ने को मिलता है, जहाँ वे बताते हैं कि कैसे आदिवासियों के लिए मिट्टी का यह घोड़ा वास्तविक जीवन्त घोड़े से भी बढ़कर, हवा से बातें करता घोड़ा है जिसे सवारी के लिए पाकर देव प्रसन्न होंगे।

पारंपरिक कलाएं बनाम नयी अभिव्यक्ति

उपर्युक्त उदाहरणों से कई महत्त्वपूर्ण बिन्दु उभरकर आते हैं। क्या बनना है (मसलन हाथी), किस माध्यम में बनना है (मसलन मिट्टी), किसके द्वारा बनाया जाना है, किस हेतु बनाया जाना है, ये चारों मानक यहाँ निर्धारित कर दिये गये हैं, किन्तु, इनके आपसी मेल से अन्ततः जो सिरजे जाने की उम्मीद है, उसका मानक तय नहीं है और उससे अपनी समस्त सम्भावनाओं का अतिक्रमण कर जाने की अपेक्षा है। सम्भावनाओं के इस आविष्ट धुँधलके में ही सृजन का रहस्यमय बीज प्रस्फुटित होना है। कलाकार और माध्यम के बीच इस घनीभूत अन्तःसंवाद में दोनों से ही अपनी सीमाओं को लाँघ जाने की उम्मीद है।

दूसरी बात जो इन उदाहरणों से निकलती है वह लोगों के बीच पारम्परिक कलाओं, शिल्पों को लेकर इस आमफ़हम मान्यता का खण्डन करती है कि यहाँ व्यक्तिगत हस्तक्षेप या अभिव्यक्ति के लिए कोई गुंजाइश नहीं होती और यह पूरी तरह से आधुनिक कला की बपौती है। यहाँ कालीपद बनाते तो हाथी ही हैं और वह बोंगा देव को ही चढ़ाया जाना है किन्तु न कालीपद के आजे-दादों ने ऐसा कोई हाथी देखा-बनाया था और न इससे पहले बोंगा देव को ऐसी नायाब सवारी मिली थी।

पारम्परिक कलाओं के सम्बन्ध में जिन मान्यताओं के परदे हमने अभी तक लगा रखे हैं उनमें कई बड़े-बड़े छेद हो चुके हैं, जिनमें से सरगुजा की सोनाबाई रजवार, तो पाटनगढ़ के जनगढ़ सिंह श्याम आदि न जाने कितने ही कलाकारों के काम झाँक रहे हैं। ये किसी परम्परा के पिछलग्गू नहीं, बल्कि किसी नयी परम्परा का सूत्रपात करने वाले अधिक जान पड़ते हैं। मौक़ा मिलने पर इन लोगों ने केवल अपने समाज में बल्कि दुनिया भर में अपने काम का लोहा मनवाया और सिर्फ़ स्वयं को नहीं, अपने समूचे समाज को एक नयी अस्मिता प्रदान की।

यहाँ एक और तथ्य मार्के का है कि जो कलाकार और सृजन को चीन्हने वाली पारखी नज़र है वह न केवल किसी कालीपद, किसी सहदेव, किसी नीलमणी की खोज-ख़बर रखती है बल्कि उसके लिए स्वयं अधिक दाम चुकाने और उसे प्राप्त करने के लिए 10-20 मील का पैदल अथवा कष्टप्रद सफ़र भी करने को राज़ी है। ठीक है कि कालीपद को उनके बनाये बोंगा हाथी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्रदान किया गया किन्तु, उससे काफ़ी पहले वे संथाली युवक उन्हें खोजते हुए बीस मील पैदल चलकर, एक नहीं दो-दो बार आये और मन की चीज़ पाकर उसके दुगुने दाम भी देकर गये थे। नीलमणी देवी बताती हैं उनके घिस-घिसकर चिकने किये गये मटके की क़ीमत हाट-बाज़ार में लोग ख़ुद दुगुनी-तिगुनी करके देते थे। यह भी कि उनके अपने और आस-पास के गाँव से लोग उनके काम की जितनी माँग करते थे वे उसे कभी पूरा नहीं कर पायीं, जबकि यह जानकर आपको आश्चर्य होगा कि नीलमणी देवी के गाँव थोंगजाओ की लगभग हर स्त्री मटके बनाती है।

पारम्परिक कलाओं में रूपाकार प्रायः उनकी उपयोगिता से निर्धारित होते हैं। दूसरे शब्दों में, यहाँ उनकी उपयोगिता अर्थात ‘यूज़ वैल्यू’ सर्वोपरि है और उसका सौन्दर्य अर्थात ‘स्टेटस वैल्यू’ का स्थान बाद में आता है। जहाँ यह बात बाधक हो सकती है, वहीं दूसरी ओर यह वस्तु को ग़ैर-ज़रूरी अलंकरण से बचाकर उसके स्वरूप को सरल-सहज रखने में सहायक भी होती है। यहाँ कलाकार का अपने माध्यम से अन्तर्सम्बन्ध ही वह तंग गली है जहाँ कलाकार और कृति को स्वयं को आविष्कृत करना होता है।

shampa shah, शम्पा शाह

शम्पा शाह

कला की दुनिया में रमी हुई यह कलाकार सिरैमिक की लोक कला और आधुनिक अभिव्यक्ति के बीच पुल बनाती रही है और मृदा कला के संरक्षण/संवर्धन में योगदान देती रही है। भारत के अनेक शहरों सहित अनेक देशों में कला प्रदर्शनियां आपके नाम हैं। आपकी शिल्प कला में मानवीय, प्राकृतिक एवं मिथकीय रूपों का एक अंतर्गुम्फन एक थीम की तरह प्रतिध्वनित होता है। भोपाल स्थित मानव संग्रहालय में 20 और कला के क्षेत्र में 30 से अधिक सालों तक सेवाओं के साथ ही साहित्य, संगीत व सिनेमा जैसे कलाक्षेत्रों में भी ख़ासा दख़ल।

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