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पाक्षिक ब्लॉग विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....

ग्रीनलैंड: संकट की वैश्विक चुनौती

             कलाल्लित नुनात, जिसका नाम ग्लोब पर ग्रीनलैंड है, पृथ्वी का सबसे बड़ा द्वीप है जो 21.66 लाख वर्ग किलोमीटर में फैली एक विशाल बर्फ़ की सफ़ेद चादर (आइस शीट) से लगभग 80% ढंका हआ है। डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त प्रदेश, ग्रीनलैंड अपने विशाल संभावित अनछुए खनिज संसाधनों और रणनीतिक भौगोलिक स्थिति के कारण हमेशा से वैश्विक रुचि का केंद्र रहा है, किंतु आज यह वैश्विक पर्यावरणीय संकट के प्रतीक में से एक बन गया है।

पिछले एक दशक में, विशेष रूप से अमेरिका ने ग्रीनलैंड के प्रति अपनी नीतियों में उल्लेखनीय बदलाव किया है, जो मुख्यतः तीन कारणों से है।

भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा एवं सैन्य सामरिकता: अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड का सबसे पुराना और महत्वपूर्ण हित उत्तरी ध्रुव के निकट स्थित थुले एयरबेस है। यह अड्डा अमेरिकी मिसाइल रक्षा प्रणाली और अंतरिक्ष निगरानी का एक अभिन्न अंग है। रूस की बढ़ती आर्कटिक सैन्य गतिविधियों और चीन की “पोलर सिल्क रोड” की महत्वाकांक्षाओं के मद्देनज़र, अमेरिका ने थुले बेस का आधुनिकीकरण करने और ग्रीनलैंड के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाने पर ज़ोर दिया है। 2019 में तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा द्वीप को खरीदने की संभावना जताये जाने से यह अमेरिकी रुचि की तीव्रता दर्शाता है।

संसाधन सुरक्षा एवं आर्थिक हित: जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ़ पिघलने से ग्रीनलैंड के विशाल दुर्लभ पृथ्वी खनिजों (Rare Earth Elements), तेल, गैस और अन्य खनिज भंडार तक पहुंच संभव हो रही है। चीन वर्तमान में दुर्लभ खनिजों के वैश्विक बाज़ार पर हावी है, जो इलेक्ट्रिक वाहनों से लेकर उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स तक सभी आधुनिक प्रौद्योगिकियों के लिए आवश्यक हैं। अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के लिए, ग्रीनलैंड इन महत्वपूर्ण संसाधनों के लिए चीन पर निर्भरता कम करने का एक वैकल्पिक स्रोत बन सकता है। अमेरिका ने ग्रीनलैंड में खनन परियोजनाओं और संरचना विकास में निवेश को बढ़ावा देने के प्रस्ताव किये हैं।

वैज्ञानिक अनुसंधान में नेतृत्व: ग्रीनलैंड की बर्फ़ की चादर जलवायु परिवर्तन को समझने की कुंजी है। अमेरिकी एजेंसियां जैसे नासा (NASA) और नेशनल साइन्स फ़ाउंडेशन (NSF) दशकों से यहां शोध कर रही हैं। हाल की नीतियों में आर्कटिक अनुसंधान के लिए वित्त पोषण और अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग को बढ़ाने पर बल दिया गया है, ताकि जलवायु मॉडलों में सुधार किया जा सके और पर्यावरणीय परिवर्तनों पर डेटा एकत्र किया जा सके।

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ग्रीनलैंड की बर्फ़ की चादर केवल बर्फ़ का एक जमाव नहीं है; यह पृथ्वी की जलवायु स्वास्थ्य का एक संवेदनशील बैरोमीटर है। इसका तेजी से पिघलना वैश्विक पर्यावरण के लिए गहन चिंताएं पैदा कर रहा है:

  • समुद्र स्तर में वृद्धि: ग्रीनलैंड की बर्फ़ अकेले वैश्विक समुद्र स्तर को लगभग 7.4 मीटर (24 फीट) तक बढ़ाने की क्षमता रखती है। 1990 के दशक की तुलना में अब यह लगभग सात गुना तेज़ी से पिघल रही है और वर्तमान वैश्विक समुद्र स्तर में वृद्धि के 20 से 25% के लिए ज़िम्मेदार है। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो दुनिया भर के तटीय शहरों और द्वीप राष्ट्रों के अस्तित्व पर संकट आ सकता है।
  • महासागरीय धाराओं एवं वैश्विक मौसम पर प्रभाव: बर्फ़ के पिघलने से उत्पन्न विशाल मात्रा में मीठा पानी उत्तरी अटलांटिक में समुद्री जल के घनत्व और लवणता को बदल रहा है। इससे अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (AMOC) नामक महासागरीय धारा प्रणाली कमज़ोर होने का ख़तरा है, जो दुनिया भर में गर्मी का वितरण करती है। इसके बाधित होने से यूरोप में अत्यधिक ठंड, मॉनसून पैटर्न में बदलाव और चरम मौसम की घटनाओं में वृद्धि हो सकती है।
  • पर्यावरणीय “टिपिंग पॉइंट” की आशंका: वैज्ञानिक चिंता जताते हैं कि ग्रीनलैंड की बर्फ़ की चादर एक जलवायु “टिपिंग पॉइंट” के निकट पहुंच सकती है। एक निश्चित तापमान सीमा (अनुमानित +1.5°C से +2.3°C के बीच) के पार जाने पर बर्फ़ का पिघलाव इतना तेज और अपरिवर्तनीय हो सकता है कि भविष्य में तापमान कम होने पर भी इसे रोकना मुश्किल हो जाएगा। यह एक ऐसी दहलीज़ है, जिसके पार जाने पर पर्यावरणीय परिवर्तनों पर प्राकृतिक नियंत्रण लगभग असंभव हो जाएगा।
  • स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र का विघटन: बर्फ़ के पिघलने से ग्रीनलैंड की स्थानीय जैव विविधता प्रभावित हो रही है। समुद्री बर्फ़ में कमी से ध्रुवीय भालू, वालरस और सील जैसे प्रजातियों के आवास नष्ट हो रहे हैं, जो पूरी आर्कटिक खाद्य श्रृंखला को अस्थिर कर रहे हैं। साथ ही, पर्माफ्रॉस्ट (स्थायी बर्फ़) के पिघलने से अतीत में जमी हुई कार्बन भी वातावरण में मुक्त हो रही है, जो ग्रीनहाउस प्रभाव को और बढ़ाती है।

बर्फ़ की सफेद चादर में ढंका ग्रीनलैंड आज भू-राजनीति और पर्यावरण विज्ञान का एक अनूठा और विवादास्पद संगम बन गया है। अमेरिका सहित विश्व शक्तियों की रणनीतिक और आर्थिक नीतियां इसके भविष्य को एक नये दबाव में डाल रही हैं। किंतु, सबसे बड़ा ख़तरा वैश्विक तापमान बढ़ने के कारण इसकी बर्फ़ की चादर के पिघलने से उत्पन्न हो रहा है।

ग्रीनलैंड का संकट केवल एक द्वीप का संकट नहीं है; यह समस्त मानवता के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है। इसकी बर्फ़ की सफ़ेद चादर का संरक्षण केवल एक राष्ट्र या समुदाय की नहीं, बल्कि पूरे वैश्विक समुदाय की साझा ज़िम्मेदारी बन गया है। ग्रीनलैंड के भविष्य का निर्धारण इस बात से होगा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अपनी संकीर्ण राजनीतिक और आर्थिक होड़ से ऊपर उठकर, पर्यावरणीय स्थिरता को प्राथमिकता देने के लिए कितना सक्षम और इच्छुक है। यह हमारी सामूहिक बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता की सबसे बड़ी परीक्षा है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

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