
- August 14, 2025
- आब-ओ-हवा
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नमिता सिंह की कलम से....
हमज़मीन: व्यवस्था के अंतर्विरोध और प्रतिरोध की कहानियां
अवधेश प्रीत एक वरिष्ठ और प्रतिष्ठित कथाकार हैं। लंबे अरसे से वह लेखन में सक्रिय हैं, रंगकर्म से भी जुड़े रहे हैं। पत्रकार के रूप में ‘दैनिक हिंदुस्तान’ में वर्षों तक सहायक संपादक के रूप में पटना में काम करते रहे। दो उपन्यास और छह कहानी संग्रहों के अलावा उनके लेख और समीक्षाएं भी पढ़ने को मिलती रही हैं। पिछले वर्ष उनके कहानी संग्रह ‘हमज़मीन’ का पेपरबैक संस्करण प्रकाशित हुआ जो मेरे सामने है। उनकी कहानियों से गुज़रते हुए यह विश्वास गहरा हुआ कि सामाजिक यथार्थ की आधारभूमि लेखन को सार्थक बनाती है और साथ ही उसकी प्रासंगिकता को भी रेखांकित करती है। साहित्य अपने समय का दस्तावेज़ होता है। सामाजिक इतिहास के सवाल दूर तक फैले होते हैं और वक़्त बीतने के साथ किसी भी देश-समाज की धरोहर होते हैं। वैयक्तिक धरातल से उठाये गये अनुभव के कथा-सूत्र जब सामाजिक वायुमंडल में फैलकर अंकित होते हैं तो समाज और राजनीति के रूप-रंग से परिचित कराते हैं। यही साहित्य का उद्देश्य भी है।
इस संग्रह की अनेक कहानियों में पात्रों के नाम यदा-कदा ही आते हैं। अधिकतर कहानियों का रचना-संसार फ़ैंटेसी के माध्यम से रचा हुआ है। जातिगत सामाजिक व्यवस्था हो या राजनीति के स्तर पर शासक वर्ग की प्रवृत्तियां… प्रतीकात्मकता और सांकेतिक नामकरण का वे इस्तेमाल करते हैं। मसलन कहानियों में चौधरी समाज और उसका वर्चस्ववाद प्रतीकात्मक रूप से शासक वर्ग को इंगित करता है। जातिगत समूहों का अंकन भी इसी रूप में हुआ है। यह पद्धति हालांकि कथारस को बाधित कर सकती है और कथा के अमूर्त हो जाने से संप्रेषण के ख़तरे हो सकते हैं, लेकिन वह पूरी रोचकता से कथा के प्रवाह को बनाये रखते हैं और कहानी अपना संदेश देने में सफल होती है। प्रतीकों के माध्यम से हम लोगों ने भी इमरजेंसी के काल में कहानियां लिखी थीं जब प्रतिरोध का साहित्य रचना ख़तरे से ख़ाली नहीं था। कहानी की सार्थकता उसकी पठनीयता में निहित है। कहानी पाठक की चेतना को प्रभावित कर सामाजिक-मानवीय संदेश संप्रेषित करने में सक्षम है तो वह सफल है। इस रूप में अवधेश प्रीत की कहानियां वैचारिक धरातल पर सामाजिक अनुभवों को प्रेषित करने में सफल हैं। उनका आत्मसंघर्ष रची हुई फ़ंतासी के ज़रिये व्यापक सामाजिक संघर्ष में रूपांतरित हो जाता है। आज समाज में व्याप्त वर्ग-भेद आधारित सांप्रदायिक और सामंती क्रूरताएं चिंता का विषय हैं। लेकिन वह इसके साथ ही समाज के वर्गों की जिजीविषा और संघर्ष को भी प्रस्तुत करते हैं। एक सुविचारित उद्देश्य के साथ रची गयी इन कहानियों में फ़ंतासी का अर्थवान प्रयोग हुआ है।
शीर्षक कहानी ‘हमज़मीन’ क़ब्र में लेटे दो मुर्दों के बीच संवाद के रूप में है। सांप्रदायिक दंगों के दौरान दोनों ही बेमौत मरे हैं। यहां दंगों का समाजशास्त्र यह है कि साठ साल का एक बूढ़ा जो राजमिस्त्री था, उसे उसके मुहल्लों के शोहदों ने मार डाला कि वह एक हिंदू बेवा के मकान को बनाने के लिए चला गया। नौजवान हिंदू जो सुलेमान सेठ की गढ़ी में काम करता था, वहां दंगाइयों ने आग लगा दी और सभी मारे गये। ‘गोया कि हिंदू की रोज़ी हिंदू – मुसलमान की रोज़ी मुसलमान।’
‘तीसरी औरत’ कहानी हवेली की चार दीवारी के भीतर अंधेरी कोठरियों में घुट—घुटकर जीने वाली तीन पीढ़ियों की औरतों की गाथा है, जिनके हिस्से में अंधेरा है और सहजीवन के नाम पर है मानुष-गंध। यहां आतंक का माहौल है, भटकती हुई आत्माएं हैं और एक है विद्रोही मउगा, जो मुक्त होकर हवेली से जा चुका है। हवेली की औरतें जानती हैं कि बंद फाटक की चाबी मउगा के पास है यानी विद्रोह के रूप में आतताई से मुक्ति। एक अन्य बड़े संकेत देने वाली छोटी कहानी है ‘अन्यथा’, जिसमें एक बूढ़ा और उसकी किताबों का संसार है। यहां शहर भी एक पात्र के रूप में है, जो व्यवस्था का प्रतीक है। हर तानाशाह व्यवस्था का पहला निशाना ज्ञान पर होता है। पुस्तकें ज्ञान, विवेक और तार्किकता का प्रतीक हैं, जिसे नष्ट करना हर निरंकुश शासक वर्ग का धर्म है। इसी क्रम में ‘कवच’ आज के बदलते परिवेश में सामाजिक संबंधों और मूल्यों के क्षरण की कहानी है, जहां ‘सर्वाइवल’ ही नयी पीढ़ी के लिए चुनौती है। एक और बेहतरीन कहानी ‘निमोछिया’ भी प्रतीकों के माध्यम से व्यवस्था के चरित्र को उजागर करती संदेश देती है कि अपने अस्तित्व की लड़ाई जन संघर्षों से ही संभव है। क्रूर व्यवस्था किसी के प्रति न संवेदनशील है और न इसकी जवाबदेही है। ‘ठिठोली’ और ‘सरपट’ कहानियों में भी चौधरी, ठाकुर, पठान, मुसहर, घोड़े, गधे, टट्टू प्रतीक के रूप में वर्ग विभाजित समाज में शासक वर्ग के वर्चस्व की गाथा बयान करते हैं।
मात्र मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि व्यवस्था के वर्चस्ववाद और वर्गीय चेतना को आधार बनाकर रची गयी ये कहानियां पूरी पठनीयता के साथ पाठक तक संदेश प्रेषित करने में सफल हैं।

नमिता सिंह
लखनऊ में पली बढ़ी।साहित्य, समाज और राजनीति की सोच यहीं से शुरू हुई तो विस्तार मिला अलीगढ़ जो जीवन की कर्मभूमि बनी।पी एच डी की थीसिस रसायन शास्त्र को समर्पित हुई तो आठ कहानी संग्रह ,दो उपन्यास के अलावा एक समीक्षा-आलोचना,एक साक्षात्कार संग्रह और एक स्त्री विमर्श की पुस्तक 'स्त्री-प्रश्न '।तीन संपादित पुस्तकें।पिछले वर्ष संस्मरणों की पुस्तक 'समय शिला पर'।कुछ हिन्दी साहित्य के शोध कर्ताओं को मेरे कथा साहित्य में कुछ ठीक लगा तो तीन पुस्तकें रचनाकर्म पर भीहैं।'फ़सादात की लायानियत -नमिता सिंह की कहानियाँ'-उर्दू में अनुवादित संग्रह। अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में कहानियों के अनुवाद। 'कर्फ्यू 'कहानी पर दूरदर्शन द्वारा टेलीफिल्म।
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