
- December 19, 2025
- आब-ओ-हवा
- 3
साहित्य अकादमी सम्मान की रुकी घोषणा पर कटाक्ष विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....
हंसी ही बचाव और सवाल ही उम्मीद
सचिव का इंतज़ार था, जो संस्कृति मंत्रालय में निदेशक भी हैं। अकादमी सम्मान घोषित होने थे। इंतज़ार सिर्फ़ एक घोषणा का नहीं था, उस व्यवस्था का था जो कहती है कि साहित्य स्वायत्त है। देश दुनिया में साहित्य के मेरे जैसे जागरूक पाठक, सुधी रचनाकार, साहित्यिक पत्रकार सब इंतज़ार करते रह गये और कोई ब्यूरोक्रेट गले में आई कार्ड डाले हॉल में आया, दबी ज़ुबान में कह गया कि आज घोषणा नहीं होगी।
शब्द सहम जाते हैं, दृश्य किसी रंगमंच का लगता है, पर है देश की साहित्य अकादमी का। कानाफूसी है ऊपर से आदेश आया दो नाम जोड़ो, किसी ने कहा जूरी और सरकार में टकराव हुआ है, किसी ने कहा नाम तय है पर घोषणा रुकी है। इस सारी गॉसिप में सच्चाई कहीं बीच में छिपी बैठी ज़रूर होगी पर उसे कुर्सी नहीं मिली और सब हॉल की कुर्सियां ख़ाली होते देखते रहे।
जिस हॉल में कैमरे सज चुके हों, सवालों की फ़ेहरिस्त तैयार हो और समय की सूई प्रेस कॉन्फ्रेंस के तय समय पर अटक गयी हो, वहां पर्दा उठने से पहले ही गिरा दिया गया और दर्शक तालियां बजाने के बजाय सिर खुजाते हॉल से बाहर निकलने के लिए मजबूर हुए। साहित्य अकादमी के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि न प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई न प्रेस रिलीज़ जारी की गयी।
पत्रकार घर लौट आया पर ख़बर वहीं की वहीं अटकी रह गयी। भीतर क्या हुआ यह कोई बताने को तैयार नहीं, पर बाहर बैठे हर आदमी को पता है कि भीतर कुछ न कुछ ज़रूर हुआ है। मंत्री जी, सफ़ेद शर्ट वाले आका जी, बड़े प्रकाशक, कोई ना कोई तो है, जो घोषणा रोकने की ताक़त रखता है। सरकारी गलियारों की यह ख़ासियत होती है कि वहां जब कुछ नहीं होता तब भी भीतर ही भीतर बहुत कुछ हो रहा होता है और जब बहुत कुछ होता है तब भी उसे कुछ भी नहीं कहा जाता।
सवाल है कि इस उठापटक के बाद जो पुरस्कार घोषित होंगे, उन्हें सम्मान कहा जाये या जुगाड़, प्रेशर पॉलिटिक्स या प्रतिभा, कलम का अपमान अथवा समझौता, उपलब्धि या अनुकंपा?
साहित्य का मौलिक स्वभाव प्रश्न करना है पर पुरस्कार का स्वभाव अक्सर चुप करा देना होता है। जो कल तक व्यवस्था की विसंगतियों पर कलम चलाता था आज उसी व्यवस्था की चुप्पी पर मौन साध ले तो आम पाठक के भीतर का आदमी सरे आम ठगा ठगा सा रह जाता है।
यह वह बिंदु है जहां व्यंग्य जन्म लेता है और रोता नहीं हंसता है ताकि रोने की आवाज़ कहीं दब न जाये।
नोबेल पुरस्कार की राजनीति की बातें अब फुसफुसाहट नहीं रहीं। साम दाम दंड भेद के सूत्र वहां भी खुली किताब की तरह पढ़े जा रहे हैं। जब विश्व का सबसे प्रतिष्ठित मंच भी सत्ता समीकरणों से अछूता नहीं तो अपने यहां के छोटे बड़े मंचों से मासूमियत की उम्मीद करना बाल सुलभ ही है। उत्तर प्रदेश राज्य सरकार के सम्मान, पुरस्कार वर्षों से लंबित हैं और फाइलें धूल खा रहीं हैं। सम्मान अब महज योग्यता का नहीं धैर्य का इम्तहान भी बन गये हैं।
इस पूरी कथा में सबसे रोचक यह है कि सबको सब पता है पर कोई कुछ नहीं जानता। यह अनभिज्ञता नहीं एक संस्थागत अभिनय है। जब अकादमी जैसे मंच पर प्रेस कॉन्फ्रेंस का रद्द होना एक रहस्य बने, तो समझ लेना चाहिए कि साहित्य से ज़्यादा राजनीति और साहित्य की जुगलबंदी की गोपनीयता फलफूल रही है।
समाधान क्या है? समाधान वही पुराना है। पुरस्कारों की प्रक्रिया को सार्वजनिक किया जाये, जूरी की राय को संक्षेप में सामने रखा जाये, सरकार का दख़ल अगर है तो उसे स्वीकार कर स्पष्ट वैधानिक नामांकन नीति बनायी जाये ताकि पर्दे के पीछे की फुसफुसाहट मंच के खुले संवाद में बदल सके। और सबसे ज़रूरी यह कि लेखक पुरस्कार को अंतिम सत्य न माने बल्कि पाठक को ही अपना स्थायी निर्णायक समझे।
व्यंग्यकार के लिए यह समय उपजाऊ है क्योंकि विसंगति खुलेआम मुस्कुरा रही है। यह पूरा प्रसंग किसी प्रहसन से कम नहीं जहां पात्र गंभीर हैं, संवाद गुप्त हैं और मंच पर अंधेरा है। फ़र्क बस इतना है कि यहां शो के प्रवेश पत्र पाठक ने, लेखकों ने और साहित्य प्रेमियों ने ले रखे हैं पर शो रद्द कर दिया गया है। ऐसे में हंसी ही बचाव है और सवाल ही उम्मीद है। साहित्य अगर जीवित है तो वह इन रहस्यों पर हंसेगा भी और उन्हें उजागर भी करेगा। यही साहित्य की सदा से ज़िद रही है, यही उसका दायित्व भी है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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शानदार ,जानदार ,मारक व्यंग्य ।
धारदार व्यंग्य
आपकी रिपोर्टिंग लाजवाब है। आप व्यंग्यात्मक लहज़े में एकेडमी और हिंदी के लेखकों की धज्जियां उड़ा दी ।