
- March 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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उर्दू अफ़सानानिगारों में महिलाओं के नाम भले ही उंगलियों पर गिने जाने लायक़ हों लेकिन उनका क़द अदब में काफ़ी ऊंचा है। ये नाम बड़े ही एहतराम से लिये जाते हैं। बिहार निवासी अस्सी साला ज़किया मशहदी उर्दू अदब की दुनिया में किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। दर्जनों किताबों की ख़ालिक़ ज़किया जी का वर्तमान निवास पटना है। उन्होंने अफ़साने लिखने के साथ-साथ अनुवाद और आलोचना में भी नाम कमाया। हिंदी-उर्दू दोनों भाषाओं पर समान पकड़ बनाये रखने वाली ज़किया मशहदी जी ने मुख्य रूप से महिलाओं की समस्याओं, सामाजिक असमानताओं को अपनी कहानियों के केंद्र में रखा। अब तक सात कथा संग्रह, तीन उपन्यास और सोलह से अधिक पुस्तकों का अनुवाद उनके नाम है। और यह सिलसिला थमा नहीं है। इस योगदान के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, इक़बाल सम्मान, मिर्ज़ा ग़ालिब पुरस्कार आदि से आप नवाज़ी जा चुकी हैं। भेड़िए, पारसा बीबी की बघार, बरगद, सदा-ए-बाज़गश्त उनकी चर्चित कहानियां रही हैं। आब-ओ-हवा के लिए ग़ज़ाला तबस्सुम के उन्होंने एक महत्वपूर्ण बातचीत की है...
हिंदुस्तान में उर्दू अदब का हाल मायूस करता है: ज़किया मशहदी
ग़ज़ाला तबस्सुम: आब-ओ-हवा में आपका स्वागत है। जैसा कि हम जानते हैं आपका जन्म और परवरिश लखनऊ में हुई, तो मेरा पहला सवाल यहीं से है कि लखनऊ के सांस्कृतिक माहौल ने आपके लेखन पर असर कितना डाला और यह सफ़र कब शुरू हुआ?

ज़किया मशहदी (सवाल के बीच में ही टोकते हुए): मेरे मुतअल्लिक़ दो-एक ग़लत बातें राह पा गयी हैं, उनकी तसहीह (सुधार) कर दूँ। मेरी तालीम-ओ-तरबियत (शिक्षा और परवरिश) और रिहाइश लखनऊ में रही, लेकिन पैदाइश अमरोहा ज़िला मुरादाबाद की है। अमरोहा मेरा ननिहाल था। रेख़्ता में भी ग़लत जानकारी दर्ज है, जिसे काहिली की वजह से आज तक दुरुस्त नहीं करा पायी, लेकिन जल्द ही इसे ठीक करूंगी।
लखनऊ को मैंने शादी के बाद ख़ैरबाद कहा। जब लखनऊ छोड़ा उस वक़्त तक मैंने बाक़ायदा लिखना शुरू नहीं किया था, लेकिन बहरहाल लखनऊ की ज़बान, उसका कल्चर, उस वक़्त के वाक़िआत, यूनिवर्सिटी… ये सब ज़िंदगी का हिस्सा रहे, इसलिए अफ़सानों में उन्होंने ग़ैर-शऊरी और शऊरी (प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष) दोनों तरह राह पायी।
मैं उन लोगों में से हूं, जो बहुत देर से लेखन की दुनिया में आये। लेखन मेरे मिज़ाज में था ही तो शुरू-शुरू में छुट-पुट कुछ लिखा करती थी, लेकिन बाक़ायदा लिखना मैंने शादी के बाद, सन 75 के बाद शुरू किया।
ग़ज़ाला तबस्सुम: मनोविज्ञान की पढ़ाई और आपका लेखन का सफ़र, इसमें बहुत कुछ दिलचस्प होगा…
ज़किया मशहदी: नफ़्सियात (मनोविज्ञान) की तालीम ने ज़ेह्न को एक ख़ास नहज (दिशा) की तरफ़ यक़ीनन मोड़ा। इंसानी ज़ेह्न को समझने में क़द्रे-इज़ाफ़ी (अतिरिक्त) मदद ज़रूर की, ख़ास तौर पर पेचीदा रवैयों और रुजहानात (रुझानों) को समझने में, लेकिन साथ ही मेरा ख़याल है इंसानी ज़ेह्न और माहौल से उसके पेचीदा रिश्तों को जानने के लिए तजुर्बा और मुशाहिदा (अनुभव से सीखना) बहुत काम आते हैं, चाहे आपने नफ़्सियात पढ़ी हो या नहीं। मैने कभी महसूस नहीं किया कि मनोविज्ञान पढ़ने से साहित्य में कोई असर पड़ा या कोई फ़ायदा पहुंचा हो।
ग़ज़ाला तबस्सुम: कहते हैं अनकान्शियस माइंड में बहुत कुछ रह जाया करता है, तो क्या मनोविज्ञान की पढ़ाई के साथ ऐसा हुआ हो, मुमकिन है?
ज़किया मशहदी: मेरा यह मानना है कि तालीम आपके लिखने की सलाहीयत को मांजती और बेहतर बनाती है, चाहे किसी भी विषय की हो, किसी ख़ास विषय का साहित्य पर कोई असर नहीं पड़ता। विज्ञान पढ़ने वाले भी अच्छे-अच्छे साहित्यकार हुए हैं लेकिन ऐसा नहीं कि उनका लेखन विज्ञान से ही मुतालिक़ रहा हो। पाकिस्तान के हसन मंज़र साहब मनोवैज्ञानिक हैं, लेकिन उन्होंने कई उपन्यास और दर्जनों कहानियां लिखी हैं।
ग़ज़ाला तबस्सुम: आपकी कहानियों में आम जनजीवन की घटनाएं विशेष दिखती हैं। आपने इस्मत चुग़ताई और कुर्रतुल ऐन हैदर की तरह न तो बोल्ड विषयों का चुनाव किया और न ही नारी विमर्श के नाम पर पुरुषों पर दोषारोपण… फिर भी स्त्री मन की उलझनों को बख़ूबी उकेरा…
ज़किया मशहदी (हंसते हुए): देखिए, हर लेखक का अलग माहौल होता है, माहौल के नुमायाँ और अहम अनासिर (स्पष्ट और महत्वपूर्ण तत्व) होते हैं, ख़ुद उसका अपना तजुर्बा और दिलचस्पियाँ होती हैं। इस्मत चुग़ताई और क़ुर्रतुल ऐन हैदर बहुत बड़ी लेखिकाएं हैं, उनका माहौल और उसके ज़रिये उनकी ज़ेह्न-साज़ी (किसी खास दिशा में विचारों को ढालना) बिल्कुल अलग है। ज़ाहिर है मेरा न उनसे मुक़ाबला है न मुवाज़ना (तुलना)। अगर मैं निस्वानी फ़ितरत (स्त्री स्वभाव) की अक्कासी करने में कामयाब हूँ तो मुझे ख़ुशी है। मैंने यह महसूस किया कि समाज में पुरुषों के अपने मसाइल हैं औरतों के अपने। सबके मसाइल एक जैसे नहीं होते। मैंने ज़िंदगी को यूनिटी की तरह लिया, जिसमें सभी शामिल हैं।
आप अपना सवाल ज़रा दोहराइए…
ग़ज़ाला तबस्सुम: जी, मैं कह रही थी आपने स्त्री विमर्श के नाम पर पुरुषों पर दोषारोपण नहीं किया, लानत-मलामत नहीं की। आजकल स्त्री विमर्श का मतलब ही पितृसत्तात्मक समाज को कठघरे में खड़ा करना हो गया है।
ज़किया मशहदी: नहीं, मैंने ऐसा महसूस नहीं किया। हमने एक समाज बना लिया है, जो समाज पितृसत्तात्मक समाज है। इस समाज को स्त्रियों ने न सिर्फ़ क़ुबूल कर लिया है, बल्कि वो उस समाज में ख़ामोशी से शामिल हो गयी हैं। नतीजा हुआ कि हम अगर स्त्रियों के प्रति कहीं कोई ज़्यादती होते देखते हैं, तो हमें उसमें पूरा समाज शामिल दिखता है, चाहे उसकी वजह कोई भी हो। शायद इस वजह से हमने पुरुषों को इल्ज़ाम देना मुनासिब नहीं समझा।
ग़ज़ाला तबस्सुम: इस्मत आपा और ऐनी आपा ने सामाजिक बदलाव का जो सपना देखा था, वो आपकी आँखें किस तरह देख रही हैं? तब और अब की महिलाओं की समस्याएं कितनी अलग हैं? कितना बदलाव आया है?
ज़किया मशहदी: फिर आप उन्हीं दोनों की बात कर रही हैं। देखिए ख़वातीन, ख़ास तौर पर मुस्लिम ख़वातीन के मसाइल (समस्याएं), उनकी सामाजिक हैसियत और उनके उमूमी हालात (सामान्य परिस्थितियां) में काफ़ी तब्दीलियाँ आयी हैं और ये तब्दीलियाँ काफ़ी पॉज़िटिव हैं। पहली बात तो यह कि तालीम में इज़ाफ़ा हुआ है, उसकी वजह से माली तौर पर ख़ुद-मुक़्तफ़ी (आत्मनिर्भर) हो सकी हैं, ख़ुद-ऐतमादी (आत्म विश्वास) और हालात से नबरद-आज़मा (संघर्ष) होने की सलाहीयत बढ़ी है, लेकिन ये तब्दीलियाँ बहुत सुस्त-रफ़्तार से आयी हैं और कहा जाये कि आइडियल हालात अब भी नहीं हैं।
समाज पितृसत्तात्मक था और अब भी है। जब तक वह अपनी पकड़ ढीली नहीं करेगा, औरतों के लिए आइडियल बराबरी के मौक़े नहीं मिलेंगे। मेरा एक उपन्यास है ‘पारसा बीवी का बघार’…
ग़ज़ाला तबस्सुम: चर्चित नॉवेल है। मैंने पढ़ी है…
ज़किया मशहदी: तो उस नॉवेल में मैंने इस बदलाव को दिखाया है, उसमें चार पीढ़ियों में आने वाले बदलाव को मैंने अपनी आंखों से देखा है। बदलाव तो आया है क्योंकि तालीम आयी है। लेकिन बदलाव बहुत धीमी रफ़्तार से आया है। हमारे समाज में दो धाराएं साथ-साथ चलती दिखायी देती हैं। एक बहुत ही पुराने विचार की धारा है और एक मॉडर्न विचारधारा। इन दोनों के बीच की जो धारा है, वो अभी बहुत कमज़ोर है। आइडियल विचारधारा अभी तक बहुत कम मिली है। मुस्लिम समाज में जो तब्दीलियां आयी हैं बहुत धीमी रफ़्तार से। आज भी शादियां मां-बाप की मर्ज़ी से होती हैं, कम उम्र में हो जाती हैं। अभी तक हम आइडियल सिचुएशन तक नहीं पहुंच पाये हैं।
ग़ज़ाला तबस्सुम: आपको ‘पारसा बीबी की बघार’ लिखने की प्रेरणा कहां से मिली?
ज़किया मशहदी: आस-पास से। कहानियों की प्रेरणा आस-पास से ही मिलती है। कहानी की शुरूआत में जिस पारसा बीवी की ज़िक्र है, वो मैंने कहीं सुनी थी जिसे मैंने अपनी कहानी की बुनियाद बनाया। अदब आसमानी किताबों की तरह इलहाम या वही नहीं होता है बल्कि यह तो समाज से मिलता है। बुनियादी कहानी का आइडिया मिलने के बाद इसमें जितनी चाहें कशीदाकारी कर लें।
ग़ज़ाला तबस्सुम: आपकी कहानी लिखने की क्या कोई ख़ास प्रक्रिया होती है? कुछ इस बारे में बताएं।
ज़किया मशहदी: मेरा अफ़साना लिखने का अमल? अरे भाई, कोई पूछे तभी इस तरफ़ ध्यान जाता है। बस कभी कोई वाक़या, कोई ख़याल, कोई इंसान ज़ेह्न को इतना मुतास्सिर कर जाता है कि उस पर कुछ लिखने की ख़्वाहिश पैदा हो जाये तो क़लम उठाकर लिखना शुरू कर देती हूँ। लेकिन शायद ही कभी कोई अफ़साना एक ही बैठक में पूरा किया हो।
कभी-कभी तो यूं भी हुआ है कि कोई अफ़साना शुरू करने के बाद उसे उठाकर रख दिया और फिर काफ़ी लंबी मुद्दत तक दोबारा उसे पकड़ नहीं सकी। लेकिन वह कभी न कभी मुकम्मल हो ही गया और उसी सूरत में, जिस तरह वह ज़ेह्न में आया था।
मुझे पता नहीं यह सबके साथ होता है या सिर्फ़ मेरे साथ, कि ख़यालों का सिरा टूटता ही नहीं। मैं जो लिख चुकी होती हूँ, उसे दो-चार बार पढ़ती हूँ तो ख़याल क़ाबू में आ जाते हैं।
ग़ज़ाला तबस्सुम: प्लॉट, किरदार वग़ैरह पहले से तैयार रहते हैं या कहानी की मांग से तय होते, जुड़ते चले जाते हैं?
ज़किया मशहदी: कुछ नहीं, कुछ भी नहीं। पहले से कुछ तय नहीं होता। बस ज़ेह्न में एक ख़्याल आया कि कहानी लिखनी है तो किरदार भी ख़ुद जन्म लेने लगते हैं और कहानी आगे बढ़ने लगती है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि लिखते-लिखते कहानी अलग ही राह पकड़ लेती है। मेरी एक तवील कहानी है ‘बरगद’। इस कहानी का प्लॉट तो ज़ेह्न में था कि एक बरगद जिसने कई पीढ़ियों का सफ़र देखा है, उसके नज़रिये से लिखना है लेकिन लिखते वक़्त कहानी ख़ुद-ब-ख़ुद आगे बढ़ती गयी। एक और कहानी है ‘मेरे घर का पता’! इसका प्लॉट भी था ज़ेह्न में और एक ही किरदार था लेकिन कहानी आगे बढ़ी तो किरदार बढ़ते चले गये।
ग़ज़ाला तबस्सुम: अब अगर हम पूरे अदब की बात करें तो पहले यह बताइए, वर्तमान उर्दू साहित्य को आप किस दिशा में जाते हुए देखती हैं?
ज़किया मशहदी: देखिए अदब (साहित्य) तो ज़ौक़ (रुचि और सौंदर्यबोध) का मामला है। आज के तकनीकी तरक़्क़ी के दौर में अदब की अहमियत कम हो गयी है, फिर भी एक आम औरत अदब में दिलचस्पी लेती नज़र तो आती है। अब वह अदब-ए-आलिया (उच्च कोटि का साहित्य) हो या पॉपुलर अदब (लोकप्रिय साहित्य)। मेरा ज़ाती ख़याल यह है कि मौजूदा ज़िंदगी में जो कशमकश और तनाव हैं, उनकी वजह से पॉपुलर अदब का दख़ल ज़्यादा है, क्योंकि यह फ़ौरी तौर पर ज़ेह्नी फ़रहत (सुख) देता है। संजीदा अदब ज़रा कम दख़ल पाता है।
आज हिंदुस्तान की सतह तक तो उर्दू अदब क़द्रे-मायूस कर रहा है। मैंने एक ज़माने में, एक ही दौर में बहुत से बड़े अदीबों को उर्दू अदब को मुतमव्वल (समृद्ध) बनाते देखा था। लोगों को उनकी क़द्रदानी करते देखा था, रिसाले (पत्रिकाएं) मक़बूल (लोकप्रिय) थे। क़ारीन (पाठक) पढ़कर राय ज़ाहिर करते थे। आज यह सूरत-ए-हाल वैसी नहीं रह गयी है। ज़बान वैसे भी अपनी अहमियत खो रही है। आज हमारे पास वह कहकशाँ नहीं है, जिसमें इस्मत चुग़ताई, जीलानी बानो, कृष्ण चंदर, ख़्वाजा अहमद अब्बास, ग़ुलाम अब्बास, क़ुर्रतुलऐन हैदर, कृष्ण चंदर, बेदी जैसे सितारे जगमगा रहे हों। लेकिन बहरहाल लोग लिख रहे हैं, कुछ लोग बहुत अच्छा भी लिख रहे हैं, लेकिन मैं क़द्रे-मायूस हूँ। वैसे अगर आपकी मुराद दिशा से रुजहान की है तो कई तजुर्बों से गुज़रने के बाद उर्दू अदब फिर कहानी की बाज़याबी (वापसी) की तरफ़ पलटा है।
ग़ज़ाला तबस्सुम: अदब के पाठकों, ख़ासकर मुस्लिम महिलाओं के जीवन में साहित्य किस तरह शामिल है? किस तरह होना चाहिए? आपकी क्या उम्मीदें हैं?
ज़किया मशहदी: देखिए, ऐसी कोई आइडियल सिचुएशन नहीं है कि साहित्य कितना शामिल होना चाहिए। लेकिन साहित्य मन-मस्तिष्क को ज़िला बख़्शता है (ताज़गी देता है), सुकून देता है, आप एक वसीअ कल्ब (खुले दिल वाले) इंसान बनते हैं। अगर आप परेशान हों या उलझे हुए हों तो आपको अदब सहारा देता है, लोगों को समझने में मदद करता है। लेकिन मोबाइल और सोशल मीडिया की वजह से अदब की तरफ़ से लोगों का रुजहान कम हो रहा है। यह सिर्फ़ उर्दू या हिंदी साहित्य की बात नहीं है। यह ऑल ओवर द वर्ल्ड समस्या है। दूसरी वजह यह भी है कि आज हम तकनीकी शिक्षा को ज़्यादा महत्व देते हैं, जिसकी वजह से ज़िंदगी आसान हो गयी है, रोज़गार मिल रहे हैं। एक तरह से टेक्नोलॉजी हम पर हावी हो गयी है और इसकी वजह से साहित्य का दख़ल कम हुआ है। लेकिन साहित्य ज़ेह्न को सुकून देने वाला एक एलिमेंट है, जो ज़िंदगी में होना चाहिए।
ग़ज़ाला तबस्सुम: क्या महिला लेखकों को पुरुष लेखकों की तुलना में अलग चुनौतियों का सामना करना पड़ता है? आपकी अपनी चुनौतियों क्या रहीं?
ज़किया मशहदी: ख़वातीन (महिलाओं) को क़द्रे-मुख़्तलिफ़ (अलग तरह की चुनौतियां) चैलेंज तो ज़रूर फेस करने पड़ते हैं। पहली बात तो यह कि ख़वातीन कुल-वक़्ती मुसन्निफ़ (फ़ुलटाइम लेखिका) शायद ही बन सकती हों। बेशतर के लिए घर और घर के अफ़राद (सदस्य) और अगर मुलाज़मत-पेशा हों तो मुलाज़मत, सफ़-ए-अव्वल (प्राथमिकता) में जगह पाती है। यह मसअला, या आपके अल्फ़ाज़ में चैलेंज, मेरे सामने भी हमेशा रहा। लिखना एक हॉबी की सूरत रहा, मक़सद नहीं बन सका। जितना वक़्त और तवज्जो दरकार होती है, वह मर्द हज़रात ज़्यादा दे सकते हैं।
दूसरा बड़ा आमिल (फैक्टर) यह होता है कि आज भी ख़वातीन बे-मुहाबा (बेझिझक) बाहर की दुनिया से रू-ब-रू नहीं हो पातीं, ख़ास तौर पर मुस्लिम ख़वातीन। बाहर के तजुर्बात ज़ेह्न को वुसअत और बालीदगी (मानसिक विस्तार और परिपक्वता) बख़्शते हैं। तीसरी बड़ी चुनौती है कि उनकी हुसूलीयाबियों (उपलब्धियों) को पितृसत्तात्मक समाज अक्सर नज़रअंदाज़ करता है। कुछ ख़वातीन ज़्यादा आगे बढ़ें तो अफ़वाहें भी झेलनी पड़ सकती हैं।
ग़ज़ाला तबस्सुम: आपकी अपनी चुनौतियां क्या रहीं?
ज़किया मशहदी: जहाँ तक मेरा अपना सवाल है, मैं चूँकि लो प्रोफ़ाइल के साथ घर में रहकर ख़ामोशी से लिखती रही, इसलिए ज़्यादा मसाइल से जूझना न हुआ। हाँ, यह ज़रूर कि बाहर जाकर कुछ ख़ास तबक़ों या कुछ ख़ुसूसी माहौल का जायज़ा लेकर, मुशाहिदा (तजुर्बा) करके लिखने की ख़्वाहिश कभी पूरी नहीं हो सकी। कई हसरतें रह गयीं…
ग़ज़ाला तबस्सुम: आपसे अभी किताबों और लेखन के बारे में कुछ सवालात करने हैं, पर पहले यह जिज्ञासा आ रही है कि बिहार के साहित्य जगत में महिला लेखकों के योगदान को कैसे देखती हैं आप?
ज़किया मशहदी: उर्दू में तो बहुत कम हैं, उर्दू में बहुत कम ख़्वातीन लिख रही हैं। बिहार में मैं लंबे अरसे से रह रही हूं। अगर यहां से उर्दू अदब से अगर मेरा नाम हटा दिया जाये तो एक शकीला अख़्तर ही दिखायी देती हैं। हां, यूपी और हैदराबाद की महिला लेखकों का बड़ा योगदान है।
ग़ज़ाला तबस्सुम: और पूरे उर्दू साहित्य जगत में महिला लेखकों के योगदान की बात की जाये तो?
ज़किया मशहदी: यूं काफ़ी लेखिकाएं हैं, कुर्रतुल ऐन हैदर के लेवल का कोई नाम दिखायी नहीं देता। उन्होंने अदब को इस मुकाम तक पहुंचा दिया कि किसी और का पहुंचना नामुमकिन है। इस्मत चुग़ताई, तरन्नुम रियाज़ जो कश्मीर से हैं, बिल्किस जीलानी बानो जैसे बड़े नाम हैं, जिन्होंने उर्दू अदब को काफ़ी समृद्ध किया है।
ग़ज़ाला तबस्सुम: अच्छा ज़किया जी, आपने अनुवाद भी किये हैं, तो यह एक नुक़्ता भी कि हिंदी और उर्दू साहित्य के बीच दीवार बनाम पुल की बहस बनी रही है, आपका नज़रिया?
ज़किया मशहदी: उर्दू और हिंदी के दरमियान दीवार सियासी नज़रिये का नतीजा है, वरना पुल ही पुल हैं। दोनों ज़ुबानों को एक-दूसरे का पूरक समझा जाना चाहिए।
ग़ज़ाला तबस्सुम: चलते-चलते किताबों पर फिर बात करनी है आपसे। आपने कहा सिर्फ़ हिंदी-उर्दू नहीं बल्कि दुनिया भर में किताबों के लिए रुजहान घट रहा है, तो क्या सच में किताबों का दौर ख़त्म होने वाला है?
ज़किया मशहदी: तब्दीलियाँ इतनी तेज़ी से आ रही हैं कि मैं हतमी तौर (अंतिम रूप) से कुछ नहीं कह सकती, लेकिन किताबें बनी रहेंगी। लोग अभी उनके जादू से जल्दी आज़ाद नहीं होंगे। सबसे बड़ी बात यह है कि आउट ऑफ़ प्रिंट का मसअला नहीं रहेगा। वे सुरक्षित हो जाएँगी। उन्हें डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म से हासिल किया जा सकेगा। अभी हाल ही अलीगढ़ में उर्दू बुक फ़ेयर में ख़बर है तक़रीबन एक करोड़ रुपये की किताबें बिकी हैं। इसका मतलब है लोगों ने ख़रीदी हैं, और ख़रीदी हैं तो शायद पढ़ेंगे भी। अभी कुछ वक़्त तक तो किताबें नहीं जाएंगी। किताब पढ़ने का अलग सुख है।
ग़ज़ाला तबस्सुम: किताबों के कारोबार से इतर, डिजिटल तरक़्क़ी ने क्या लेखन को भी बदला है? हां, तो कैसे?
ज़किया मशहदी: जिस तरह सभी नयी इजादात (आविष्कार) के नकारात्मक और सकारात्मक दोनों पहलू होते हैं, उसी तरह यह डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के भी हैं। ज़िंदगी की व्यस्तताएँ बढ़ गयी हैं, इसलिए कहीं जाना और साहित्यिक महफ़िलों से लाभ उठाना मुश्किल हो गया है। इन चैनलों के ज़रिये “नारसा” तक पहुँच आसान हो गयी है। जैसा मैंने कहा रचनाएँ सुरक्षित हो गयी हैं। साहित्यिक विषयों और नयी रचनाओं पर चर्चा करना आसान तो हो गया है और यह भी कि नयी आने वाली किताबों की सूचना और उन पर टिप्पणियाँ बहुत जल्दी मिल जाती हैं।
फिर यह भी है कि इसने सस्ती और त्वरित प्रसिद्धि पाने के इच्छुक लोगों की एक फ़ौज भी खड़ी कर दी है। दूसरी बात कि इसने किताबों की ओर से ध्यान कुछ कम कर दिया है। हालांकि, बावजूद इस सबके, अब भी मुझे लगता है किताबों का जादू पूरी तरह ख़त्म नहीं हो सका है, हां, कम तो ज़रूर हो रहा है…
ग़ज़ाला तबस्सुम: ज़किया जी, आप उस पीढ़ी के लेखकों में हैं, जिनसे हमारी और आने वाली पीढ़ियों को सीखना है, जानना है। आपने अपनी सुलझी हुई समझ, अपने तजुर्बे और ख़याल हमसे बांटे, आब-ओ-हवा के लिए इतना वक़्त निकाला, तबीयत ठीक नहीं होने पर भी… आब-ओ-हवा की तरफ़ से आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।
ज़किया मशहदी: आपका भी शुक्रिया। तबीयत ठीक होती तो शायद मैं और अच्छी तरह आपके सवालों के जवाब दे पाती। लेकिन फिर भी आब-ओ-हवा के लिए यूं बात करना तसल्लीबख़्श रहा।

ग़ज़ाला तबस्सुम
साहित्यिक समूहों में छोटी-छोटी समीक्षाएं लिखने से शुरू हुआ साहित्यिक सफ़र अब शायरी के साथ अदबी लेखन और प्रेरक हस्तियों के साथ गुफ़्तगू से लुत्फ़अंदोज़ हो रहा है। एक ग़ज़ल संग्रह ने अदब की दुनिया में थोड़ी-सी पहचान दिलायी है। लेखन में जुनून नहीं, सुकून की तलाश है। आब-ओ-हवा के पहले अंक से ही जुड़े होना फ़ख़्र महसूस कराता है।
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