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21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो एक टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से ​चयन और इन फ़िल्मों का दस्तावेज़ीकरण...
पाक्षिक ब्लॉग मानस की कलम से....

राज़: कैसे कल्ट बन गयी फिल्म?

           ‘राज़’ को हिंदी फ़िल्म उद्योग के हॉरर सिनेमा में एक मील का पत्थर माना जाता है। यह पहली मेनस्ट्रीम बॉलीवुड हॉरर फ़िल्म बनी, जिसे फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड्स के लिए नॉमिनेशन मिला। इससे हुआ यह कि इस जॉनर की विश्वसनीयता बढ़ी और इसने भविष्य की जाने कितनी ही हॉरर-रोमांस फ़िल्मों के लिए रास्ता बना दिया। यह 2002 की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली दूसरी फ़िल्म भी बनी।

यह फ़िल्म भारत की पहली मॉडर्न हॉरर ब्लॉकबस्टर रही, जिसने बॉलीवुड में हॉरर जॉनर को फिर से ज़िंदा कर दिया। इस परिभाषा में 1980 और 1990 के दशक में ज़्यादातर कम बजट की फ़िल्में ही बना करती थी। राज़ के पहले कुछ चुनिंदा हॉरर फ़िल्में ही रही हैं, जैसे मोनिहारा, गहराई, महल, रात इत्यादि। या फिर रामसे ब्रदर्स के प्रॉडक्शन में बनने वाली दोयम दर्जे की फ़िल्में, जो अपनी फूहड़ता के लिए ही देखी और जानी गयीं।

राज़ ने उस दोयम दर्जे के सिनेमा को इरॉटिक रूप में बदल दिया। सिर्फ़ इतना ही नहीं। फ़िल्म ‘राज़’ ने एक तरीक़े से फ़िल्म की सफलता के पीछे छुपे राज़ को भी उजागर करने का काम किया। ख़ास तौर पर ‘विशेष फ़िल्म्स’ के लिए। इस फ़िल्म की सफलता ने विशेष फ़िल्म्स को एक तरह से सफलता का फ़ॉर्मूला ही दे दिया। आने वाली फ़िल्मों जैसे राज़ सीरीज़ की बाक़ी 3 फ़िल्में, मर्डर सीरीज़, ज़हर, साया, आवारापन इत्यादि ने कामयाबी की इबारतें लिखकर साबित कर दिया कि ये हिट फ़ॉर्मूला है।

इस फ़ॉर्मूले पर ग़ौर करें तो फ़िल्म में शानदार प्रोडक्शन वैल्यू (जो पहले हॉरर फ़िल्मों में नही होती थी), संगीत पर ख़ासा ध्यान दिया गया (जिससे ये फ़िल्में म्यूज़िकल हिट हुईं)। इस तरह की फ़िल्मों का किसी हॉलीवुड या कोरियन फ़िल्म की रीमेक (औपचारिक या अनौपचारिक) होना, रोमांच और इरॉटिक दृश्यों से लबरेज़ पटकथा व​ फ़िल्मांकन सफलता के कारण माने गये। कुछ-कुछ फ़िल्में हॉरर न होकर थ्रिलर भर थीं लेकिन बाक़ी की सामग्री समान रही। के.के. की आवाज़, इरशाद कामिल के गीत और केरमानी (जिन्हें आगे चल कर ऑस्कर मिला) इन फ़िल्मों के संगीत की सबसे सफल जुगलबंदी रहे।

राज़ हॉलीवुड की फ़िल्म ‘व्हॉट लाइज़ बिनीथ’ (2000) का अनऑफ़िशियल अडैप्टेशन है, जो डायरेक्टर विक्रम भट्ट के करियर का टर्निंग पॉइंट भी रही। इस फ़िल्म ने बाद की कई फ़िल्मों में हॉरर जॉनर को एक्सप्लोर करने के लिए प्रेरित किया। ग़ौरतलब बात है कि ‘अमेरिकन एंटरटेनमेंट पब्लिकेशन कोलाइडर’ ने इसे ओरिजिनल फ़िल्म से बेहतर बताया है।

इस फ़िल्म का एक स्पिरिचुअल सीक्वल 23 जनवरी 2009 को ‘राज़: द मिस्ट्री कंटीन्यूज़’ नाम से रिलीज़ हुआ था और इस सीरीज़ की तीसरी किस्त ‘राज़ 3’ 7 सितंबर 2012 को 3D में रिलीज़ हुई। चौथी फ़िल्म, ‘राज़ रिबूट’, 16 सितंबर 2016 को सिनेमाघरों में पहुंची।

फ़िल्म की कलात्मक पसंद और बॉक्स ऑफ़िस पर असर ने इसे एक कल्ट स्टेटस दिलाया, जिसे पहले की हॉरर फ़िल्मों की तुलना में एक बड़ा बदलाव माना जाता है।

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इस फ़िल्म को तब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी पहचान मिली, जब पॉल मैककार्टनी ने फ़िल्म की स्क्रीनिंग में हिस्सा लिया और बिपाशा बसु और डीनो मोरिया की लीड परफ़ॉर्मेंस की तारीफ़ की। ख़बरों बताती हैं, उन्होंने बसु के किरदार की तारीफ़ की और उन्हें “भारत की सोफ़िया लॉरेन” का ख़िताब दे डाला था। फ़ोर्ब्स ने इस फ़िल्म को “बॉलीवुड का हॉरर रिवाइवल” कहा। पाकिस्तानी डेली डॉन ने इसे दशक की सबसे अच्छी हॉरर फ़िल्म बताया। द वायर ने राज़ को रोमांटिक-हॉरर फ़िल्मों की उस लाइन में रखा, जिसने हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में विज़ुअल हॉरर को फिर से परिभाषित किया। इंटरनेशनल मीडिया प्लेटफॉर्म मैशेबल ने इसे “हिंदी हॉरर में एक क्रांति” कहा था। गल्फ़ न्यूज़ ने इसे उस फ़िल्म के रूप में माना, जिसने बॉलीवुड हॉरर को वैधता दी। 2003 में मालदीव में, राज़ का रीमेक बनाया गया और उसका नाम गिन्हींला रखा गया।

ब्रिटिश फ़िल्म इंस्टीट्यूट ने इस फ़िल्म को इसके जॉनर-ब्लेंडिंग अप्रोच के लिए सराहा, जिसमें रोमांस और मेलोड्रामा के एलिमेंट्स को हॉरर कहानी में मिलाया गया था, जिससे इसकी अपील बढ़ी और इसने भविष्य की भारतीय हॉरर फ़िल्मों को प्रभावित किया।

और यह ट्रिविया भी…

विक्रम भट्ट आर्टिस्ट की आवाज़ को लेकर ख़ासा ध्यान रखते हैं। फ़िल्म राज़ में, बिपाशा की आवाज़ उनकी नहीं है, इसे मोना घोष ने डब किया और न ही मालिनी शर्मा की आवाज़ उनकी अपनी है। फ़िल्म क़सूर में लीज़ा रे की आवाज़ दिव्या दत्ता ने डब की जबकि दिव्या दत्ता की आवाज़ किसी और ने। विक्रम ने ख़ुद अपने लीड एक्टर डिनो मोरिया के लिए डबिंग की थी! इससे पहले भी, विक्रम की पिछली हिट फ़िल्म कसूर में, आफ़ताब की आवाज़ भी डब की गयी थी। ‘राज़-3’ के ट्रेलर में डरावनी आवाज़ सुनकर आपकी रूह कांप जाएगी और यह आवाज़ भी विक्रम भट्ट ने दी है। इसके पहले ग़ुलाम में भी रानी मुखर्जी की आवाज़ उनकी नहीं है। इमरान हाशमी की डेब्यू फ़िल्म फ़ुटपाथ में भी उनकी आवाज़ शरद कपूर ने डब की।

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मानस

विवेक त्रिपाठी उर्फ़ मानस पूर्व बैंककर्मी हैं लेकिन फ़िल्मों के जुनून ने नौकरी छुड़वायी और फ़िल्में बनाने की दिशा में प्रेरित किया। आधा दर्जन शॉर्ट फ़िल्में बना चुके मानस की कुछ फ़िल्मों को फ़ेस्टिवलों में सराहना व पुरस्कार मिले हैं। फ़िल्म लेखन व निर्देशन के अलावा मानस का एक कहानी संग्रह 'बालकनी' प्रकाशित है। इन दिनों वह पूरी लंबाई की फ़िल्म के निर्माण के लिए संघर्षरत हैं।

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