
- January 15, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग विवेक सावरीकर मृदुल की कलम से....
हृदयनाथ का मंगेशकर घराना
पंडित हृदयनाथ मंगेशकर का नाम बॉलीवुड के संगीत आकाश में ध्रुव सितारे जैसा रहा है। चमकीला और अटल। यद्यपि हिंदी फ़िल्मों में पंडितजी का मन न तो अधिक रमा और न ही उनकी उत्कट प्रयोगधर्मिता को बंधी-बंधायी चौखट पर चलने वाले हिंदी फ़िल्मों के निर्देशक समझ सके। मगर जिसने भी उनके संगीतबद्ध किये लता मंगेशकरजी के गाये मीरा के भजनों (चला वाही देस और माई म्हारो सपना में परनेया दीनानाथ) को या ग़ालिब की ग़ज़लों को एक बार भी सुन लिया (..ये हम जो हिज्र में दीवारो-दर को देखते हैं) तो वह जीवन भर के लिए हृदयनाथ मंगेशकर की धुनों का पुजारी बन गया।
आज आज हम बात करते हैं फ़िल्म “सुबह” के एक प्रार्थना गीत की। गीत लिखा है पंडित नरेंद्र शर्मा ने और बोल हैं- “तुम आशा विश्वास हमारे, तुम धरती आकाश हमारे रामा”! राग यमन कल्याण पर आधारित इस गाने को सुनकर मन को जैसे ईश्वरीय चेतना का साक्षात्कार होता है। न ऑर्केस्ट्रेशन को महिमामंडित करने के लिए साज़ों की भीड़, न ताल वाद्यों का मेला। महज़ हारमोनियम, तबला, ऑर्गन जैसे बुनियादी वाद्यों की संगति में स्वर साम्राज्ञी का दैवीय स्वर और उतना ही कर्णमधुर कोरस भी।
यह गीत स्मिता पाटिल और गिरीश कर्नाड अभिनीत फ़िल्म “सुबह” में परित्यक्त महिलाओं के लिए संचालित महिला सुधार गृह की प्रार्थना सभा का है। आश्रम की एक महिला प्रार्थना गा रही है और अन्य महिलाएं समवेत स्वरों में प्रार्थना दोहरा रही हैं। यहां निर्देशक जब्बार पटेल के निर्देशन की भी प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने यह महत्वपूर्ण गाना लीड एक्ट्रेस स्मिता पर फ़िल्माने का मोह नहीं किया, जिससे दृश्य कहीं से भी कृत्रिम नहीं लगा। स्मिता पाटिल ने उस सामान्य दृश्य में भी एक कुशल प्रशासक की तरह कभी प्रार्थना के लिए खड़ी युवतियों को पंक्तिबद्ध करने तो कभी उनके विन्यास को ठीक करने का कार्य व्यापार कर अपने किरदार को बिना एक संवाद बोले ख़ास बना दिया है।

ख़ैर, हम बात कर रहे थे संगीतकार हृदयनाथ मंगेशकर की प्रयोगधर्मिता की। तो अंतरे की ओर चलिए। “तात मात तुम बंधु भ्रात हो” में लताजी जिस तरह ऊपर की पट्टी से मंद्र पंचम तक जाती हैं, बड़ा ही चमत्कारी है। इसी तरह दूसरे अंतरे में पंक्ति- “सांसों में तुम आते-जाते” में लताजी महज़ आवाज़ से सांसों का आना-जाना बताती हैं। “एक तुम्हीं से हैं सब नाते” में ‘से’ पर मींड की जगह निकालना किसी साधारण संगीतकार के वश की बात नहीं हो सकती। इस गाने के अंत में लताजी जब टेर लगाती हैं- “राsमा हमारे, दाता हमारे” (ओह फिर मींड का काम!) तब तो आँख मूंदकर नतमस्तक होने के अलावा कोई चारा नहीं बचता।
आपको बताना चाहता हूं फ़िल्म सुबह मराठी फिल्म “उंबरठा” (दहलीज़) का हिंदी संस्करण थी। मूल मराठी में भी स्मिता और गिरीश कर्नाड (मूलतः कन्नड़ भाषी गिरीश कर्नाड मराठी में भी उतने ही प्रवीण थे) ही थे। तो प्रार्थना गीत भी था जिसे वसंत बापट ने लिखा था। राग तिलक कामोद में स्वरबद्ध यह गीत भी लताजी की उत्कृष्ट गायकी की मिसाल है। बोल हैं- “गगन सदन, तेजोमय”। यह कुछ आश्चर्य का विषय है कि पंडितजी ने अपने समस्त हिंदी, मराठी, बांग्ला फ़िल्मों के संगीत में शायद ही रागदारी संगीत से हटकर कभी धुन बनायी और शायद इसीलिए मुख्यधारा के फ़िल्मी संगीत की दुनिया में रहते हुए भी वीतरागी से मात्र आदरभाव रहे। यहां तक कि राजकपूर ने भी सत्यम शिवम सुंदरम के लिए लताजी से वादा करने के बावजूद पंडित जी की जगह लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को ऐन वक़्त पर अनुबंधित कर लिया। लता बौखलायीं, ग़ुस्सा भी हुईं और ग़ुस्से-ग़ुस्से में मात्र एक टेक में ईश्वर सत्य है, सत्य ही शिव है जैसा क्लिष्ट शीर्षक गीत गाकर चली गयीं, मगर अपने गुणी भाई का प्रारब्ध फिर भी न बदल सकीं।
देखा जाये तो महान गायक और मंगेशकर परिवार के मुखिया मास्टर दीनानाथ मंगेशकर का निधन हुआ, तब हृदयनाथ मात्र पांच वर्ष के थे। मगर उनके साथ था पिता की शास्त्रीय ख़याल बंदिशों का डायरी में अंकित अनमोल ख़ज़ाना और चौदह वर्ष की अपनी तेजस्वी दीदी की गंधर्व गान साधना का दृढ़ संकल्पित हाथ। वो दीदी जिसे मधुर कंठ और तीनों सप्तकों में हवा की तरह विचरण करती गायन कला का दिव्यत्व ईश्वर ने देकर भेजा था। इस सबने या चाहे जिस कारण से हो, हृदयनाथ के बाल हृदय ने संभवतः तभी से संगीत की दुनिया में कुछ हटकर प्रयोग करने का संकल्प ले लिया। इसे उन्होंने जीवन भर निभाया भी।
राग पूरिया धनश्री में अपनी दूसरी और अत्यंत प्रतिभावान बहन आशा (भोसले) के लिए उन्होंने बहुत कम उम्र में एक गीत मराठी में रिकॉर्ड किया- “जीवलगा राहिले ये दूर घर माझे”। इस गीत ने ऐसी धूम मचायी कि हिंदी फ़िल्म “प्रार्थना” में इसी धुन पर आशाजी से ही एक गीत गवाया गया। बोल थे- “ओ बावरी, जाएगी तू, कैसे पिया द्वारे”। बोल लिखे मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने। अफ़सोस, न फ़िल्म चली न ये गाना हिंदी में मक़बूल हुआ।हिंदी में फ़िल्म चक्र, मशाल, माया मेमसाब, धनवान और लेकिन में उनके संगीत की मेलडी और लयात्मक गहराई को महसूसा जा सकता है। फिर चाहे- “यारा सीली सीली” हो या “सुनियो जी, अरज म्हारी ओ, बाबुला हमार” जैसे गायन के लिहाज़ से महाकठिन गाने हों या “ये आंखें देखकर हम सारी दुनिया भूल जाते हैं” और “सुरमई शाम इस तरह आये…” इन्हें सुनकर बस यही मन में आता है कि यह हृदयनाथ का ऐसा मंगेशकर घराना है, जहां गुणात्मकता का विचार सर्वोपरि रहता है।

विवेक सावरीकर मृदुल
सांस्कृतिक और कला पत्रकारिता से अपने कैरियर का आगाज़ करने वाले विवेक मृदुल यूं तो माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववियालय में वरिष्ठ अधिकारी हैं,पर दिल से एक ऐसे सृजनधर्मी हैं, जिनका मन अभिनय, लेखन, कविता, गीत, संगीत और एंकरिंग में बसता है। दो कविता संग्रह सृजनपथ और समकालीन सप्तक में इनकी कविता के ताप को महसूसा जा सकता है।मराठी में लयवलये काव्य संग्रह में कुछ अन्य कवियों के साथ इन्हें भी स्थान मिला है। दर्जनों नाटकों में अभिनय और निर्देशन के लिए सराहना मिली तो कुछ के लिए पुरस्कृत भी हुए। प्रमुख नाटक पुरूष, तिकड़म तिकड़म धा, सूखे दरख्त, सविता दामोदर परांजपे, डॉ आप भी! आदि। अनेक फिल्मों, वेबसीरीज, दूरदर्शन के नाटकों में काम। लापता लेडीज़ में स्टेशन मास्टर के अपने किरदार के लिए काफी सराहे गये।
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