राजेंद्र गौतम, rajendra gautam

इंद्रधनुष-13: राजेंद्र गौतम के नवगीत

1984 में प्रकाशित पुस्तक ‘हिन्दी नवगीतः उद्भव और विकास’ यानी अब तक नवगीत के सबसे प्रामाणिक शोध-ग्रंथ के लेखक हैं सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर डॉ. राजेंद्र गौतम। बेशक नवगीत के साथ ही, लोक साहित्य, संस्कृति आदि क्षेत्रों संबंधी आलोचना एवं शोध उनके गद्य लेखन के विषय रहे हैं, पर उनकी पहचान एक कवि की है। डॉ. गौतम के नवगीत बहुआयामी हैं। एक ओर प्रकृति की विभिन्न छवियां आपकी रचनाओं में हैं, तो दूसरी ओर सत्ता और समाज की विद्रूपता पर वे ज़िम्मेदारी और गम्भीरता से कलम चलाते हैं। आपके काव्य में समय का सच सम्पूर्ण साहस और तथ्य के साथ आता है। वे नवगीत विधा की तथ्यात्मकता से छेड़-छाड़ करने वाले साथियों को समय-समय पर चेताते भी रहते हैं। नवगीत का इतिहास और वर्तमान डॉ. गौतम की उपस्थिति के बिना पूर्ण नहीं हो सकता। आब-ओ-हवा के लिए यह परिचय एवं प्रस्तुति समकालीन नवगीतकार अनामिका सिंह द्वारा।

राजेंद्र गौतम, rajendra gautam

राजेंद्र गौतम के 7 नवगीत

1

थाम लेंगे हाथ जब जलती मशालों को
देख लेना तब लगेगी आग पानी में

नर्म सपनों की त्वचा जो नोचते पंजे
भोथरे होंगे वही चट्टान से घिस कर
बहुत मुमकिन थरथराये यह गगन सारा
हड्डियाँ बारूद हो जाएँ सभी पिस कर

रोशनी की सुरंगें हमको बिछानी हैं
अँधेरा घुसपैठ करता राजधानी में

बँध सका दरिया कहाँ है आज तक उसमें
बर्फ़ की जो एक ठंडी क़ैद होती है
लाज़िमी है पत्थरों का राह से हटना
सफ़र में जब चाह ख़ुद मुस्तैद होती है

साहिलों तक कश्तियाँ ख़ुद ही चली आतीं
ज़ोर होता है इरादों की रवानी में

———*———

2

आग चूल्हों की
बुझी है
छू रहा आकाश को
नरमेघ का कड़ुवा धुआँ है!

अब समिध-
की जा रही है
हवन-कुण्डों को समर्पित
रक्त से सिंचित शवों की
एक तीखी
गन्ध भरती
जा रही नासापुटों में
झुलसते शिशु-किसलयों की

आदमी ने
भूल से
अंगार-से दहके समय को
मोम के हाथों छुआ है।

दिख रही लेती उसारा
कौन-सी तहज़ीब की है
यह इमारत
लिखी
जिसकी नींव के
सब पत्थरों पर
ख़ून से ही है इबारत

क्या भला
फ़रियाद करते
दौर में इन हादसों के
ख़ुद ख़ुदा सहमा हुआ है।

———*———

3

तुम हमारी जान ले लो
यह बहुत सस्ती मिलेगी

बेदख़ल हम खेत से हैं
बेदख़ल खलिहान से हैं
कब भला दिखते तुम्हें हम
इक अदद इन्सान से हैं

पाँव छाती पर धरे हो
या कि गर्दन पर रखे हो,
देह अब सामान, ले लो
यह बहुत सस्ती मिलेगी

पीपलों को,
बरगदों को काट देना
उधर स्वीमिंग-पूल होगा
बस्तियाँ जब तक
न उजड़ेंगी यहाँ
मौसम कहाँ अनुकूल होगा

झील-परबत-जंगलों पर
‘सेज’ बिछनी है तुम्हारी
गांव की पहचान ले लो
यह बहुत सस्ती मिलेगी

तुम ख़ुदा, हाकिम तुम्हीं हो
स्वर्ग का बसना यहाँ पर
लाज़िमी अब
छू रहे आकाश तुम हो
राह रोके कौन अदना आदमी अब
चाँद-तारों से सजी
बारात निकली जा रही है

रात की तुम शान ले लो
यह बहुत सस्ती मिलेगी
तुम हमारी जान ले लो
यह बहुत सस्ती मिलेगी

———*———

4

तोड़, सभी की मूरत तोड़!

भूत लंगोटी वाला है
आफ़त का परकाला है
अपनी दाल गलाने को
इसका भी तू माथा फोड़
बापू की भी मूरत तोड़!

चाचा आता सपने में
बहुत डराता सपने में
सब को अपना लगता है
मर कर भी करता है होड़
चाचा की भी मूरत तोड़!

भूख-भूख दिन रात करे
इन्क़लाब की बात करे
यह दाढ़ी वाला बकरा कौन
गर्दन इसकी तुरत मरोड़!
इस बकरे की मूरत तोड़

जेबों में क्यों भरा ज्ञान
लिये खड़ा जो संविधान
ज़्यादा अफ़लातून बना
कहता- “हक़ से नाता जोड़!”
इसकी भी तू मूरत तोड़
अब सबकी तू मूरत तोड़!

———*———

5

यह धुआँ
सच ही बहुत कड़ुआ घना काला
क्षितिज तक दीवार
फिर भी बन न पाएगा

लाश सूरज की दबी चट्टान के नीचे-
सोच यह मन में
ठठाकर रात हंसती है
सुन अंधेरी कोठरी की वृद्ध खाँसी को
आत्ममुग्धा-गर्विता यह
व्यंग्य कसती है

एक जाला-सा
समय की आँख में उतरा
पर उजाला
सहज ही यों छिन न पाएगा।

सखिया कोई कुओं में डाल जाता है
हवा व्याकुल
गाँव भर की देह है नीली
दिशाएँ निःस्पन्द सब
बेहोश सीवानें
कुटिलता की गुंजलक
होती नहीं ढीली

पर गरुड़-से
भैरवी के पंख फैलेंगे
चुप्पियों के नाग का फन
तन न पाएगा।

———*———

6

सोख कर
संवेदना का जल
आग का ख़ूनी समन्दर
दूर तक हुंकार भरता है!

चुक गईं सम्भावनाएँ सब
निकल पाने की
दग्ध लपटों के मुहाने से
झुलसना केवल बदा है अब
कुछ नहीं होगा
व्यर्थ ही यों छटपटाने से

जो मछलियों से भरा था कल
ताल जाएगा वही मर
यहां लावा रोज़ झरता है!

संदली ठण्डी हवाओं के
काफ़िले को भी
यहाँ रेगिस्तान ने लूटा
इसलिए
हर ऑख का सपना
चोट खाकर काँच-सा टूटा

बालकों-सा सहमता जंगल
खड़ा लोगों के रहम पर
आरियों से बहुत डरता है!

एक मीठी आँच होती है
अलावों की
बांटती है-
जो एक अपनापन
वह लपट पर और होती है
फूल, कलियों, कोंपलों का
लीलती जो तन

पड़े हैं रिश्ते सभी घायल,
जिस्म इनके
ख़ून से तर
कौन लेकिन सांस भरता है!

———*———

7

ऐसा ही होता है
यहाँ हर सफ़र में

कुछ हिलते रूमालों
कुछ भीगी पलकों के
धुँधलाते अक्सों को
याद में रचाये
हर खुलती खिड़की से
कतरा कर नज़रें हम-
गुज़रे इन कूचों से
सहमे सकुचाये

शायद ही लौटें अब
आप के शहर में

एक-एक कर पीछे
छूट गये सारे
वे दुआ सलामों के
बोझिल सम्मोहन
बर्फ़ीली खोहों में
तोड़ चुके दम हैं
रोमिल ख़रगोशों-से
परिचित सम्बोधन

एक अजनबीपन ही
भरा हर नज़र में

सांझ की ढलानों पर
इधर-उधर छितरी हैं
गीतों की
ग़ज़लों की
नुची हुई पाँखें
चुप्पी की किरचों की
आँकती चुभन हैं
बदहवास चिड़ियों की
भरी हुई आँखें

बहती है थकी हवा
डूबकर ज़हर में

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