Lumière Brothers, Georges Méliès, जॉर्ज मेलिएस, लुमिएर ब्रदर्स, world cinema
मूक सिनेमा से एल्गोरिदम युग तक आ पहुंचे, सवा सदी से भी पुराने हो चुके सिनेमा को कितना जानते हैं आप? परदे पर न जाने कितनी ही कहानियां आपने देखी हैं, उनके बारे में पढ़ा है पर क्या आप इस परदे के पीछे के अमर किरदारों को जानते हैं? आइए विश्व सिनेमा की कमसुने-अनसुने क़िस्सों के सफ़र पर चलें...
पाक्षिक ब्लॉग चारु शर्मा की कलम से....

आविष्कारक और सिनेमा का पहला जादूगर

            यूँ तो सिनेमा का इतिहास मेरी उम्र से काफ़ी लम्बा है। शायद इतना कि मैं दो बार मर के ज़िन्दा हो जाऊं। लेकिन मेरे लिए सिनेमा/फ़िल्मों का इतिहास तबसे है, जबसे मैंने होश संभाला और अपने आस-पास फ़िल्मों को दिल बहलाने के माध्यम के रूप में देखा और समझा… बस यही वह समय था, जब मन के अंदर इस विधा को जानने और समझने की तीव्र इच्छा बैठ गयी। लेकिन उस दौर में यह आसान नहीं था। सिनेमा पढ़ना, वह भी एक लड़की होकर, किसी विद्रोह से कम न था। ख़ैर अपनी इच्छा को वहीं दफ़न किया और परिवार और समाज के दायरों के बीच अपनी ज़िंदगी को समेट लिया। लेकिन मन में बसी ख़्वाहिश ने दोबारा सर उठाने की गुस्ताख़ी की और सब कुछ परे रखकर इस क्षेत्र में क़दम रख दिया।

मैं यहाँ आप सबसे अपनी जीवन-गाथा नहीं बल्कि इस विशेष कॉलम के ज़रिये परत-दर-परत विश्व सिनेमा जगत के विभिन्न पहलुओं पर अपनी समझ और मन में घर कर चुकी दास्तानें साझा करना चाहूंगी। जानती हूँ आपमें से किसी को शायद यह दिलचस्प न लगे क्योंकि आज के गूगल और डूडल के ज़माने में जहाँ सब-कुछ आपकी हथेली में सिमट गया है, वहाँ इस तरह कुछ पढ़ना या जानना थोड़ा पुराने फ़ैशन जैसा लगता है, लेकिन इस पुराने तरीक़े में जो सबसे नयी बात होगी, वो है एक पुरानी कहानी किसी नये इन्सान से सुनना। क्योंकि कहानी चाहे जितनी भी पुरानी हो लेकिन हर नया शख़्स उसे अपने अंदाज़ में जब सुनाता है तो नयी ही लगती है… चलिए फिर शुरू से शुरू करते हैं।

विश्व सिनेमा का इतिहास केवल तकनीकी आविष्कारों की शृंखला मात्र नहीं है बल्कि यह मनुष्य की संवेदनात्मक चेतना, स्मृति कल्पना शक्ति और जूनून के विकास का इतिहास भी है। सिनेमा की शुरूआत यूँ तो लुमिएर ब्रदर्स (Lumière Brothers-1895) से मानी जाती है लेकिन मेरा मानना है सिनेमा की शुरूआत उससे भी पहले 1816 में हुई, जब फ्रेंच आविष्कारक जोसेफ़ निसफ़ोरे (Joseph Nicéphore) ने कैमरे की खोज की। क्योंकि वहीं से वैश्विक पटल पर फ़िल्मों की नींव रखी गयी। अगर कैमरा चलन में न आया होता तो हम आज भी सिनेमा के उस दौर में न पहुंच पाते जहाँ आज हैं।

अब देखिए ना, आज हम सबके हाथ में कैमरा है और हम सब व्यक्तिगत या व्यावसायिक रूप से इस पर निर्भर हैं। लुमिएर ब्रदर्स ने इसके इस्तेमाल के नये आयाम तय किये और सिनेमाई चकाचौंध को कैमरे में क़ैद करके दुनिया को मनोरंजन के एक विशेष हथियार के रूप में सौंप दिया।

जब उन्नीसवी सदी के अंत में पहली बार चलती तस्वीरें सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित की गयीं, तब वे महज़ वैज्ञानिक जिज्ञासा का परिणाम प्रतीत होती थीं। किंतु बहुत शीघ्र ही यह स्पष्ट हो गया कि सिनेमा केवल यांत्रिक पुनरुत्पादन का माध्यम नहीं रहेगा, बल्कि वह मानव अनुभव को व्यक्त करने की एक नयी भाषा बन जाएगा। मूक सिनेमा से लेकर आज के एल्गोरिदम संचालित डिजिटल युग तक, सिनेमा ने लगातार अपनी संरचना, तकनीक और सौंदर्य बोध को बदला है और इस प्रक्रिया में उसने दुनिया को देखने के हमारे तरीक़ों को भी रूपांतरित किया है।

चमत्कार यानी वो छह फ़िल्में

1895 में पेरिस में लुमिएर ब्रदर्स द्वारा आयोजित पहली सार्वजनिक स्क्रीनिंग को विश्व सिनेमा की जन्म घड़ी माना जाता है। उनकी लघु फ़िल्मों जैसे Arrival of a Train at La Ciotat ने दर्शकों को चकित कर दिया था, क्योंकि पहली बार रोज़मर्रा की वास्तविकता, गतिशील रूप में उनके सामने उपस्थित थी। हालाँकि शुरूआती सिनेमा में कहानी कहने की प्रथा बहुत सरल थी; कैमरा अक्सर स्थिर रहता था और दृश्य एक ही फ्रेम में घटित होते थे। इतना ही नहीं, शुरू में कलाकार भी आम लोग होते थे और उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी की झलकियां ही कैमरे में क़ैद करके उन्हें दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया जाता था। फिर भी, इस सादगी में एक क्रांतिकारी संभावना छिपी थी, समय और स्थान को रिकॉर्ड करके पुनः प्रस्तुत करने की क्षमता।

एक ओर वैश्विक स्तर पर सिनेमा का आगाज़ हो चुका था, वहीं भारत में भी इसकी गूँज सुनायी देने लगी थी। और इस गूँज को हवा तब लगी जब लुमिएर ब्रदर्स की छह लघु फ़िल्मों का प्रदर्शन मुंबई के Watson’s Hotel, जो आज Esplanade Mansion के नाम से प्रचलित है, में किया गया।

यूँ तो ये फ़िल्में अधिकांशतः दैनिक जीवन के छोटे-छोटे दृश्यों पर बनी थीं, जिनकी अवधि प्रायः 30 सेकंड से 1 मिनट के बीच थी लेकिन इनके प्रदर्शन ने भारतीय दर्शकों को एक नये पहलू से अवगत करा दिया और भारतीय अख़बारों ने इसे “तकनीकी चमत्कार” और “सदी का चमत्कार” शीर्षक के साथ छापा। The Times of India के मुताबिक़ ₹1 के टिकट पर दर्शकों की भारी भीड़ ने कबाड़े-समान तख़्तियों पर बैठकर इन चलती तस्वीरों का आनंद लिया। सिनेमैटोग्राफ़ मशीन का उपयोग करते हुए छह छोटी फ़िल्मों (Entry of the Cinematograph, The Sea Bath, Arrival of a Train, A Demolition, Ladies and Soldiers on Wheels और Leaving the Factory) का प्रदर्शन किया।

इतना ही नहीं, इन फ़िल्मों की स्क्रीनिंग के दौरान कुछ बेहद हास्यास्पद वाक़ये भी घटित हुए जैसे जब “Arrival of a Train” दिखायी गयी, तो कहा जाता है कुछ दर्शक स्क्रीन की ओर आती ट्रेन को सचमुच अपनी ओर आता हुआ समझकर घबरा गये और अपनी सीटों से उठकर पीछे हट गये। एक और मज़ेदार क़िस्सा है कि कुछ शुरूआती दर्शक यह समझने की कोशिश करते थे कि “लोग पर्दे के अंदर कैसे आ गये?” कई लोग स्क्रीन के पीछे जाकर देखने की कोशिश करते थे कि कहीं असली लोग तो छिपे नहीं हैं। यह शुरूआती सिनेमा की मासूम जिज्ञासा का सुंदर उदाहरण है।

‘सिनेमा का कोई भविष्य नहीं’!

कुछ और बातें थीं, जो विश्व सिनेमा के आगमन के पलों को आज भी ख़ास बनती हैं… जैसे कई बार स्थानीय लोग कैमरे को देखकर जानबूझकर अजीब हरकतें करते थे, हाथ हिलाते थे या कैमरे के सामने पोज़ देते थे। यह सिनेमा के शुरूआती “photobomb” क्षण थे। आपको शायद पता हो लुमिएर ब्रदर्स की फ़िल्म “The Sprinkler Sprinkled” को दुनिया की पहली scripted कॉमेडी फिल्मों में से एक माना जाता है। बाद के सालों में इतिहासकारों ने इसे सिनेमा का पहला रिकॉर्डेड “visual joke” माना, जो अपने आप में बहुत विशेष बात रही है।

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यह भारत में पहली बार था जब चलचित्र ने बड़े पर्दे पर भारतीय दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। हालाँकि किसी भी ऐतिहासिक दस्तावेज़ में ये सबूत नहीं मिलता कि भारतीय सिनेमा के जनक ‘दादासाहब फालके’ भी इन फ़िल्मों के चित्रांकन के समय Watson’s Hotel में मौजूद थे या नहीं? फिर भी माना जाता है कि फालके उस समय फ़ोटोग्राफ़ी की पढ़ाई तथा प्रिंटिंग तकनीक के काम सीख रहे थे और कैमरे के साथ उनकी मोहब्बत भी अपने चरम पर थी।

अजीब विडंबना थी कि वैश्विक पटल पर सिनेमा की नींव रखने वाले लुमिएर ब्रदर्स स्वयं इसका भविष्य नहीं देख पा रहे थे। वे नहीं जानते थे कि उन्होंने मनोरंजन की दुनिया में जो क्रांति ला दी है, वो उन्हें इतिहास में हमेशा के लिए अमिट जगह दे जाएगी।

क्या आप यक़ीन करेंगे लुमिएर ब्रदर्स ने सोचा था सिनेमा एक अस्थायी वैज्ञानिक जिज्ञासा है। उनका एक प्रसिद्ध कथन है (हालाँकि इतिहासकार इसे अप्रामाणिक मानते हैं): “Cinema is an invention without a future.” (सिनेमा एक ऐसा आविष्कार है जिसका कोई भविष्य नहीं है)। अपने इसी विश्वास के चलते उन्होंने जल्द ही फ़िल्म निर्माण से हटकर फ़ोटोग्राफ़ी और विज्ञान में वापसी की। उनके पुश्तैनी घर और पहले स्टूडियो की जगह को एक संग्रहालय बना दिया गया है। इसे आज भी विश्व सिनेमा के इतिहास का प्रमुख केंद्र माना जाता है। और हर साल यहाँ Lumière Film Festival आयोजित होता है, जिसके माध्यम से सिनेमा में उनके योगदान का सम्मान किया जाता है।

आविष्कार के पीछे ज़रूरत या हादसे?

विश्व सिनेमा के दूसरे चरण में हैं, जॉर्ज मेलिएस (Georges Méliès), जो पेशे से एक जादूगर थे और रंगमंच पर अपनी कला का प्रदर्शन भी किया करते थे। यूँ तो जॉर्ज मेलिएस (Georges Méliès) एक जूता व्यवसायी के बेटे थे लेकिन बचपन से ही उनकी रुचि चित्रकला, रंगमंच, मशीनों और जादू (magic) में थी। लिहाज़ा बड़े होने पर उन्होंने अपने पिता की विरासत से दामन छुड़ाकर पेरिस का प्रसिद्ध Théâtre Robert-Houdin ख़रीद लिया और वहां जादूगरी के करतबों का मंचन करने लगे। यही थिएटर बाद में उनके सिनेमा की प्रयोगशाला बना। उस दौर के प्रसिद्ध जादूगर John Nevil Maskelyne उनकी प्रेरणा थे।

पेरिस में लुमिएर ब्रदर्स की फ़िल्मों के सार्वजनिक प्रदर्शन के दौरान वो इस कला से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरंत लुमिएर ब्रदर्स से उनका सिनेमेटोग्राफ़ ख़रीदने की कोशिश की और इसके लिए उनको एक भारी रक़म का प्रस्ताव भी दिया। लेकिन लुमिएर ब्रदर्स ने मशीन बेचने से मना कर दिया। इतने पर भी मेलिएस (Georges Méliès) ने हार नहीं मानी और एक अन्य ब्रिटिश आविष्कारक रॉबर्ट डब्ल्यू. पॉल से उनका प्रोजेक्टर ख़रीदा और उसे खोलकर समझा, फिर अपने इंजीनियर दोस्तों की मदद से उस प्रोजेक्टर से कैमरा बना लिया। यह सिनेमा के इतिहास के पहले “रिवर्स इंजीनियरिंग” के उदाहरणों में से एक रहा है। तो जहाँ सिनेमा की दुनिया में नये-नये करिश्मे हो रहे थे वहीं अन्य संबंधित क्षेत्र भी नये आविष्कारों को जन्म दे रहे थे।

जॉर्ज मेलिएस (Georges Méliès) के सफ़र की शुरूआत तो हो चुकी थी लेकिन नये उपकरणों के चलते उन्हें बहुत मुश्किलों से जूझना पड़ता था। मसलन कभी कैमरे से सही तरीक़े से फ़िल्म/चलचित्र की शूटिंग न हो पाना। एक दिन वे सड़क पर आते-जाते वाहनों को शूट कर रहे थे। अचानक कैमरा जाम हो गया। कुछ सेकंड बाद वह फिर चल पड़ा। जब फ़िल्म विकसित हुई, तो उन्होंने देखा कि एक दृश्य में एक बस अचानक ताबूत में बदल गयी। यह महज़ एक तकनीकी दुर्घटना थी, लेकिन मेलिएस के लिए यह खोज साबित हुई। उन्हें समझ आ गया था कि कैमरा रोककर वस्तुएँ बदलने से जादुई रूपांतरण दिखाया जा सकता है। इसे आज हम stop-trick substitution कहते हैं।

वे इतने उत्साहित हुए कि अगले ही दिन से उन्होंने जानबूझकर ऐसे प्रयोग करने शुरू कर दिये। उनके अभिनेता अक्सर मज़ाक़ में कहते: “हमें ग़ायब कर देते हैं और फिर वापस बुला लेते हैं!” इस उपलब्धि के चलते इतिहास में उनका नाम “Father of Special Effects in Cinema” के शीर्षक के साथ जोड़ा गया।

1896 में उन्होंने अपनी फ़िल्म कंपनी शुरू की, जिसका नाम Star Film Company रखा। पेरिस के पास Montreuil में दुनिया के शुरूआती फ़िल्म स्टूडियो में से एक यह भी है। यह एक काँच की छत वाला स्टूडियो था, जो ग्रीनहाउस जैसा दिखता था ताकि प्राकृतिक रोशनी भरपूर मिले। गर्मी के समय में यहाँ बैठना लगभग नामुमकिन होता और जॉर्ज के साथ काम करने वाले उनको मज़ाक़ में कहते कि हम तो पिघल रहे हैं, इस पर मेलिएस हँसकर कहते: “सिनेमा के लिए थोड़ा पिघलना ज़रूरी है!”

सिनेमा की पहली रियल ट्रैजडी

फिर आया 1902 और आयी जॉर्ज मेलिएस (Georges Méliès) की फ़िल्म “A Trip to the Moon”, जिसने उस समय की सबसे चर्चित फ़िल्म का ख़िताब अपने नाम किया। इस फ़िल्म ने जॉर्ज मेलिएस और उनकी कंपनी दोनों को विश्व स्तर पर बहुत मशहूर कर दिया। “A Trip to the Moon” में कुछ ख़ास बातें थीं, जिनकी वजह से यह फ़िल्म आम से ख़ास तक के बीच अपनी विशेष जगह बना पायी… और वो चीज़ें थीं साइन्स-फ़िक्शन, फ़ैंटेसी, थिएटर का अद्भुत मिश्रण और इसके साथ हाथ से रंगे फ्रेम, जटिल सेट डिज़ाइन, मल्टीपल एक्सपोज़र और डिसॉल्व और फ़ेड जैसी तकनीक का इस्तेमाल। 12 से 14 मिनट की अवधि वाली यह फ़िल्म कई मायनों में नायाब और अद्भुत थी।

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17 साल के अपने सक्रिय फ़िल्म निर्माण करियर में मेलिएस ने 500 से ज़्यादा फ़िल्मों का निर्माण किया। लेकिन जैसा कहा जाता है सबका वक़्त बदलता है, वैसे ही मेलिएस का भी वक़्त बदला और धीरे-धीरे उनकी फ़िल्मों का जादू फीका पड़ने लगा। फिर एक दौर आया जहाँ मेलिएस पूरी तरह से गुमनामी के अँधेरे में खो गये। जॉर्ज के जीवन का अंतिम चरण बहुत त्रासदीपूर्ण था। एक ऐसा कलाकार, जिसने दुनिया को सपने दिखाये, लेकिन अपने ही जीवन के अंत में लगभग भुला दिया गया। उनके अंतिम वर्षों और उनकी खोयी हुई फ़िल्मों की कहानी दरअसल एक ही कथा के दो पहलू हैं – स्मृति और धुंधलेपन के बीच झूलती हुई सिनेमा की पहली दास्तान।

1910 के बाद जब सिनेमा बदलने लगा, बड़े स्टूडियो उभरने लगे और लंबी यथार्थवादी फ़िल्में लोकप्रिय होने लग पड़ी थीं, तब मेलिएस की रंगमंचीय, जादुई शैली में बुनी गयी कहानियां धीरे-धीरे पुराने समय की चीज़ मानी जाने लगीं। आर्थिक संकट के चलते उनको अपनी कंपनी बंद करना पड़ी। कर्ज़ इतना बढ़ चुका था कि उन्हें अपने जीवन की सबसे मूल्यवान संपत्ति बेचनी पड़ी… उनकी फ़िल्मों की मूल रीलें। यह सिनेमा इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक है: उनकी अनगिनत फ़िल्में कबाड़ी के हाथ बिक गयीं और उन्हें पिघलाकर जूतों की एड़ी और औद्योगिक सामग्री बनायी गयी।

जिन रीलों में कभी चाँद की यात्रा, जादुई सपनों और कल्पना के दृश्य क़ैद थे, वे पिघलकर किसी के पैर के जूतों तले आ गयीं। कहा जाता है जब मेलिएस ने अपनी फ़िल्मों के नष्ट होने की ख़बर सुनी, तो वे लंबे समय तक चुप रहे। उनके लिए यह केवल आर्थिक नुक़सान नहीं था बल्कि यह उनकी यादों, कल्पनाशीलता और रचनात्मकता का अंत था। ऐतिहासिक दस्तावेजों की मानें तो उनकी लगभग आधी फ़िल्में हमेशा के लिए खो गयीं। आज जो फ़िल्में बची हैं, वे उस विशाल रचनात्मक संसार का अंशमात्र हैं।

कहानी.. संतोष के आंसुओं तक

कहा जाता है मेलिएस लगभग गुमनामी में जी रहे थे। वे और उनका परिवार पेरिस के Montparnasse रेलवे स्टेशन पर एक छोटी-सी खिलौनों की दुकान चलाते थे। यह कल्पना करना भी कितना मुश्किल है जिस व्यक्ति ने सिनेमा को जादू दिया था, वो अपने अंतिम दौर में बच्चों को खिलौने बेच रहा था। जीवट यह कि उस समय भी वह एक कहानीकार ही रहे। दुकान पर आने वाले बच्चों को कहानी सुनाना और छोटी-मोटी जादुई तरक़ीब सिखाना, उनके ज़िन्दा होने का सबूत था।

1920 के अंत में कुछ फ़िल्म पत्रकारों ने उन्हें खोज निकाला। जब उनकी कहानी दुनिया के सामने आयी, तो युवा फ़िल्म प्रेमियों को यह जानकर झटका लगा कि सिनेमा का यह महान व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों में रह रहा है। उसके बाद फ्रांसीसी सरकार ने उन्हें Legion of Honour से सम्मानित किया। सम्मान समारोह में लुमियर ब्रदर्स भी स्वयं उपस्थित थे। यह क्षण प्रतीकात्मक था- सिनेमा के आविष्कारक और सिनेमा के जादूगर एक मंच पर एक साथ खड़े थे। कहा जाता है उस दिन मेलिएस की आँखों में आँसू थे। वर्षों की उपेक्षा के बाद सिनेमा ने उन्हें फिर स्वीकारा था। उनकी खोयी हुई फ़िल्में एक तरह से सिनेमा की नश्वरता की याद दिलाती हैं.. कि कला भी समय के साथ मिट सकती है, अगर उसे संभाला न जाये।

आज जब हम आधुनिक स्पेशल इफ़ेक्ट्स और भव्य फ़ैंटेसी फ़िल्में देखते हैं, तो उनके भीतर कहीं न कहीं मेलिएस की हँसी गूँजती है- वही हँसी जो उनके स्टूडियो में गूँजती थी जब कोई ट्रिक सफल हो जाती थी।

तो दोस्तो… यह थी विश्व सिनेमा की शुरूआत की कहानी, जिसमें हमने बारीकी से सिर्फ़ तथ्यों को ही नहीं बल्कि संवेदना के अवशेषों को भी सहेजने की कोशिश की। अगले अंक में हम इस कहानी को आगे बढ़ाएंगे और ऐसे ही दिलचस्प और महान किरदारों से आपको रूबरू करवाएंगे। इस अंक में बस इतना ही… कैसी लगी आपको हमारी कोशिश? और कैसा लगा इस कोशिश को पेश करने का अंदाज़, ज़रूर बताइए।

चारु शर्मा, charu sharma

चारु शर्मा

फ़िल्मकार, लेखक, प्रोड्यूसर और सांस्कृतिक क्यूरेटर। यथाकथा फ़िल्म एंड लिटरेचर फ़ेस्टिवल की संस्थापक। चारु मुख्यतः सामाजिक मुद्दों और ऐतिहासिक कथाओं संबंधी डॉक्यूमेंट्री फिल्मों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और कंटेंट पर केंद्रित हैं। व्यक्तित्वों, विचारों आदि के दस्तावेज़ीकरण से जुड़े प्रोजेक्ट्स से जुड़ी रही हैं। फ़ीचर-लेंथ डॉक्यूमेंट्री “एम्बेसडर ऑफ़ सोशलिज़्म – लाइफ एंड टाइम्स ऑफ डॉ. राममनोहर लोहिया” उनके प्रमुख कार्यों में शामिल है। संपर्क: 9082050680

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