
- March 11, 2026
- आब-ओ-हवा
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विवेक रंजन श्रीवास्तव विदेश यात्राओं पर हैं और युद्ध के चलते लंदन में रुके हुए हैं। इस दौरान वह नियमित रूप से शब्दों को समय दे रहे हैं। आब-ओ-हवा पर विशेष रूप से इस वैचारिकी, नोट्स, अनुभव आदि इंदराज के लिए यह कोना।
दूर देस में लेखक-13...
इस्लाम: सत्ता संघर्ष और वैश्विक शांति की राह
धर्म और आस्था सदैव से मानवीय चेतना का आधार रहे हैं, लेकिन समय के साथ एक ही विचार की कई धाराएं बन जाती हैं। जैसे एक ही वृक्ष से निकली विभिन्न शाखाएं अलग-अलग दिशाओं में फैलती हैं, वैसे ही दुनिया के हर बड़े धर्म में उप-संप्रदाय विकसित हुए। ईसाई धर्म में जहाँ ‘कैथोलिक’ और ‘प्रोटेस्टेंट’ के बीच ऐतिहासिक संघर्ष रहे, वहीं बौद्ध धर्म ‘हीनयान’ और ‘महायान’ में बँटा। जैन धर्म में ‘दिगंबर’ और ‘श्वेतांबर’ की अपनी परंपराएं हैं। यह विभाजन अक्सर मूल सिद्धांतों पर नहीं, बल्कि उत्तराधिकार और व्याख्याओं के मतभेद से उत्पन्न होता है।
इस्लाम धर्म भी इसका अपवाद नहीं है, जहाँ ‘सुन्नी’ और ‘शिया’ दो ऐसी धाराएं हैं जिनका इतिहास आज पूरी दुनिया की राजनीति को प्रभावित कर रहा है।
इस्लाम में इस विभाजन की नींव पैगंबर मोहम्मद के बाद उनके उत्तराधिकार के प्रश्न पर पड़ी। सुन्नी समुदाय, जो कुल मुस्लिम जनसंख्या का लगभग 85 से 90 प्रतिशत है, ‘सुन्ना’ यानी पैगंबर की परंपराओं में विश्वास रखता है। उनका मानना है कि पैगंबर के बाद समुदाय के सबसे योग्य व्यक्ति (ख़लीफ़ा) को नेतृत्व करना चाहिए था। इसके विपरीत, शिया समुदाय का मानना है कि नेतृत्व का अधिकार केवल पैगंबर के परिवार, विशेषकर उनके दामाद हज़रत अली और उनके वंशजों को ही था।
आज ये दोनों समुदाय दुनिया भर में फैले हुए हैं। सुन्नी जनसंख्या मुख्य रूप से इंडोनेशिया (लगभग 23 करोड़), पाकिस्तान (20 करोड़), सऊदी अरब और मिस्र जैसे देशों में बहुसंख्यक है। वहीं, शिया समुदाय ईरान (लगभग 8 करोड़), इराक, अज़रबैजान और बहरीन जैसे देशों में प्रमुखता से है।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जब हम ईरान और मध्य-पूर्व के युद्धों को देखते हैं, तो यह केवल धार्मिक मतभेद नहीं रह जाता। ईरान आज दुनिया का सबसे शक्तिशाली शिया राष्ट्र है, जबकि सऊदी अरब ख़ुद को सुन्नी जगत का केंद्र मानता है। इनके बीच का संघर्ष असल में ‘क्षेत्रीय वर्चस्व’ की लड़ाई है। ईरान अपना प्रभाव इराक, सीरिया और यमन तक बढ़ाना चाहता है, जिसे सुन्नी देश अपने अस्तित्व के लिए ख़तरा मानते हैं।
हालांकि, इतिहास में शांति की कोशिशें भी हुई हैं। सन 1990 के दशक में सऊदी अरब और ईरान के बीच संबंधों को सुधारने के लिए ‘अकबा समझौता’ हुआ था, और हाल में 2023 में चीन की मध्यस्थता से दोनों देशों ने अपने राजनयिक संबंध फिर से बहाल किये हैं। ये छोटे क़दम बताते हैं कि कूटनीति से बड़ी से बड़ी दरार भरी जा सकती है।

ग्लोबल शांति की स्थापना के लिए सबसे पहले धर्म को सत्ता की राजनीति से अलग करना होगा। जब तक राजनेता आम जनता की धार्मिक भावनाओं को युद्ध के लिए उकसाएंगे, शांति संभव नहीं है। दुनिया को एक ऐसे मंच की ज़रूरत है, जहाँ सुन्नी और शिया नेतृत्व आपसी संवाद से उन ऐतिहासिक घावों को भर सकें। दुखद है कि कथित रूप से स्व घोषित वैश्विक नेतृत्व संभाले हुए एक चुने हुए सबसे पुराने लोकतांत्रिक देश के नेता समस्या से स्वयं अपना राजनैतिक लाभ उठाने के चक्कर में युद्ध भड़काने में अधिक प्रभावी भूमिका निभाते दिखते हैं।
भारत जैसे देश, जहाँ शिया और सुन्नी दोनों समुदाय सदियों से शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व के साथ रह रहे हैं, पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बन सकते हैं। अंततः, शांति का मार्ग शस्त्रों से नहीं, बल्कि उस मानवीय मर्म से ही निकलेगा, जो सिखाता है ‘इंसानियत’ ही सबसे बड़ा धर्म है। यदि हम आने वाली पीढ़ी को सुरक्षित भविष्य देना चाहते हैं, तो हमें कट्टरता की दीवारों को गिराकर सहिष्णुता के सेतु बनाने होंगे।
(चित्र परिचय: कैरिकैचर डॉ. मो. मारूफ़ शाह के ब्लॉग से साभार)

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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