
- October 22, 2025
- आब-ओ-हवा
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प्रसंगवश: दीवाली के बाद आने वाली दूज पर कायस्थ समुदाय में चित्रगुप्त पूजन की परंपरा है। इस तिथि पर कायस्थ समुदाय में विशेष रूप काग़ज़, कलम और दवात की पूजा होती है।
विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....
कायस्थों की लिपि कैथी - इतिहास, वर्तमान और भविष्य
कायस्थ लिपि, जिसे कैथी लिपि भी कहा जाता है, भारत में प्राचीन और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण लिपि रही है। अंग्रेज़ी शासन के समय जारी एक रुपये के नोट (नीचे चित्र देखें) में दूसरे नंबर पर एक रुपया कैथी लिपि में ही लिखा हुआ है।
इस लिपि का नाम कायस्थ समुदाय के नाम पर पड़ा क्योंकि इसी समुदाय के लोगों ने मुख्य रूप से इसका प्रयोग किया। कायस्थ समुदाय पारंपरिक रूप से लेखाकार, गणक और राजाओं के प्रशासनिक कार्यकर्ताओं का समूह था, जिनके लेखन कार्य के लिए यह लिपि विकसित हुई। इसका इतिहास प्राचीन ब्राह्मी लिपि से शुरू होकर गुप्तकाल में विकसित कुटिल लिपि के ज़रिये कैथी के रूप में परिष्कृत होने तक फैला हुआ है। यह लिपि छठी शताब्दी के आसपास अस्तित्व में आयी थी और मुग़ल व ब्रिटिश काल में इसका व्यापक उपयोग हुआ। यह लिपि हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों द्वारा प्रशासनिक, न्यायिक, धार्मिक और व्यापारिक दस्तावेज़ों में प्रयुक्त की जाती रही थी।
कैथी लिपि की ख़ासियत यह थी कि इसमें अक्षर सरल और स्पष्ट होते थे, जिनमें कोई शिरोरेखा नहीं होती थी और अति शीघ्रता से लिखने की सुविधा थी। इस लिपि में भाषाओं की विविधता के चलते अवधी, भोजपुरी, मगही, मैथिली, बंगला, उर्दू आदि कई भाषाओं के लेखन होते रहे। उत्तर भारत के बड़े इलाक़े में यह अक्सर दफ़्तरों और अदालतों की अधिकारिक लिपि रही। यहां तक कि ब्रितानी काल में भी इसे शासन के औपचारिक दस्तावेज़ों में मान्यता प्राप्त थी।

समय के साथ आधुनिकता और शिक्षा के नये स्वरूपों के आ जाने से कायस्थों की इस लिपि का प्रयोग धीरे-धीरे कम होता गया। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में देवनागरी और फ़ारसी लिपि को सरकारी कामों में प्राथमिकता मिलने लगी, जिसके कारण कैथी का प्रचलन ख़त्म होता चला गया। आज के समय में यह लिपि लुप्तप्राय है और इसे पढ़ने-बूझने वाले विशेषज्ञ भी बहुत कम बचे हैं। पुराने सरकारी और न्यायालयीन अभिलेखों में यह लिपि अभी भी मौजूद है, लेकिन उन अभिलेखों को समझने में दिक़्क़तें आ रही हैं। डिजिटल युग में पुराने दस्तावेज़ों का संरक्षण और उनकी विद्यमानता के लिए प्रयास किये जा रहे हैं।
भविष्य की ओर देखें तो इस लिपि के पुनरुद्धार की संभावनाएं भी बन रही हैं। सांस्कृतिक संगठन, शोध केंद्र और कुछ शासकीय पहल इस लिपि को संरक्षित करने के लिए काम कर रहे हैं। नयी तकनीकों के माध्यम से डिजिटल फॉन्ट, शिक्षण सामग्री और शोधकार्य इसे जीवित रखने का प्रयास हो रहा है। यदि युवा पीढ़ी में इस लिपि के प्रति रुचि बढ़े और इसे शिक्षा तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जगह मिले, तो कायस्थ लिपि भारतीय सांस्कृतिक इतिहास की अमूल्य धरोहर के रूप में फिर से अपना स्थान मज़बूत कर सकती है।

यह कायस्थ लिपि केवल एक अतीत की कहानी नहीं है, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विविधता और भाषा-लेखन के इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ी है। इसके संरक्षण और संवर्द्धन के बिना हमारी सांस्कृतिक समझ अधूरी ही होगी। ज़रूरी है कि हम इस विरासत के प्रति जागरूकता बढ़ाएं और इसे आने वाले समय के लिए सुरक्षित रखें ताकि हमारी भाषा और संस्कृति की जड़ें और मज़बूत हों।
(चित्र विवरण: 1. ब्रिटिश राज के दौरान जारी नोट में कैथी लिपि। 2. आरा, बिहार के एक साइनबोर्ड पर कैथी लिपि का प्रयोग। 3. शेरशाह सूरी के समय में जारी सिक्कों में से बाएं सिक्के पर सबसे नीचे कैथी लिपि का प्रयोग। 4. 1898 में बाबूराम स्मरणलाल द्वारा कैथी लिपि में लिखित एक भोजपुरी कथा। कोलाज में चित्र विकिकॉमन्स से साभार।)

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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ऐतिहासिक एवं महत्वपूर्ण जानकारी की रोचक प्रस्तुति के लिए साधुवाद।
महत्वपूर्ण जानकारी
बेहतरीन आलेख
बधाई