
- August 17, 2025
- आब-ओ-हवा
- 1
पुस्तक परिचय लीलाधर मंडलोई की कलम से....
कितनी त्रासद होती है आग?
इस उपन्यास की तुलना समकालीन परिदृश्य में वृंदावनलाल वर्मा, भगवानदास मोरवाल, महेश कटारे के उपन्यासों से की जा सकती है।
“एक अलिखित भविष्य का बीज
जो किसी सपने में नहीं था
चुपके से उगता रहा अग्निगर्भ में
जलती रही कोमल पंखुरियां
तप्त हो गये नदियों के प्रवाह
और धूम्र से भर उठे थे पर्जन्य
झरती रही अग्नि आकाश से भी
वेदना से फूट पड़ी थी सुनहरी आभा
और गूंजने लगा था अनात्म गान
सहस्राब्दियों तक धधकती ज्वालाओं के साथ”
उपरोक्त किताब के प्रारंभ में वीणा की कविता है जिसे पढ़ा जाना चाहिए। इसमें उपन्यास को समझने का सूत्र है।
दरअसल यह किताब, एक अनात्म गान है, अलक्षित, अमूर्त इतिहास का। इसका वस्तु परिसर संश्लिष्ट है, लेकिन इसमें अलक्षित भविष्य बीज हैं। काल की जो धधकती स्मृति ज्वालाएं और चतुर्दिक धुआं है, उसमें उतरे बिना विलुप्त यथार्थ कथा तक पहुंचना संभव नहीं है। वीणा इतिहास के ध्वस्त अवशेष के दरवाज़े पर एक शोधकर्ता की तरह खड़ी थी। कितने साल, क्या क्या उत्खनित करती रहीं, पहले एक पुरातत्व वेत्ता की तरह धैर्य, साधना और तथ्य अन्वेषण करना। बख़्तियार खिलजी के आक्रमणकाल में अज्ञान को ज्ञान में रूपांतरित करते नालंदा के तीन विशाल पुस्तकालय खिलजी की सेना जला देती है। वे पुस्तकालय मात्र न थे, उसमें बुद्ध की 84 लाख शिक्षाओं का पाठ था। विद्यार्थी और गाथाएं और जीवंत गुरु शिष्य परंपरा। इन सभी पर भीषण कुठाराघात। शताब्दियों से अर्जित और विकसित ज्ञान स्रोतों का मर्सिया और उसकी पीड़ा। उपन्यास की कथा, सभ्यता की भी इतिहास कथा है। वीणा सिन्हा उस पीड़ा को गहरे तक अनुभव करतीं, उसकी तहों में जाने का उपक्रम करती हैं। एक लंबी रागदारी में रियाज़ करती हैं और यह रियाज़ इतिहास वस्तु के साथ उस तत्सम काल भाषा के लिए है, जो समकालीन उपन्यास लेखन में अनुपस्थित है।
वस्तुतः यह साधना से जन्मा उपन्यास लगता है। इसमें सहस्राब्दियों की चेतना के स्फुल्लिंग है, इसमें फ्लैशबैक की सिनेमैटिक टेक्नीक में अतीत की इमेज साजी है। दृश्य दर दृश्य मूल कथा के भीतर अन्य काल कथाएँ, जो यात्रा वृत्तांत के शिल्प में है, कथानायक की लंबी यात्रा, यात्रा के पड़ाव, पड़ाव के आख्यानों से बुना यह उपन्यास कारीगरी भी है और कारनामा भी। शिक्षा के मौलिक अधिकार, विद्यार्थियों के जीवन प्रश्नों को यह उपन्यास जिस तरह से सामने रखता है, वह आज की शिक्षा व्यवस्था में एकरेखीय सेंधमारी से भी परोक्ष रूप से जोड़ता है। जो शिक्षा महान किताबों की वजह से है, उसे हटाना एक दूसरे अर्थ में जलाना भी है। पढ़ने लिखने के अधिकारों को लेकर भी यह किताब प्रश्नाकुल है।
किताब में स्त्री जीवन को लेकर गहरा विचार विमर्श है। उनकी स्वायत्तता के गंभीर मुद्दे भी लक्षित किये गये हैं। सामान्य जन के समाज के यथार्थ चित्रों में तत्कालीन समय के संघर्ष है। उनके दैन्य पर उपन्यासकार की गहरी निगाह है, जो उपन्यास के बड़े कैनवास को संभालने का सूचक है। इस धार्मिक राजनीति से आज हम व्यथित हैरान और दिग्भ्रमित है, यह उपन्यास उसके बीज तत्कालीन संघ और संगठन में देखता है। धर्म-केंद्रित अतीत की राजनीति का दूसरे अर्थ में आज से जुड़कर एक संदर्भ संकेत बनता है। ऐसी राजनीति मनुष्यता और लोकतंत्र के ख़िलाफ़ है। उपन्यासकार का यह एक प्रासंगिक मंतव्य है।
अनित्य के प्रति अंधभक्ति को लेकर इसमें चेतावनी के स्वर है। शाश्वतता की अवधारणा के प्रति ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में चिंतन है। अवधारणा अंतिम सत्य नहीं होती, इसके बारे में उपन्यास में अभिमत है।
तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों में, पतनशील हालात में मनुष्यता को बचाये रखने का संघर्ष उपन्यास का मुख्य स्वर बनता जाता है। यह बात कथानायक माधव के यात्रा वृत्तांत में अंतः विन्यस्त है। उपन्यास के काल के अनुरूप भाषा के अर्जन पर वीणा ने जो परिश्रम किया है, वह साधना की तरह है। एक सुदीर्घ कालखंड के इतिहास के गलियारों से गुज़रते हुए तत्सम की शब्द संपदा को वीणा ने आश्चर्य की तरह संभव किया है। इसमें बुद्ध और शंकराचार्य के काल की भाषाओं की छवियाँ हैं। साधारण नागरिक से शिक्षित समुदाय तक भाषा के दो उदाहरण आस्वाद के लिए प्रस्तुत है–
- “केश राशि जिसके वलय व सुगंध में सप्त द्वीपों के मरुथल निवासरत हैं”
- “नीति यही कहती है कि देश, काल, अवसर व परिस्थिति को देखकर वही निर्णय लेना चाहिए जिसके परिणाम सबके लिए हितकारी हों”
- “मैं कृषकाय हूँ/वृद्ध हूँ/चलता हूँ झुककर/ कितना ही ऊँचा क्यों न हो पर्वत/चढ़ने में मैं सिद्ध हूँ”
ये कुछ उदाहरण हैं जहाँ तत्सम भाषा किसी तरह का व्यवधान पैदा नहीं करती। वह प्रवाहमय है और कथा संप्रेषण में सहज और गरिमायुक्त है। एक और कथन–
- “इस धारा का जल ग्रहण न करें। कुछ दिनों पूर्व इसमें कुछ शव बहकर आये थे। संभवतः ऊपर की ओर महामारी फैल रही है।”
महामारी हमने कोरोना के रूप में देखी है, तो परोक्ष रूप से इतिहास और वर्तमान का एक सिरा भी उपन्यास जोड़ता है। एक संकेतधर्मी शेर, शायर हैं, भोपाल के भवेश दिलशाद-
उधर भी आग लगी है इधर भी आग लगी
जलीं वो मंज़िलें, ये रहगुज़र भी आग लगी
आग कितनी त्रासद होती है, यह किताब हमें बताती है।

लीलाधर मंडलोई
प्रख्यात साहित्यकार और आलोचक लीलाधर मंडलोई दूरदर्शन और आकाशवाणी के महानिदेशक रह चुके हैं। प्रसार भारती बोर्ड के भी सदस्य भी रह चुके हैं। साथ ही, उन्होंने साहित्य की अनेक विधाओं में अनुपम कृतियों का सृजन किया है। आत्मकथा भी लिख चुके हैं और राष्ट्रीय/अंतरराष्ट्रीय स्तर के साहित्यिक आयोजनों के सूत्रधार के रूप में भी सक्रिय हैं।
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बधाइयां….यह एक महत्वपूर्ण शोधपरक उपन्यास है।