
- June 28, 2025
- आब-ओ-हवा
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मर्सिया: ग़म की शायरी, मातम का शे’र
हर ज़बान का दर्द से अपना रिश्ता रहता है। और उसी रिश्ते के हवाले से वह ज़बान एक और ज़बान बुनती है, जिसे सिर्फ़ वो समझते हैं जो उस दर्द से वाक़िफ़ हैं। मर्सिया ऐसी ही एक ज़बान है, अरबी और उर्दू में आँसुओं की शायरी, जो ग़म को कभी इबादत की शक्ल देती है, तो कभी प्रेरणा देती है, और कभी हौसले को आवाज़ देती है।
मर्सिया शोकगीत है, जिसे किसी अज़ीज़ की मौत पर या किसी दर्दनाक हादसे की याद में पढ़ा जाता है। इस्लामी परंपरा में इसकी ख़ास अहमियत है, ख़ासकर मुहर्रम के महीने में, जब कर्बला की ज़मीन पर इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत को याद किया जाता है।
इस्लामी तारीख़ बताती है कि सन् 680 में पैग़ंबर मुहम्मद के छोटे पोते हुसैन बिन अली इराक़ के कर्बला मैदान में शहीद कर दिये गये थे। पैग़ंबर के वंश के इस सदस्य की अपने परिवार और अनुयायियों के साथ शहादत साढ़े तेरह सौ साल बाद भी ख़ासकर शिया सांस्कृतिक हलक़ों में उनके वुजूद के लिए एक बेहद अहम घटना की तरह है, जिसमें वो हिस्सा लेते हैं। कर्बला की घटना ने इस्लामी इतिहास के फैलाव, इबादत के तरीक़ों, उसके सौंदर्यशास्त्र, उसके रहस्यवाद और बाद के सुधार आंदोलनों पर अमिट छाप छोड़ी है। हिंदुस्तान में मर्सिया शिया पहचान को मज़बूत करने का भी काम करता है, जो हिंदुस्तानी मुसलमानों में अल्पसंख्यक हैं।
मरसिया लफ़्ज़ अरबी के रिसा से आया है, यानी जो दुनिया से चले गये हैं उनकी तारीफ़ और उस पर शोक जताना। इसे हिंदुस्तान में सोज़ख़्वानी की शक्ल दी गयी। फ़ारसी में “सोज़” का मतलब है दिल को चीर देने वाला विलाप और “सोज़ख़्वानी” वो रीत है, जिसमें इसे दर्द भरे सुरों में गाया जाता है।

शायद वैसे न सुना जाता हो पर जब मरसिया पढ़ा जाता है, तो पुरुष खुलेआम रोते हैं। शोकपूर्ण पंक्तियों में पढ़ी और गायी जा रही कहानी उन घटनाओं को सैकड़ों साल बाद फिर से ज़िंदा कर देती है। जब मर्सिये पढ़े जाते हैं, तो महफ़िलों में बस सन्नाटा गूँजता है या सिसकियाँ। चूँकि ये अशआर सिर्फ़ पढ़े नहीं जाते, बल्कि जिये जाते हैं, तो शायद इसीलिए इसे परफॉर्मेंस आर्ट भी माना गया है। इस कला में गायक, शायर और श्रोता, तीनों का दर्द बस एकमएक हो जाता है।
उर्दू शायरी में कर्बला प्रतीक है सच और झूठ के बीच टकराव का, ज़ालिम के सामने सर न झुकाने की ज़िद का, और सदियों से बह रहे आँसुओं का। मर्सिया-निगारों ने इस वाक़ये को महज़ इतिहास नहीं रहने दिया, उन्होंने इसे बेइंतेहा ज़ुल्म के ख़िलाफ़ इंसाफ़ की जंग की दास्तान में पेश किया और इस घटना को गहराई भी दी और विस्तार भी।
मीर अनीस का लिखा और ज़ेड.ए. बोख़ारी का पढ़ा गया मर्सिया इस परंपरा का एक बेहतरीन नमूना है। मीर बाबर अली अनीस वह शायर हैं, जिन्होंने मर्सिया में इतना दर्द और ऐसा सौंदर्य भरा था कि मर्सिया सिर्फ़ मज़हब का नहीं, कलात्मक संवेदना का प्रतीक बन गया। मसलन:
जब रन में सर बुलंद अली का अलम हुआ
फ़ौज-ए-ख़ुदा पे साया-ए-अब्र-ए-करम हुआ
चर्ख़ ज़बर जदी पे तस्लीम ख़म हुआ
पंजे पे सात बार तसद्दुक़ हशम हुआ
देखा न था कभी जो अलम इस नमूद का
दोनों तरफ़ की फौज में ग़ुल था दरूद का
मीर अनीस के लिखे मर्सिये को नूरजहाँ जैसी गायिका ने भी अपनी आवाज़ में ढाला, जिससे इसकी पहुँच और बढ़ गयी।
मीर अनीस के दौर में उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी कहे जाने वाले मिर्ज़ा दबीर भी लखनऊ में थे। उनके मर्सिये पर फ़ारसी का असर ज़्यादा था और वे अपने शिल्प, शौर्य और जज़्बाती असर के लिए जाने जाते हैं। उनके एक मर्सिये के कुछ अशआर हैं:
किस शेर की आमद है कि रन काँप रहा है
रुस्तम का जिगर ज़ेर-ए-कफ़न काँप रहा है
हर क़स्र-ए-सलातीन-ए-ज़मन काँप रहा है
सब एक तरफ़ चर्ख़-ए-कुहन काँप रहा है
शमशीर-बकफ़ देख के हैदर के पिसर को
जिब्रील लरज़ते हैं समेटे हुए पर को
20वीं सदी में मर्सियानिगारी को कई बड़े शायरों ने आज़माया। प्रगतिशील लेखक संघ और उसके ‘इन्क़िलाब’ के नज़रिये से प्रेरित शायर जोश मलीहाबादी ने भी मर्सिया लिखने की कोशिश की। उनका मशहूर मर्सिया ‘हुसैन और इन्क़िलाब’ का एक बंद है:
तेरा परचम अलम ओ छतर ओ असा पर भारी
एक-एक हर्फ़ तेरा अर्ज़-ओ-समा पर भारी
तेरा एक इश्वा दो-आलम की अदा पर भारी
रौशनाई तेरी ख़ून-ए-शुहदा पर भारी
जिसमें अंसर है अबद का वो हुनर है तुझमें
दौलत-ए-उम्र-ए-मसीहा ओ ख़िज़्र है तुझमें
साहित्य के इतिहासकार मानते हैं कि मर्सिया इस्लाम के आने से भी पहले (दौर-ए-जाहिलिया) में भी लिखा जाता था और उस समय कई शायर रिसा लिखा करते थे। कुछ इतिहासकारों के मुताबिक़ ईरान में इसे लिखने और गाने की परंपरा पहले से थी। सोग़-ए-सियाहवाशान और मर्ग-ए-ज़रीर और कुछ और ऐसी रचनाएँ आज भी पुराने फ़ारसी साहित्य की धरोहर हैं।
जब मर्सिया फ़ारसी और अरबी से गुज़रता हुआ हिंदुस्तान पहुँचा, तो यह पूरी तरह बदल गया। 16वीं सदी में दक़न की बोलियों में इसका पुनर्जन्म हुआ। माना जाता है उर्दू में मर्सिये की शुरूआत गोलकुंडा और बीजापुर की सल्तनतों में हुई, जो शिया रुजहान वाली थीं और ईरानी रवायत से काफ़ी क़रीब थीं। हालाँकि उर्दू में मर्सिया लिखने वाला पहला शायर कौन था, इस पर एकराय नहीं है। इन सल्तनतों के दौरान मर्सिया की शैली, विषय और रूप में काफ़ी बदलाव हुए। दक़नी मर्सिये ग़ज़ल की शैली में लिखे जाते थे और उन्हें मुहर्रम और दूसरे धार्मिक अवसरों पर नौहा की तरह पढ़ा जाता था। ये मर्सिये या तो दो मिसरों वाले क़सीदों की शक़्ल में होते थे या चार मिसरों वाले मुकर्रबा के बतौर। इसमें किसी ख़ास बहर को प्राथमिकता नहीं दी जाती थी।
18वीं सदी तक आते-आते यह और ज़्यादा परिष्कृत संगीतमय शैली सोज़ख़्वानी में बदलने लगा था। अब मर्सिया अवध यानी लखनऊ पहुँचा और वहाँ अपनी पूरी रौनक़ के साथ उभरा। यहाँ के नवाबों में इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों के लिए बेहद श्रद्धा थी जिसने मरसिया को वहाँ पाल-पोसकर बड़ा किया। शायरों ने इसे दीनी फ़र्ज़ और सवाब का काम माना कि वे इमाम हुसैन की शहादत का ज़िक्र करें। अवध के कई संगीतकारों ने लयबद्ध ढंग से मर्सिये पढ़ने की परंपरा शुरू की।

आज हम जिस मर्सिया को जानते हैं, जिसमें विषय की सुंदरता, ‘मुसद्दस’ (छह मिसरों की बहर) का ख़ास इस्तेमाल और एक कहानी होती है, वह 19वीं सदी के लखनऊ से शुरू हुआ था। इसमें चार पंक्तियाँ एक ही तुकांत में होती थीं और उसके बाद की दो पंक्तियाँ अलग तुकांत में। हर मर्सिये में नीचे लिखी गयी बातों में से कुछ या सभी चीज़ें पायी जाती हैं, जिनका इस्तेमाल शायर अपने हिसाब से करते रहे हैं-
- चेहरा – भूमिका या स्तुति, जिसमें अल्लाह, पैग़ंबर, अली, हुसैन की प्रशंसा होती है
- माजरा – वह घटना जिससे नायक का परिचय कराया जाता है
- सरापा – नायक के शारीरिक और आध्यात्मिक गुणों का लंबा बयान
- रुख़्सत – नायक का लड़ाई के मैदान यानी कर्बला के लिए जाना
- रजज़ – नायक की ओर से अपने कुलीन वंश और निजी गुणों का ऐलान
- जंग – कर्बला की जंग का विवरण
- शहादत – लड़ाई के मैदान में नायक की लड़ते हुए मौत
- बैन – शोक और विलाप
- दुआ – शायर की ओर से दुआ
लखनऊ में पनपी इस मर्सिया शैली में कई दूसरी नयी चीज़ें भी हुईं, जैसे इसे राग, ध्रुपद, ताल और सुर के साथ पेश किया जाने लगा। मसलन मीर अनीस का एक मर्सिया देखिए:
ग़ुल था ज़हे-हुसैन की शौक़त ज़हे-वक़ार
गोया खड़े हैं जंग को महबूब-ए-किर्दगार
रुख़ से अयाँ है दबदबा-ए-शाह-ए-ज़ुल्फ़िक़ार
है नूर-ए-हक़ जबीन-ए-मुनव्वर से आश्कार
क्यूँकर छुपे न माह-ए-दो-हफ़्ता हिजाब से
चौदा तबक़ में नूर है उस आफ़ताब से
मर्सिया मारवाड़ी, पंजाबी और पूर्वी बोलियों में भी पहुँचा। इन भाषाओं और बोलियों में भारतीय परंपराओं के कई नये तत्व इसमें शामिल हो गये जैसे कि भाषा, धार्मिक प्रतीक और कल्पनात्मक चित्र।
ग़म की शायरी सिर्फ़ इस्लाम तक सीमित नहीं है। अंग्रेज़ी साहित्य में ‘एलेजी’ उसी दर्द की दूसरी ज़बान है और ये तब बोली जाती है जब किसी अपने का साथ छूट जाये या कोई हादसा दिल पर गहरा घाव दे जाये। शोक और उदासी ही उसकी थीम होती है। एलेजी भी संगीत बन सकती है, दुख की धुन में डूबी हुई।
एक और काम की बात, कर्बला से केवल मर्सिया ही जनम नहीं लेता और केवल मुसलमान ही उससे प्रेरणा हासिल नहीं करते। हिंदुस्तान पहुँचने से लेकर अब तक कर्बला की कहानी ने न जाने कितने साहित्यकारों पर असर डाला है चाहे वह प्रेमचंद हों, जिनके तीन नाटकों में से एक का नाम है ‘कर्बला’, या गाँधी जिन्होंने कहा था, “अगर मेरे पास हुसैन जैसे 72 साथी होते, तो मैं 24 घंटे में हिंदुस्तान को आज़ाद करा देता।”
संदर्भ/स्रोत —
1- हुसैनी, एस. (2016) मर्सिया: एलेजी टू एपिक, आथरप्रेस
2- मैथ्यूज़ डी, (1994) द बैटल आफ़ कर्बला: अ मर्सिया आफ़ अनीस
3- हैदर एस.ए. (2006) रीलिविंग कर्बला: मार्टायरडम इन साउथ एशियन मेमरी
4- नईम, सी.एम. (2004) उर्दू टेक्स्ट्स एंड कॉंटेक्स्ट्स: द सेलेक्टेड एसेज़
5- त्रिवेदी, एम. (2010) द मेकिंग आफ़ द अवध कल्चर, इंडिया:प्रीमियम बुक्स
6- दोनों तस्वीरें : (बैटल आफ़ कर्बला) ब्रुकलिन म्यूज़ियम और (मर्सियाख़्वानी की पेंटिंग) c-karbala.com से साभार

अजय शर्मा
पत्रकारिता में दो दशक से अधिक का अनुभव। इतिहास विषयक एवं अछूते विषयों को लेकर शोध की ओर गहरा रुजहान रखने वाले अजय इन दिनों स्वतंत्र रूप से लेखन एवं शोध कर रहे हैं। शोध आधारित आपकी कुछ पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं।
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बहुत शानदार लिखा है।