
क्या हैं नवगीत और कैसे?
नवगीतों का रंग-रूप और चाल-चरित्र क्या होता है? इस विषय पर नवगीतकार ख़ुद क्या महसूस करते हैं! भोपाल में 5 फरवरी को नवगीत केंद्रित एक आयोजन में युवा कवि चित्रांश ने रचना पढ़ी, जिसमें ‘नवगीत’ का रूप जी उठा। इस आयोजन के बाद वरिष्ठ कवि डॉ. आचार्य ने सोशल मीडिया पर नवगीत को समझाता नवगीत पोस्ट किया। चर्चित कवि मनोज जैन ‘मधुर’ ने हाल ही ऐसा नवगीत रचा और इसी संदर्भ में शिवानंद सहयोगी का भी एक गीत यादों के गलियारों से गूंज उठा। आब-ओ-हवा की पेशकश (चित्र : अनिता मंडा), इन रचनाओं को एक साथ गुनिए, गुनगुनाइए और नवगीतों की धड़कन ज़रा महसूस कीजिए…

नवगीत पर 4 नवगीत
1. बतियाते नवगीत
-चित्रांश वाघमारे, भोपाल
जहाँ कहीं भी हों जीवन से
दूर नहीं जाते नवगीत
बोलचाल की भाषा में ही
हमसे बतियाते नवगीत
मन को कोमलता से छूकर
ठोस भाव भी तरल कर दिये
नये समय के गीतों ने तो
वेदमंत्र भी सरल कर दिये
कई कई उलझनें समय की
ऐसे सुलझाते नवगीत
जग का सत्य बता जाते हैं
आमफ़हम बोली बानी में
कौन यहाँ कितना ऊपर है
कौन यहाँ कितने पानी में
सच जितना झुठलाया जाता
उतना दोहराते नवगीत
भरी भीड़ से बातें करते
लोकजगत की जीवन की
किसी अकेले कोने में वे
तुरपाई करते मन की
गुरु सखा या बंधु सहोदर
सब कुछ बन जाते नवगीत
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2. कथ्य महुआ चू रहा है
-शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’, वाराणसी
चल रहीं हैं
संग अब
नवगीत की परछाइयाँ।
गूँजती हैं
हृद पटल पर
साधना की स्वर लहरियाँ
थिरकतीं हैं
आँसुओं की
पीर की अनगिन बदलियाँ
सज रहीं हैं
मुक्तछांदस
सिंधु की गहराइयाँ।
व्यंजना की
टोलियों की
लक्षणा की धुन कलरवी
मंत्रणा के
भाव उतरे
बिंब बिंदासी अजनवी
उग रहीं हैं
सेमली लय श्रिया
की अमराइयाँ।
टेक का
संगीत वंदित
ध्यान का तन छू रहा है
शब्द की
डोली उठाए
कथ्य महुआ चू रहा है
बज रहीं हैं
अंतरों के
द्वार पर शहनाइयाँ।
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3. नवगीत में मानवता
-मनोज जैन ‘मधुर’, भोपाल
नवगीतों में क्या होता?
मानवता होती है
मानवता जो जुड़ी हुई हो,
धरती के सुख से
बतियाती है जो मनुष्य के
भीतर के दुख से
कथ्य शिल्प में शब्द-शक्ति की
नवता होती है
नवगीतों में क्या होता?
मानवता होती है
युग के संवेदन को लय में
खुलकर कहते हैं
नहीं गीत से विलग गीत की
लय में रहते हैं
भाव बोध में अभिनव सघन
प्रवणता होती है
नवगीतों में क्या होता?
मानवता होती है
परम्परा से सम्पोषित हो
मङ्गल हो जाते
नयी सोच के बीज हृदय में
गहरे बो जाते
परिधि, केंद्र, त्रिज्या व्यास में,
ममता होती है
नवगीतों में क्या होता?
मानवता होती है।
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4. नवयुग का नवगीत
-डॉ. रामवल्लभ आचार्य, भोपाल
कथ्य शिल्प भाषा नवीन है
नवल व्याकरण है
नव युग का नवगीत
गीत का नया संस्करण है
गीत कभी आल्हा अरिल्ल था
कभी गीत था दोहा,
कभी कवित्त सवैया बनकर
जन जन का मन मोहा,
कवि ने चौपाई गाई या
‘पद’ का किया वरण है
नवयुग का नवगीत
गीत का नया संस्करण है
इसने कल्पित उपमानों का,
कभी आवरण पहना,
या माधुर्य प्रसाद ओज का
धरा कंठ पर गहना
क्या आश्चर्य गात पर इसके
नया आभरण है
नवयुग का नवगीत
गीत का नया संस्करण है
संस्कृति और सभ्यता
हर युग में परिवर्तित होती,
नया रूप धरती पीढ़ी
पहचान पुरानी खोती,
नये शब्द, नव बोली वाणी
नया आचरण है
नवयुग का नवगीत
गीत का नया संस्करण है
रागात्मकता का बोलो कब
इसने दामन छोड़ा,
छंद और लय से भी इसने
नहीं कभी मुँह मोड़ा,
करुणा ही है उत्स,
लोक की पीड़ा का दर्पण है
नवयुग का नवगीत
गीत का नया संस्करण है
जिनको दिखती नहीं वेदना
पीड़ित शोषित जन की,
करते मृदुल कल्पना
मंजुल तन के आलिंगन की,
कोई उन्हें बताये जीवन
कुरुक्षेत्र का रण है
नवयुग का नवगीत
गीत का नया संस्करण है
जाने समझे बिना दोष
जो इस पर मिथ्या मढ़ते,
काश कभी नवगीत समझते
गाकर इसको पढ़ते,
रखते द्वेष ओढ़ कुंठा का
कुटिल आवरण है
नवयुग का नवगीत
गीत का नया संस्करण है

“नवगीत अपनी संपूर्णता में साकार हो उठा।बेहतरीन प्रस्तुति।”
वरिष्ठ लेखक नमिता सिंह जी का कथन…