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विवेक रंजन श्रीवास्तव नवंबर से अमेरिका प्रवास पर हैं और अन्य देशों की यात्राओं पर भी जाने वाले हैं। इस दौरान वह रोज़ाना शब्दों को समय दे रहे हैं। आब-ओ-हवा पर विशेष रूप से इस वैचारिकी, नोट्स, अनुभव आदि इंदराज के लिए यह कोना।
दूर देस में लेखक-10...

अमेरिका: पार्किंग का चक्रव्यूह, भारत के लिए सीख

              अमेरिका को ‘पहियों पर चलने वाला देश’ कहा जाता है। यहां दो स्थानों की दूरी मील में कम कार से ट्रैवल के गूगल मैप टाइम से ज़्यादा बतलायी जाने का प्रचलन है। लेकिन कारों की बढ़ती संख्या के चलते आज यही पहिये पार्किंग के लिए जगह तलाशते-तलाशते थक रहे हैं। न्यूयॉर्क और न्यू जर्सी जैसे महानगरों में पार्किंग अब केवल सुविधा नहीं, बल्कि एक रणनीतिक चुनौती बन गयी है।

हाल ही न्यूयॉर्क में एक डॉक्टर के अपॉइंटमेंट के दौरान जब मुझे समय पर पार्किंग नहीं मिली, तो मजबूरी में कार ‘ट्रक पार्किंग’ ज़ोन में खड़ी करनी पड़ी। महज़ 10 मिनट के भीतर वापस आने पर $115 (करीब 9,500 रुपये) का फ़ाइन टिकट वाइपर पर चिपका मिला। यह घटना दर्शाती है यहाँ का प्रशासन और पुलिस व्यवस्था कितनी चाक-चौबंद है।

तकनीक और नियमों का सख़्त पहरा चौबीस घंटे बना रहता है। रात के वीराने में भी ख़ाली सड़क होते हुए भी लाल सिग्नल पर कारें खड़ी रहती हैं। पैदल चलने वाले को सड़क पर पहला अधिकार दिया जाता है। रोड क्रॉसिंग पर कार रोककर पैदल व्यक्ति को सड़क क्रॉस करने की प्राथमिकता मुस्कराकर देना शिष्टाचार है।

लिबर्टी स्टेट पार्क टहलने के लिए रोज़ ही जाता हूं, पाथ ट्रेन (लोकल) लेवल क्रॉसिंग पड़ती है, पर कोई बैरियर नहीं है, न ही कोई वॉचमैन, केवल स्वचालित लाइट के इशारे समझकर कार, पैदल, साइकिलिंग करने वाले सभी रुक जाते हैं। मेरे साथ तो एक बार अद्भुत घटना हुई… जब मैं पत्नी के संग रुका हुआ था कि ट्रेन गुज़र जाये तब ट्रैक क्रॉस करूं, पर ट्रेन ड्राइवर ने इशारा किया कि मैं निकल जाऊं, और उसने पल भर के लिए रोकी गयी ट्रेन और कुछ क्षण रोके रखी।

कुल मिलाकर यहाँ सड़क पर कोई कभी भी हड़बड़ी में कार नहीं चलाता। यहां अत्याधुनिक तकनीक और कड़े नियमों का एक बड़ा नेटवर्क परिवहन व्यवस्था बनाये हुए है। पुलिस की मौजूदगी हर जगह भौतिक रूप से भले न दिखे, लेकिन तकनीक की नज़र हर वाहन पर है। ‘रडार आधारित स्पीड लिमिट’ के कारण आपकी गति सीमा का उल्लंघन तुरंत दर्ज हो जाता है।

  • EZ Pass और स्मार्ट टोल: टोल प्लाज़ा पर लंबी कतारों के बजाय ‘EZ Pass’ जैसी RFID प्रणाली का उपयोग होता है, जिससे वाहन बिना रुके पूरी लगभग सौ की स्पीड से टोल पार कर लेते हैं।
  • HOV लेन (High Occupancy Vehicle): पर्यावरण और ट्रैफ़िक को ध्यान में रखते हुए, तीन या उससे अधिक यात्रियों वाली कारों के लिए अलग लेन आरक्षित होती है।
  • पार्किंग का डिजिटल समाधान: भारत के लिए यह नया व्यवसाय हो सकता है। अमेरिका में जहाँ जगह कम है, वहाँ पार्किंग समाधान ‘स्मार्ट’ हैं। अब न्यूयॉर्क और जर्सी में ParkMobile जैसे ‘मैन-लेस’ (Man-less) ऐप्स का बोलबाला है। आपको किसी पार्किंग अटेंडेंट की ज़रूरत नहीं, बस ऐप पर अपना ज़ोन नंबर डालें और भुगतान करें। यदि समय बढ़ता है, तो आप अपने फ़ोन से ही समयसीमा बढ़ा सकते हैं। इसके अलावा, शहरों में मल्टी-लेवल और रोबोटिक पार्किंग का जाल है, जो सीमित स्थान का अधिकतम उपयोग करते हैं। मॉल आदि में भी स्वयं ही पार्किंग पेमेंट और स्लिप स्कैन करनी होती है।

भारत और अमेरिका में लोगों की ड्राइविंग आदतों में एक बड़ा मौलिक अंतर अनुशासन का है। अमेरिका में अरबपति हो या सामान्य कर्मचारी, अधिकांश लोग स्वयं कार चलाते हैं। इसके विपरीत, भारत में अभी भी एक बड़ा वर्ग ड्राइवरों पर निर्भर है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि भारत में स्व अनुशासन की भारी कमी दिखती है। अनेक बार जिसे जहाँ मन आता है, वहीं कार खड़ी कर देता है। ‘नो पार्किंग’ के बोर्ड के नीचे ही गाड़ियाँ खड़ी करना हमारे यहाँ आम बात है, जिससे यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाती है। चालान बनाते पुलिस वाले से अपने किसी परिचित नेता या अधिकारी से फ़ोन पर बात करवाना जैसा कुछ यहां नहीं होता।

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अमेरिका में पार्किंग साइन बोर्ड्स (जैसा कि चित्र में दिख रहा है) पर सड़क की सफ़ाई के दिन, आपातकालीन निषेध और समय सीमा का स्पष्ट उल्लेख होता है, और वहाँ कोई भी “दो मिनट में आता हूँ” कहकर अवैध पार्किंग करने का जोखिम नहीं लेता, क्योंकि वहाँ का जुर्माना और टोइंग व्यवस्था बहुत कठोर है। सड़क किनारे फ़ायर ब्रिगेड के हाइड्रेंट्स लगे हुए हैं, उनके सम्मुख पार्किंग करना मतलब आ बैल मुझे मार जैसा है।

भारत के बढ़ते महानगरीय क्षेत्रों के लिए अमेरिका का यह सेल्फ़ पेमेंट ऐप पार्किंग मॉडल एक रोडमैप, रोज़गार की संभावना हो सकता है। यदि हम ‘फ़ास्टैग’ (FASTag) को ही पार्किंग के साथ एकीकृत (Integrate) कर दें, तो मॉल और अस्पतालों में पार्किंग कैशलेस हो सकती है। निजी ख़ाली प्लॉट या पार्किंग स्पेस को किराये पर देने वाले ऐप्स भारत के तंग इलाक़ों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकते हैं। यहाँ की तरह अतिरिक्त आय के साधन और पार्किंग सुविधा बन सकते हैं। तकनीक के साथ-साथ यदि हम भारतीयों में भी यह बोध आ जाये कि सड़क का उपयोग ‘अधिकार’ नहीं बल्कि ‘साझा ज़िम्मेदारी’ है, तो हमारे यातायात की सूरत बदल सकती है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

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