
इंद्रधनुष-8 : रुख़साना जबीन की शायरी
1955 में कश्मीर में जन्मी रुख़साना जबीन को समकालीन उर्दू अदब में ख़ास मुकाम हासिल है। कश्मीर में मुस्लिम महिला होते हुए उन्होंने शेरो-शायरी से लगाव रखा, हमेशा ग़ज़लें कहती रहीं, लेकिन इसके लिए उन्हें लंबा संघर्ष करना पड़ा। शिक्षा पूरी करने के बाद ऑल इंडिया रेडियो में बतौर प्रोग्राम एग्ज़ीक्यूटिव काम शुरू किया और तीन दशकों से अधिक सेवाएं दीं। करियर के अंतिम चरण में वे रेडियो कश्मीर, श्रीनगर की स्टेशन डायरेक्टर पद से सेवानिवृत्त हुईं। उर्दू, फ़ारसी और कश्मीरी तीनों भाषाओं में दक्ष रुख़साना जबीन फ़ारसी के महाकवि हाफ़िज़ शीराज़ी की कविताओं का उर्दू में छंदबद्ध अनुवाद कर चुकी हैं। सार्वजनिक संवाद, संस्कृति और भाषा से उनके लंबे जुड़ाव ने उनकी शायरी को गहराई दी है, उनकी ग़ज़लों में स्पष्टता, संतुलन और प्रभावी अभिव्यक्ति दिखती है। आब-ओ-हवा के पाठकों के लिए उनकी ग़ज़लों की यह ख़ास पेशकश – ग़ज़ाला तबस्सुम

रुख़साना जबीन की 7 ग़ज़लें
1
तमाम उम्र रहेगा अब इंतज़ार मुझे
गुज़िश्ता साल ने मुझसे लिया उधार मुझे
उतर चुकी हूँ मैं तेरे लहू के दरिया में
तू अपने जिस्म के साहिल पे अब पुकार मुझे
बुलंदियों के तक़ाज़े ही कुछ अजीब-से हैं
मेरी ज़मीं के सियाहगार में उतार मुझे
लहूलुहान करेगी ये सर से ता-ब-क़दम
ये रोज़-ओ-शब की मुसलसल बरसती धार मुझे
मैं कबसे वक़्त की दहलीज़ पर खड़ी गुम हूँ
बनाये कौन से लम्हे की यादगार मुझे
———*———
2
जश्न तेरे ख़्वाबों का मनाने वाली मैं
रात को अपने साथ जगाने वाली मैं
मेरे हक़ में तेरा एक इशारा हुक्म
दुनिया उंगली पे हूँ नचाने वाली मैं
दिन भर मुझसे नज़र चुराने वाला तू
आख़िर-ए-शब तेरे गीत गाने वाली मैं
हक़ जैसा हो उसे जताने वाले तुम
फ़र्ज़ कोई हो उसे निभाने वाली मैं
रात गये तक सदाएँ देने वाले तुम
सुब्ह से पहले कभी न आने वाली मैं
मेरी अना को अना न कहने वाले तुम
आईना ये तुम्हें दिखाने वाली मैं
———*———
3
मंज़िल हमारी एक थी चलना पड़ा मुझे
सूरज मेरा हरीफ़ था जलना पड़ा मुझे
ये मस्लहत-पसंदी सियासत का खेल है
अपना बयान ख़ुद ही बदलना पड़ा मुझे
तब जाकर मेरा रश्क-ए-सिकंदर पड़ा है नाम
ज़हर-ए-हयात-बख़्श निगलना पड़ा मुझे
फ़ौलाद देखने में हूँ हालाँकि बारहा
अंदर से मिस्ल-ए-शम्अ पिघलना पड़ा मुझे
होने को है तुलूअ कोई आफ़ताब-सा
एक सन-रसीदा रात-सी ढलना पड़ा मुझे
दिल था बज़िद कि कदूरतों से पाक हो दिमाग़
अपने ही आँसुओं में उबलना पड़ा मुझे
———*———
4
ये दर्द दर्द-ए-जिगर के सिवा कुछ और नहीं
इलाज इसका नज़र के सिवा कुछ और नहीं
कहीं खड़ा है कोई हाथ में लिये ख़ंजर
तुम्हारा डर है ये डर के सिवा कुछ और नहीं
हमारी भूल कि समझे थे मंज़िल मक़सूद
हयात राहगुज़र के सिवा कुछ और नहीं
नज़र-नवाज़ नज़ारों की बात क्या करना
कि ये फ़रेब-ए-नज़र के सिवा कुछ और नहीं
कटा तो सकते हैं उसको मगर झुका नहीं सकते
तमाम जिस्म में सर के सिवा कुछ और नहीं
तुम्हारी झोली में सब कुछ है एक घर के सिवा
हमारे पास तो घर के सिवा कुछ और नहीं
———*———
5
हमारी बात कहाँ नुक्ता-दाँ समझते हैं
नहीं कहें तो उसे भी वो हाँ समझते हैं
जुनूँ की बात सही ख़ामोशी से डरती हूँ
कि वो भी मेरी तरह ये ज़बाँ समझते हैं
हमारी सोचों में जो फ़र्क है सो इतना है
हयात को वो हवा हम धुआँ समझते हैं
तमाम लोग खड़े जाँ हथेलियों पे लिये
लहू के बहने को हैं नदियाँ समझते हैं
न जाने अब भी हैं ज़िंदा वो बौला-हवस कितने
जो ज़ालिमों को बड़ा मेहरबाँ समझते हैं
भरम है सदियों का पल भर में टूटने वाला
ये बात वक़्त के सब हुक्मराँ समझते हैं
ये इश्तिहार है अब अपने नाम लिखवाएँ
दियार-ए-ख़्वाब को जो बे-अमाँ समझते हैं
गुलाब महके हुए हैं हमारे हाथों में
वो बदगुमानी में संग-ओ-सनाँ समझते हैं
ख़ुलूस-ओ-सादा-दिली की इनायतें हैं सब
अकेले शख़्स को ही कारवाँ समझते हैं
———*———
6
हमारे ख़्वाब अजब कहकशाँ बनाते हैं
ज़मीं को तारों भरा आसमाँ बनाते हैं
सलीस-ओ-सादा इबारत है ज़िंदगी की मियाँ
मगर सवाल उसे इम्तिहाँ बनाते हैं
मैं भूल जाती हूँ उनकी कहानियाँ कितनी
ज़रा-सी बात को वो दास्ताँ बनाते हैं
हमें तो सौंप गये हैं वो ऐसे छू-मंतर
ज़मीं शोर को जो गुलिस्ताँ बनाते हैं
वो जब भी खींचते हैं कैनवस पे तस्वीरें
चराग़ आगे तो पीछे धुआँ बनाते हैं
नयी रुतों में परिंदे नयी उमंग के साथ
नये शजर पे नया आशियाँ बनाते हैं
है दीदनी ये अक़ीदत ये इश्क़ ये इख़्लास
जबीन के वास्ते एक आस्ताँ बनाते हैं
———*———

7
ये क्या सवाल है वो क्यों सफ़र में रहता है
किसी के इश्क़ का सौदा जो सर में रहता है
खुली हों आँखें मेरी या उन्हें मैं बंद रखूँ
बस एक चेहरा हमेशा नज़र में रहता है
कभी जो लब पे खिला रहता था तबस्सुम-सा
वो ख़्वाब अब के मेरी चश्म-ए-तर में रहता है
अजीब सानिहा गुज़रा है इस बरस ऐ दोस्त
कि मेरा साया किसी और घर में रहता है
ये सोचने की भी मोहलत नहीं मिली हमको
कि लग़ज़िशों का भी इम्काँ बशर में रहता है
बुलंदियों के सफ़र में ये राज़ मुझ पे खुला
कि आसमान मेरे बाल-ओ-पर में रहता है
मुझे यक़ीन है कि यूँ ही नहीं गुमाँ गुज़रा
कोई तो ऐब भी दस्त-ए-हुनर में रहता है

Congratulations
God has blessed you with an art off pen down your feelings so beautifully.May you keep on inspiring many others.
A big fan of you always
बहुत उम्दा