
- February 28, 2026
- आब-ओ-हवा
- 2
पाक्षिक ब्लॉग रति सक्सेना की कलम से....
कविता, कला, प्रकृति... नॉर्वे का स्त्वांगर
आसमान विशाल है, हम पढ़ते-सुनते हैं। आसमान विशाल है, हम कभी-कभार ऊपर झाँक लेते हैं। धुएँ-धक्कड़ और इमारतों के बीच से हमारा आसमान उतना ही विशाल होता है, जितना कि हम देख पाते हैं। मैं नोर्वे के स्त्वांगर ज़िले में आसमान देख रही हूँ। मई का महीना है, मेरा देश जल रहा है, लेकिन यह प्रान्त ठंड की खुनक लिए खिल रहा है। मैं नॉर्वे की कवयित्री ओदवे क्लीवे के घर आयी हूँ। इटली के काव्योत्सव में कवि, फ़िल्मकार ओदवे और विएना के कवि पीटर ने मुझे अपने देश आने का आमंत्रण दिया था। यूरोप भ्रमण नॉर्वे से शुरू करने का विचार किया, क्योंकि वहां से वीसा मिलना आसान था। बस इतना कहूँगी कि ख़ूब पापड़ बेलने पड़े, कारण बस यही था कि मैं कवि के रूप में वीसा लेना चाहती थी।
अकेले भ्रमण की इच्छा मन में हमेशा रही, वैसे भी अकेले कहां, हर जगह कोई न कोई होस्ट है। त्रिवेन्द्रम से मुम्बई की फ़्लाइट दिन की थी और मैं मुम्बई दिन के 3 बजे तक पहुँच गयी थी। रात तक इंतज़ार करने के लिए अन्तरराष्ट्रीय विश्रामालय में गयी, जहाँ बैठने के लिए फ़ीस देनी पड़ी। मैंने एक विदेशी लड़की को अकेला बैठे देखा तो उसके पास जाकर बैठ गयी, ताकि सामान छोड़कर जाना हो तो सुविधा हो। धीरे-धीरे हम अलग-अलग देशों की पाँच-छह महिलाएँ इकट्ठी हो गयीं। हम सब उसी तरह से गप्पे लगाने लगीं, जैसे कि क़स्बे-मुहल्ले की लड़कियाँ-औरतें लगाती हैं।
हममें से एक लड़की केवल सत्रह बरस की थी और वह दुनिया घूम चुकी थी। भारत में भी क़रीब छह महीने से थी, और काफ़ी कुछ जानती थी। एक अन्य लड़की पांडिचेरि में भारतीय संगीत पर तुलनात्मक अध्ययन कर रही थी। मैं उन्हें देखकर अचंभित थी, हम लोग अपनी ज़िन्दगी किस तरह यूँ ही गँवा देते हैं, अपने क़स्बे के बारे में भी नहीं जान पाते और ये लड़कियाँ कितना कुछ जानती हैं।
रात के 2 बजे फ़्लाइट थी, मैं रात के बारह बजे प्रमुख अड्डे पर आयी, बेहद भीड़ थी। जब मैं सामान के लिए काउंटर पर पहुँची तो मुझसे पूछा गया कि मैं किसलिए जा रही हूँ। मैंने देखा कि मेरे साथ खड़े अन्य किसी दूसरे से कुछ नहीं पूछा गया था। मैंने कहा काव्योत्सव में भाग लेने जा रही हूँ, तो वह कहने लगा कि इनविटेशन दिखाइए। इमिग्रेशन काउंटर पर इनविटेशन लेटर के लिए पूछा गया। मैंने उसके साथ उस अख़बार की प्रतिलिपि भी दे दी जिसमें नॉर्वे के अख़बार में मेरा नाम भारत से आने वाले कवियों में लिखा हुआ था। इन झंझटों से छूटकर हवाई जहाज़ में बैठने का इंतज़ार करने पर एक बार यात्रा शुरू हुई, तो चिन्ता कुछ कम हुई। फ़्रैंकफ़र्ट, जर्मनी में हवाई जहाज़ बदलना था। यहाँ कुछ वक़्त का इंतज़ार था। इन देशों में कठोर सुरक्षा प्रणाली से तो गुज़रना पड़ा, लेकिन किसी ने मेरी कविता पाठ में भाग लेने वाली बात पर सवाल नहीं किये।
स्त्वांगर एयरपोर्ट पर ओदवे लेने आयी थीं, उन्होंने एक दीवार दिखायी, जहां उनकी कविता पेंट की गयी थी। कवि को इतना सम्मान, मुझे बहुत अच्छा लगा। खाने के बाद ओदवे हमें घुमाने ले चलती हैं। हम शहर का चक्कर लगाते हुए, इन्टरनेशनल हाउस के डायरेक्टर पीटर से मिलने जाते हैं। पीटर राष्ट्रीय दिवस के दिन अन्तरराष्ट्रीय सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन करने वाले हैं, मुझे उसी में भाग लेने का मौक़ा मिला है। विशालकाय पीटर स्त्वांगर में एक ऐसी संस्था चला रहे हैं, जो धर्म और जाति से ऊपर उठकर साहित्य और संस्कृति के लिए काम कर रही है। उनका इन्टरनेशनल हाउस काफी बड़ा और सुन्दर है, जहां ऑफिस के अतिरिक्त कैफ़े, रीडिंग रूम, विश्रामालय आदि स्थित हैं।
नॉर्वे में सरकारी अनुदान पर्याप्त मिलता है, सरकार की संस्कृति के प्रति रुचि भी है, लेकिन उसका लाभ उठाने के लिए भी कर्मठता की ज़रूरत है। उनकी इस संस्था में अनेक देशों के लोग काम कर रहे हैं, जैसे कि सैक्रेटरी कोरियन हैं, उपाध्यक्ष श्रीलंका के हैं, अन्य सहयोगी पाकिस्तान के हैं। वे सब धड़ल्ले से नोर्वेजियन भाषा बोलते हैं। पीटर बता रहे हैं उन्होंने एक कमरे में यह संस्था शुरू की थी, आज यह स्त्वांगर की सबसे बड़ी सांस्कृतिक संस्था है। 17 मई को नॉर्वे में राष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है। इस दिन सभी लोग पारम्परिक वेषभूषा पहनकर सड़कों पर जुलूस निकालते हैं, विभिन्न स्थानों पर कार्यक्रम होते हैं।
नॉर्वे ईसाई धर्म को मानने वाला देश है। यहाँ सामी भाषाई आदिवासी समाज का निवास था। भूगर्भ शास्त्रियों के अनुसार यहाँ ईसा से दस हज़ार वर्ष पहले तक मनुष्य के निवास के चिह्न मिलते हैं। यह इलाक़ा काफ़ी वक़्त तक डेनमार्क और स्वीडन के राजतंत्र का हिस्सा रहा। स्वीडन से जुड़े होने पर भी नॉर्वे ने 1905 में स्वायत्तता प्राप्त की, और डेनिश के राजा को नॉर्वे में राजतंत्र संभालने को आमंत्रित किया। इस प्रकार नॉर्वे का स्वतंत्र शासन आरम्भ हुआ। किन्तु 9 अप्रैल 1940 में नॉर्वे पर अप्रत्याशित रूप से जर्मनी के नाज़ियों का आक्रमण हुआ, जिसका नॉर्वेवासियों ने बड़ी बहादुरी से सामना किया। दूसरे विश्वयुद्ध के उपरान्त नॉर्वे का बड़ी तेज़ी से विकास हुआ, विशेष रूप से 1970 में तेल निकलने के उपरान्त।
यूरोपियन देशों में नगरपालिका शहर की सबसे बड़ी सत्ता होती है। स्त्वांगर रोगालैण्ड देश के अंतर्गत आता है। भारत की ही तरह नॉर्वे में विभिन्न राज्य हैं, और वे अपनी स्वायत्त सत्ता रखते हैं। इन्टरनेशनल हाउस से लौटते वक़्त हम शहर का चक्कर लगा रहे हैं। इस वक़्त शहर सोता-सा लग रहा है, क्योंकि यहाँ की जनसंख्या बेहद कम है। मैं क़रीब 32-34 घण्टों से सोयी नहीं हूँ, इसलिए बेहद थकी हूँ। लेकिन यहाँ की आबो-हवा ऐसी है कि थकावट लग ही नहीं रही।

घर पहुँचने तक ब्रेयान यानी कि ओदवे के पति आ गये हैं, हम चाय पीते हैं। इस वक़्त रात के आठ बज गये हैं, लेकिन काफ़ी उजाला है। मैं तो वक़्त को भूल ही गयी हूँ। ओदवे और ब्रेयान हमें पास की नदी के तट पर ले जाना चाहते हैं। मैं चलने का मोह नहीं छोड़ पाती हूँ। ओदवे कर्मठ हैं, लेकिन बड़ा साहित्यिक जीवन जीती हैं। उनका घर ख़ूबसूरती से सजा है, उनका अपना कमरा जो छत की तिकोनी के नीचे बना है, बेहद ख़ूबसूरत है। घर का एक-एक हिस्सा कलाकारी से सजा है। वे कविताओं के साथ बाल्य-साहित्य से भी जुड़ी हैं, और फ़िल्में भी बनाती हैं। कृत्या-2008 में वे अपनी फ़िल्में लेकर आयी थीं और अनेक भारतीय कवियों पर फ़िल्म की शूटिंग करके लौटी थीं।
मैं खिड़की से बाहर झांकती रहती हूँ। कुछ लिखने-पढ़ने की भी कोशिश करती हूँ। दूसरे दिन ब्रेयान को जल्दी दफ़्तर जाना है। वह उठ जाते हैं, लकड़ी के घरों में सारी आवाज़ें इधर से उधर जाती रहती हैं। थोड़ी देर में मैं नहाकर नीचे पहुँचती हूँ और नाश्ता बनाने में ओदवे की मदद करने लगती हूँ। नाश्ते पर स्त्वांगर एफ़ेनब्लाड (Stavanger Afenblad) की संवाददाता इंगबोर्ग एलिआसन आयी हैं। रात को ओदवे ने क़रीब 18 लोगों को खाने पर बुलाया है। साथ में कविता पाठ भी है। यहाँ ज़्यादातर लोग अंग्रेज़ी नहीं जानते, पर क्रस्टीन कामचलाऊ बोल लेती हैं, वह कृत्या की यात्रा के बारे में काफ़ी कुछ पूछती हैं, तस्वीर खींचती हैं, उससे बात करके बेहद अच्छा लगता है।
ओदवे हम लोगों को पब्लिक लाइब्रेरी ले आयी। यह लाइब्रेरी शहर के बीचो-बीच स्थित एक गली में बनी है, इसके एक ओर पुराना थिएटर और दूसरी ओर लाइब्रेरी है। यहाँ की सड़कें यूरोपीय तरीक़े से बनी हैं, जिनमें चौकोर पत्थर गढ़े हुए हैं। गली जो थिएटर और लाइब्रेरी के बीच में से गुज़रती है, इतनी है कि यहाँ छोटे-मोटे साहित्यिक आयोजन किये जाते हैं। इस लाइब्रेरी और स्थान में एक साल में क़रीब 1.7 लाख लोग आते हैं। लाइब्रेरी में अधिकतर काम मशीनों से होता है, लाइब्रेरियन हमें विभिन्न जगहों पर ले जाती हैं। हमें विदेशी किताबों के बीच कुछ हिन्दी के उपन्यास भी मिल जाते हैं, विशेष रूप से विष्णु प्रभाकर जी के उपन्यास, ख़ुशी होती है उन्हें देखकर।
एक हॉल में आर्ट एग्ज़ीबिशन की तैयारी की जा रही है। थिएटर की दीवार साथ जुड़ी है। दरअसल यह लाइब्रेरी नहीं, एक सांस्कृतिक संस्थान है, जिसमें लेखन, पठन-वाचन आदि सभी कार्य एक साथ होते हैं। इसके साथ ही कॉफ़ी हाउस है, जहाँ हम लोग भोजन करते हैं। यहाँ पर कोई भी कितने भी समय तक किताब पढ़ सकता है, बस किताबें किराये पर लेने के लिए पेमेंट किया जाता है। पहली मंज़िल पर अख़बार पढ़ने के स्थान के साथ संगीत और फ़िल्मों की लाइब्रेरी भी है, वहीं बैठकर इनका आनन्द लिया जा सकता है। साथ में ही कैफ़े लगा हुआ है। पहली मंज़िल 700 स्क्वायर मीटर की जगह पर चित्रकला वीथी और आयोजन कक्ष हैं। बेसमेंट में बच्चों के लिए पुस्तकें और उनके लिए विशेष आयोजनों के लिए स्थल है।
इसके बाद हम यूनीवर्सिटी गये। ओदवे ने घंटों कोशिश करके एक फ़ोन नम्बर प्राप्त किया। लेकिन हमें केवल दो लोग मिल पाये, दोनों का विषय थियोलॉजी था। जहाँ प्राचीन धर्म की बात आती है, भारतीय प्राचीन साहित्य को नकारा नहीं जा सकता है। पहले हमें जोन स्कारपीड (Jon Skarpeid) मिला जिसने (Jarie Stormark) से मिलवाया। इन अध्यापकों का कमरा बेहद बड़ा था और अलमारियाँ किताबों से ठसाठस भरी थीं। कम्प्यूटर आदि की सुविधा भी थी। मैंने उनसे बातें शुरू की तो पता चला कि वे भारतीय धर्मों, विशेष रूप से बौद्ध धर्म के बारे में काफ़ी कुछ जानते हैं। अपने काम के लिए भारत भी आते हैं। पांडिचेरि से उन्हें काफ़ी सामग्री मिलती है। मैं उनकी भारतीय रिलीजन के बारे में जानकारी देखकर बड़ी प्रभावित थी।
लौटते वक़्त हम ओदवे की मित्र पेन्टर ओसा के घर से होते हुए आते हैं। ओसा अकेले रहती हैं और चित्रकला को जीवन समझती हैं। वे रंगों के साथ विशेष प्रेम रखती हैं। उनका कहना है कि भारत में इतने रंग हैं, जो देश को ख़ूबसूरत बनाते हैं। वे बनारस आ चुकी हैं, लेकिन फिर भारत आना चाहती हैं। हम ओसा के कला कक्ष को देखते हैं, आनन्द लेते हैं, और लौट आते हैं।
शाम को हम लोग लौटे तो शायद छह बज गये थे। रात को कई लोग कविता पाठ के लिए आने वाले थे, इसलिए मैंने ओदवे से कहा कि यदि वे चाहें तो मैं उनकी सहायता कर सकती हूँ। वे मुझसे कहने लगी कि चाहूँ तो इण्डियन ब्रेड बना सकती हूँ। जब मैंने आटा देखा तो सकपका गयी क्योंकि वह निरा मैदा था। मैंने पराँठे बनाने का विचार बनाया, लेकिन आटा इतना लचीला था कि 15-16 पराँठे बनाने में ही काफ़ी वक़्त लग गया।
मैं जल्दी से शावर लेकर तैयार होकर नीचे आयी तो काफ़ी लोग आ गये थे। रसोई को ब्रेयान और उनके मित्र संभाले हुए थे। सब लोग अलग-अलग ग्रुप में बैठ गये। नोर्वे में इस तरह के भोज में सबसे पहले भोजन किया जाता है। बातचीत को भोजन के बाद स्थान दिया जाता है। ओदवे के घर डाइनिंग टेबिल रसोई में थी, जिस पर भोजन का सारा समान भर गया, सब लोग रसोई से ही खाना परोसकर लाने लगे।
मैंने देखा कि गुलाब की कली-सी चटख गुलाबी रंग वाली प्रोन्स (झींगा मछली) बड़ी-सी तश्तरी में रखी थीं, लोगों ने उन्हें अपनी तश्तरी में रखकर मटर की फली की तरह छील कर ब्रेड पर सजा लिया और खाना शुरू कर दिया। मुझे बताया गया कि वे स्मोक्ड हैं। मैंने भी उनकी देखा-देखी अपनी ब्रेड को सजाया, और मुँह में रखा। सच कहती हूँ बड़ी स्वादिष्ट लगीं। खाने के उपरान्त कविता पाठ शुरू हुआ। मैंने अपनी कविताएँ हिन्दी में पढ़ीं, जिनका अनुवाद ओदवे ने पढ़ा।
इसके उपरान्त बातें शुरू हो गयीं, बड़ी अच्छी शाम बीती, सबके जाते-जाते रात के 12 तो बज ही गये होंगे। अगले दिन शनिवार है और हमें पहाड़ों पर फ़्योर्ड देखने जाना है।
पहाड़, झरने, घाटी और ग्लेशियर
जिन दिनों धरती बर्फ़ से ढंकी होगी, नॉर्वे की ज़मीन पर अनेक ग्लेशियर रहे होंगे। बाद में ये ग्लेशियर पिघलकर समंदर की ओर बहने लगे। इस भूमि पर समंदर और पहाड़ का संगम तो था ही, इन ग्लेशियरों के कारण घाटियाँ और भी बन गयीं। इस तरह प्रकृति का अद्भुत संगम बन गया। यह संगम इतना ख़ूबसूरत है कि बखान करना संभव ही नहीं। ऐसे लगता है कि एक बड़े-से कैनवास पर विभिन्न रंग भर दिये हों, जिसमें नीला, भूरा, सफ़ेद, ख़ाकी, आसमानी आदि हैं। अजीब-सा नज़ारा, पहाड़ समंदर में चले जा रहे हैं, समंदर घाटियों के बीच फँसा-सा और कसमसाकर रह गया लगता है। कहीं हरे-भरे पहाड़ तो कहीं तीखी नुकीली चट्टानें, समंदर के पास जैसी उमस होनी चाहिए उसका नामो-निशान तक नहीं। यही वह जगह थी, जहाँ नाज़ी आक्रमण के वक्त नॉर्वे के सैनिकों ने बहादुरी से दुश्मनों का सामना किया था। फ़्योर्ड (Gloppedalsura Fjord) करीब दस हज़ार वर्ष पुराना है, जो एक ग्लेशियर के पिघलने से बना था। हम सुबह से शाम तक पहाड़ों में मंडराते रहते हैं, और तनिक भी थकावट नहीं लगती। रास्ते में हम कई दुकानों में रुकते हैं, और देखते हैं। नॉर्वे बड़ा महंगा देश है, हम अपने साथ सैंडविच आदि ले गये थे और उनसे काम चलाया। लौटते वक़्त हम समंदर के किनारे होते हुए लौटते हैं। रास्ते में हमें एक वरिष्ठ कवि हेल्गे तोर्वुंड से मुलाक़ात करनी है।
कुछ मुलाक़ातें, कुछ बातें
एक पेट्रोल पम्प पर हमें हेल्गे तोर्वुंड मिलते हैं। पतले-दुबले, कमज़ोर-से, किन्तु चेहरे पर एक शालीन मुस्कान। नॉर्वे की संस्कृति के अनुरूप वे सबसे गले मिलकर अभिवादन करते हैं। इसी बीच ओदवे मुझे बता चुकी है कि वे कवि, आलोचक, कला आलोचक और प्रकृति प्रेमी हैं, इन सबसे पहली बात यह कि वे मनोवैज्ञानिक हैं। हेल्गे हमें उस जगह ले जाना चाहते हैं, जो उनके बैठने का स्थान है, हम पेड़ों के बीच से होते हुए एक चट्टान की ओर ले चलते हैं। वे बताते हैं कि जबसे उन्हें कैंसर हुआ है, वे अधिकतर समय यहीं गुज़ारते हैं।
ओदवे बताती है कि भेड़ें पालना नॉर्वे में धंधा नहीं, शौक़ रहा है, जो धीरे-धीरे धूमिल पड़ता जा रहा है। अपने परिवार के बारे में बताते हुए कहती हैं कि उनके पिता के पास काफ़ी भेड़ें थीं। सर्दियों में ये भेड़ें घर में बन्द होती हैं, लेकिन गर्मी आते ही उन्हें पहाड़ों पर छोड़ दिया जाता है। भेड़ें पहाड़ों पर जाते ही ख़ुश हो जाती थीं। भेड़ों के साथ किसी का रहना ज़रूरी नहीं होता था। लोग किसी और की भेड़ को नहीं ले जाते थे, लेकिन इन दिनों बीच-बीच में पहाड़ जाकर देखना पड़ता था कि वे सकुशल हैं या नहीं।
पिछले चार दिनों से यही हो रहा है कि मैं सोती तो नॉर्वे समय से और उठ जाती हूँ भारतीय वक़्त से। आज 17 मई का दिन, नॉर्वे दिवस, सुबह-सुबह शहर जग गया। मैं खिड़की से देखती हूँ कि अलसुबह बच्चे जत्था बनाकर स्कूल जा रहे हैं, बैंड बजना अभी ही शुरू हो गया। आज के दिन के लिए मैं नारंगी रंग की साड़ी लायी थी। मुझे बताया गया था कि इस दिन नॉर्वे में सभी लोग अपनी परम्परागत वेषभूषा पहनते हैं। ओदवे ने बताया था कि हर प्रान्त की वेषभूषा में कुछ-कुछ ख़ासियत होती है। अधिकतर ये हाथ से कढ़ाई की हुई होती हैं और काफ़ी महंगी होती हैं। मैं तैयार होकर नीचे आयी तो पता चला कि ब्रेयान रसोई में काम कर रहा है और ओदवे अभी तैयार होकर आयी ही नहीं।
जब ओदवे नीचे आयी तो मेरी साड़ी देख कर ख़ुश हो गयी। वह भी बेहद सुन्दर वेषभूषा पहने हुए थी। मैंने साड़ी के साथ शॉल लिया था, उसने कहा कि नॉर्वे में कभी भी मौसम बदल जाता है इसलिए स्वेटर भी रख लो।
हम नाश्ता करके निकल गये, आज का दिन काफ़ी ठण्डा था। लग ही नहीं रहा था कि कल धूप भी निकली थी। हम लोग सड़क पर आकर खड़े हो गये, जहाँ से जुलूस निकल रहा था। वहाँ काफ़ी लोग जमा थे, और सभी बेहद उत्साहित। मुझे अपना बचपन याद आया, जब हम लोग भी पन्द्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी को उत्साह से स्कूल जाते थे। लेकिन केरल में मैंने यह उत्साह न के बराबर देखा।

जुलूस निकलते जा रहे थे, एक के बाद एक, स्कूल और विभिन्न संस्थाओं के। ठण्ड बढ़ती जा रही है, लेकिन लोगों के उत्साह में कोई कमी नहीं। क़रीब दस बजे हम चर्च के लिए रवाना हुए। यूरोपीय चर्च की शैली बेहद ख़ूबसूरत होती है। ओदवे और ब्रेयान प्रार्थना में भाग लेने लगे, मुझे झपकी-सी आने लगी, एक तो चर्च में इतनी शालीनता होती है कि मन शान्त हो जाता है, दूसरे भीतर अंधेरा था, फिर कई रातों से सोई भी नहीं थी। बाहर निकलते ही ओदवे मुस्कुरा कर बोली, ठीक से नींद आई ना?
हम दोनों खिलखिला उठे, आज सुबह से हम हँस ही तो रहे हैं। हम चर्च के सामने से जुलूस बन कर पार्क की ओर चल दिया, इस बार हम जुलूस का हिस्सा थे। ओदवे की सहेलियाँ ओसा और एन्ना भी आकर हमसे मिल गयीं। पार्क में गहमागहमी थी। हम लोग पीटर से मिले, वे हमारा इंतज़ार कर रहे थे। तुरन्त राजकीय भोज में लेकर आ गये।
बड़े-बड़े लोग थे वहाँ, मुझे पीटर ने सबसे मिलवाया। पुलिस के चीफ, डिप्टी मेयर और अन्य कई महत्वपूर्ण अतिथिगण थे वहाँ। भोजन के शुरू होते ही डिप्टी मेयर ने नॉर्वेजियन भाषा में भाषण दिया, जिसमें पीटर को उनके काम के लिए बधाई दी। वे जिस तरह से सांस्कृतिक मेल-मिलाप के लिए काम कर रहे हैं, वह नॉर्वे के लिए भी महत्वपूर्ण है। राजकीय भोजन था, टेबिल पर वाइन और ब्रेड स्टिक आदि परोसे गये थे। पीटर ने हमें बता दिया था कि प्रमुख भोजन परोसे जाने से पहले उठ जाना है। मुझे राजकीय भोजन न कर पाने का दुख तो था, लेकिन कोई और चारा भी नहीं था।
वापस पार्क आये तो हमारी बारी आने वाली थी। क़रीब-क़रीब सारे कार्यक्रम हो चुके थे, युवकों की भीड़ थी। फिर भी सोचा कि अपनी भाषा का प्रतिनिधित्व कर लूं। सबसे पहले मैंने हिन्दी में कविता सुनायी, ओदवे ने उसका अनुवाद पढ़ा, फिर दूसरी सुनायी और उसका अनुवाद फिर ओदवे ने सुनाया। सारा माहौल मस्ती का था, कविता का माहौल नहीं था। कविता सुनाकर भी मुझे मज़ा नहीं आया। मुझे लगा कि कविता को समाज में सही जगह बनाने के लिए काफ़ी कुछ अलग-सा करना चाहिए।
स्टेज से उतरी तो इण्डियन एसोसिएशन का सेक्रेटरी दौड़ा आया और मुझे बधाई दी। वह आग्रह से मुझे अपने स्टॉल में ले आया, जहाँ पर पुलाव और चिकन बेचा जा रहा था। ये सब लोग नॉर्वे में नौकरी करने आये हैं और मिलकर रहते हैं। इस बार उनके चिकन और चावल की बड़ी अच्छी बिक्री हो रही है।
वहाँ से हम लोग फिर एक-दूसरे ठिकाने पर आये, जहाँ से बुज़ुर्गों का जुलूस निकलने वाला था। सर्दी बढ़ती जा रही थी। मैं और ओदवे एक ही शाल में दुबक गये। थोड़ी देर बाद जब सर्दी सहन न हुई तो हम घर लौट गये।
घर आते ही ओदवे ने मुझे गरम पानी से शावर लेने के लिए भेज दिया। उसका कहना था कि ठंड से बचने का सबसे अच्छा उपाय है गरम-गरम पानी से स्नान कर लो। रात को हम फिर भोजन के लिए बैठे, जो हमारा आख़िरी भोजन था। दूसरे दिन हमें ओदवे से विदा लेकर बर्गन के लिए रवाना होना था। समान बाँधते-बाँधते मैं भावुक हो उठी। कितना रम गया है मन यहाँ…

रति सक्सेना
लेखक, कवि, अनुवादक, संपादक और वैदिक स्कॉलर के रूप में रति सक्सेना ख्याति अर्जित कर चुकी हैं। व्याख्याता और प्राध्यापक रह चुकीं रति सक्सेना कृत कविताओं, आलोचना/शोध, यात्रा वृत्तांत, अनुवाद, संस्मरण आदि पर आधारित दर्जनों पुस्तकें और शोध पत्र प्रकाशित हैं। अनेक देशों की अनेक यात्राएं, अंतरराष्ट्रीय कविता आंदोलनों में शिरकत और कई महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान आपके नाम हैं।
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बड़ी सुघड़ता से लिखा गया है ये, मैं साहित्यकार नहीं वरन् एक पाठक हूं और पढ़ते हुए एक बार भी मन इधर उधर नहीं हुआ।
फ्योर्ड के समंदर की तरह ही शांत लिखावट, विचारों और इवेंट्स का वर्णन नपा-तुला।
आबो हवा को शुभकामनाएं व सफलता की शुभेच्छा।