
- October 15, 2025
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नियमित ब्लॉग रति सक्सेना की कलम से....
युद्ध और आपदा में संजीवनी पोएट्री
केस 2: मार्गस लैटिक
कविता से इलाज के सिलसिले में पिछले अंक में हमने चीनी मूल के कवि कून वून के बारे में चर्चा की थी। इस बार मार्गस लैटिक की थोड़ी बात करते हैं, जो एस्टोनिया के बेहतरीन कवि हैं। मार्गस का दायां हाथ कंधे से कटा हुआ है। वे अनेक बार कृत्या फेस्टिवल में शिरकत कर चुके हैं, लेकिन मैंने कभी भी उनसे उनके हाथ के बारे में नहीं पूछा। 2015 में, हम त्रिवेंद्रम के एक अस्पताल के कैंसर वार्ड में गये थे। तभी हमें पता चला कि उन्हें बचपन में कैंसर था। उन्होंने एक व्याख्यान के दौरान यह बात बतायी। वे जब बेहद छोटे थे, उन्हें सर्जरी के लिए बार-बार अस्पताल में भर्ती होना पड़ रहा था। वे अकेलेपन से जूझ रहे थे, साथ ही उन्हें अपने हाथ के काटे जाने से उपजी समस्याओं का सामना भी करना पड़ रहा था। बचपन का वह अकेलापन उनके साथ बहुत लम्बा चला, जिसे झेलने की शक्ति कविता ने दी। मार्गस ने अन्ततः कविता को अपना माध्यम बनाया और आज तक वे कविता और आध्यात्मिकता से जुड़े हैं। मार्गस के अनुसार यदि वे कविता की ओर उन्मुख नहीं होते तो ज़िन्दगी को जीने के लिए शक्ति नही पा सकते थे।
हमें अनेक उदाहरण मिलेंगे, जिन्होंने विषम परिस्थितियों में कविता का सहारा लिया। कुछ उदाहरण प्रस्तुत करती हूं।
युद्ध और आपदावस्था में पोइट्री थेरेपी
हंगरी के एक कवि थे, वे यहूदी मूल के थे, उनका नाम था यहूदी मिक्लोस रैडनोटी [1909-1944] उन्हें होलोकॉस्ट कवियों में महसन कवि के रूप में याद किया जाता है। वे 1937 में कार्टेस पोस्टेल नाम से पोस्टकार्ड लिख रहे थे, जिनमें युद्ध की गहन छवियां थीं।

1940 में कामगार क़ैदी के रूप में बेगार करने को मजबूर किया गया। उन्हें यूक्रेनी मोर्चे पर विस्फोटकों को निरस्त्र करने के लिए भेजा गया था। 1944 में उन्हें यूगोस्लाविया के एक लेबर कैंप में भेज दिया गया। जब वहां के यातना शिविर को ख़ाली किया गया, तो उन्हें यूगोस्लाविया और हंगरी के मध्य पैदल भेजा गया। वे मार्ग में भी पोस्टकार्ड कविता लिखते रहे, लेकिन एक सैनिक का ध्यान उन पर गया, और उन्हें पीटा गया। इस घायल कवि की 9 नवंबर, 1944 को गोली मारकर हत्या कर दी गयी, साथ ही 21 अन्य कैदियों को भी मार दिया गया, जो चलने में असमर्थ थे। युद्ध के बाद उनकी सामूहिक क़ब्र खोदी गयी। युद्ध के उपरान्त रैडनोटी की कविताएँ कवि पत्नी को उनके शरीर पर मिलीं, जो एक छोटी सर्बियाई डायरी में पेंसिल से लिखी गयी थीं।
पोस्टकार्ड-1
मिकलोस रैडनोटी द्वारा 30 अगस्त, 1944 को लिखा गया और माइकल आर. बर्च द्वारा अंग्रेज़ी में अनूदित।
बुल्गारिया से,
तोपख़ानों की महान जंगली गर्जना कंपाती है,
पहाड़ की चोटियों पर गूंजती है, उछलती है,
फिर शांत हो जाती है
जबकि यहाँ मनुष्य, जानवर,
गाड़ियाँ और कल्पनाएँ सभी लगातार बढ़ रही हैं;
सड़कें हिनहिना रही हैं,
आकाश सरपट भाग रहा लोगों के साथ
पर तुम हमेशा मेरे साथ हो, प्रिया!
तमाम अराजकताओं के बीच स्थिर,
मेरे विवेक के भीतर चमकते हुए- प्रज्ज्वलित, तीव्र।
प्रिया, तुम हमेशा मेरे भीतर कहीं हो-
स्थिर, गतिहीन, मूक,
मृत्यु से स्तब्ध एक देवदूत की तरह
या एक सड़ते पेड़ के दिल में छिपे भौंरे की तरह
इतनी भयानक स्थिति में भी वे अपनी पत्नी को याद कर रहे थे, कविता लिख रहे थे। आखिर क्यों? शायद इसलिए कि कविता और पत्नी उनके लगातार जर्जर होते शरीर और तकलीफ़ पाते मन को उष्णता दे रहे थे।
इसी तरह दूसरी कविता में एक ओर क्रूर सैनिक किसानों के घरों और खेतों को जलाते दिख रहे हैं, लेकिन कवि चरवाहा लड़की और भेड़ों के ऊन के माध्यम से कोमलता को महसूस कर पा रहे हैं:
पोस्टकार्ड-2
मिकलोस रैडनोटी द्वारा 6 अक्टूबर, 1944 को क्रवेंका, सर्बिया के पास लिखा गया
माइकल आर. बर्च द्वारा अंग्रेज़ी में अनूदित।
कुछ मील दूर वे घास के ढेर और घरों को जला रहे हैं,
जबकि यहाँ इस सुखद घास के मैदान के किनारे पर बैठे हुए,
स्तब्ध व पीड़ित किसान चुपचाप अपने पाइप मुख से लगाये धूम्रपान कर रहे।
अब, यहाँ इस शांत तालाब में क़दम रखते हुए, छोटी चरवाहा लड़की
चाँदी के पानी को लहरदार बनाती है
जबकि, पीने के लिए झुकते हुए, उसकी कोमल भेड़ें
बहते बादलों की तरह तैरती प्रतीत होती हैं।
कवि सालों से एक क़ैदी और मज़दूर के रूप में काम कर रहे थे। वे युद्ध की विभीषिका से भी वाकिफ़ थे, लेकिन बमों और बन्दूकों के बीच भी उनके मन की कोमलता उन्हें कविता लिखने को बाध्य कर रही थी, दूसरे शब्दों में कहें तो यह उनके लिए थेरेपी थी, जिसके माध्यम से वे क्रूरता की परिकाष्ठा को सहने की कोशिश कर रहे थे।
इसी तरह एक कविता “द लिटिल बॉय विद हिज़ हैंड्स अप” बेहद प्रसिद्ध हुई, जिसे याला हेलेन कोर्विन ने लिखा था। इस कविता पर वृत्तचित्र भी बना था। बचपन में याला को एक नाज़ी कैम्प में रहना पड़ा था। बाद में वे शरणार्थी बनकर फ्रांस चली गयीं। उन्होंने होलोकास्ट पर अनेक कविताएं लिखीं। यद्यपि यह कविता युद्ध के बाद लिखी गयी थीं, लेकिन संभवतया वे अपने ख़ौफ़नाक अनुभवों से उबरने के लिए कविताएं लिख रही थीं। यही नहीं दुनिया को ज्ञात हुआ कि युद्ध बच्चों की मानसिकता पर कितना गहरा प्रभाव डालता है।
अगले अंक में कुछ और कवियों की बात करूंगी…
क्रमश:

रति सक्सेना
लेखक, कवि, अनुवादक, संपादक और वैदिक स्कॉलर के रूप में रति सक्सेना ख्याति अर्जित कर चुकी हैं। व्याख्याता और प्राध्यापक रह चुकीं रति सक्सेना कृत कविताओं, आलोचना/शोध, यात्रा वृत्तांत, अनुवाद, संस्मरण आदि पर आधारित दर्जनों पुस्तकें और शोध पत्र प्रकाशित हैं। अनेक देशों की अनेक यात्राएं, अंतरराष्ट्रीय कविता आंदोलनों में शिरकत और कई महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान आपके नाम हैं।
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