
- December 31, 2025
- आब-ओ-हवा
- 2
लेखा-जोखा मानस की कलम से....
2025 का राजनीतिक सिनेमा: राष्ट्रवाद-प्रतिक्रिया-मनोरंजन की नयी त्रयी
पिछले कुछ वर्षों में सिनेमा के विषयों में राजनीति और जासूसी की दुनिया की उपस्थिति तेज़ी से बढ़ी है। वर्ष 2025 की ही बात करें तो क़रीब तीस फ़िल्में और वेब सीरीज़ केवल इन्हीं विषयों के इर्द-गिर्द घूमती नज़र आती हैं। इसके पीछे एक बड़ा कारण OTT प्लेटफ़ॉर्म्स का उभार है।
OTT ने दर्शकों के सामने वैश्विक सिनेमा का ख़ज़ाना खोल दिया है। नतीजतन, दर्शक का वर्ल्ड व्यू बदला है और उसके साथ बदली है- सिनेमा से उसकी अपेक्षा भी। अब वह सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, बल्कि विचार, विमर्श और समकालीन यथार्थ देखना चाहता है। लेकिन इसके पीछे एक और, कहीं ज़्यादा प्रभावशाली वजह भी है- आज के समय में देशभक्ति का बदला हुआ स्वरूप।
अब ‘देशभक्ति की भावना’ नहीं, बल्कि ‘देशभक्ति का उबाल’ दिखायी देता है। नागरिक की जगह कार्यकर्ता आ गया है और पॉलिटिकली एक्टिव व्यक्ति की जगह पॉलिटिकली रिएक्टिव व्यक्ति। प्रतिक्रिया अब विचार से ज़्यादा तेज़ है।
इस बदलाव को बॉलीवुड ने बड़ी तत्परता से पहचान लिया। राष्ट्रवाद की चाशनी हाथ में लेकर वह सीधे मैदान में कूद पड़ा। और फिर उसी चाशनी में छान-छान कर सिनेमा बनने लगा। एक हद तक यह सराहनीय भी है। दर्शकों को घिसी-पिटी राजा-रानी की कहानियों से इतर कुछ नया देखने को मिला है- इतिहास की ओर झाँकने का अवसर मिला है, बहस को जन्म देने वाला सिनेमा आया है और कुछ फ़िल्मों ने सिनेमा के नये शिल्प (craft) को भी सामने रखा है। लेकिन इसी के साथ राजनीतिक फ़िल्मों के भी स्पष्ट वर्ग बनते चले गये हैं।
पहला: संतुलित राष्ट्रबोध का सिनेमा
कुछ फ़िल्में ऐसी हैं जिन्हें देखकर दर्शक सिनेमा हॉल से एक राष्ट्र के ज़िम्मेदार नागरिक की तरह बाहर निकलता है, न कि किसी पार्टी विशेष के नशे में, न किसी पार्टी को कोसते हुए। स्काय फ़ोर्स, द डिप्लोमेट, ग्राउंड ज़ीरो, तेहरान, सारे जहां से अच्छा जैसी फ़िल्में इस श्रेणी में आती हैं।
दूसरा: अति-मिठास वाला प्रतिक्रियाशील राष्ट्रवाद
कुछ फ़िल्मों में देशभक्ति की चाशनी इतनी अधिक डाल दी जाती है कि कट्टर राष्ट्रवादी भी शुगर के डर से उनसे दूरी बना लेते हैं। यहाँ कंटेंट, इंटेंट और सिनेमा का व्याकरण- तीनों ही कमज़ोर साबित होते हैं। नतीजा यह कि फ़िल्में औंधे मुँह गिरती हैं। उदयपुर फ़ाइल्स, द बंगाल फ़ाइल्स, अजेय: द अनटोल्ड स्टोरी आफ़ ए योगी, द ताज स्टोरी, 2020 दिल्ली, मैच फ़िक्सिंग… जैसी फ़िल्में इसी श्रेणी में आती हैं और चिंता का विषय यह है कि यह सूची हर साल लंबी होती जा रही है।
तीसरा: चालाकी से पैक राजनीतिक संदेश
अब आती हैं वे फ़िल्में जो सबसे ज़्यादा बहस पैदा करती हैं। यहाँ देशभक्ति की मिठास को सिनेमा के व्याकरण से बड़ी सफ़ाई से संतुलित किया जाता है। एक निहित ‘संदेश’ को ‘मनोरंजन’ की रंगीन पुड़िया में लपेटकर दर्शक के मस्तिष्क में धीरे-धीरे बैठाया जाता है। बारामूला, इमरजेंसी, धुरंधर, सलाकार जैसी फ़िल्में कंटेंट और शिल्प में मज़बूत हैं, लेकिन उनके इंटेंट को लेकर सवाल खड़े किये जा रहे हैं।
इन फ़िल्मों का उद्देश्य अपेक्षाकृत स्पष्ट है- किसी व्यक्ति या पार्टी विशेष का महिमामंडन करना और किसी अन्य का महिमाखंडन। यह एक नया ट्रेंड है। इससे पहले शायद ही ऐसा देखा गया हो कि मौजूदा सत्ता, सिनेमा के माध्यम से पिछली सरकारों के कार्यों को इस तरह प्रस्तुत करे कि उनकी छवि धूमिल हो और अपनी चमक बढ़ायी जा सके। ऐसी फ़िल्मों का जोखम यह है कि पूर्ववर्ती सरकारों की आलोचना करने और देश की बदनामी का कारण बनने में एक धागे भर का फ़र्क है और कौन-सी फ़िल्म इस फ़र्क को कितना समझ पाती है, इस पर विद्धान दृष्टि रख भी रहे हैं।

इस प्रक्रिया में ये फ़िल्में ब्लैक-एंड-व्हाइट स्टैंड लेती नज़र आती हैं। लेकिन सवाल यह है- जब राजनीति स्वयं कभी ब्लैक-एंड-व्हाइट नहीं होती, तो उस पर बनी फ़िल्में कैसे हो सकती हैं?
जैसा कहा जाता है- “राजनीति में फ़ैसले सही या ग़लत नहीं होते; उनका मूल्य मक़सद पूरा करने में होता है।” उनका सही या ग़लत होना समय, संदर्भ और अनेक मानदंडों के साथ तय होता है। लेकिन यदि ठान लिया जाये, तो किसी को भी नायक और किसी को भी खलनायक बनाया जा सकता है।
राजनीतिक सिनेमा: एक वैचारिक वर्गीकरण
‘राजनीतिक सिनेमा’ की संकीर्ण और व्यापक अवधारणाओं के बीच अंतर करने के लिए फ़िल्म विद्वान ईवा माज़िएर्स्का एक महत्वपूर्ण वर्गीकरण प्रस्तुत करती हैं। वे राजनीतिक फ़िल्मों को: 1. अनुरूपतावादी (Conformist) और विरोधी (Oppositional) 2. चिह्नित (Marked) और अचिह्नित (Unmarked) श्रेणियों में बाँटती हैं।
उनके अनुसार, अनुरूपतावादी फ़िल्में राजनीतिक यथास्थिति को स्वीकार करती हैं, जबकि विरोधी फ़िल्में उसे चुनौती देती हैं। चिह्नित राजनीतिक फ़िल्में खुलकर उस पार्टी या विचारधारा को सामने रखती हैं जिसकी वे सेवा करती हैं; वहीं अचिह्नित फ़िल्में इस झुकाव को छिपाकर पेश करती हैं।
इसी दृष्टिकोण से देखें तो अधिकांश दर्शक उन्हीं फ़िल्मों को ‘राजनीतिक’ मानते हैं जो स्पष्ट रूप से विरोधात्मक और घोषित राजनीतिक होती हैं क्योंकि आम चर्चा में राजनीति पर बनी फ़िल्मों की पहचान प्रायः इन्हीं मानकों से तय की जाती है।
इसी संदर्भ में कुछ फ़िल्में ऐसी भी सामने आयीं, जिन्होंने सीधे राजनीतिक विषय न चुनते हुए समाज और मानवीय ड्रामा के ज़रिये राजनीति को केंद्र में रखा। ये फ़िल्में संकेतों, प्रतीकों और रूपकों के माध्यम से सत्ता और असामाजिक संरचनाओं पर सवाल उठाती दिखती हैं। द ग्रेट शम्सुद्दीन फ़ैमिली ने हिंदू-मुस्लिम समीकरण को छुआ, होमबाउंड ने जातीय समीकरण, सामाजिक भेदभाव और वर्गीकरण को कोविड के संदर्भ में उकेरा, जॉली एलएलबी-3 ने किसानों की ज़मीन अधिग्रहण और आर्थिक संकट को सामने रखा, जबकि धड़क-2 ने जातिगत असमानता को अपनी कथा का आधार बनाया।
समानांतर रूप से कुछ फ़िल्में ऐसी भी रहीं, जो विषयवस्तु में सीधे तौर पर राजनीति से जुड़ी नहीं थीं, लेकिन सत्ता की राजनीति का शिकार हो गयीं। किसी को सेंसर बोर्ड के कठोर कट्स झेलने पड़े (फुले), तो कुछ को प्रदर्शित होने का अवसर ही नहीं मिला (सरदार जी 3, पंजाब 95, टीस और कैनेडी)। इन घटनाओं ने एक स्पष्ट संदेश दिया- यदि आप सत्ता की राजनीति से असहमति जताते हैं या असहज सवाल उठाते हैं, तो आपकी आवाज़ दबा दी जाएगी।
2025 का राजनीतिक सिनेमा हमें यह समझाता है कि समस्या राजनीति के सिनेमा में आने की नहीं, बल्कि उसके प्रस्तुतिकरण की है। जब सिनेमा सवाल पूछता है, बहस को जगह देता है और दर्शक को सोचने के लिए छोड़ता है, तब वह लोकतांत्रिक मूल्य निभाता है; लेकिन जब वही सिनेमा तय निष्कर्ष थोपने लगता है, तो वह कला कम और प्रचार अधिक बन जाता है। राजनीति कभी एकरेखीय नहीं होती- वह संदर्भ, समय और दृष्टिकोण से बनती-बिगड़ती है इसलिए उस पर बनी फ़िल्में भी अगर ब्लैक-एंड-व्हाइट होंगी, तो वे यथार्थ से ज़्यादा सुविधा की सेवा करेंगी। असल चुनौती यही है कि राजनीतिक सिनेमा राष्ट्रवाद के उबाल और मनोरंजन के दबाव के बीच संतुलन बनाये रखते हुए नागरिक को प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि विवेक से काम लेना होगा।

मानस
विवेक त्रिपाठी उर्फ़ मानस पूर्व बैंककर्मी हैं लेकिन फ़िल्मों के जुनून ने नौकरी छुड़वायी और फ़िल्में बनाने की दिशा में प्रेरित किया। आधा दर्जन शॉर्ट फ़िल्में बना चुके मानस की कुछ फ़िल्मों को फ़ेस्टिवलों में सराहना व पुरस्कार मिले हैं। फ़िल्म लेखन व निर्देशन के अलावा मानस का एक कहानी संग्रह 'बालकनी' प्रकाशित है। इन दिनों वह पूरी लंबाई की फ़िल्म के निर्माण के लिए संघर्षरत हैं।
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“नागरिक की जगह कार्यकर्ता आ गया है और पॉलिटिकली एक्टिव व्यक्ति की जगह पॉलिटिकली रिएक्टिव व्यक्ति।” बढ़िया विश्लेषण किया है। बधाई
Dallawood and Urdu ka set kiya agenda abb nahi chalta jisme Rahim chacha baat ke pakke namaazi aur saare munshi, munim, pandit, lala humesha rapist and chor..laat maaro dallo ko.. welcome to change in the cinema and literature..