
- December 14, 2025
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शख़्सियत को जानिए ज़ाहिद ख़ान की कलम से....
राज कपूर: हिंदी सिनेमा के पहले शोमैन
हिंदी सिनेमा में राज कपूर की शिनाख़्त पहले शोमैन के तौर पर है। जिनकी नीली आंखों में सतरंगी सपने थे। वो आम आदमी के फ़िल्मकार थे और उन्होंने अपनी फ़िल्मों में आम आदमी के दुःख-दर्द, उनकी आशा-निराशा, स्वप्न और संघर्ष को बड़े ही खू़बसूरती से अभिव्यक्ति दी। ‘बरसात’, ‘आवारा’, ‘अनाढ़ी’, ‘श्री 420’, ‘जागते रहो’, ‘जिस देश में गंगा बहती है’ ‘संगम’ और ‘मेरा नाम जोकर’ जैसी फ़िल्में उनकी बेहतरीन अदाकारी और कल्पनाशील डायरेक्शन की वजह से जानी जाती हैं। राज कपूर, नेहरू युग के प्रतिनिधि फ़िल्मकार थे और उन्होंने अपनी फ़िल्मों के ज़रिए उस दौर की बेहतरीन तर्जुमानी की। ख़ास तौर पर उनकी शुरूआती फ़िल्मों को देखने के बाद लगता है कि उस दौर में आम आदमी के संघर्ष, सपने और आकांक्षाएं क्या थीं ? ख़्वाजा अहमद अब्बास की इंक़लाबी क़लम से निकली दृष्टिसंपन्न कहानियों को राज कपूर ने फ़िल्मों में इस अंदाज़ में पेश किया कि लोग उनकी फ़िल्मों के दीवाने हो गये। अदाकार दिलीप कुमार, देव आनंद उनके समकालीन थे और इनका फ़िल्मों में उस वक़्त बेहद दबदबा था। इन दोनों की अदाकारी के लाखों शैदाई थे। बावजूद इसके राज कपूर ने अपने निर्देशन और शानदार अदाकारी से एक अलग पहचान बनाई। फ़िल्मों को नया विजन दिया। राजकपूर और उनकी फ़िल्मों की लोकप्रियता देश-दुनिया में असाधारण थी। दक्षिण एशिया से लेकर अरब मुल्कों, चीन, मॉरिशस और लेटिन अमेरिका के लोग उनकी फ़िल्मों में एक अपनापन महसूस करते थे। जिसमें अविभाजित सोवियत संघ और उसके बाद अलग हुए देशों में आज भी उनकी फ़िल्मों के जानिब ग़ज़ब की दीवानगी है। यहां तक कि पूंजीवादी देश भी राज कपूर की फ़िल्मों को पसंद करते हैं। बीसवीं सदी के आठवें दशक में अमेरिका के कई शहरों में राज कपूर की फ़िल्में दिखाई गईं और ‘आरके रिट्रास्पेक्टिव’ आयोजित किया गया। जिन्हें देखने के लिए दर्शकों का सैलाब उमड़ पड़ा था।
राज कपूर ने फ़िल्मी दुनिया में उस दौर में अपनी एक अलग पहचान बनाई, जब हिंदी सिनेमा में वी.शांताराम, महबूब खान, बिमल रॉय, गुरुदत्त, बीआर चोपड़ा जैसे दिग्गज निर्देशक एक साथ काम कर रहे थे। राज कपूर ने एक अलग ही फ़िल्मी मुहावरा अपनाया। मधुर गीत संगीत से सजी उनकी फ़िल्मों में अदाकारों के बीच एक जुदा केमिस्ट्री नज़र आती थी। उनकी फ़िल्मों से दर्शकों को सिर्फ़ मनोरंजन ही नहीं, बल्कि एक सशक्त सामाजिक संदेश भी मिलता था। भारतीयता उनकी फ़िल्मों की पहचान थी। ‘बूट पॉलिश’, ‘अब दिल्ली दूर नहीं’, ‘जागते रहो’, ‘फिर सुबह होगी’, ‘तीसरी कसम’ जैसी फ़िल्मों का तसव्वुर राज कपूर के बिना नामुमकिन है। उनकी फ़िल्म ‘आवारा’ को जो कामयाबी मिली, ऐसी कामयाबी बहुत कम फ़िल्मों को हासिल होती है। उस ज़माने में समाजवादी देशों में यह फ़िल्म ख़ूब पसंद की गई। पं. जवाहरलाल नेहरू, निकिता ख्रुश्चेव, माओ और अब्दुल ग़माल नासर जैसे वैश्विक लीडरों ने इस फ़िल्म की तारीफ़ की थी। राज कपूर की शुरूआती फ़िल्में बॉक्स ऑफ़िस पर फ़्लॉप रहीं। फ़िल्मों में कामयाबी के लिए उन्हें छह साल इंतज़ार करना पड़ा। साल 1949 में आई फ़िल्म ‘अंदाज़’ और ‘बरसात’ ने राज कपूर को फ़िल्मी दुनिया में स्थापित कर दिया। फ़िल्म ‘बरसात’ के तो वे निर्माता-निर्देशक भी थे। राज कपूर और नरगिस की लाजवाब अदाकारी, संगीतकार शंकर-जयकिशन के संगीत एवं शैलेन्द्र, हसरत जयपुरी के गीतों से सजी यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर ज़बर्दस्त कामयाब रही।
नाटक हो या फिर सिनेमा, यह तब बेहतर बनता है जब एक बेहतरीन टीम और इसमें टीम वर्क शामिल हो। राज कपूर इस बात से अच्छी तरह से वाक़िफ़ थे। लिहाज़ा वह लगातार यह कोशिश करते रहे कि यह टीम बने। बहरहाल, उनकी यह बेहतरीन टीम बनी साल 1951 में और फ़िल्म थी, ‘आवारा’। टीम क्या थी, गुणीजनों का जमघट था। जिसमें कहानीकार, पटकथा लेखक के तौर पर वामपंथी लेखक ख़्वाजा अहमद अब्बास, संगीतकार-शंकर जयकिशन की जोड़ी, गायक-गायिका मुकेश, मन्ना डे, लता मंगेशकर, कैमरामैन-राधू कर्माकर, साउंड रिकॉर्डिस्ट-अलाउद्दीन, कला निर्देशक-एमआर अचरेकर और संपादक जीजी मायेकर शामिल थे। इस टीम का जादू दो दशक तक चला। राज कपूर की इस प्रतिभाशाली टीम ने भारतीय सिनेमा को आधा दर्जन सुपर हिट फ़िल्में दीं। जिसमें फ़िल्म ‘बूट पॉलिश’, ‘श्री 420’, ‘जागते रहो’, ‘जिस देश में गंगा बहती है’, ‘संगम’ और ‘मेरा नाम जोकर’ शामिल हैं।

पहले गीतकार शैलेन्द्र, फिर संगीतकार जयकिशन, गायक मुकेश और उसके बाद ख़्वाजा अहमद अब्बास एक के बाद एक के बिछड़ जाने से टीम बिखर गई। इस बीच एक वाक़िआ और हुआ। ‘मेरा नाम जोकर’ राज कपूर की महत्त्वाकांक्षी फ़िल्म थी। बड़े स्टारकास्ट की इस फ़िल्म को बनाने के लिए उन्होंने ख़ूब जतन किए थे। फ़िल्म पर पानी की तरह पैसा बहाया था। लेकिन यह फ़िल्म उम्मीदों के बर-ख़िलाफ़ टिकिट ख़िड़की पर नाकामयाब साबित हुई। फ़िल्म नाकाम हुई, तो राज कपूर का आत्मविश्वास लड़खड़ा गया। वो काफ़ी दिन तक सदमे में रहे। लेकिन इस होनहार निर्देशक ने हिम्मत नहीं हारी। उद्देश्यपूर्ण फ़िल्मों से इतर उन्होंने अब अपने बेटे ऋषि कपूर और नई नवेली हीरोइन डिम्पल कपाड़िया को लेकर फ़िल्म ‘बॉबी’ बनाई। किशोर उम्र की इस प्रेम कहानी को दर्शकों ने हाथों हाथ लिया। फ़िल्म सुपर हिट हुई। ख़ास तौर पर फ़िल्म के गाने बच्चे-बच्चे की ज़बान पर थे। ‘बॉबी’ की कामयाबी के बाद राजकपूर ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। इस फ़िल्म के बाद आई ‘प्रेम रोग’ और ‘राम तेरी गंगा मैली’ ने भी वही कामयाबी दोहराई। राज कपूर को अपनी फ़िल्मों के लिए कई सम्मान और पुरस्कारों से नवाज़ा गया। फिल्म ‘अनाड़ी’ और ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता एवं ‘संगम’, ‘मेरा नाम जोकर’, ‘प्रेम रोग’, ‘राम तेरी गंगा मैली’ फ़िल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फ़िल्मफे़यर अवार्ड मिला। वहीं उनकी फ़िल्म ‘जागते रहो’ कारलोवी वेरी अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्मोत्सव में ग्रा. प्री अवार्ड से सम्मानित की गई। साल 1969 में वह देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मानों में से एक ‘पद्म भूषण’ से नवाज़े गए, तो साल 1981 में उन्हें मॉस्को में सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

जाहिद ख़ान
इक्कीसवीं सदी के पहले दशक से लेखन की शुरुआत। देश के अहम अख़बार और समाचार एवं साहित्य की तमाम मशहूर मैगज़ीनों में समसामयिक विषयों, हिंदी-उर्दू साहित्य, कला, सिनेमा एवं संगीत की बेमिसाल शख़्सियतों पर हज़ार से ज़्यादा लेख, रिपोर्ट, निबंध,आलोचना और समीक्षा आदि प्रकाशित। यह सिलसिला मुसलसल जारी है। अभी तलक अलग-अलग मौज़ूअ पर पन्द्रह किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक के हमसफ़र’ के लिए उन्हें ‘मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन’ का प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘वागीश्वरी पुरस्कार’ मिला है। यही नहीं इस किताब का मराठी और उर्दू ज़बान में अनुवाद भी हुआ है।
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