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21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से चयन और इन फ़िल्मों का दस्तावेज़ीकरण...
पाक्षिक ब्लॉग (भाग-6) मानस की कलम से....

रंग दे बसंती: समाज व लोकतंत्र की ताकत

            शहरी जीवन की ऊब, दिशाहीनता और भीतर सुलगती चुपचाप ग़ुस्से की आग.. इन सबके बीच “मस्ती की पाठशाला” में पढ़ते युवाओं की कहानी है- रंग दे बसंती (2006)। यह केवल एक फ़िल्म नहीं रही, बल्कि एक बहस बन गयी। अपने समय की सबसे चर्चित और सराही गयी फ़िल्मों में शामिल इस कृति को अमेरिका के अकादमी पुरस्कारों के लिए भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में भी भेजा गया।

बॉलीवुड की समृद्ध परंपरा में खड़ी यह फ़िल्म नवीनता और रूढ़िवाद का दिलचस्प संगम है। हिंदी सिनेमा के दो केंद्रीय विषय- राष्ट्रवाद और सिनेमा- यहाँ एक साथ मौजूद हैं। लेकिन यह राष्ट्रवाद नारों वाला राष्ट्रवाद नहीं, आत्ममंथन वाला है; और सिनेमा महज़ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक दर्पण बनकर उभरता है।

तेज़ एडिटिंग और आकर्षक विज़ुअल्स के पीछे एक बहुपरत कथा छिपी है, जिसे समझने के लिए बीसवीं सदी के भारतीय इतिहास की पृष्ठभूमि ज़रूरी हो जाती है। 1931 की वह गाथा जब भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और चंद्रशेखर आज़ाद ने शहादत दी, आधुनिक भारत की स्मृति में एक पवित्र आख्यान की तरह दर्ज है। ऐसी कहानी पहले भी परदे पर आ चुकी है, जैसे ‘द लीजेंड ऑफ़ भगत सिंह’ में, लेकिन यहाँ इसे केवल दोहराया नहीं गया; इसे आज के समय की बेचैनी से टकराया गया है।

फ़िल्म दो समानांतर कथाएँ बुनती है- एक इतिहास के पन्नों में दर्ज और परिचित, दूसरी वर्तमान में जन्म लेती हुई, अप्रत्याशित और असहज। दोनों कथाएँ “फ़िल्म के भीतर फ़िल्म” की संरचना से जुड़ती हैं। कैमरा यहाँ सिर्फ़ घटनाएँ दर्ज नहीं करता, बल्कि पीढ़ियों के बीच संवाद रचता है- अतीत के बलिदान और वर्तमान की ज़िम्मेदारी के बीच। यही टकराव कहानी को झकझोर देता है: क्या क्रांति केवल इतिहास है? या हर पीढ़ी को उसे अपनी भाषा में फिर से लिखना पड़ता है?

किरदारों में विचार

निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा किरदार गढ़ने में माहिर हैं। पटकथा जिस वैचारिक रेखा पर खड़ी है, वहाँ से फ़िल्म का उपदेशात्मक हो जाना आसान था। लेकिन उन्होंने अपने विचारों को चतुराई से पात्रों में पिरो दिया। हर किरदार किसी न किसी वैचारिक प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करता है- हिंदू-मुस्लिम रुढ़िवादिता (कुणाल कपूर), दक्षिणपंथी कट्टरपंथ (अतुल कुलकर्णी) नाइयलिस्टिक और संभ्रांतवादी विचारधारा (सिद्धार्थ), आज का दिग्भ्रमित युवा (शरमन जोशी) और अस्तित्ववादी बेचैनी (आमिर ख़ान)।

ये पात्र केवल व्यक्ति नहीं, विचार हैं। शायद यही कारण है फ़िल्म के अंत में वे सभी मर जाते हैं। यदि वे जीवित रहते, तो हम अपनी लड़ाइयाँ लड़ने के लिए उन्हें ही ढूँढ़ते रहते। उनकी मृत्यु के बाद वे विचार बनकर हमारे भीतर उतर जाते हैं। मृत्यु एक शारीरिक प्रक्रिया है, लेकिन विचार अमर होते हैं। जैसे महात्मा गांधी या भगत सिंह आज हमारे बीच शारीरिक रूप से नहीं हैं, पर उनकी सोच हमारे सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में जीवित है। पात्रों का जाना ही फ़िल्म के प्रभाव को गहराई देता है।

फ़िल्म का प्रभाव

इस फ़िल्म के बाद नागरिक आंदोलनों में युवाओं की भागीदारी बढ़ी। अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में हुए आंदोलनों के दौरान कैंडल मार्च और इंडिया गेट पर जुटान को अक्सर इस फ़िल्म की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से जोड़ा गया। आमिर ख़ान की इसी दौर की फ़िल्में- तारे ज़मीन पर और थ्री इडियट्स- भी सामाजिक प्रभाव के लिए जानी गयीं, लेकिन रंग दे बसंती का असर विशेष रूप से राजनीतिक चेतना से जुड़ा था।

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इसकी प्रतिष्ठा इस बात पर निर्भर करती है आप किस मापदंड से इसे परखते हैं- सांस्कृतिक प्रभाव, सिनेमाई शिल्प, राजनीतिक प्रतिध्वनि या दीर्घकालिक स्मृति। हर पैमाने पर यह फ़िल्म एक संतुलित और प्रभावशाली कृति सिद्ध होती है।

सांस्कृतिक रूप से इसने युवाओं के आक्रोश को मुख्यधारा की चर्चा में बदला। संसद में इसकी विशेष स्क्रीनिंग हुई। इसके संवाद और दृश्य सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बने। साउंडट्रैक ने फ़ैशन, विज्ञापन और युवा संस्कृति को प्रभावित किया। यह फ़िल्म 2004 के बाद के राजनीतिक मोहभंग और मीडिया-सचेत युवा पीढ़ी की भावनाओं से गहराई से जुड़ी हुई थी।

कथात्मक और विषयगत महत्व

फ़िल्म का आज का युवा मंदबुद्धि नहीं, बल्कि “बंद बुद्धि” है। वह राजनीतिक विमर्श से इसलिए दूर है क्योंकि उसे विश्वास नहीं कि इससे कोई बदलाव होगा। उसे क्रांतिकारियों की बातें अविश्वसनीय लगती हैं। लेकिन भीतर कहीं एक क्रांतिकारी निरंतर पलता रहता है। जब तक कोई अपना नहीं मरता, हर मौत एक आँकड़ा लगती है। लेकिन अपने दोस्त फ्लाइट लेफ्टिनेंट अजय राठौड़ की मृत्यु इन युवाओं के लिए वह झटका बनती है, जो आँखें खोल देता है।

जैसे बहरों को सुनाने के लिए धमाके की ज़रूरत पड़ती है, वैसे ही व्यक्तिगत क्षति उन्हें व्यवस्था की सच्चाई से रूबरू कराती है। स्वतंत्रता सेनानियों और आज के युवाओं की समानांतर कथा, फ़िल्म की आत्मा है। यही संयोजन इसे पारंपरिक देशभक्ति फ़िल्मों से अलग और अधिक प्रभावशाली बनाता है।

निष्कर्ष

रंग दे बसंती एक ज़रूरी फ़िल्म है। लोकतंत्र में जैसे चुनाव समय-समय पर आवश्यक होते हैं, वैसे ही ऐसी फ़िल्में भी समय-समय पर बनती रहनी चाहिए। जब संवाद विषमवाद में बदल जाये और सूचनाएँ एकतरफ़ा हो जाएँ, तब सिनेमा को दर्पण बनना पड़ता है।

मिग विमान सौदों की अनियमितताओं जैसे विषय आम तौर पर मुख्यधारा के विमर्श से बाहर रहते हैं। एक फ्लाइट लेफ्टिनेंट की मृत्यु हमारे लिए सिर्फ़ आँकड़ा बन जाती है। लेकिन इस फ़िल्म ने उस “आँकड़े” को चेहरा दिया, उसे घर-घर पहुँचाया। अजय की मौत हमें अपने ही बच्चों के भविष्य पर संकट की तरह महसूस होती है।

एक फ़िल्म के रूप में इससे बड़ी जीत क्या हो सकती है कि वह समाज को आईना दिखाये, असुविधाजनक सवाल पूछे और विचारों को जीवित रखे। ऐसी फ़िल्में का बनते रहना ही हमारे लोकतंत्र और समाज की सबसे बड़ी ताक़त है।

और ये ट्रिविया भी…

  • उस समय सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष शर्मिला टैगोर थीं, जो सोहा अली खान (सोनिया) की मां हैं। विशेष स्क्रीनिंग के बाद, रक्षा मंत्रालय ने किसी भी प्रकार की कटौती पर ज़ोर नहीं दिया, लेकिन उनकी सिफ़ारिश पर फ़िल्म मे दिवंगत मिग पायलटों को समर्पित स्लाइड में और नाम जोड़े गये।
  • रंग दे बसंती का गाना “रूबरू” डीप ब्लू समथिंग के “ब्रेकफ़ास्ट एट टिफ़नीज़” से और
    “लुका छुप्पी” का इंट्रो पिंक फ्लॉयड के “डॉग्स” के इंट्रो से लिया गया था।
  • 2011 में राजकुमार गुप्ता निर्देशित फ़िल्म नोवन किल्ड जेसिका के एक दृश्य में एक युवा को ‘रंग दे बसंती’ फ़िल्म देखने के बाद कैंडल मार्च का आइडिया आता है और वह जेसिका को इंसाफ़ दिलाने के लिए ऐसी मुहिम मोबाइल फ़ोन पर मैसेज के ज़रिये छेड़ देती है। बाद की कुछ और फ़िल्मों में भी किसी रंग दे बसंती संदर्भ के तौर पर नज़र आती रही है।
मानस, विवेक त्रिपाठी, vivek tripathi, maanas

मानस

विवेक त्रिपाठी उर्फ़ मानस पूर्व बैंककर्मी हैं लेकिन फ़िल्मों के जुनून ने नौकरी छुड़वायी और फ़िल्में बनाने की दिशा में प्रेरित किया। आधा दर्जन शॉर्ट फ़िल्में बना चुके मानस की कुछ फ़िल्मों को फ़ेस्टिवलों में सराहना व पुरस्कार मिले हैं। फ़िल्म लेखन व निर्देशन के अलावा मानस का एक कहानी संग्रह 'बालकनी' प्रकाशित है। इन दिनों वह पूरी लंबाई की फ़िल्म के निर्माण के लिए संघर्षरत हैं।

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