
- January 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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रति सक्सेना साहित्य की दुनिया में भली-भांति पहचानी जाती हैं। वर्ल्ड पोएट्री मूवमेंट और कृत्या पोएट्री फ़ेस्टिवल उनकी शख़्सियत के पर्याय बन चुके हैं। ratisaxena.com पर उनके व्यक्तित्व व कृतित्व के विस्तृत ब्योरे हैं। सहायक प्राध्यापक सागर शर्मा ने रचना प्रक्रिया को लेकर रति सक्सेना से बातचीत की, मूल अंग्रेज़ी में दर्ज इस साक्षात्कार को हिंदी पाठकों के लिए आब-ओ-हवा अनुवाद रूप में प्रस्तुत कर रहा है...
कविता को नये संदर्भों में समझना होगा: रति सक्सेना
सागर कुमार शर्मा: आपके लिए कविता है क्या, कोई रहस्योद्घाटन? हां तो किस तरह? कोई विरेचन? कोई घोषणा या फिर आत्मावलोकन? या और कुछ?
रति सक्सेना: मेरे लिए कविता किसी एक प्रकार की अभिव्यक्ति नहीं बल्कि यह स्वत:स्फूर्त रही है। परिवार में साहित्यिक पृष्ठभूमि के अभाव में भी मैं स्वयं को कविता के माध्यम से अभिव्यक्त कर पाती हूं तो यह अपने आप में एक वरदान रहा है। हां, यह ज़रूर कि मैं कच्ची उम्र से ही साहित्य, विशेषकर कहानियों की पाठक रही, शायद जैसे हर बच्चा या किशोर होता हो। यह भी आश्चर्य ही रहा कि मैंने पहली बार ख़ुद को कविता के माध्यम से अभिव्यक्त किया और वह भी एक ऐसी शैली में जिससे मैं अनजान ही थी। हिंदी को चूंकि कभी विषय की तरह पढ़ा नहीं इसलिए मैं कविता के आधुनिकतावाद से अपरिचित थी, फिर भी संस्कृत की विद्यार्थी होने के कारण पारंपरिक काव्य से परिचय था। मज़े की बात यह है कि कविता मेरा पहला प्रेम नहीं रही। सकूल और कॉलेज में अभिनय, थिएटर, वाद-विवाद, परिचर्चा आदि की ओर रुजहान अधिक था। शायद इसलिए कि मैं बहिर्मुखी रही। जैसा कि ‘यिन एंड येंग’ में दाओ (ताओ) ने कहा था, वाचाल व्यक्ति अधिक अकेला होता है, उसी तरह मैं कह सकती हूं हर तेज़ स्वर के पीछे एक शांत दर्द होता है। तो, शुरूआती दौर में कविता मेरे लिए विरेचन अधिक रही, फिर यह रहस्योद्घाटन और बाद की उम्र में आत्मावलोकन होती गयी।

सागर: आप एक स्थापित कवि, आलोचक, अनुवादक और सम्मानित स्कॉलर हैं। आपके नाम अनेक प्रकाशन हैं। यह बताइए कि आप अपने लेखन के प्रति कैसी आलोचक हैं?
रति: अपने लेखन के प्रति सभी को आलोचक होना ही चाहिए। अपनी बात करूं तो मैं हमेशा कुछ न कुछ सुधार करना चाहती हूं। मैं अपने लेखन को परफ़ेक्ट नहीं पाती। लेकिन एक सीमा के बाद यह संभव नहीं हो पाता और तब मैं अपने लेखन में सुधार की प्रक्रिया से दूरी बना लेती हूं। कविता, मेरे लिए सिर्फ़ एक भावुक या बौद्धिक काम नहीं है बल्कि मुझे लगता है कि कुछ चित्रों/दृश्यों के रूप में कविताएं कवि तक पहुंचती हैं और कवि उन्हें शब्द देता है। मैं यह भी महसूसती हूं कि कविताएं काग़ज़ पर ही पनपती हैं और कोई भी कवि सिर्फ़ अच्छी कविताएं ही लिखे, संभव नहीं है। कुछ कविताएं अच्छी होंगी, कुछ बेहतर और कुछ सामान्य।
सागर: मैथ्यू अर्नाल्ड के अनुसार ‘किसी बात को कहने के लिए कविता सबसे सुंदर और काफ़ी असरदार सलीक़ा है और इसीलिए यह महत्वपूर्ण है’। आपके लिए क्या अधिक महत्वपूर्ण है कथ्य या शैली?
रति: भारतीय काव्यशास्त्र कथ्य एवं शैली दोनों को ही महत्व देता है। पारंपरिक भारतीय काव्यशास्त्र हमारे सामने विभिन्न शैलियों का संसार खोल देता है। इन्हें हम ‘छंद’ कहते हैं। वैदिक ऋचाओं में तीन तत्व हैं: पहला देवता (जिसके लिए ऋचा की रचना हो), दूसरा है ऋषि (अर्थात कवि) और तीसरा है छंद (शैली)।
हमने शताब्दियों तक छंद का अनुसरण किया, लेकिन समकालीन यथार्थ जब काफ़ी कठोर, अधिक जटिल हुआ एक सामाजिक लयभंग हुआ। इसीलिए हम कह सकते हैं कि समकालीन कविता में भी लय का लोप हुआ। मेरी कविता भी इसी क्रम में है, मैं छंदों या लयबद्ध शैली का अनुसरण नहीं करती। लेकिन मेरी कविता में एक अंतर्लय है। आप जब इन कविताओं को पढ़ेंगे तो महसूस करेंगे कि इनमें किसी प्रकार की अंतर्गुम्फित लय है। इस संबंध में, मैं महसूस करती हूं कि एक कवि को सभी काव्य रूपों में, लयबद्ध पारंपरिक काव्य के अनुसार भी सृजन करना चाहिए।
सागर: कविता में संगीत और संगीत की कविता के बारे में अपने विचारों से अवगत करवाइए।
रति: अनेक भाषाओं में संगीत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है और बहुत शुरूआती समय से कविता का आधार संगीत रहा है। समकाल में भी, उदाहरण के तौर पर, मलयालम में कविताओं को छंदों में पढ़ा और अक्सर गाया जाता है। यूरोप में, कविता के साथ संगीत (अधिकतर पार्श्व में) की संगत रहती है। यूरोपीय देशों में, मैंने भी अपनी कविताओं को संगीत के साथ प्रस्तुत किया है। लेकिन वर्तमान समय में, तकनीक का हस्तक्षेप इतना है कि हम छोटे-छोटे अवसरों पर गाना-गुनगुनाना भूल चुके हैं, जो हमारी विरासत रही। यही कारण है कि अब कविता भी संगीत से दूर जा रही है। कहते हैं जब दुनिया ही लय खो रही है तो कविता क्यों नहीं! फिर भी मुझे लगता है कि कविता में संगीत होना महत्वपूर्ण है।
सागर: क्या आप महसूसती हैं कि कविता अन्य कलाओं के लिए भी प्रवेशद्वार है? और यह भी चर्चा रही कि कविता सामाजिक परिवर्तन की वाहक है, आपके क्या विचार हैं?
रति: हां, यहां मैं 2005 से शुरू हुए कृत्या उत्सव के उदाहरण से बात करना चाहूंगी। यह पहला काव्य उत्सव था। हमारा मंत्र था- “हम गाएं कविता, नाचें कविता, रंगों में चित्रित करें कविता”- इसका मूल यही था कि कविता वास्तव में सभी कला रूपों की आत्मा है। कृत्या पोएट्री फ़ेस्टिवल में हमने ‘जुगलबंदी’ को एक रिवाज बनाया और काव्य और चित्रकला एवं काव्य आधारित फ़िल्में प्रस्तुत की गयीं।
सागर: मैं प्रश्न का दूसरा हिस्सा दूसरे ढंग से रखूं कि आपके अनुसार कवियों के सामाजिक दायित्व क्या हैं? और आपको लगता है कि उनका निर्वाह हो पा रहा है?
रति: मैं केरल में रहती हूं और यहां मैं देखती हूं कि हमारी पूर्व पीढ़ी के कवि समाज से गहरे संबद्ध रहे। महान कवि सुगत कुमारी आदिवासी महिलाओं, पशु अधिकारों आदि मुद्दों के लिए काम करती थीं। बाद में उन्होंने उन लड़कियों के लिए आश्रम बनाया, जो अपने संबंधियों/परिवारों द्वारा त्याग दी जाती थीं और सड़कों पर मानसिक रोगों की शिकार होती थीं या वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर। वह पशु अधिकारों के लिए खड़ी हुईं। ढोल की थापों पर घंटों तक हज़ार हाथियों को खड़ा रखने वाले त्रिशूरपुरम का उन्होंने विरोध किया था। जब एक कवि एक सही दिशा में विचार शुरू करता है तो अन्य कलाकार और युवा उसका अनुसरण करते हैं। यही कारण है कि सुगत कुमारी के पशु रक्षा अभियान के साथ अनेक युवा कवि जुड़ते गये।
कुछ देशों में, दीवारों, रेलवे स्टेशनों, हवाई अड्डों आदि पर कविताएं दर्ज हैं। ये कथन लोगों के लिए किसी पवित्र ग्रंथ जैसी भूमिका निभाते हैं। मैं शिद्दत से मानती हूं कि कवियों, कलाकारों, अभिनेताओं को समाज के लिए उद्यत होना चाहिए। चूंकि इधर, अधिकांशत: कवि बहुत संपन्न नहीं होते, तो वे अपनी रचनात्मकता के ज़रिये एक सकारात्मक परिवर्तन के लिए सामाजिक अभियानों से जुड़ सकते हैं।
सागर: आपने अपनी कविताओं में महिलाओं के मुद्दों पर विपुल लेखन किया है। समकालीन कविता में लैंगिकता की भूमिका को नये ढंग से परिभाषित करने का एक प्रयास जारी भी है। तो इस समय के संदर्भ में, फ़ेमिनिज़म और रचनात्मक कला रूपों में इसके व्यक्त हो पाने का आंकलन आप किस प्रकार करती हैं?
रति: मैं यूरोपीय क़िस्म के फ़ेमिनिज़म में विश्वास नहीं रख पाती। हमारे देश में महिलाओं की अनेक समस्याएं हैं, उदाहरण के लिए लड़कियों के लिए शिक्षा (विशेषकर छोटे शहरों में), अपनी पसंद/इच्छा से शादी की आज़ादी और दहेज से छुटकारा व महिलाओं की सुरक्षा आदि। महिला को मानसिक मज़बूती के साथ परिपक्व होना चाहिए और समाज के लिए उपयोगी।
मैं दो मलयालम कवियों के उदाहरण आपके सामने रखती हूं, बालमोन्यम्मा और कमला दास। कमला दास प्रसिद्ध फ़ेमिनिस्ट कवि रहीं, जिन्होंने दैहिक प्रेम और दैहिक स्वतंत्रता के बारे में खुलकर अभिव्यक्तियां दीं। जबकि उनकी मां, बालमोन्यम्मा को नातिनों, पोतियों आदि के बारे में बहुलता से लिखने के कारण, आलोचकों ने हमेशा ‘अम्मा कवि’ के नाम से ही पुकारा। लेकिन सच यह है कि उन्होंने पौराणिक देवियों के बारे में उत्कृष्ट प्रामाणिकता के साथ बहुत लेखन किया है। यही नहीं बल्कि पौराणिक कथाओं में नायक रूप में वर्णित वाल्मीकि, परशुराम, विभीषण जैसे पुरुष चरित्रों पर उन्होंने प्रश्न भी उठाये। उनके नारी पात्र काफ़ी सशक्त थे और यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं कि उन्हें कमला दास से ज़रा भी कम दर्जे का फ़ेमिनिस्ट नहीं कहा जा सकता। तो, इसलिए फ़ेमिनिज़म की परिभाषाओं, अवधारणाओं और समझ के पुनर्मूल्यांकन की महती आवश्यकता बनी हुई है।
सागर: भीतरी और बाहरी द्वंद्वों से निपटने में कविता आपकी मदद कैसे करती है?
रति: यहां मैं अपनी नयी पुस्तक ‘द फ़िस्ट विच ओपन्स’ के बारे में चर्चा करना चाहूंगी। यह पुस्तक असल में मेरे उस दीर्घकालिक शोध का नतीजा है, जो मैंने तन व मन के रोगों से लड़ने के लिए कविता को एक थेरेपी के रूप में देखने के संदर्भ में किया। भाषा के संदर्भ में, कविता और विज्ञान काफ़ी अलग हैं। विज्ञान की तुलना में कविता में भाषा की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण है। कविता के संदर्भ में भाषा, एक बड़े स्तर पर अवचेतन के साथ संबद्ध है जबकि विज्ञान में तर्क के साथ इसलिए भाषा की भूमिका वहां सीमित है। कविता में ऐसी शब्दावली को लक्ष्य किया जाता है जो अनेकार्थी हो, अर्थात व्यंजनापूर्ण हो जबकि विज्ञान इससे बचता है। यह भी है कि विज्ञान की विभिन्न शाखाओं की तुलना में कविता के लिए आपको बहुत बड़ी शब्दावली चाहिए होती है। उदाहरण के लिए गणित में, प्रतीकों को शब्दों के बदले प्रयुक्त किया जा सकता है और शब्द व चिह्न संबद्ध व परिभाषित होते हैं ताकि उन पर आधारित सघन सूत्र बनाये जा सकें। लेकिन, कभी-कभी इन प्रतीकों की व्याख्या की ज़रूरत होती है। गणित सिर्फ़ प्राकृतिक प्रक्रियाओं का वर्णन ही नहीं करता, बल्कि यह प्रकृति में ही मौजूद है। कविता वह माध्यम है, जो आपको गहरे उतरने के योग्य बनाती है। यह आपको प्रकृति और अपने परिवेश के साथ जुड़ने में मदद करती है।
भाषा प्रकृति की ही गूंज है। हालांकि यह मानवनिर्मित है फिर भी इसने मनुष्य को उन्नति के उन सोपानों तक स्थापित किया है, जहां अन्य प्राणी कभी पहुंच नहीं सके। हम देखते हैं पहले के समय में कविता को रोगियों के लिए एक चिकित्सा की तरह उपयोग में लाया जाता था क्योंकि यह मानवीय भावनाओं की नैसर्गिक अभिव्यक्ति पर आधारित थी। आज के समय में लोक आभासी सच की दुनिया में जी रहे हैं, जीवन्त समाज संपर्क नगण्य है यानी सामाजिक संबंधों का ताना-बाना तकनीक की भेंट चढ़ चुका है। जीवन जीने का ढब दिन-ब-दिन पेचीदा होता जा रहा है। कुछ ही वक़्त पहले तक कैंसर एक दुर्लभ रोग था लेकिन अब जैसे हर तरफ़ है, इतनी आम बात हो गया है। तो शरीर या मन के गंभीर दुख-दर्द में हमें दवाओं के अलावा और भी कई वैकल्पिक इलाजों की ज़रूरत है। एक हमदर्द और रचनात्मक मन वाला व्यक्ति एक मरीज़ के लिए जल्द मददगार हो सकता है। तो, यही कारण है कि हमें कविता को और आधुनिकतर ज़रूरतों के परिप्रेक्ष्य में समझने और अपनाने की ज़रूरत है।
सागर: अंतत: उभरते हुए कवियों के लिए आपका संदेश?
रति: मैं मानती हूं कवि को हमेशा कवि बने रहना चाहिए और ख़ुद अपना गुरु होना चाहिए। जब कविता किसी और के द्वारा सिखायी जाती है तब जो सीख रहा है, उसकी मौलिकता का ह्रास होता है। अच्छे कवियों को पढ़ना चाहिए लेकिन नक़ल के उद्देश्य से नहीं। साथ ही साथ कवि अपने अंतस की आवाज़ ज़रूर सुने, ग़ुजरते पलों को सोख पाने के लिए ख़ुद को समय दें और कविता को अपने आप पर थोपे नहीं। नवोदित कवियों को यह बात सीखना चाहिए कि शब्दों को बरतते हुए कुशाग्र कैसे रहना है और उसी समय बिम्बों के मामले में उदार कैसे। कुल मिलाकर कवि को बहुत अच्छा आब्ज़र्वर होना चाहिए।

सागर कुमार शर्मा
इगनू से अंग्रेज़ी में पीएच.डी. के बाद डॉ. सागर असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय जर्नलों में अनेक शोध पत्र प्रकाशित हैं और आप 'राइटर्स स्पीक' पुस्तक का संपादन कर चुके हैं। यूजीसी से एस.आर.एफ़. अवार्डी सागर अनुवाद, रचनात्मक लेखन व साहित्य अध्ययन में रुचि रखते हुए दिल से ख़ुद को कवि, मिज़ाज से शोधकर्ता और कलाप्रेमी मानते हैं।
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अच्छी बातचीत।