
- January 30, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग निशांत कौशिक की कलम से
डिकेन्स कृत 'ग्रेट एक्सपेक्टेशन्स'... एक पाठ
‘ग्रेट एक्सपेक्टेशन्स’ उन उपन्यासों में से एक है, जिसे मैंने अपने जीवन के शुरूआती दौर में पढ़ा था -लगभग सत्रह वर्ष की उम्र में- जब मैं अभी अंग्रेज़ी सीख ही रहा था और मेरी शिक्षा का मुख्य माध्यम हिंदी था। बाद के वर्षों में मैंने इस उपन्यास पर बनी फ़िल्में भी देखीं, जिससे इसकी कहानी किसी न किसी रूप में मेरी स्मृति में बनी रही।
क़रीब 2012 के आसपास, जब चार्ल्स डिकेन्स (1812) और सआदत हसन मंटो (1912) की द्विशताब्दी और जन्म-शताब्दी मनायी जा रही थी, तब मेरे विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग में डिकेन्स के लेखन पर कार्यक्रम और चर्चाएँ हुईं। उसी संदर्भ में मैंने डिकेन्स को दोबारा पढ़ा। इस पुनर्पाठ के दौरान उनके लेखन के कुछ असहज पहलू भी सामने आये-विशेष रूप से ब्रिटिश साम्राज्य के दौर में भारत को लेकर उनकी दृष्टि और अश्वेत लोगों के प्रति उनका रवैया- जिन्हें आज नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
इसके बावजूद, डिकेन्स को पढ़ने का अनुभव स्मृति से मिट नहीं पाया। इसी समय, फ़िराक़ गोरखपुरी के एक पुराने साक्षात्कार के माध्यम से मुझे यह समझने में मदद मिली कि डिकेन्स ने अंग्रेज़ी उपन्यास को किस तरह एक अधिक यथार्थपरक दिशा दी। उनके उपन्यासों का संसार यदा-कदा कठोर विक्टोरियन नैतिकता से छिटकता है और तत्कालीन अंग्रेज़ी सेन्सिबिलिटी को भी कुछ अलग रास्ते पर लाता है।
‘ग्रेट एक्सपेक्टेशन्स’ पिप नाम के एक अनाथ बच्चे की कथा है, जिसे उसके गाँव में उसकी ग़ुस्सैल बहन और उसके लोहार पति जो-गार्गरी ने पाला-पोसा है। बचपन में पिप एक भागे हुए क़ैदी, एबेल मैगविच की मदद करता है, जो आगे उसकी ज़िंदगी को अप्रत्याशित तरीक़ों से बदल देता है। पिप को एक अनजान मददगार से पैसे मिलते हैं और उसे एक “जेंटलमैन” की तरह शिक्षा पाने के लिए लंदन भेजा जाता है। इस वक़्फ़े में पिप अपने उस संसार और घर से हर तरह से दूर हो जाता है, जिन्होंने उसकी मदद और परवा की थी।
यहाँ से और ‘जेंटलमैन’ बनने के इस क्रम में उपन्यास अपनी घटनाओं में ज़्यादा इस बात पर टिका हुआ है कि पिप का ख़ुद के बारे में और दूसरों के बारे में नज़रिया धीरे-धीरे कैसे बदलता है। सैटिस हाउस में बिताया गया उसका समय, ख़ासकर एस्टेला के साथ उसकी मुलाक़ातें और पिप के प्रति एस्टेला का व्यवहार, पिप के भीतर अपने ही जीवन को लेकर एक तरह की शर्म का भाव पैदा करता है। डिकेन्स की यह उस्तादी है कि यह शर्म अपनी शुरूआत में न तो चटख होती है और न ही नाटकीय, लेकिन धीरे-धीरे इसी शर्म के चलते पिप अतीत को भिन्न तरह से देखने लगता है। वह अपनी बहन और उसके पति के पालन-पोषण और जीवन-मूल्यों को पूरी तरह रद्द नहीं करता, लेकिन अब वे मूल्य जीवन के लिए पिप को अपर्याप्त लगने लगते हैं।

लंदन आने पर डिकेन्स पिप में उसकी आदतों के ज़रिये दिखाते हैं कि वह किस तरह रोज़-ब-रोज़ अपने मूल स्वभाव से विलग होता जाता है, जैसे क़र्ज़, टालमटोल और अन्य लापरवाइयाँ। डिकेन्स लंदन को सीधे-सीधे, आज के अर्थों में एक भ्रष्ट शहर की तरह दिखाने से बचते हैं, लेकिन पिप के किरदार और उसकी जीवनशैली के माध्यम से यह बताते हैं कि वह अब एक आरामतलब ज़िंदगी में है, जहाँ सुविधाएँ हैं, साधन हैं और जीने का एक आरामदायक ढंग है- और इन सबका एक छुपा हुआ भुगतान भी। अब पिप की अपनी बहन को लिखी चिट्ठियाँ भी बहुत औपचारिक हो जाती हैं और कम लिखी जाने लगती और पिप का अलगाव पूरी तरह सामने आने लगता है।
यह पता चलना कि वह अनजान मददगार, जिसने पिप को लंदन पढ़ने-लिखने भेजा था, दरअसल वही भागा हुआ क़ैदी मैगविच था पिप को झकझोर देता है। पिप अब जिस तरह का व्यक्ति बन चुका है, उसके भीतर वर्ग और आर्थिक मान्यताओं का एक सरल लेकिन कठोर समीकरण बस चुका है। इसीलिए मैगविच के सच को स्वीकार करने में होने वाली शुरूआती बेचैनी, विरोध और अंततः स्वीकृति के माध्यम से डिकेन्स दिखाते हैं कि पिप के भीतर वर्ग की भ्रामक और सरलीकृत धारणाएँ किस क़दर गहराई से बसी हुई थीं।
पिप और मैगविच के बीच का रिश्ता अपने स्वरूप में असहज है। मैगविच एक घोषित अपराधी रहा है और अब पिप यह भी जानता है कि उसी ने उसकी शिक्षा और जीवन में मदद की। भले ही यह मदद मैगविच की अपनी ज़िंदगी को एक अर्थ देने का प्रयास रही हो, लेकिन डिकेन्स इन दोनों किरदारों के रिश्ते को न तो आसान बनाते हैं और न ही पूरी तरह सुलझाकर रखते हैं।
एस्टेला का किरदार भी दूसरी तरफ़ पिप के साथ-साथ विकसित होता है। वहाँ भी एक तरह का अधूरापन है। मिस हैविशम ने एस्टेला को पाला है और इस पालन में भावनात्मक पोषण और आज़ादी की जगह लगभग नगण्य रही है। इसी कारण एस्टेला का प्रेम या लगाव पिप के प्रति कभी पारस्परिक नहीं हो पाता। वह अपनी सीमाओं के प्रति इतनी सजग है कि निष्ठुरता की हद तक चली जाती है। उसकी यह सजगता या समझदारी उसकी असमर्थता भी है। शायद डिकेन्स यह जताते हैं कि अपने शुरूआती दुखों और पीड़ाओं को जान भर लेने से वे हमारे जीवन से ग़ायब नहीं हो जाते। एस्टेला इसी विरोधाभास की छवि है।
अपने स्वरूप में यह उपन्यास अंततः कुछ त्रासद भी है। यह एक कमिंग ऑफ़ एज कथा है, लेकिन साथ ही लॉस ऑफ इनोसेंस की कहानी भी। डिकेन्स के लेखन-संसार में बच्चे अधिकतम जगह घेरते हैं और वे अक्सर किसी न किसी सामाजिक या निजी संक्रमण के प्रतीक होते हैं। ‘ग्रेट एक्सपेक्टेशन्स’ भी उसी परंपरा में शामिल है।

निशांत कौशिक
1991 में जन्मे निशांत ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली से तुर्की भाषा एवं साहित्य में स्नातक किया है। मुंबई विश्वविद्यालय से फ़ारसी में एडवांस डिप्लोमा किया है और फ़ारसी में ही एम.ए. में अध्ययनरत हैं। तुर्की, उर्दू, अज़रबैजानी, पंजाबी और अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित। पुणे में 2023 से नौकरी एवं रिहाइश।
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