
- February 28, 2026
- आब-ओ-हवा
- 2
पाक्षिक ब्लॉग भवेश दिलशाद की कलम से....
साहिर के नाम, औरतों के नाम
ये किरदार ये बातें बताती हैं कि तुम लोग
हवस की, गुनाहों की किसी रात का सच हो
दस एक बरस पहले ये दो मिसरे मैंने किसी ग़ज़लिया नज़्म में बांधे थे। मेरी हमसफ़र और एक मेरे सुख़नफ़हम दोस्त का कहना था इन मिसरों का मफ़हूम पेचीदा है। तब मैंने उनसे अपनी एक समझ बांटी। मेरा ख़याल कि इस देस-दुनिया में नफ़रत या ज़ुल्म या फिर वहशत के हावी होने की जड़ में ज़ियादातर पैदाइशों का मुहब्बतों के बजाय हवस की देन होना है। शादियां और आबादियां दिल का मामला शायद सबसे आख़िर में हैं। और यही साइकी है, सदियों से।
इस ख़याल से रज़ामंदी ज़ाहिर करने में शायद सभी सुनने वालों को एक हिचक तो रही। ये ख़याल किस तरह आये होंगे, मैं एकदम तो नहीं कह सकता। होता यूं है कि कुछ बातें हमारे सबकॉन्शियस में रह जाती हैं। ऐसा कुछ मैंने कहीं अदब में पढ़ा हो, न तब याद था और न अब। मैंने अपना समाज देखा, तमाम हलचलें पढ़ी, सुनी थीं, तो यह साफ़ था कि रिश्ते निभाने से ज़ियादा ढोये जाते हैं।
ऐसा नहीं कि तब तक शायरी की दुनिया से नावाकिफ़ था। कुछ शायर पसंदीदा रहे तो नौजवानी के दौर में उनका जो लिखा जहां मिलता, पढ़ लेता था, लेकिन कमबख़्त याद! हां बहुत-कुछ अवचेतन वाला मामला ज़रूर रहा होगा ही। फिर हुआ यूं कि अभी तीन-चार बरस पहले साहिर लुधियानवी की किताबें ख़रीदीं। ठहरकर पढ़ा। साहिर के यहां अभी कुछ वक़्त पहले दो मिसरे मिले:
जब्र से नस्ल बढ़े ज़ुल्म से तन मेल करें
ये अमल हममें है बे-इल्म परिंदों में नहीं
पढ़ंत की लय में इन मिसरों से होकर गुज़र गया। कुछ और पन्ने उलट लेने के बाद, कुछ रोज़ बाद अचानक कौंधा, ये मिसरे तो मेरे वही ख़याल थे, जिन पर अपने यारों से कब बात हुई थी! अब मुझे पता नहीं मैं अपने इन मिसरों का क्या करूं!
अस्ल में, चकले, औरत ने जनम दिया मर्दों को, मता-ए-ग़ैर जैसी कुछ पॉपुलर नज़्मों से आशनाई रही। कहते हैं जो चीज़ आडियो या विज़ुअल माध्यमों से आपके कानों या आंखों के रास्ते आती है, उसे याद रखना आसान होता है। साहिर के यहां चूंकि बहुत-सी कम या अनसुनी शायरी है, जो सिनेमा भी नहीं आयी और संगीत में भी, तो मेरे साथ भी यह हुआ कि एकदम से वह सब याद में नहीं रह पाता।
ये दो मिसरे उस नज़्म के बीच मिले, जो ‘लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं’ मिसरे से शुरू होती है। यह नज़्म भी ‘औरत ने जनम दिया मर्दों को’ वाली टोन में ही है पर इसका सुर उतना पंचम नहीं है। मुझे इतना इल्म है कि पंचम अचल स्वर है पर ‘उतना पंचम’ को और कैसे कहूं! शायद स्केल या सप्तक के अंतर का एहसास हो…
साहिर के यहां औरतों से वाबस्ता जो शायरी है, उससे मेरे ख़यालों की दुनिया कई सत्हों पर टकराती है, यह इस टकराहट से गूंज कम और नये आकार ज़ियादा उभर आते हैं। एक और क़िस्सा ग़ज़ल की रवायती समझ को लेकर है। मैंने परंपरावादी लोगों को अक्सर कहते सुना कि ग़ज़ल औरतों से या माशूक़ से गुफ़्तगू करना है। इस दलील से ये लोग अक्सर ग़ज़ल पर नाज़ुकी और पर्दादारी थोपने का काम लेते हैं। बस, यहां मेरी खुली असहमतियां शुरू हो जाती हैं।
माशूक़ या औरतें अब कहां पर्दों में हैं! बहुत ही दक़ियानूसी लोगों की बात हम करें ही क्यूं? दूसरे यह कि औरतें बराबरी का हक़ तो पहले भी रखती थीं और अब हम देख रहे हैं क़ानूनी, समाजी और नैतिक मोर्चों पर लड़कर हक़ लेने को तैयार औरतें ख़ासी तादाद में हैं। आप ख़ुद सोचिए किसी सरकारी अकादमी की कुर्सी संभालने वाली एक ख़ातून अगर कहे चूंकि ग़ज़ल औरतों से बात करने की बात है, उसे पर्दादार होना ही चाहिए, तो? वह भी तब जबकि ख़ुद वह ख़ातून किसी पर्दे या हिजाब में नहीं आती और बड़ी कठोर दुनिया के साथ कंधे से कंधा मिलाये चल रही है… ऐसे मामलों में पढ़े-लिखे कहते हैं ऐसी औरतें भी कम कहां, जो पितृसत्तात्मक समाज या सोच की कठपुतलियां हैं।
औरतें दुनिया के मंच पर इसलिए दमदारी से दिख रही हैं क्योंकि टफ़ हालात से जूझकर बोल्ड फ़ैसले ले पा रही हैं। ऐसे में मुझ जैसा एक आदमी अपनी माशूक़, महबूबा, बीवी से या किसी दोस्त की शक्ल में मिलने वाली औरतों से किसी ख़ास क़िस्म की बात क्यूं नहीं कर सकता! हम दिल की, दिमाग़ की, रूह की, जिगर की, ख़ून की… आपस में हर बात कर पा रहे हैं। मेरी समझ से यह दलील सिवाय बकवास के कुछ नहीं कि ग़ज़ल चूंकि औरतों से बात करना है इसलिए उसके मफ़हूम नाज़ुक होने चाहिए या खुरदरी बातें ग़ज़ल में न हों।

यह बहस मैं अपने समकालीनों से कर रहा हूं। मुझे करना पड़ रही है जबकि साहिर कितने अरसे पहले कुछ हद तक यह भी कर गये। माज़ूरी और हमअस्र जैसी नज़्मों में वह औरतों को संबोधित कर रहे हैं और ज़माने भर की तल्ख़ियों की बातें कर रहे हैं। कुछ और जगह भी साहिर औरतों के सामने बड़े तल्ख़ मसअलों पर पूरे क़र्ब के साथ बात करते हैं।
‘औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया’, ज़रा ग़ौर कीजिए इस नज़्म को अगर गाना है, तो किसकी आवाज़ में गाया जाना चाहिए। शायद ऐसे किर्दार को, जो औरत और मर्द में बंटी इस दुनिया को देख रहा है, हालात बयान कर रहा है। लेकिन यह नज़्म लता जी की आवाज़ में है। फ़िल्म ‘साधना’ में वैजयंती माला पर्दे पर गुनगुनाते दिखती हैं। इतनी तल्ख़ नज़्म औरत की ज़ुबानी आती है। वह भी लता यानी उस गायिका के स्वर में जिसे उस दौर में शायद सबसे नाज़ुक और मुलायम आवाज़ कहा गया। क्या यह साहिर की ज़िद रही होगी? या फिर तमाम क्रिएटिव लोगों की एक साझा समझ?
अब यहां कुछ आलिम नुक़्ता निकाल सकते हैं, नज़्म में और ग़ज़ल में औरत के साथ अलग-अलग ज़ुबान और नज़र की बात है। इन आलिमों से पूछिए अपनी महबूबा या बीवी के साथ हमबिस्तरी करना है तो ग़ज़ल और रसोई में पसीना बहाकर भरपेट खाना देने वाली उसी औरत को डांटना, पीटना है तो नज़्म… यह लकीर किस मक्कार ने तय की है और कौन खोखले लोग हैं, इस लकीर को पीटने के क़ायल बने हुए हैं?
और फिर अपने समकालीन शायरों के बरअक्स साहिर के यहां औरतों का अलग रंग है। कैफ़ी कह रहे हैं ‘उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे’ और मजाज़ कह रहे हैं ‘तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था’ और फ़ैज़ कह रहे हैं ‘मुझ से पहली-सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग’… तब साहिर के यहां यही औरत, यही महबूबा कह रही है:
तुम अपना रंज-ओ-ग़म अपनी परेशानी मुझे दे दो
तुम्हें ग़म की क़सम इस दिल की वीरानी मुझे दे दो
मैं देखूँ तो सही दुनिया तुम्हें कैसे सताती है
कोई दिन के लिए अपनी निगहबानी मुझे दे दो
यह ग़ज़ल है। जगजीत कौर की आवाज़ इन मिसरों के साथ सुनायी देती है। इसे सुनते हुए या जगजीत कौर की गूंज को याद करते हुए पहला ख़याल यह आता ही नहीं कि इन मिसरों में कोई जेंडर बायस है ही नहीं। 60 साल से भी पहले की बात है साहिर के यहां औरत के आज़ाद, बुलंद और अपने अधिकारों को लेकर सजग होने के संदर्भ हैं। जहां मजबूरी है, ज़ुल्म है, वहां साहिर निज़ाम को लताड़ते हुए औरत के हक़ में, उसके साथ खड़े हैं। रहम करते हुए नहीं, मदद करते हुए नहीं, साथ देते हुए…
जावेद अख़्तर साहब को साहिर की सोहबतें ख़ूब मयस्सर रहीं। उन्होंने शबाना जी के लिए मजाज़ का मिसरा दोहराया, ‘मैं जिस दुनिया में रहता हूँ वो उस दुनिया की औरत है’। हम, जिन्हें साहिर की सोहबतें ज़िंदा-जावेद ‘जादू’ की तरह नहीं, रह गये अल्फ़ाज़ की बदौलत नसीब हैं, रह गयी आवाज़ और गूंज की तरह हासिल हैं… हम बोलना चाह रहे हैं कोई आदमी कब बोल पाएगा, ‘मैं उस दुनिया का मर्द हूँ, जो इस औरत की दुनिया है’…
(8 मार्च: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और साहिर लुधियानवी की जयंती)

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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बहुत ख़ूब बिरादरम, मगर ये बतलाओ कि फेमिनिस्ट होने के लिए क्या individualist की कुर्बानी देना लाज़िम है?
वैसे बारंगे साहिर और बारास्ते साहिर आपको जानना हमारे और यारों को अच्छा लगेगा, हम तो आपके कुछ और ग़ोशों से भी वाक़िफ़ जो ठहरे। कभी वो दूसरे महबूब शायर को भी आवाज़ देना, वैसे साहिर के साथ अभी और पहलू भी तो बाक़ी हैं… Good one again