शमशेर, shamsher bahadur singh
डॉ. अस्मिता सिंह की कलम से....

शमशेर: ग़ज़ल की ज़मीन पर

                ग़ज़ल उर्दू की केंद्रीय विधा है और अन्य विधाओं की तुलना में उसे सर्वाधिक लोकप्रियता प्राप्त है। इस लोकप्रियता का राज़ उसकी नाज़ुक़ ख़याली और अंदाज़े-बयां में मिलता है। मूलत: प्रेम की वाणी होने के कारण दिलो-दिमाग़ पर उसका बहुत गहरा असर पड़ता है और दरबारों में जो उसे इतनी जगह मिली, उसका कारण भी यही रहा कि ग़ज़लों से आदमी के दिल को अपनी ज़ुबान मिलती रही। शब्द जब अंदर की सारी उष्मा लेकर इंसान के जज़्बात की ओर इशारा करते हैं, एक डाल पर पास-पास बैठे दो पंछी जब गुफ़्तगू करने लगते हैं, पेड़ की उठती हुई कोई टहनी आसमान की नीली गहराइयों को छूने के लिए जब कसमसा उठती है, सुबह की किरणें जब अपने हल्के स्पर्श से सोयी हुई दूब को छूकर जगाने लगती है, वहां तब ग़ज़ल खड़ी होती है। आदमी को उसकी ख़ुदी से अलग कर ख़यालों में बांधने और बांधकर फिर ख़यालों में ही ऊंचा उठा देने की उसमें एक अजीब सी ताक़त होती है। एक हुनरमंद और रूह का सच्चा ग़ज़लगो चाहे यदि उसकी तासीर में ज़रा-सा हेर-फेर करके उसे इंसान के रूहानी बदलाव के काम में भी ला सकता है। इसलिए, ग़ज़ल का प्रमुख मुद्दा जहां प्रेम का उसके संयोग और वियोग पक्ष का बड़ी मार्मिकता से उद्घाटन करना रहा है, वहां मीर और ग़ालिब जैसे शायरों ने उसमें अपने आला ख़यालों को ढाल कर उसका इस्तेमाल इंसान को और ऊंचा उठाने के उद्देश्य से भी किया है।

इश्क़, इसमें कोई शक नहीं, ग़ज़ल की रूह में खड़ा रहता है मगर उसकी अहमियत ज़िंदगी की सच्चाइयों को लेकर खड़ी रहती है। इंसान, केवल इंसान से प्रेम करके ख़ुदा तक पहुंच सकता है, इंसान को भूलकर ख़ुदा रसीदा बनना बेकार है:

बंदे के दर्दे-दिल को कोई नहीं पहुंचता
हर एक बे-हक़ीक़त यां है ख़ुदा-रसीदा

“मीर उन अर्थों में इश्क़िया शायर नहीं है, जिन अर्थों में कोई समालोचक और अर्ध-रूमानी शायर उर्दू की सारी शायरी को जिंसियात (विलास) तक सीमित कर देना चाहते हैं। ग़ालिब ने भी ऐसी इश्क़िया शायरी से पनाह मांगी है और लिखा है कि आशिक़ाना शायरी से मैं उतना ही दूर हूं जितना कुफ़्र से ईमान हो सकता है। (ख़ुतूत-ए-ग़ालिब, गुलामरसूल मेहर, पृ 56) मीर के यहां इश्क़ एक असीम समुद्र है, जिसकी बहुत-सी मौजें हैं। मध्य युग में इंसान दोस्ती का सबसे बड़ा आंदोलन तसब्बुक के रूप में उभरा। भक्ति और मिस्टीसिज़म इसके ग़ैर इस्लामी रूप हैं। इन आंदोलनों का संबंध कारीगरों और किसानों की बग़ावतों से भी रहा है, लेकिन मीर के समय तक पहुंचते-पहुंचते केवल एक विचारधारा बाक़ी रह गयी थी, जो जागीरदारी समाज के मूल्यों से भिन्न मूल्य रखती थी और उनमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण वहदत-ए-इंसानी (मानवीय एकता) का तसव्वुर था धर्म, जाति और पेशों की बुनियाद पर बंट जाने वाले इंसानों को एक ही रिश्ते में पिरो लेता था।”

शमशेर, shamsher bahadur singh

ख़ुदा और इंसान का सीधा संबंध इश्क़ को पकड़कर ही खड़ा होता है। जाफ़री आगे लिखा है:

“इश्क़ और दिल दो शब्द हैं, जो इस तसव्वुर को पूरी तरह घेर लेते हैं। इश्क़ सबसे बड़ी भावना है दिल सबसे बड़ी वस्तु। काबा हो या मंदिर और मस्जिद, ये अगर टूट जाएं तो फिर बन सकते हैं लेकिन ‘दिल वो नगर नहीं कि फिर आबाद हो सके’ इसलिए दिल ढहाकर काबा बनाने से कुछ प्राप्त नहीं हो सकता। हज, नमाज़ या रोज़े से कोई आदमी नहीं बनता। ये दिखावटी आराधनाएं हैं। आदमी दिल से बनता है और दिल पीर-ओ-मुर्शिद है। इश्क़ का केंद्र है और इश्क़ ख़ुदा है। इस ब्रह्मांड का निर्माता है , उसका रंग-रूप है। इश्क़ ही जिलाता है, इश्क़ ही मारता है।”

इस प्रकार उर्दू शायरी में ख़यालात जब अपनी ऊंचाइयां हा​सिल कर लेते हैं, आदमी के प्रति आदमी का दैहिक आकर्षण और प्रेम अंत में मानव जाति और ख़ुदा से प्रेम में तब्दील हो जाता है। ग़रज़ यह कि उर्दू ग़ज़लों में प्रमुख मुद्दा – इश्क़िया ग़ज़लगोई से ऊपर उठकर सामाजिक चेतना – यहां तक कि विश्व-चिंता से भी जुड़ जाता है और ग़ज़ल तरन्नुम में आकर गुनगुनाने तक ही सीमित न रहकर हमारी जद्दोजहद में उद्बोधन के लिए एक कारगर माध्यम भी साबित होती है।

ग़ज़ल की तासीर में यह तब्दीली बहुत पीछे यानी बीसवीं सदी के आरंभ मिलने लगती है। ‘ग़ज़ल और शमशेर’ पर विचार करते हुए नरेंद्र वशिष्ठ ने लिखा है- “बीसवीं सदी के आरंभ में ग़ज़ल में एक क्रांतिकारी मोड़ आया। हाली ने इश्क़िया ग़ज़लगोई पर सामाजिक विषयों को ढालने वाली नज़्मगोई को तरजीह दी। प्रत्यक्ष रूप से यह ग़ज़ल की आलोचना थी किंतु परोक्ष रूप से इसने ग़ज़ल के क्षेत्र-विस्तार में बहुत मदद की। शायरों ने समाज-चेतना से संपृक्त अशआर कहना शुरू किये।”

फिर यदि ख़ुद शमशेर को ग़ज़ल में कोई पुरानापन नज़र नहीं आता तो इसके कुछ विशेष कारण हैं। एक तो यही कि शमशेर ऐसा नहीं मानते कि ग़ज़ल दरबारों से निकली हुई विधा है, “प्रगतिशील मूल्यों को अभिव्यक्ति देने में सक्षम है”।

इसके विपरीत वे कंटेंट और फ़ॉर्म के अंतर्संबंधों को रचना की बुनियादी शर्त मानते हैं। उनका कहना है, “कंटेंट स्वयं अपनी प्रकृति के मुताबिक़ फ़ॉर्म की तलाश करता है। एक सही रचनाकार बेहतर ढंग से जानता है कि उसे किस बात के लिए कौन-सा माध्यम चुनना है। मुझे ग़ज़ल में कोई पुरानापन नज़र नहीं आता।”

दूसरे, ग़ज़ल की पूरी ताक़त उसके अंदाज़ और इशारे में होती है और इसी के बल पर वह एक ‘इंतिहाइयत’ तक पहुंचती है। मतलब यह कि शमशेर के विचार से ग़ज़ल को बड़ी से बड़ी बात कहने के लिए चुना जा सकता है और यह ग़ज़ल कहने वाले की अपनी क़ूवत पर निर्भर करता है कि वह किसी मेधा विशेष का इस्तेमाल करते हुए कैसा असर पैदा करता है। इक़बाल कहते हैं:

कांपता है दिल तेरा अंदेशा-ए-तूफ़ां से क्या
नाख़ुदा तू वो भी तू कश्ती भी तू साहिल भी तू

इंसान की बुलंदी का यह ‘इंतिहाई गहरा’ अक्स, इसमें कोई शक नहीं कि, शमशेर की ग़ज़लों में भी अपना असर दिखाता है। “यह सलामी दोस्तों को है मगर मुट्ठियां तनती हैं दुश्मनों के लिए”, जैसा कलाम उनके एक उम्दा मिसाल होने के अलावे इस बात का भी सबूत हैं कि उनकी ग़ज़लों में ‘तख़य्युल’ की दुनिया से बाहर आकर हक़ीक़त की ज़मीन पर पहुंचने की जद्दोजहद खड़ी रहती है और इस क्रिया में उनकी ग़ज़ल, ग़ज़ल की ज़मीन से हटकर बिल्कुल अपनी ज़मीन तैयार करती मिलती है।

हिंदी और उर्दू के प्रकृतिगत अंतर को लेकर कुछ विशुद्धतावादियों का यह आक्षेप है कि शमशेर की ग़ज़लें हिंदी लिपि में लिखी उर्दू ग़ज़लें हैं। शमशेर की ही नहीं, हिंदी के अन्य कवियों की ग़ज़लों को लेकर भी यही शिकायत है। मगर शमशेर को इसे लेकर कोई परेशानी नहीं है। वे ग़ज़लों को अपनी कविताओं से अलग नहीं मानते। एक भेंट-वार्ता में जानकी प्रसाद शर्मा से उनका कहना है, “हिंदी-उर्दू भाषाएं मुझे कभी दो चीज़ें नहीं लगी हैं। मेरा प्रयास हमेशा यह रहा है इन दोनों भाषाओं के फ़र्क को दूर कर सकूं। ग़ज़ल भी लिरिक की एक विधा है, जिसकी अपनी एक सुस्पष्ट परंपरा है। मैंने उसमें रचना की है तो किसी विशिष्टता के ​दावे के साथ नहीं। यह तत्वत: हिंदी की रचनाएं हैं क्योंकि इनका मिज़ाज उर्दू शायरी का नहीं है।”

कुछ इसी तरह के सवालों का सामना दुष्यंत कुमार को भी करना पड़ा था। “मैं स्वीकार करता हूं..” में अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए दुष्यंत कुमार ने लिखा है: “उर्दू और हिंदी अपने-अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के पास आती हैं तो उनमें फ़र्क कर पाना बड़ा मुश्किल होता है। मेरी नीयत और कोशिश यह रही है कि इन दोनों भाषाओं को ज़्यादा से ज़्यादा क़रीब ला सकूं। इसलिए ये ग़ज़लें उस भाषा में कही गयी हैं, जिसे मैं बोलता हूं।”

दरअसल सच्ची सृजनशीलता की भी यही मांग होती है। एक सतर्क रचनाकार होने के नाते निराला हों या शमशेर, नागार्जुन और त्रिलोचन या फिर दुष्यंत कुमार — सबने हिंदी की ज़मीन पर खड़े होकर ग़ज़ल देने की कोशिश की है। और कुछ शैलीगत त्रुटियों के बावजूद उनकी ग़ज़लियत की अपनी-अपनी ख़ासियत और रंग-ओ-ख़ुशबू है। शमशेर जब ग़ज़ल की ज़मीन पर उतरते हैं, या शेर कहने पर आते हैं, उनकी ज़ुबान में कहीं-कहीं उनकी कविताओं से भी अधिक तेज़ी आ जाती है और ​वे दिलो-दिमाग़ को बहुत गहरे उतरकर छूते हैं:

ये सब सही है मगर ऐ मेरे दिले-नाशाद
कोई भी ग़म के सिवा दोस्‍त हो तो क्‍योंकर हो
चुपके से कोई कहता है शाइर नहीं हूँ में
क्यूँ अस्ल में हूँ जो वो ब-ज़ाहिर नहीं हूँ मैं
मैं कई बार मिट चुका हूंगा
वर्ना इस ज़िंदगी की इतनी धूम

ग़ज़लगो शमशेर, हमें यह कभी भी नहीं भुलाना होगा, पहले एक हिंदी कवि हैं और हालांकि उन पर मीर, ग़ालिब और इक़बाल जैसे शायरों का बहुत गहरा असर पड़ा है, वे खड़े हमेशा हिंदी की ज़मीन पर ही मिलते हैं और वहां भी यदि उर्दू की रूमानियत है तो हिंदी भाषा और संस्कृति की, रूहे-वतन की अहमियत भी खड़ी मिलती है। शमशेर ने अपने प्रिय शायर फ़ैज़ की चारित्रिक विशेषता का उद्घाटन करते हुए एक जगह लिखा है:

“फ़ैज़ वहीं है जहां असलियत बोलती है, भाषा की हदों से उठकर बोलती है और अपने लहजों के नर्म और गर्म तेवर से हमारी आज की ज़िंदगी के बहुत—से राज़ खोलती है… वो राज़ जिनसे रूह तो ​वाकिफ़ है मगर जिन पर बुर्जुआ और सामंती सियासत और तानाशाही ने शोषण और अत्याचार के धुआंधार पर्दे डाल रखे हैं, अगरचे वह बहुत कुछ ढंक नहीं पा रहे हैं। हां, इसी मंच पर फ़ैज़ की शायरी अपनी आवाज़ बुलंद करती है। फ़ैज़ की शायरी ऐसे ज़िंदा इशारों का पर्याय है, जो दर्द की चीख और कराह को कसकर अंदर ही अंदर दबाये और छुपाये हुए है मगर जो दरअसल दबते हैं न छुपाये छुपते हैं।”

यही शमशेर के विषय में भी कहा जा सकता है। हालांकि उनके हालात अलग खड़े हैं। मगर जहां तक इंसानी जज़्बात को ज़ुबान देने का सवाल है, वही कि जहां फ़ैज़ कहते हैं:

मता-ए-लौह-ओ-क़लम छिन गयी तो क्या ग़म है
कि ख़ूने दिल में डुबो ली हैं उंगलियां मैंने
ज़ुबां पे मोहर लगी है तो क्या कि रख दी है
हर एक हल्क:-ए-ज़ंजीर में ज़ुबां मैंने

वहीं शमशेर एक इंतिहाई नर्मी और बेइख़्तियारी के साथ अर्ज़ करते हैं:

हो चुकी जब ख़त्म अपनी ज़िंदगी की दास्तां
उनकी फ़रमाइश हुई है इसको दोबारा कहें

आग एक ही है जो हिंदी-उर्दू के अंतर को मिटाकर हमारी उपमहाद्वीपीय चेतना को जगाये हुए है और ज़ुल्मो-सितम के ख़िलाफ़ अपने हक़ के लिए उठ खड़े इंसान की आवाज़ बल्कि उसके इन्क़िलाबी इरादे को बुलंद किये हुए है। यदि दो-चार लफ़्ज़ों में कहना हो, शमशेर की शमशेरियत का यही राज़ है।

संदर्भ—संकेत
1. दीवान-ए-मीर
2. शमशेर की कविता
3. धरती, ग़ज़ल विशेषांक
4. साये में धूप
5. कुछ और कविताएं
6. उदिता
7. फ़ैज़, संपादक-शमशेर बहादुर सिंह, पृ 5

अस्मिता सिंह, asmita singh

अस्मिता सिंह

कहानीकार एवं आलोचक। लंबे समय तक मगध यूनिवर्सिटी और पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय में हिन्दी-साहित्य का अध्यापन। प्रमुख पुस्तकों में 'रंग से बेरंग होती ज़िंदगी', 'इन्तज़ार तो ख़त्म हुआ' (कहानी-संग्रह), 'फुलिया' (उपन्यास), 'शमशेर: अभिव्यक्ति की कशमकश (आलोचना पुस्तक), नारी मुक्ति: दशा एवं दिशा (नारी विमर्श), दलित अनुभव का सच (दलित-विमर्श) हैं। साथ ही, लू-शुन के पत्रों के अनुवाद और अन्य संकलित व संपादित पुस्तकें भी। बहुपठित एवं बहुप्रकाशित लेखक अस्मिता सिंह इन दिनों एस.ए. डांगे इंस्टीट्यूट आफ सोशलिस्ट स्टडीज़ एंड रिसर्च में निदेशक-प्रमुख हैं।

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