जातिवाद, मुस्लिम समाज में ऊँच-नीच की कहानियां
पाक्षिक ब्लॉग नमिता सिंह की कलम से....

जातिवाद, मुस्लिम समाज में ऊँच-नीच की कहानियां

     ‘तश्तरी’ सुहेल वहीद द्वारा संपादित मुस्लिम समाज में जातिगत ऊँच-नीच पर केंद्रित कहानियों का संग्रह है। सुहेल वहीद का नाम हिन्दी-उर्दू पत्रकारिता में चर्चित है। उर्दू दैनिक ‘क़ौमी आवाज़’, हिन्दी दैनिक ‘नवभारत टाइम्स’, ‘नई दुनिया’ और फिर उर्दू मासिक ‘नया दौर’ के संपादक भी रहे। ‘परस्तिश बर्क़ की’ (कहानी संग्रह) और ‘यादों की बारात’ (यात्रा-वृत्तांत) पुस्तकों के लेखक सुहेल वहीद अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हैं। इस संपादित पुस्तक में 19 कहानियाँ और एक लंबी विचारोत्तेजक भूमिका है जो बहस की मांग करती है।

सुहेल वहीद का यह कहना सही है कि “बज़ाहिर एक दिखने वाला, एक ही सफ़ या लाइन में बिना भेदभाव के मस्जिद में नमाज़ अदा करने वाला हिन्दुस्तानी मुस्लिम समाज, दर-हक़ीक़त दो बड़े हिस्सों ‘अशराफ़’ और ‘अजलाफ़’ में बँटा हुआ है…”। अशराफ़ यानि नस्ली ऐतबार से ऊँची जात के और अजलाफ़, नीचे समझे जाने वाले कमेरे वर्ग के। रोज़मर्रा के व्यवहार और सामाजिक वातावरण में यह भेदभाव मुस्लिम समाज में दिखायी नहीं देता, जबकि हिन्दू समाज जो मूलतः वर्ण व्यवस्था पर आधारित है और जात-पांत के भेदभाव को धर्मसम्मत कहा जाता है इसलिए यह आमतौर पर परंपरागत रूप से सहज स्वाभाविक लगता है। इसीलिए समाज सुधार आन्दोलनों में जातिभेद और अस्पृश्यता उन्मूलन का मुद्दा हमेशा मौजूद रहा। मुस्लिम समाज में भी यह ऊँच-नीच, अशराफ़-अजलाफ़ की सोच व्यवहार में तो रही लेकिन इसके ख़िलाफ़ कभी संगठित आवाज़ नहीं उठी। यह जातिगत भेदभाव हिन्दू समाज के संपर्क में आने से स्वाभाविक रूप से और बढ़ा जिसका ज़िक्र लेखक ने सल्तनत-कालीन इतिहास के प्रसंगों के आधार पर किया है।

सुहेल वहीद सर सैयद से लेकर चर्चित लेखकों रशीदजहाँ, इस्मत चुग़ताई, कुर्रतुल ऐन हैदर, शानी, सईद नक़वी, राही मासूम रज़ा, असग़र वजाहत, काज़ी अब्दुल सत्तार, बदीउज़्ज़्मा और अब्दुल बिस्मिल्लाह आदि लेखकों की कृतियों का वर्णन करते हैं। उनको शिकायत है कि ये सभी लेखक मुस्लिम समाज के भीतर व्याप्त जात-पांत के मुद्दे पर ख़ामोश थे और एक-दो को छोड़कर सभी अपने खानदान और जाति की उच्चता के भाव से ग्रसित थे। इसीलिए नीची जात के मुसलमानों के प्रति होने वाले सामाजिक अन्याय को उन्होंने अपना विषय नहीं बनाया।

मुझे लगता है सुहेल वहीद यहाँ स्वयं भी पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। पिछली सदी के उत्तरार्द्ध में स्त्री और दलित विमर्श साहित्य के केंद्र में थे, उस समय एक तीखी बहस लंबे समय तक लेखन का विषय बनी कि उच्च वर्ण के ग़ैर-दलित लेखक दलित जीवन और समस्याओं के प्रति न्याय नहीं कर सकते, ईमानदारी से उन्हें लेखन के केंद्र में नहीं रख सकते। यानि दलित लेखक ही दलितों के प्रति संवेदनशील हो सकता है और उनकी पक्षधरता कर सकता है। यह आधारहीन सतही बहस थी, सो ज़्यादा नहीं चली। दरअसल संवेदनशील और ज़रूरी सामाजिक मुद्दों पर जब राजनीति होने लगती है तो अक्सर भ्रामक स्थापनाएँ सामने आने लगती हैं। सुहेल वहीद लगातार राही मासूम रज़ा को सैय्यद राही मासूम रज़ा लिखते हैं।सईद नक़वी, काज़ी अब्दुल सत्तार, असग़र वजाहत को जातिगत उच्चता के भाव से भरा बताते हैं। बदीउज़्ज़्मा के ‘छाको की वापसी’ को ‘आधा गाँव’ से श्रेष्ठ बताते हैं। ‘आधा गाँव’ 1965 में छपा था और वो उसे 1985 में छपा हुआ बताकर ‘छाको की वापसी’ के साथ जोड़ते हैं लेकिन अब्दुल बिस्मिल्लाह के उपन्यास ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ का सही आंकलन भी करते हैं।

अनेक विसंगतियों और पूर्वाग्रहों के बावजूद कहा जाना चाहिए कि सुहेल वहीद ने पहली बार यह सवाल उठाया है कि मुस्लिम कथाकारों और उर्दू लेखकों ने जात-पांत के ग़ैर-बराबरी वाले रवैये पर क़लम क्यों नहीं चलायी, जिन पर हिन्दी में बहुत लिखा गया।

जातिवाद, मुस्लिम समाज में ऊँच-नीच की कहानियां

इस संग्रह की उल्लेखनीय कहानियों में वाजिदा तबस्सुम की बेहद चर्चित कहानी ‘उतरन’, ज़किया मशहदी की ‘गुड़ रोटी’, शमोएल अहमद की ‘चुनवा का हलाला’, ग़ज़नफ़र की ‘रमी का जोकर’, हुसैन उल हक़ की ‘फ़ितरी अमल’, अहमद सग़ीर की’ फ़ातिहा’, अनीस रफ़ी की ‘मौला दादा आएंगे’, सलमा जिलानी की ‘स्वीपर’, एम. मुबीन की ‘पारस’ और शूबी ज़हरा नक़वी की ‘तश्तरी’ हैं, जिनमें जात-पांत पर आधारित विविध प्रसंग हैं।

‘गुड़ रोटी’ में ढहता हुआ सामंती परिवेश है, लेकिन साहबज़ादी अभी भी अपनी जर्जर हवेली में बैठकर पुराने सेवकों, कारिन्दों को गुड़ रोटी बांटती हैं। पुराने सेवक झुनवा का नौजवान बेटा इसे लेने से इनकार कर देता है। वह जानता है कि इसी हवेली में उसके परदादा को पेड़ से बांधकर जूते मारे गये थे।

हुसैन उल हक़ की कहानी ‘फ़ितरी अमल’ में ऊँचे खानदान वाले रजब अली अब पढ़-लिख कर यूनिवर्सिटी में टीचर हैं। उनके बचपन की यादों में घरों का मैला उठाने वाली दिलजान बहू है, जिसका पोता ग़ुलाम अली बेग अब म्युनिसिपैलटी में क्लर्क हो गया है। एक समारोह में उनका सामना युवा छात्र नेता, सियासत का उभरता सितारा और प्रखर वक्ता एहतशाम बेग से होता है। बाद में पता चलता है कि वह दिलजान बहू का छोटा पोता है, तो रजब अली हैरान-परेशान होते हैं।

‘तश्तरी’ इस रूप में उल्लेखनीय है कि वह रेखांकित करती है कि खानदानी मुस्लिम परिवारों के लिए मैला उठाने वाले अछूत थे लेकिन नीची जात के हिन्दुओं के लिए भी हर मुस्लिम अछूत जैसा होता है। ‘चुनवा का हलाला’ में एक ग़रीब, छोटी जात के मुस्लिम युवा को धर्म के नाम पर मौलवी साहब ग़ैर-मज़हबी घोषित कर देते हैं। फिर से उसे इस्लाम में दीक्षित करने के बाद उसकी ख़ूबसूरत बीवी से से हलाला करते हैं, जिस पर उनकी पहले से नज़र थी।

बाक़ी अन्य कहानियों में भी संपन्न, खानदानी लोग कैसे विभिन्न स्तरों पर अपने मुलाज़िमों और ग़रीबों का शोषण करते हैं, वह प्रचलित सामाजिक रवैये को ही प्रस्तुत करता है। सुहेल वहीद द्वारा संपादित इस कहानी संग्रह को पढ़ना नयी संवेदना और अनुभवों से गुज़रना है। यह संग्रह विस्तृत समीक्षा की मांग करता है।

नमिता सिंह

नमिता सिंह

लखनऊ में पली बढ़ी।साहित्य, समाज और राजनीति की सोच यहीं से शुरू हुई तो विस्तार मिला अलीगढ़ जो जीवन की कर्मभूमि बनी।पी एच डी की थीसिस रसायन शास्त्र को समर्पित हुई तो आठ कहानी संग्रह ,दो उपन्यास के अलावा एक समीक्षा-आलोचना,एक साक्षात्कार संग्रह और एक स्त्री विमर्श की पुस्तक 'स्त्री-प्रश्न '।तीन संपादित पुस्तकें।पिछले वर्ष संस्मरणों की पुस्तक 'समय शिला पर'।कुछ हिन्दी साहित्य के शोध कर्ताओं को मेरे कथा साहित्य में कुछ ठीक लगा तो तीन पुस्तकें रचनाकर्म पर भीहैं।'फ़सादात की लायानियत -नमिता सिंह की कहानियाँ'-उर्दू में अनुवादित संग्रह। अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में कहानियों के अनुवाद। 'कर्फ्यू 'कहानी पर दूरदर्शन द्वारा टेलीफिल्म।

1 comment on “जातिवाद, मुस्लिम समाज में ऊँच-नीच की कहानियां

  1. आपने लिखा है –
    ‘ दरअसल संवेदनशील और जरूरी सामाजिक मुद्दों पर जब राजनीति होने लगती है तो अक्सर भ्रामक स्थापनाएँ सामने आने लगती हैं।’
    बहुत प्रासंगिक और विचारोत्तेजक टिप्पणी है।

    राही मासूम रज़ा नाम के साथ सैय्यद अन्य कहीं नहीं दिखाई दिया ,(उनके नाम के साथ सैय्यद लिखना ) इस पर टिप्पणी कर आपने एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई है।

    समीक्षा ने संकलन व उसकी कहानियों के केन्द्रित विषय के जरिए जटिल साहित्यिक विमर्श की भूमिका तैयार की है ।
    कहानियों के साथ विचारोत्तेजक भूमिका के प्रति भी जिज्ञासा होती है।

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