
- January 30, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग शम्पा शाह की कलम से....
सोनाबाई... अपने अकेलेपन से मौलिक प्रतिशोध
उनके घर के बरामदे में बनी मिट्टी की जालियों की ओर इशारा करते हुए जब मैं बार-बार सोनाबाई से पूछती- उस गोल-गोल आकारों से बनी जाली को क्या कहते हैं? और उस ऊपर वाली जाली का क्या नाम है जिसमें चिड़िया बैठी है? तो वह कह उठती हैं- “नहीं जानूं मैं! जब यह झिंझरी (जाली) बनायी थी तब क्या मालूम था कि कोई इनका नाम भी पूछेगा? तब तो जो कुछ मन में आता गया बनाती गयी। वैसे चाहो तो इसे चूड़ी झिंझरी और जिसमें चिड़िया बैठी है उसे पिंजरा झिंझरी कह सकते हैं।”
नहीं, सोना बाई ने अपने घर में यह सुंदर जालियां, यह जानवर, पक्षी, मानव आकृतियां इसलिए नहीं बनाये थे कि एक दिन लोग आकर उनसे इन सबके बारे में पूछें अथवा, इस सौंदर्य की सृष्टि के लिए उन्हें धन या मान देकर सम्मानित करें।
सोनाबाई ने बेशक यह सब न सोचा हो, न चाहा हो, लेकिन तथ्य यह है कि 1983 में जबसे पहले-पहल इस अभूतपूर्व घर के बारे में लोगों को पता चला, तब से देश-विदेश के कला मर्मज्ञों के यहाँ आने का सिलसिला अनवरत जारी है तथा धन-मान भी इनके पीछे-पीछे चला ही आया।
सोनाबाई रजवार के मिट्टी के घर में ऐसा क्या है जो इतने बिन बुलाये मेहमानों को बरबस खींच लाता है? और इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि सोनाबाई ने ऐसा घर क्यों बनाया?
सोनाबाई से पूछा, तो उन्होंने उसका सात शब्दों का सीधा-सा जवाब दिया- “घर सुघड़ लगेगा ऐसा सोचकर सहज बनाया था।”
सोनाबाई और उनके इकलौते बेटे श्री दरोगा राम के साथ कई-कई बार हुई अंतरंग बातचीतों के दौरान वो बातें सामने आयीं, जो सोना बाई के व्यक्तित्व तथा कृतित्व पर रोशनी डालती हैं और एक कलाकार के जन्म लेने, खिलने की पूरी प्रक्रिया को भी उजागर करती हैं।
सोनाबाई का घर
सात भाई-बहनों में से एक, सोनाबाई का जन्म छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के केनापारा गांव में, रजवार समुदाय के किसान परिवार में 1930 के आसपास हुआ था। 14 बरस की उम्र में उनका ब्याह पास के गांव पुहपुटरा के रहने वाले होलीराम रजवार के साथ हुआ। होलीराम तीन भाई थे। पिता की मृत्यु के बाद परिवार में ज़मीन-जायदाद का बंटवारा हुआ और तीनों भाई अलग-अलग हो गये। दो भाई तो पुश्तैनी घर में ही रहने लगे, लेकिन होलीराम ने अपना घर, बस्ती से दूर– खेतों के पास बनाया। पड़ोस के नाम पर पास में केवल एक पंडित जी का घर था। सोनाबाई-होलीराम का बेटा तब कुल एक माह का था इसलिए घर वालों ने इतनी दूर घर बनाने के लिए बहुत मना किया लेकिन वह नहीं माने और नये घर में रहने आ गये। जिस दिन वे लोग इस घर में रहने आने वाले थे, उसी दिन सुबह होलीराम को नाग के दर्शन हुए। दोनों ने ही इसे आशीर्वाद की तरह माना। नये घर में नयी गृहस्थी को नये सिरे से जमाना था। होलीराम सुबह से ही खेती-बाड़ी संभालने चले जाते।

जेठानियाँ बालक दरोगा राम को इतना पसंद करती थी कि दिनभर वे उसे अपने पास ही रखतीं, बीच-बीच में दूध पिलाने की गरज़ भर से बालक को मां के पास लाया जाता। न आस-पड़ोस, न घर में कोई बोलने वाला और फिर घर भी तो अभी अधूरा था- लिपाई, रंगाई अभी बाक़ी थी। सिर्फ़ दीवारों और छत से भला घर बनता है? कम से कम सोनाबाई का घर तो इतने से निश्चित ही नहीं बनता था।
मिट्टी और सोनाबाई
बचपन में सोनाबाई ने अपनी मां को घर की लिपाई-रंगाई करते देखा था और उनका हाथ भी बटाया था। बड़े परिवार में मां को फ़ुर्सत कहां थी लेकिन, छेरता त्योहार के समय मां जब घर लीपतीं, तो सादी लिपाई कभी नहीं करती थीं। वे उंगलियों से खड़िया की गीली सतह पर तरह-तरह के छोहा (चिन्ह) निकालती थीं।
जब अपना घर बनाने के लिए सोनाबाई ने एक बार मिट्टी हाथ में ली, तो फिर वह कभी जैसे छूटी ही नहीं। पता नहीं कि सोनाबाई ने मिट्टी को नहीं छोड़ा या की मिट्टी ने सोनाबाई को नहीं छोड़ा?
बहरहाल, सोनाबाई ने बताया था कि उनके पति होली राम खेत से लौटते तो उन पर ग़ुस्सा करते- “जब देखो तब हाथ में चिखला (मिट्टी) धरे रहती है!” पर पति के इस ग़ुस्से का सोनाबाई पर कोई असर नहीं होता। उनके घर से जाते ही सोनाबाई फिर से हाथ में चिखला धर लेती और काम में जुट जाती।
आँगन से कमरों को अलग करते हुए जो बरामदे थे, वहां धीरे-धीरे एक अलग ही दुनिया आकार लेने लगी। बांस की छोटी-छोटी पतली खपच्चियों को मोड़कर, उसे सूत से बांधकर और उस पर फिर मिट्टी चढ़ाकर सोनाबाई ने नाना आकारों की झिंझरी (जाली) बनायी और तब उस पर कहीं ढोल बजाने वाला आदमी, कहीं झांकता हुआ शरारती बच्चा, कहीं बिल्ली, शेर, गाय, चिड़िया, सांप, सब एक-एक कर प्रकट होने लगे।
कोना-कोना जीवन
धीरे-धीरे बरामदे से लगी कमरे की बाहरी दीवार भी विस्तृत लैंडस्केप में बदल गयी, जिस पर कहीं पीपल की फैली डालों पर उत्पात मचाते बंदर थे तो कहीं सींग से सींग भिड़ाकर लड़ने का बहाना करते बैल थे। दूर क्षितिज पर एक दूल्हा अकेला ही घोड़े पर चढ़कर जा रहा था! और दीवार के दूसरे छोर पर लड़के-लड़कियों का सैला नृत्य करता समूह गुज़र रहा था। दीवार पर बने देथा (आले) में दो बकरियां सुस्ताती बैठी थीं। सोनाबाई के हाथ रुकने का नाम ही नहीं लेते थे। घर का कोई कोना अब सूना नहीं था। हर तरफ़ जीवन था। दोंदकी-वह कोठी जिसमें अगले वर्ष के लिए बीज रखा जाता है, वह भी गाय-बैलों की आरामगाह बन गयी थी।
अपने सूने मकान और उसमें अपने अकेलेपन के इर्द-गिर्द सोनाबाई ने जीवन का ऐसा मेला रचा कि जिसमें तमाम नृत्य- त्योहार, जंगल, खेत-खलिहान लहलहा उठे।
अपने अकेलेपन से ऐसा मौलिक प्रतिशोध?
एक क्षण के लिए भ्रम होता है कि बात पारंपरिक कलाकार की नहीं बल्कि, किसी आधुनिक चेतना के कलाकार की हो रही है। लेकिन जो जीवित है, उसी को तो परंपरा कहेंगे? और वह जीवित तभी बच सकती है जब उसकी सिंचाई नित नयी रीझ-बूझ, नये आविष्कारों से होती हो। जैसा कि ज्योतिंद्र जैन सोनाबाई पर लिखे अपने लेख में लिखते हैं-“She revitalised and built upon an inherited collective tradition and thereby initiated and established her own tradition which again became a collective tradition but with a difference.”
सोनाबाई ने अपने घर-आंगन में मिट्टी से जो सृष्टि रची, उसकी कितनी, कैसी परंपरा सरगुजा में रहने वाले रजवार और अन्य समुदायों के बीच थी, इस बात की विधिवत तहक़ीक़ात शायद परंपरा के विस्तृत और लचीले फ़लक की हमारी समझ को कुछ और खोलेगी।
सहज मौलिक प्रतिभा
1993 में सोनाबाई से मैंने पूछा था कि उन्होंने यह मिट्टी का काम किससे सीखा? जवाब में उन्होंने कहा था कि बचपन में मां घर सजाती थी और उसका हाथ बटाते हुए उन्होंने यह काम माँ से सीखा था। तब मैंने, उनकी इस बात को शब्दशः मान लिया था। उसमें आश्चर्य या संदेह की कोई बात नहीं थी क्योंकि पारंपरिक कला तो ऐसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होती जाती है। लेकिन बाद में, इस संबंध में लोगों से बातचीत करने पर अलग ही तथ्य सामने आया जो मुझ जैसे नौसिखिया शोधकर्ता के लिए बेहद चौंकाने वाला था।
1983 में, भारत भवन, भोपाल की आदिवासी एवं लोक कला दीर्घा के लिए संकलन करने हेतु एक दल सरगुजा ज़िले के गांवों में पहुंचा था। दल में अग्रणी चित्रकार और छायाकार श्री ज्योति भट्ट भी थे।
दल की एक दूसरी सदस्य, अर्चना वर्मा ने बताया कि वे लोग मुख्य रूप से वहां टेराकोटा एकत्रित करने गये थे। जब उन्होंने इस बारे में अंबिकापुर, सर्किट हाउस के चौकीदार से यूं ही ज़िक्र छेड़ा तो उसने पुहपुटरा गांव की सोनाबाई और उनके घर का हवाला दिया और कहा कि वह कुम्हार तो नहीं है पर उनका घर मिट्टी के जानवर आदि से सजा हुआ है। अगले दिन दल के लोग सोनाबाई के घर पहुंचे तो उसे देख कर दंग रह गये। चौकीदार की बात सही थी, सोनाबाई के घर का कोना-कोना नाना रूपकारों से जगमग था।
उन लोगों ने उसके बाद पुहपुटरा और आसपास के गांव में कई घर देखे लेकिन, वैसा काम उन्हें किसी और घर में देखने को नहीं मिला। यानी, सोनाबाई के घर के भीतर की अजब-ग़ज़ब दुनिया नितांत उनका अपना सृजन थी। पारंपरिक कलाओं से जुड़ी यह धारणा कि वह लगभग ज्यों की त्यों, पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती है और उनमें व्यक्तिगत हस्ताक्षर की कोई गुंजाइश नहीं होती- इस बात को, इस खोज ने हिला के रख दिया।
2004 में जब मैं सोनाबाई के गांव गयी तो मैंने उनसे वही प्रश्न दुबारा पूछा- यह काम आपने किससे सीखा? और उनका जवाब भी वही था कि बचपन में मां के साथ सीखा। इस बार, उनके बेटे-दरोगा राम ने जोड़ा- “नहीं यह सब कुछ ख़ुद ही बनायी हैं।” तब सोनाबाई ने जोड़ा- “माँ झिंझरी, जानवर, मूर्ति नहीं बनाती थी, वह मैंने सहज ही मन से बनाये।” वाक्य के उत्तरार्ध में उनकी ज्यादा रुचि नहीं जान पड़ती थी। मैंने पूछा आपको कैसा लगता है जब लोग आपका काम देखने, देश-विदेश बुलाने के लिए आते हैं?

वह बोलीं,-“पहले तो बाहर जाने के नाम से मुझे बहुत डर लगता था। मैं तो गाड़ी देखते ही भागकर छिप जाती थी। यहां सब बनाया तो इससे मान-सम्मान मिलेगा, ऐसा नहीं जानती थी। घर सुघड़ लगेगा बस यही सोचकर बनाती थी।”
ऐसे बन गयी परंपरा
इस यात्रा में भी मैं सोनाबाई के घर के अलावा, आसपास के इलाक़े में बहुत-से घर देखने गयी। क़रीब बारह-पंद्रह घर ऐसे थे जिनमें सोनाबाई के जैसा थोड़ा ना थोड़ा काम था। उन घरों में जब लोगों से यही सवाल दोहराया कि उन्होंने यह काम किससे सीखा? तब जवाब में सभी ने, स्वयं अपने मन से ऐसा करने की बात कही। यह पूछने पर कि क्या उन्होंने सोनाबाई का घर देखा है? उनमें से कई ने इनकार किया। जबकि उनके घरों की दीवार पर वही दृश्य बने थे, जिन्हें सोनाबाई बनाती आयी हैं, यहां तक कि पेड़ पर चढ़े बंदरों की संख्या, पेड़ की पत्तियां भी वैसी ही थीं।
जो महत्वपूर्ण बात इससे सामने आती है, वह ये, कि समय के साथ कलाकारों के सोचने में एक निर्णायक मोड़ आया है। अब वह स्वयं को परंपरा का हिस्सा कहलाने के इतने उत्सुक नहीं थे। वे ज़ोर देकर कह रहे थे कि उन्होंने स्वयं यह काम किया है, किसी से नहीं सीखा…
बहरहाल, सोनाबाई की कथा के छूट गये तार को फिर से पकड़ते हैं। भारत भवन से आये लोगों ने उनके काम की ख़ूब प्रशंसा की और कहा कि वह उनका कुछ काम ख़रीदकर भोपाल में बन रहे कला संग्रहालय के लिए ले जाना चाहते हैं। होलीराम को बहुत आश्चर्य हुआ कि इन मिट्टी के जानवरों के लिए लोग इतने पैसे देने को तैयार हैं। वे बोले- “ऐसे जानवर तो घर के हर कोने में रखे हैं।” सोनाबाई ने बताया- “वो लोग इतने अच्छे थे और हमारे घर इतनी दूर से आये थे कि उन्हें मना कैसे करती? लेकिन जब उन्होंने भोपाल चलने की बात कही तो मुझे बहुत डर लग गया और मैं भाग गयी!”
सोनाबाई ने यह भी बताया कि उन्होंने स्वयं अपनी ओर से पैसे लेने से मना किया था। और यह भी कि जब एक जानवर की आकृति को जाली में से अलग करने के लिए आरी से काटा जा रहा था तो उनके आंसू आ गये थे। बहरहाल, उन लोगों ने सामान पैसा देकर ही लिया था। 1983 में श्री ज्योति भट्ट द्वारा खींचे गये उनके घर के चित्रों के आधार पर सोनाबाई को अपनी कला के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सोनाबाई के काम के ख़रीदे जाने और पुरस्कार मिलने की ख़बर आसपास के गांव में आग की तरह फैल गयी।
उनके बेटे दरोगा राम बताते हैं कि तब लगभग हर घर ने यह काम शुरू कर दिया था लेकिन मिट्टी के काम में झंझट बहुत है, यह उतना आसान होता नहीं है जितना देखने पर लगता है। इसीलिए, कुछ ही समय बाद इस काम को करने वाले थोड़े से ही बचे। 1983 में घोषित यह पुरस्कार 1985 में दिया गया, जिसे लेने के लिए वे अपने बेटे के साथ दिल्ली गयी थीं। 1986 में उन्हें मध्य प्रदेश सरकार के राष्ट्रीय तुलसी सम्मान से नवाज़ा गया। इसी साल वे दो माह के लिए अपने बेटे के साथ अमरीका भी गयी थीं, जहां उन्होंने मिट्टी की जाली, कोठी और प्लाईवुड पर वैसी ही उभरी हुई आकृतियां बनायीं जैसी कि वह घर की दीवारों पर बनाया करती थी।
(चित्र परिचय: 1. सोनाबाई के साथ शम्पा शाह। 2. सोनाबाई के घर के विभिन्न हिस्सों पर माटी कला। छायाकार: राजुला शाह)

शम्पा शाह
कला की दुनिया में रमी हुई यह कलाकार सिरैमिक की लोक कला और आधुनिक अभिव्यक्ति के बीच पुल बनाती रही है और मृदा कला के संरक्षण/संवर्धन में योगदान देती रही है। भारत के अनेक शहरों सहित अनेक देशों में कला प्रदर्शनियां आपके नाम हैं। आपकी शिल्प कला में मानवीय, प्राकृतिक एवं मिथकीय रूपों का एक अंतर्गुम्फन एक थीम की तरह प्रतिध्वनित होता है। भोपाल स्थित मानव संग्रहालय में 20 और कला के क्षेत्र में 30 से अधिक सालों तक सेवाओं के साथ ही साहित्य, संगीत व सिनेमा जैसे कलाक्षेत्रों में भी ख़ासा दख़ल।
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