
- January 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग नमिता सिंह की कलम से....
स्त्री-त्रासदी की शाश्वत गाथा फुलिया...
आलोचना और कहानी लेखन के क्षेत्र में अस्मिता सिंह का जाना-माना नाम है। लघु-पत्रिकाओं के अलावा अनेक पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कहानियाँ और लेख प्रकाशित होते रहते हैं। उनके संपादन में प्रख्यात कवि कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह की कविताओं के बाद वरिष्ठ आलोचक आनंद प्रकाश के रचना-कर्म पर भी पुस्तक का प्रकाशन हुआ है। लंबे समय तक हिन्दी साहित्य विषय के अध्यापन के बाद संप्रति वह एस.ए.डाँगे इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज़ एंड रिसर्च के निदेशक के पद पर सक्रिय हैं।
अस्मिता सिंह के दो कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। ‘फुलिया एक लड़की का नाम है’ दो वर्ष पहले अनुज्ञा बुक्स से प्रकाशित हुआ। उपन्यास के केंद्र में फूलकुमारी है और उसकी जीवन-गाथा है। फूलकुमारी संभवतः एक प्रतिनिधि स्त्री पात्र है और उस कालखंड में कमोबेश स्त्रियों की यही नियति होती थी। फूलकुमारी अपनी सहेलियों के समूह में सबसे अधिक जीवंत और सुंदर, चुलबुली है। उसके सपनों की दुनिया है और गाँव का पाहुन देव उससे प्रेम करता है। गाँव का सामंती परिवेश, हैसियत से बाहर जाकर सपने देखना, प्रेम करना… यही उसका अपराध बन जाता है। प्रेम करना परंपरा के ख़िलाफ़ है और समाज से लड़ने की उस परिवार की हैसियत नहीं है। पूरा घटनाक्रम फूलकुमारी को फुलिया के रूप में बदल देता है। वह गाँव वापस आती है तो अर्धविक्षिप्त है और अपनी पहचान खोकर दया की पात्र है, लेकिन अच्छे दिनों की आस में जीवित रहती है।
स्त्री-त्रासदी की यह शाश्वत गाथा है। स्त्री समाज की बात करें तो कहा जाता है कि मानव समाज के विकास का इतिहास स्त्री पराधीनता का इतिहास भी बन जाता है। कृषि आधारित सुदृढ़ सामंती व्यवस्था में स्त्री की भूमिका रसोईघर से लेकर शयनकक्ष तक ही सीमित होकर रह गयी। पति और परिवार की सेवा और वंशवृद्धि ही उसके कर्तव्य थे। पितृसत्तात्मक सामंती समाज का मज़बूत आधार सामाजिक नियम थे, जो धर्मसम्मत थे और अनिवार्य रूप से स्वीकार्य थे। सत्ता और धर्म का सदैव गठजोड़ रहा है और दोनों ही एक दूसरे के सहायक रहे हैं। यूरोप और पश्चिमी देशों में औद्योगिक क्रांति के साथ नये उभरते पूंजीवाद और सामंती व्यवस्था में टकराव हुए और निर्णायक संघर्ष भी हुए। नव पूंजीवादी समाजों में स्त्री श्रम को जगह मिली, वह घर से बाहर निकली, उत्पादन प्रक्रिया में उसकी भी हिस्सेदारी हुई और सामाजिक संरचना में तेजी से बदलाव आया। इसी के साथ प्रकारांतर से स्त्री-स्वातंत्र्य और अस्मिता के प्रश्न सामने आये।
भारत में स्त्री-स्वाधीनता और उसके बंदी जीवन की चर्चा 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध से शुरू हुई जब पारंपरिक पितृसत्तात्मक सोच से अलग कुछ समाज सुधारकों ने सुधार आन्दोलनों की शुरूआत की। अंग्रेज़ी शासन के दौरान नयी शिक्षा का प्रभाव, ब्रिटिश अफ़सरों की जीवन पद्धति, उनकी स्त्रियों का जीवन और साथ ही मिशनरियों का हिन्दुस्तानी लड़कियों के लिए शिक्षा का प्रचार-प्रसार जिसने इन आंदोलनों को जन्म दिया। सबसे पहले अमानवीय सती-प्रथा पर प्रहार हुआ। फिर बाल-विधवाएँ, उनका नारकीय जीवन, शिक्षा से वंचित और घर की चारदीवारी तक सीमित स्त्री समाज। इसीलिए पुनर्जागरण काल के समाज सुधारों की कार्यसूची में स्त्री शिक्षा और मानवोचित अधिकार सबसे ऊपर थे।

स्त्री संघर्षों का इतिहास लगभग दो सौ साल पुराना है। आज बहुत कुछ बदला है। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में समानता का अधिकार, आधुनिक शिक्षा, तेज़ी से होता शहरीकरण जिसने जनमानस और सामाजिक संरचना को बहुत बदला। इसके बावजूद सामंती मानसिकता आज भी व्याप्त है। अंधविश्वास और पितृसत्तात्मक सोच मौजूद है। गाँवों के सुदूर अंचलों में मानो विकास और आधुनिकता की रोशनी पहुँची ही नहीं।
अस्मिता सिंह का यह उपन्यास इसी पृष्ठभूमि में देखा जा सकता है। इसका कथानक उनकी स्मृतियों में बसा ननिहाल का गाँव है। वहाँ लड़कियाँ नहीं, केवल लड़के स्कूल जाते थे।लड़कियों के लिए सिर्फ़ घर-परिवार। स्त्री प्रताड़ना आम बात थी। संतान विहीनता के लिए स्त्री के प्रति हिंसा का एक दृष्टांत जहाँ सुंदर चाचा अपनी पत्नी को कूट रहे हैं- “बीज ही नहीं तो फल कहाँ से फलेगा। अंग्रेज़ी डॉक्टर को दिखाया, नीम हकीम को दिखाया… हार पाँच कर एक चेट से पैसा ख़र्च करके ख़ुद अपने लिए एक लड़की ठीक करके आया हूँ, सुनते ही रोना-धोना शुरू कर दी”। फिर अचानक उठकर सुन्दर चाचा ने दौड़कर चौखट के भीतर खींचकर मारपीट शुरू कर दी। औरतों की दुर्गति के अनेक दृष्टांत लेखिका ने चित्रित किये हैं।
कथानक की मुख्य पात्र फूलकुमारी की शादी देव कुमार से इसीलिए नहीं हो सकती क्योंकि फूलकुमारी का परिवार निर्धन है। एक संपन्न घर में ग़रीब की बेटी ब्याही जाये, यह गाँव-समाज को बर्दाश्त नहीं। फिर यह प्रेम विवाह है जो गाँव की कथित मर्यादा के विरुद्ध है कि प्रेम विवाह से पूरा गाँव बदनाम हो जाएगा और अंततः जल्दी-जल्दी फूलकुमारी ऐसे आदमी से ब्याही जाती है, जिसका परिवार उनसे भी ज़्यादा ग़रीब है। बड़ी उम्र का ‘बनमानुष’ सरीख़ा पुरुष, जिसे उसने कभी मन से पति स्वीकार नहीं किया।
बाद में रोज़ी-रोटी के लिए वह परिवार सहित कलकत्ता चली जाती है। वहाँ मेहनत मज़दूरी करके, फ़ैक्ट्री मालिकों के परिवारों में काम करके, उनकी मदद से बड़े बेटे को पढ़ाकर इंजीनियर बनाती है। बेटे की मदद से बेटी को अच्छे घर में ब्याहती है और छोटे बेटे को भी पढ़ाती है। बेटे का ब्याह एक बड़े परिवार में होता है लेकिन पत्नी से क्लेश के कारण वह आत्महत्या कर लेता है। फुलिया मानो फिर अनाथ हो गयी।
इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता ग्रामीण अंचल का सामाजिक वातावरण है, जिसका लेखिका ने सजीव वर्णन किया है। किशोरवय लड़कियों का मस्ती भरा जीवन… आँखों में भविष्य के सुनहरे सपने… परस्पर चुहलबाज़ी… ये जीवन्त वातावरण प्रस्तुत करते हैं।उपन्यास की भाषा और प्रकृति वर्णन प्रभावित करते हैं। यहाँ यह कहना ज़रूरी है कि कथानक के रूप में लेखिका के पास कच्चा माल है… स्मृतियाँ हैं, सामाजिक जीवन में स्त्री त्रासदी, परस्पर संघर्षों से भरी स्थितियों की जानकारी है, लेकिन घटनाओं के साथ स्थितियों का संयोजन और संतुलन रचना कौशल की मांग करता है। आशा है लेखिका की अगली औपन्यासिक कृति जल्द पढ़ने को मिलेगी।

नमिता सिंह
लखनऊ में पली बढ़ी।साहित्य, समाज और राजनीति की सोच यहीं से शुरू हुई तो विस्तार मिला अलीगढ़ जो जीवन की कर्मभूमि बनी।पी एच डी की थीसिस रसायन शास्त्र को समर्पित हुई तो आठ कहानी संग्रह ,दो उपन्यास के अलावा एक समीक्षा-आलोचना,एक साक्षात्कार संग्रह और एक स्त्री विमर्श की पुस्तक 'स्त्री-प्रश्न '।तीन संपादित पुस्तकें।पिछले वर्ष संस्मरणों की पुस्तक 'समय शिला पर'।कुछ हिन्दी साहित्य के शोध कर्ताओं को मेरे कथा साहित्य में कुछ ठीक लगा तो तीन पुस्तकें रचनाकर्म पर भीहैं।'फ़सादात की लायानियत -नमिता सिंह की कहानियाँ'-उर्दू में अनुवादित संग्रह। अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में कहानियों के अनुवाद। 'कर्फ्यू 'कहानी पर दूरदर्शन द्वारा टेलीफिल्म।
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कच्चा माल से संभवतः उपन्यासकार की अपार संभावनाओं की ओर संकेत किया गया है।
आपने परिपक्व आलोचक के रूप में रचना को उत्कृष्ट कृति में बदलने का वैचारिक मार्ग दिखाया है।
धन्यवाद एक नये उपन्यास की जानकारी के लिए।