जीलानी बानो, jilani bano, urdu writer
ग़ज़ाला तबस्सुम की कलम से....

जिनकी कहानी पर बनी 'वेलडन अब्बा', जीलानी बानो नहीं रहीं

            प्रसिद्ध और सम्मानित कथाकार जीलानी बानो का आज शाम (1मार्च 2026) को हैदराबाद में निधन हो गया। उनके निधन से उर्दू साहित्य का एक उज्ज्वल अध्याय समाप्त हो गया और कहानी की दुनिया एक युग-निर्माता लेखिका से वंचित हो गई।

जीलानी बानो का जन्म 14 जुलाई 1936 को उत्तर प्रदेश के शहर बदायूँ में हुआ। उनके पिता मौलाना हैरत बदायूनी प्रसिद्ध अदीब और शायर थे। उनके साहित्यिक वातावरण ने बचपन से ही उनकी वैचारिक और रचनात्मक परवरिश की। प्रारंभिक शिक्षा बदायूँ में प्राप्त की। बाद में जब उनके पिता हैदराबाद आ गए तो उन्होंने अपनी शेष शिक्षा वहीं पूरी की। 1957 में उन्होंने बी.ए. तथा 1959 में उर्दू में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। उनका विवाह उस्मानिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर, नाटककार और कवि डॉ. अनवर मुअज़्ज़म से हुआ।

उनकी साहित्यिक यात्रा का आरंभ 1952 में कहानी “एक नज़र इधर भी” के प्रकाशन से हुआ, जो पत्रिका अदब लतीफ में प्रकाशित हुई थी। उनका पहला कहानी-संग्रह “रोशनी के मीनार” और पहला उपन्यास “ऐवान-ए-ग़ज़ल” था। उन्होंने अपनी कहानियों और उपन्यासों में सामाजिक व्यवहार, वर्गीय अन्याय और विशेष रूप से वंचित एवं गरीब तबकों के जीवन को विषय बनाया। उनकी रचनाओं में स्त्री चेतना, सामाजिक दमन और आंतरिक पीड़ा का प्रभावशाली चित्रण मिलता है।

उनकी प्रमुख कृतियों में उपन्यास “ऐवान-ए-ग़ज़ल”, “बारिश-ए-संग”, “निर्वाण”, “जुगनू और सितारे” तथा “नग़्मे का सफ़र” शामिल हैं। कहानी-संग्रहों में “रोशनी के मीनार”, “पराया घर”, “रात के मुसाफ़िर”, “राज़ का किस्सा”, “यह कौन हँसा”, “तिरयाक”, “नई औरत”, “सच के सिवा”, “बात फूलों की” और “कुन” उल्लेखनीय हैं। उनकी कहानी “नरसिया की बावड़ी” पर प्रसिद्ध निर्देशक श्याम बेनेगल ने 2009 में फिल्म Well Done Abba बनाई, जिसे व्यापक सराहना मिली। उन्होंने हैदराबाद पर बनी दस्तावेज़ी फिल्म “हैदराबाद: एक शहर, एक तहज़ीब” की पटकथा भी लिखी। उनकी कहानियों का अनुवाद अनेक भाषाओं में किया जा चुका है।

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उनकी साहित्यिक सेवाओं के सम्मान में उन्हें आंध्र प्रदेश साहित्य अकादमी पुरस्कार, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, राष्ट्रीय हाली पुरस्कार, ग़ालिब पुरस्कार, महाराष्ट्र उर्दू अकादमी पुरस्कार, दोशीज़ा पुरस्कार तथा भारत सरकार का प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान सहित अनेक महत्वपूर्ण पुरस्कार प्रदान किए गए।

उनकी रचना “मोम की मरियम” उनके साहित्यिक कौशल का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें आंतरिक संघर्ष, सामाजिक पाखंड और स्त्री अस्तित्व की वेदना को अत्यंत गहन और प्रतीकात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है। उनकी भाषा सरल, प्रभावशाली और विचारोत्तेजक थी, जो पाठक को लंबे समय तक अपने प्रभाव में रखती है।

जीलानी बानो का जाना उर्दू साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति है। उनकी रचनाएँ सदैव जीवित रहेंगी और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेंगी।

ग़ज़ाला तबस्सुम

ग़ज़ाला तबस्सुम

साहित्यिक समूहों में छोटी-छोटी समीक्षाएं लिखने से शुरू हुआ साहित्यिक सफ़र अब शायरी के साथ अदबी लेखन और प्रेरक हस्तियों के साथ गुफ़्तगू से लुत्फ़अंदोज़ हो रहा है। एक ग़ज़ल संग्रह ने अदब की दुनिया में थोड़ी-सी पहचान दिलायी है। लेखन में जुनून नहीं, सुकून की तलाश है। आब-ओ-हवा के पहले अंक से ही जुड़े होना फ़ख़्र महसूस कराता है।

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