
- October 4, 2025
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नमिता सिंह (4 अक्टूबर 1943) ... कथा साहित्य का सुपरिचित एवं स्थापित नाम। जनवादी लेखक संघ की पदाधिकारी, प्राध्यापक, 'वर्तमान साहित्य' जैसी पत्रिकाओं की संपादक जैसे दायित्वों के बीच लगातार लेखन आपके व्यक्तित्व के पहलू रहे हैं। अनेक साहित्यकारों ने समय-समय पर आपके साथ वार्ता/साक्षात्कार किये हैं, जो 'हां मैंने कहा' शीर्षक से पुस्तकाकार प्रकाशित भी हुए। ऐसी ही वार्ताओं के कुछ अंश...
'वाद' के आधार पर नहीं रचा जाता साहित्य: नमिता सिंंह
शमा परवीन: साहित्य लेखन को क्या जीवन का उद्देश्य बनाया जा सकता है?
नमिता सिंह: साहित्य लेखन कोई ड्यूटी तो हैं नहींं। आदमी के भीतर की एक प्रवृत्ति जो अपने चारों ओर के परिवेश के प्रभाव से, उसकी बौद्धिकता और चिंतन के फलस्वरूप होने वाली प्रतिक्रिया से, अपने भीतर और बाहर के असंतोष और असंतुलन के फलस्वरूप होने वाली मन के भीतर की उथल-पुथल से पैदा होती है, वही उसे अभिव्यक्ति देने की ओर प्रेरित करती है। यह अभिव्यक्ति किसी भी रूप में हो सकती है। साहित्य रचना और लेखन अभिव्यक्ति का यही एक रूप है।
शमा: आज साहित्य में निरे ‘वाद’ छाये हुए हैं। आपके साहित्य में ‘वाद’ की क्या भूमिका है-क्या महत्व है?
नमिता: साहित्य रचना ‘वाद’ को आधार बनाकर नहीं होती। महत्वपूर्ण स्वयं रचना होती है और रचना-कर्म होता है। लेखक की दृष्टि, उसकी संवेदना का स्वरूप और दिशा उसकी रचना का महत्व निर्धारित करते हैं। रचनाकार अपनी सामाजिक दृष्टि के अनुसार साहित्य में मुद्दे उठाता है। पाठक उसे रचना के रूप में पढ़ते हुए निहितार्थ से विभिन्न प्रकार के प्रभाव ग्रहण करता है। हां! आलोचक अवश्य अपने सैद्धांतिक और ऐतिहासिक ज्ञान और अनुभव के आधार पर उसे श्रेणीबद्ध कर देता है। वास्तव में महत्वपूर्ण यह है कि रचना का समग्र प्रभाव जो पाठक के उपर पड़ता है, उसकी प्रकृति क्या है। क्या रचना सामाजिक प्रश्नों से दो—चार होती है? क्या लेखक का जन पक्षधरता का दृष्टिकोण रचना में उभरकर दिखायी देता है? क्या यथास्थितिवादी परिदृश्य से इतर किसी प्रकार के सामाजिक बदलाव के लिए संदेश वह रचना देती है? इसके विपरीत ऐसा भी साहित्य है, जो व्यापक सामाजिक सरोकारों से कतई नहीं जुड़ा है। नितांत वैयक्तिक भावों से भरे, नितांत अपने बेहद व्यक्तिगत अनुभव या रूढ़िवादी प्रवृत्तियों की हिमायत करने वाले साहित्य की भी कमी नहीं है। जनपक्षधरता और जनविमुखता के साहित्य को अब अगर कोई विभिन्न वादों से बांधकर प्रस्तुत करना चाहता है तो हम इसके लिए क्या कर सकते हैं।
शमा: सार्थक साहित्य सृजन के लिए आपकी दृष्टि में सबसे महत्वपूर्ण क्या है?
नमिता: साहित्यकार अपने पथ से अगर भटक जाता है तो साहित्य सृजन नहीं हो सकता। वर्तमान दौर समाज में बेहद उथल-पुथल का दौर है। मुक्त बाज़ार व्यवस्था तेज़ी से समाज का चेहरा बदल रही है। नये आर्थिक संबंधों के साथ-साथ नये मूल्य स्थापित हो रहे हैं। यह हो सकता है कि रचनाकार अपने समय के बदले यथार्थ को पहचान न पा रहा हो। मुद्दे अभी उसकी पकड़ में न आ रहे हों।
शमा: साहित्य सृजन में नये प्रयोगों के लिए कितनी गुंजाइश हो सकती है?
नमिता: सृजन चाहे साहित्य हो या चाहे कला-रूप हों, हमेशा प्रयोगधर्मी होता है और इसीलिए निरंतर बदलाव उसकी प्रकृति है। यह प्रयोग साहित्य में अधिकतर शिल्पगत होते हैं। कथ्य तो अपने आसपास अपने परिवेश और प्रवृत्तियों से ही लिया जाता है। बहुत बार कथ्य के अनुरूप नये शिल्प का गठन भी होता है। जब गंभीर मुद्दे हों, साहित्यकार का सामाजिक दायित्व बोध प्रखर हो, तब रचना की कला, रचनाकार का कौशल कथ्य केंद्रित होता है। जैसा कि मैंने पहले भी कहा, गहन सामाजिक बोध और समाजगत अध्ययन रचना को गंभीर और प्रभावी बनाते हैं। प्रेमचंद की सामाजिक पक्षधरता उनके साहित्य की केंद्रीयता है। उनकी कहानियां हमारा सामाजिक ज्ञान बढ़ाती हैं और समयगत सामाजिक प्रवृत्तियों को इंगित करती हैं।
‘प्रयोग केवल प्रयोग के लिए’ या ‘बदलाव केवल बदलने के लिए’ जैसे भाव साहित्य की सार्थकता को नष्टक करते हैं। केवल कला अथवा शिल्प के बल पर कोई रचना प्रभावी नहीं बनती। उसे सफल बनाने के लिए एक अच्छी कहानी की ज़रूरत होती है। अगर कथ्य हमारे दिल से निकला है, उसकी बात में ताक़त है तो कहानी प्रभाव छोड़ेगी, वर्ना अधिक से अधिक दो-चार दिन बाद हम उस कहानी को भूल जाएंगे। यही बात कविताओं के लिए भी है। हर पत्रिका में एक जैसे विषय पर एक जैसी ढेरों कविताएं मिल जाएंगी और यूं ही सर से होकर गुज़र जाएंगी।
शमा: कविता की भाषा को क्या कथ्य की भाषा से अलग करके देखा जा सकता है?
नमिता: काव्य की भाषा, गद्य की अपेक्षा अधिक कलात्मक और संवेदनशील होती है। इसके अलावा जो सबसे ज़रूरी है कि काव्य की भाषा गतिमय होती है और लयबद्ध। लयात्मकता ही कविता को याद रखने योग्य बनाती है। कविता की ताक़त लोगों की ज़बान पर चढ़ जाने की क्षमता है। वही कविता ज़िंदा रहती है जो लोगों के दिमाग़ में हो—संदर्भ आने पर तुरंत उतरकर ज़बान पर आती हो। बहुत बार कविता की भाषा भी उसे सर्वकालिक और प्रासंगिक बनाती है। भाषा में तय करके उसे चमत्कारिक रूप प्रदान करना अथवा कलात्मकता के भार से बोझिल करना उसे जनसाधारण से दूर करना है।
कविता की भाषा का एक मानक नहीं हो सकता। सुभद्रा कुमारी चौहान की अमर कविता ‘झांसी की रानी’ की भाषा और निराला की ‘जुही की कली’ की भाषा लोकप्रिय कविता के दो छोर हैं। जनपक्षधरता की कविता और उनकी भाषा के रूप में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और रघुवीर सहाय की कविताएं या धूमिल की कविताएं सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं, जहां गहरे सामाजिक प्रसंग हैं और उनसे जुड़ी ये कविताएं पाठकों की ज़बान पर हैं। इसी तरह धूमिल की कविताएं जो आधुनिक भावबोध के साथ वर्तमान राजनीति पर टिप्पणी करती हैं और सहज रूप में याद रखी जाती हैं, लोक मुहावरों की तरह, सर्वकालिक प्रकृति की तरह दोहरायी जाती हैं। इसी क्रम में एक और उदाहरण नागार्जुन की कविताएं हैं।

मेराज अहमद: आपने अपने लेखन का आरंभ काव्य रचना द्वारा किया, फिर कथा साहित्य के क्षेत्र में आ गयीं, कोई विशेष कारण?
नमिता: मैंने अपने साहित्य लेखन की शुरूआत कविता से ज़रूर की लेकिन बाद में मुझे लगा कि जो कविताएं लिखी जा रही हैं, शायद उसमें मैं उसके अनुरूप ख़ुद को नहीं ढाल पा रही हूं। लेखन की अपनी एक परंपरा होती है और उस परंपरा में बहुत सारे साहित्य के रूप होते हैं। सत्तर का दशक अकविता का दौर था। इसमें अतुकांत कविताएं बहुतायत से थीं। मैं समझती हूं कि कविता के लिए चाहे अतुकांत ही क्यों न हो, उसमें लय, सुर, ताल बहुत ही ज़रूरी होता है और वह बाद के दौर में कविता में नहीं रही। दूसरी तरफ़, जब समाज के विभिन्न पहलुओं की तरफ़ ग़ौर किया तो मुझे लगा कि समाज की समस्याएं, विसंगतियां कथा माध्यम के साथ अधिक ताक़तवर ढंग से व्यक्त की जा सकती हैं।
मेराज: आपके लेखन ने एक लंबा रास्ता तय कर लिया है। आपके सामने आपका शुरूआती दौर भी है और वर्तमान समय का लेखन भी। मेरे कहने का अर्थ है कि जो भी परिवर्तन है वह समय के समानांतर है अथवा उसमें कोई विशिष्ट दिशा या गति लक्षित होती है?
नमिता: देखिए, जो साहित्य में परिवर्ततन होता है, वह समय के समानांतर ही होता है। उसमें तेज़ और धीमेपन की बात नहीं होती है। अलग-अलग युग और अलग-अलग समाज की अपनी प्रवृत्तियां और दिशाएं होती हैं और साहित्य उनसे अलग हटकर नहीं चलता है। अब आप यह कहें कि किन्हीं विशिष्ट परिस्थितियों में बहुत तेज़ी से ऐसी गति आयी हो, जो समय की सीमाओं को पार कर गयी हो तो इस संबंध में यह कहा जा सकता है कि साहित्य वर्तमान के साथ-साथ भविष्य से भी जुड़ा होता है। दरअसल ऐसा साहित्य जो भविष्य की दिशा निर्धारित करने की रूपरेखा नहीं तैयार करता उसकी कोई बहुत अहमियत नहीं होती है। साहित्य का संबंध वर्तमान के साथ-साथ भविष्य से भी होता है।
मेराज: कथा साहित्य की वर्तमान स्थिति में आप स्वयं को किस मुकाम पर पाती हैं?
नमिता: मुकाम तय करना मेरा काम नहीं है। यह तो आलोचकों को और पाठकों को तय करना है। लेकिन हां, मैं एक बात कहूंगी, आज का जो हमारा समय है, उसके जो ज़रूरी मुद्दे हैं उनकी आप अनदेखी नहीं कर सकते। आज के जो हालात हैं, समाज को बांटने वाली शक्तियां मुखर हो रही हैं, उस पर आप क्या कहेंगे?
मेराज: आप ही कुछ कहिए।
नमिता: समाज में जो बिखराव की प्रक्रिया शुरू हुई, उसकी सतह में जो मुख्य कारण है, वह है सत्ता-संघर्ष और उससे जुड़ी है सांप्रदायिकता। 70 के बाद हमने देखा कि सांप्रदायिकता का एक रूप जातिवाद भी अपने उत्कर्ष पर दिखायी देने लगा है। हम लोगों को इसके विरुद्ध किस तरह से कार्य करना चाहिए, यह मेरी चिंता है। इसी तरह से औरतों का भी मुद्दा वर्तमान में गंभीर विषय है और यह पूरे समाज के लिए, सामाजिकता के स्वरूप के लिए सोचने का विषय है। इसके साथ ही आज का समय है, जिसमें एक नयी चेतना के दर्शन भी होते हैं, जिसका संबंध दलितों से है और यह भी एक गंभीर मुद्दा है…
दलित लेखन में जो एक नज़रिया है कि सभी दलित शोषित और दमित हैं, इस पर चिंतन की आवश्यकता है। एक उदाहरण मैं देना चाहती हूं कि दलित शोषण के अलावा दलितों की अपनी सामाजिक स्थिति भी है। उसमें आंतरिक शोषण कम नहीं। इसके अन्य परंपरागत सामाजिक कारण भी हैं। मैं यहां विस्तार में नहीं जाना चाहूंगी लेकिन अनुभवजन्य सत्य की अभिव्यक्ति की ज़रूरत है। जो नारी विमर्श है, इसमें स्त्रियों का अपने पैरों पर खड़ा होना, उनका उत्थान, उनकी प्रगति एक बड़ा सामाजिक प्रश्न है। यही स्थिति दलितों के संबंध में भी है। हमें एक निश्चित ख़ाका तय करने के बजाय इसे एक संतुलित दृष्टि से देखना होगा। इस सबमें मुझे लगता है कि बाज़ारवाद का प्रभाव समाज में निरंतर बढ़ रहा है। यह प्रभाव राजनीति को प्रभावित कर रहा है, जिसका व्यापक प्रभाव धीरे-धीरे पूरे सामाजिक परिदृश्य में दिखायी देगा। सांप्रदायिकता भी इससे अछूती नहीं है।
डॉ. नवीनचंद्र लोहनी: वर्तमान में लेखक-संघों की आवश्यकता क्या है? क्या लेखकों के संघ उस भूमिका को निबाहने में समर्थ रहे हैं, जिसकी कि उनसे अपेक्षा थी?
नमिता: बहुत मज़बूत संगठन न भी हो तो भी एक ढीला-ढाला (लेखक) संगठन होने में कोई हर्ज नहीं है। लेखक संगठन के रूप में आप एक ट्रेड यूनियन बनाना चाहें तो यह क़तई संभव नहीं है। जहां तक लेखक का दायित्व है, उसे उन्मुक्त विचार व वातावरण चाहिए लेकिन जो मूलभूत सिद्धांत हैं (लेखक संगठनों के), वे भी सामाजिक दायित्व को पूरा करने के लिए हैं।
जनवादी लेखक संघ को ही लें, वहां कोई भी (लेखक) सदस्य हो सकता है जो साम्राज्यवाद, सामंतवाद, सांप्रदायिकता का विरोध करता है। ऐसे कुछ मोटे सिद्धांतों पर कोई सदस्य बनता है, तो संगठन लेखक को व्यावहारिक रूप में एक वैचारिक दिशा देता है। लेखक संगठनों के माध्यम से अगर संगठित रूप में कोई मुहिम चले तो उसकी सार्थक भूमिका का पता चलता है। आपातकाल के समय लेखक संगठित थे, उन्होंने संगठित होकर आवाज़ उठायी। आज सांप्रदायिकता के माहौल में भी लेखक सार्थक भूमिका निभा रहे हैं। लेखक संगठनों से इससे ज़्यादा अपेक्षा भी नहीं करनी चाहिए।
डॉ. नवीनचंद्र: आजकल एक बात चर्चा में रहती है कि इन संगठनों का उपयोग व्यक्तिगत राजनीति चलाने के लिए किया जा रहा है या फिर संगठनों के सिरमौर लोग संगठन का राजनीतिक इस्तेमाल कर रहे हैं। ये आरोप किस हद तक सही हैं और इनसे लेखक की उर्जा व क्षमता पर कितना असर पड़ता है? क्या लेखक के लिए ऐसे पदाधिकारी घातक नहीं हैं, जो लेखकीय उर्जा का उपयोग गुटीय राजनीति के लिए करते हैं?
नमिता: ऐसे पदाधिकारी संगठन के लिए ही घातक नहीं है बल्कि रचनाकार की सर्जनात्मकता के लिए भी घातक हैं। संगठन ऐसी स्थिति में रचनाकार को कुंठित करेगा। बल्कि मैं एक बात और महसूस करती हूं, मान लीजिए लेखक संगठन के पदाधिकारी अव्वल दर्जे के लेखक नहीं हैं, इस नाते नेतागीरी के बल पर अगर वे दूसरे लेखकों व रचनाकारों को दिशा निर्देश देते हैं तो संगठन की स्थिति हास्यास्पद भी होती है। कोई बड़ा लेखक किसी संगठन में है और छोटा लेखक पदाधिकारी है, तो ऐसी स्थिति में कोई बड़ा लेखक क्यों संगठन के निर्देश मानेगा? ऐसे अंतर्विरोध भी अक्सर सामने आते हैं। ऐसी स्थिति में संगठन चल नहीं सकता।
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