
- December 15, 2025
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग सलीम सरमद की कलम से....
जुड़ती कड़ी, सिमटता हिसार और अकबर इलाहाबादी
शेर का मा’नी वक़्त और हालात के साथ बदलता जाता है। लफ़्ज़ अपनी हैसियत से ज़्यादा नज़र आने लगते हैं। शायर को ख़बर भी नहीं होती कि जो बात उसने किसी और पहलू की मद्देनज़र कही थी, वो आइंदा दौर में समाज की कड़वी सच्चाई बन जाएगी। अकबर इलाहाबादी का नाम गाहे-गाहे सुनने और पढ़ने में आता रहा है मगर वो मौक़ा नहीं मिला कि उनकी शख़्सियत के पहलुओं पर ग़ौर करें और उन्हें समझें। उनका ये शे’र-
हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता
सियासत के पैराकारों को ख़ूब भाता है मगर अपनी ग़ज़ल के बंधन में इसकी शक्ल बदली हुई-सी लगती है। ख़ैर जब मज़हबी, समाजी और सियासी शायरी हो तो कबीर की तरह हद-बेहद के परे जाना सहल नहीं है। शायर को अक्सर बाब-ओ-अज़दाद के अक़ीदे घेर लेते हैं।
दिल मेरा जिससे बहलता कोई ऐसा न मिला
बुत के बन्दे मिले अल्लाह का बन्दा न मिला
मैं अपनी इस कमी से बख़ूबी वाक़िफ़ हूँ कि मैंने अकबर इलाहाबादी का मजमूई तौर पर कभी मुताला नहीं किया और न ही मेरी तबीयत ने उनकी शायरी की तरफ़ ज़ोर मारा, हाँ किताब के कवर पे छपा उनका दुबला-पतला चेहरा ज़रूर मील के पत्थरों जैसा मुझे बार-बार दिखायी दिया और इस तरह उनसे एक रिश्ता-सा बन गया। शायद मुझे उनके नज़दीक बहुत पहले आ जाना चाहिए था।
बज़्मे-यारां से फिरी बादे-बहारी मायूस
एक सर भी उसे आमाद-ए-सौदा न मिला
पाक सफ़ेद पैरहन से आरास्ता सूफ़ी, बोसीदा लिबास पहने दीवाना, हाथों में क़ासा थामे फ़क़ीर, पागल-सा भेस बनाये शायर, ऊंची तान में गाता हुआ मांझी, आधी-पूरी ईंटों को कन्नी से छांटता मिस्त्री, सुस्ताने बैठा मज़दूर मगर गुनगुनाते हुए… इन आवाज़ों में इतनी गुंजाइश होती है कि वो हद-बेहद के परे चली जाएं। मैं ऐसी आवाज़ के पीछे-पीछे भटकता रहा। क्या अकबर इलाहाबादी इनमें से कोई नहीं थे? क्या यही एक कारण था कि मेरी रसाई अकबर इलाहाबादी तक नहीं हुई? आख़िर क्यों मैं उनके खींचे हुए हिसार तक नहीं पहुँचा? क्या वो अपने ज़माने में क़ैद थे और मैं उनके ज़माने को दरयाफ़्त नहीं कर पाया?
फ़ितरत के हर असर में हुआ एक इंक़लाब
पानी फ़लक़ पे खेत में दाना बदल गया
दाग़ अब उनकी नज़र में है शराफ़त के निशाँ
नई तहज़ीब की मौजों में धुले जाते हैं
तब मग़रिबी तहज़ीब के साये हिंदुस्तानी जिस्मों पर पड़ रहे थे हालांकि हिंदुस्तानी मन की बुनत अलग है… वो बदलता हुआ लगता है मगर बहुत बदलता नहीं है। बाहरी बदलाव को वो शुरूआती दौर था और अकबर इलाहाबादी को पढ़ते हुए महसूस होता है कि वो उसी बदलाव से आख़िरकार ख़फ़ा थे।
बिठा चुका है ज़माना हमें भी मसनद पर
हुआ किये हैं जवाहर निसार हम पर भी
कबीर… ग़ालिब से राहत इंदौरी तक जुड़ती हुई कड़ियों में अकबर इलाहाबादी एक कड़ी हैं। अकबर इलाहाबादी मज़हब, मुल्क और मुहब्बत को एक साथ समेटना चाहते थे। कबीर की तरह उन्होंने अपने अक़ीदे तय नहीं किये और न वो ग़ालिब की तरह फ़लसफ़ी हैं… यक़ीनन कबीर का खींचा हुआ हिसार सिमटता गया। अकबर इलाहाबादी भी सीमाएं तय नहीं कर पाये।
जो ग़ुब्बारे थे वो आख़िर गिर गये
जो सितारे थे चमकते ही रहे
चर्ख़ से कुछ उम्मीद थी ही नहीं
आरज़ू मैंने कोई की ही नहीं
सदियों फ़िलॉसफ़ी की चुनां और चुनीं रही
लेकिन ख़ुदा की बात जहां थी वहीं रही
पायी न किसी में बू वफ़ा की
चाहा था कि हो रहें किसी के
तौहीद का मसअला है असली
बाक़ी हैं शगूफ़े हिस्ट्री के
हिन्द से आपको हिजरत हो मुबारक अकबर
हम तो गंगा ही पे अब तो मार के आसन बैठे
ज़िन्दगानी का मज़ा मिलता था जिनकी बज़्म में
उनकी क़ब्रों का भी अब मुझको पता मिलता नहीं
ये मेरे सामने शेख़-ओ-बिरहमन क्या झगड़ते हैं
आकर मुझसे कोई पूछे कहूँ दोनों का क़ाइल हूँ
उनके असलूब में इंस्टैबिलिटी-सी है… उनमें बिखरे हुए रंग हैं, इसके बावजूद उनका अपना एक रंग है जिसे मज़ाहिया और संजीदा का मेल कह सकते हैं जो आपके साथ रहता है और वही उन्हें मुन्फ़िरद बनाता है। अकबर इलाहाबादी के गुज़रे वक़्त और हालात में कहे गये शेर मुझे आज ज़्यादा सटीक नज़र आते हैं।
ता’लीम का शोर ऐसा तहज़ीब का ग़ुल इतना
बरकत जो नहीं होती निय्यत की ख़राबी है
वह लूट के भागा करता है
यह आग लगाये जाता है
इतनी आज़ादी भी है ग़नीमत
सांस लेता हूँ बात करता हूँ
मज़हबी बहस मैंने की ही नहीं
फ़ालतू अक़्ल मुझमें थी ही नहीं

सलीम सरमद
1982 में इटावा (उ.प्र.) में जन्मे सलीम सरमद की शिक्षा भोपाल में हुई और भोपाल ही उनकी कर्म-भूमि है। वह साहित्य सृजन के साथ सरकारी शिक्षक के तौर पर विद्यार्थियों को भौतिक विज्ञान पढ़ाते हैं। सलीम अपने लेखन में अक्सर प्रयोगधर्मी हैं, उनके मिज़ाज में एकरंगी नहीं है। 'मिट्टी नम' उनकी चौथी किताब है, जो ग़ज़लों और नज़्मों का संकलन है। इससे पहले सरमद की तीन किताबें 'शहज़ादों का ख़ून' (कथेतर) 'दूसरा कबीर' (गद्य/काव्य) और 'तीसरा किरदार' (उपन्यास) प्रकाशित हो चुकी हैं।
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