
- January 5, 2026
- आब-ओ-हवा
- 2
पुस्तक चर्चा रति सक्सेना की कलम से....
हिंदी कविताओं की किताब अहिन्दीभाषियों के लिए
2025 में एक संग्रह आया, जिसका संबंध रहा हिन्दी कविता से और इस पर चर्चा हो रही है अंग्रेज़ी मीडिया और साहित्यकारों के बीच। यह एक अद्भुत संग्रह है- Perennial (The Red River book of Hindi Poetry of 21st century) इसके संपादक द्वय हैं, सौरव राय और तुहिन भोवाल।
इसका लोकार्पण बेंगलूरु लिट फ़ेस्टिवल में हुआ था। तबसे इस पर काफ़ी चर्चा भी हो चुकी है। हिन्दी के लेखकों के लिए यह सम्मान की बात है कि सौरव ने अपनी कई पन्नों लम्बी भूमिका में हिन्दी की सदाबहार स्थिति पर विस्तार से चर्चा की है। आज़ादी की लड़ाई से हिंदी (भारतेन्दु को याद करते हुए) आमजन की बोलियों, भाषाओं ओर सूफ़ी भक्ति साहित्य से रस लेते हुए किस तरह साहित्य की भाषा बनी, इसके बारे में सौरव ने विस्तार से लिखा है। मैंने किसी कविता संग्रह की इतनी बड़ी भूमिका नहीं देखी है। इस भूमिका की आवश्यकता इसलिए भी पड़ी कि यह संग्रह अंग्रेज़ी के पाठकों के लिए विशेष रूप से है, इसलिए हिन्दी के सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक योगदान पर बात करना आवश्यक था।
सौरव स्वयं अच्छे कवि हैं, जो हिन्दी व अंग्रेज़ी दोनों में लिखते हैं। तुहिन स्वयं लेखक होते हुए भी अच्छे अनुवादक रहे हैं। संग्रह में कुंवर नारायण से लेकर विहाग वैभव तक चालीस कवियों की कविताओं को छब्बीस अनुवादकों की सहायता से प्रस्तुत किया है। कवियों के नाम इस तरह हैं: कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, चन्द्रकान्त देवताले, विष्णु खरे, ममता कालिया, अशोक वाजपेयी, राजेश जोशी, वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल, ज्ञानेन्द्रपति, ओम प्रकाश वाल्मीकि, उदय प्रकाश, मनमोहन, रति सक्सेना, अरुण कमल, असद ज़ैदी, रत्नशंकर यादव, विद्रोही, देवीप्रसाद मिश्र, अनीता वर्मा, गगन गिल, सुधीर रंजन सिंह अनामिका, सविता सिंह, असंग घोष, साविता भार्गव, केशव तिवारी, नीलेश रघुवंशी, महेश वर्मा, अनुराधा सिंह, निर्मला पुतुल, हेमन्त देवलेकर, फ़रीद ख़ान, मनोज कुमार झा, मोनिका कुमार, गीत चतुर्वेदी, जेसिंता केरकेट्टा, लवली गोस्वामी, पार्वती तिर्के, अदनान कफ़ील दरवेश, विहाग वैभव। इनके साथ छब्बीस अनुवादक हैं।
मुझे पहले आश्चर्य हुआ था कि सौरव ने किस तरह से चुनाव किया होगा? हिन्दी बड़े भूभाग में विस्तरित है, तो केवल चालीस कवियों को चुनना आसान तो नहीं है। विचित्र बात यह भी है कि नक्षत्र से दैदीप्यमान कवियों के साथ हाशिये में पड़े कवियों (साहित्यिक प्रोपैगण्डा में) को भी चुना है। निसन्देह कठिन काम रहा होगा। लेकिन उनकी भूमिका में इन चालीस कवियों के अतिरिक्त अनेक कवियों के बारे में चर्चा है, उनके काव्य कर्म पर भी विस्तार से कहा गया है। जैसा कि सौरव ने साक्षात्कार में बताया है कि उन्होंने सभी विषयों को केन्द्र में रखा, इस कारण से किसी विशेष विषय पर लिखने वालें कवियों में चुनाव होना ही था। यहां कविता के सभी रूप दिख रहे हैं, चाहे वे क्रान्ति के स्वर हैं, या आदिवासी अस्मिता, स्त्रीवाद है या दलित कविता अथवा लीक से हटकर शैली में लिखी कविता। इस दृष्टि से भी कवियों का चुनाव करना आसान नहीं था। वे पहले केवल पन्द्रह कवि की कविताओं को लेना चाहते थे, लेकिन कम से कम करने पर भी चालीस कवियों की कविताओं का चुनाव किया।

मुझे जिस बात ने प्रभावित किया, वह यह था कि दोनों संपादकों का चुनाव मौलिक था, संभवतया वे उनको भी जोड़ पाये, जिनकी शैली और झुकाव केन्द्र के स्वरों से इतर था। इस पुस्तक की तैयारी में लम्बा वक़्त लगा। मुझे जिस बात ने और भी प्रभावित किया, वह था कवि परिचय। अधिकतर कवि से उनका परिचय मांग लिया जाता है, लेकिन सौरव ने एक प्रश्नावली तैयार की, क़रीब क़रीब साक्षात्कार जैसी। उस साक्षात्कार के अनुरूप संपादक ने स्वयं एक परिचय तैयार किया, जो पढ़ने में रोचक है।
अधिकतर जो केन्द्र की कविता से कुछ अलग लिख रहे हैं, उन्हें नकार दिया जाता है, लेकिन यहां सौरव का अध्ययन और केन्द्र से विलग सोचने की शक्ति काम आयी। हालांकि सौरव स्वीकारते हैं कि वे हिन्दी के केन्द्र में स्थापित कवियों प्रभावित रहे हैं, उनसे सीखते भी रहे, लेकिन इस चयन में उनकी निर्भीकता और ईमानदारी दिखती है।
तुहिन बेहतरीन कवि, अनुवादक हैं, उन्होंने अनुवादों को तराशा है, काम किया है। उन्होंने एक पते की बात साझा की है कि अधिकतर अनुवादक कविता को पंक्ति दर पंक्ति अनूदित करते हैं, जिससे कविता का मूल भाव कभी-कभी खो जाता है। तुहिन ने स्वयं जटिल कविताओं का अनुवाद किया है। यह किताब कविता के अनुवाद की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
अन्त में रेड रिवर के पब्लिशर दिव्यज्योति का भी योगदान महत्वपूर्ण है। कृत्या टाक में दिव्यज्योति से संवाद हुआ था, वे बेहतरीन कवि हैं, जो अपने को एक्सीडेंटल पब्लिशर मानते हैं। उनकी दूरदृष्टि यहां दिखती है। आजकल रेड रिवर बेहतरीन कविता की पुस्तकें लेकर आ रहा है।
मुझे विश्वास है कि यह संग्रह हिन्दी कविता के वर्तमान परिदृश्य के बारे में अहिन्दी प्रदेश और विदेशी पाठकों को अच्छी जानकारी देगा। इस तरह की मेहनत और ईमानदारी दुर्लभ है, अतः प्रकाशक और संपादकद्वय के साथ साथ अनुवादक भी बधाई के पात्र हैं।

रति सक्सेना
लेखक, कवि, अनुवादक, संपादक और वैदिक स्कॉलर के रूप में रति सक्सेना ख्याति अर्जित कर चुकी हैं। व्याख्याता और प्राध्यापक रह चुकीं रति सक्सेना कृत कविताओं, आलोचना/शोध, यात्रा वृत्तांत, अनुवाद, संस्मरण आदि पर आधारित दर्जनों पुस्तकें और शोध पत्र प्रकाशित हैं। अनेक देशों की अनेक यात्राएं, अंतरराष्ट्रीय कविता आंदोलनों में शिरकत और कई महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान आपके नाम हैं।
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इसकी तो आवश्यकता है विषय और इस पर पुस्तक दोनों की ।
बेहतरीन चर्चा।
अच्छी जानकारी मिली। मैं भी अनुवाद कार्य करती हूँ। मुझे ऐसे लोगों से जुड़कर खुशी होगी