
- January 27, 2026
- आब-ओ-हवा
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विवेक रंजन श्रीवास्तव नवंबर से अमेरिका प्रवास पर हैं और अन्य देशों की यात्राओं पर भी जाने वाले हैं। इस दौरान वह रोज़ाना शब्दों को समय दे रहे हैं। आब-ओ-हवा पर विशेष रूप से इस वैचारिकी, नोट्स, अनुभव आदि इंदराज के लिए यह कोना।
दूर देस में लेखक-8...
ब्रेन ड्रेन, ब्रेन गेन या ब्रेन वेस्ट?
कड़े वीज़ा प्रतिबंध प्रतिभा के लोक व्यापीकरण पर कुठाराघात हैं और इस पूरे परिदृश्य को यदि किसी एक मुहावरे में समेटना हो तो वह है ‘घर का न घाट का’। यह मुहावरा केवल भावनात्मक पीड़ा का संकेत नहीं देता बल्कि आधुनिक वैश्विक व्यवस्था में प्रतिभा के साथ हो रहे बौद्धिक अन्याय की सटीक व्याख्या भी करता है। आज का मेधावी युवा सीमाओं से परे सोचता है पर नीतियां उसे बार-बार याद दिलाती हैं कि वह किसी न किसी फ़ाइल का अस्थायी नाम मात्र है।
वैश्वीकरण ने यह विश्वास जगाया था कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं होगी और प्रतिभा वहां फलेगी जहां उसे सबसे उपजाऊ ज़मीन मिलेगी। परंतु व्यवहार में यह सपना कड़े वीज़ा नियमों की दीवार से टकराकर चूर हो जाता है। विशेष रूप से वे युवा जो उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाते हैं और वर्षों की साधना के बाद उस मुकाम तक पहुंचते हैं, जहां वे समाज को वास्तविक लाभ दे सकते हैं। वहीं उन्हें बताया जाता है कि अब समय पूरा हुआ और लौट जाना चाहिए। यह वह क्षण होता है जब वे न उस देश के रह जाते हैं जिसने उन्हें गढ़ा और न उस देश के जहां से वे चले थे।
आई.आई.टी. जैसे संस्थानों से निकले मेधावी छात्र जब अमेरिका जैसे देशों में शोध और तकनीक के क्षेत्र में प्रशिक्षण पाते हैं, तो प्रारंभिक वर्षों में वे सीखने वाले होते हैं। समाज उनसे बहुत अपेक्षा नहीं करता। पर पांच-छह वर्षों के बाद वही युवा नवाचार के वाहक बनते हैं, नयी सोच नये समाधान और नयी दृष्टि लेकर खड़े होते हैं। दुर्भाग्य यह है कि यही वह समय होता है जब वीज़ा की समयसीमा उनकी राह रोक लेती है। परिणामस्वरूप वे उस समाज को कुछ दे ही नहीं पाते, जिसके संसाधनों से उन्होंने सीखा और जिस समाज ने उन्हें अवसर दिया।
वापसी का विकल्प काग़ज़ों में सरल लगता है पर जीवन में उतना ही कठिन सिद्ध होता है। वर्षों विदेश में रहने के बाद उनका अपने देश से पेशेवर संपर्क कमज़ोर हो चुका होता है। तकनीकी परिवेश बदल चुका होता है संस्थागत ढांचे नये समीकरणों में बंध चुके होते हैं। वे लौटते तो हैं पर स्वागत में अवसरों की पगडंडी नहीं मिलती। वहां वे बाहरी हो जाते हैं और यहां पहले से ही बाहरी थे। इस तरह वे सचमुच न घर के रह जाते हैं न घाट के।
इस स्थिति में सबसे बड़ा नुक़सान समाज का होता है। न तो मेज़बान देश उस परिपक्व प्रतिभा का लाभ उठा पाता है और न ही मूल देश उसे समुचित स्थान दे पाता है। यह न तो ब्रेन ड्रेन है न ब्रेन गेन बल्कि ब्रेन वेस्ट है। वर्षों की शिक्षा, प्रशिक्षण और अनुभव एक ऐसे ख़ालीपन में गिर जाता है जहां उसका उपयोग संभव नहीं हो पाता। प्रतिभा का लोक व्यापीकरण जो ज्ञान को समाज के व्यापक हित में प्रवाहित करने की प्रक्रिया है वह यहीं आकर रुक जाती है।
विडंबना यह है कि वीज़ा नीतियों को अक्सर रोज़गार सुरक्षा और राष्ट्रीय हित के नाम पर कठोर बनाया जाता है। पर यह नहीं सोचा जाता कि उच्च कौशल वाली प्रतिभा रोज़गार छीनती नहीं बल्कि नये अवसर पैदा करती है। जब ऐसी प्रतिभा को वीज़ा के कारण बाहर किया जाता है तो समाज अपने ही भविष्य को संकुचित करता है। यह वैसा ही है जैसे फल से लदे पेड़ को इसलिए काट दिया जाये कि उसकी जड़ें कहीं और की मिट्टी से आयी थीं।
अंततः यह प्रश्न केवल आव्रजन नीति का नहीं बल्कि दृष्टिकोण का है। यदि प्रतिभा को साझा मानवीय पूंजी माना जाये तो उसे न घर का न घाट का बनने से बचाया जा सकता है। अन्यथा हम ऐसे समय के साक्षी बनते रहेंगे, जहां सबसे योग्य लोग सबसे अधिक असहाय होंगे और समाज यह कहते हुए आगे बढ़ जाएगा कि नियम तो नियम हैं। पर इतिहास गवाह है कि जब नियम मानव संभावनाओं से बड़े हो जाते हैं, तब विकास ठहर जाता है और सभ्यता अपने ही बनाये तटों के बीच फंसी रह जाती है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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